इक्कीसवीं सदी की हिन्दी युवा कविता : अरुणाभ सौरभ

samvadiya

इस सदी ने अपनी उपलब्धियों और सीमाओं का  एक दशक पार कर लिया है। उल्लेखनीय है कि इसमे एक तरफ ऐसे युवाओं कि फौज है जो बहुराष्ट्रीय कम्‍पनियों मे काम कर उनके उत्पादों के उपभोग, प्रसार को बढ़ावा दे रहे हैं। एक तरफ सिनेमा, विज्ञापन पर बाज़ार का पूरा प्रभाव रेखाँकित किया जा सकता है, दूसरी तरफ अत्यल्प लेकिन गम्‍भीर और लीक से हटकर सोचने वाले युवा भी सक्रिय हैं जि‍न्‍होंने अपनी रचनाशीलता को आधार बनाकर इस सदी की दहलीज़ पर कदम रखा है। ऐसे युवाओं के अंदर एक चिंतनशील सक्रिय युवा मन है जो अल्प संख्या के बावजूद साहित्य-संस्कृति में अपनी सक्रियता बनाए हुए है। इन युवाओं को सराहना के साथ प्रशिक्षित उत्प्रेरित करने की ज़रूरत है, ताकि भविष्योन्मुखी रचनाधर्मिता को संरक्षित किया जा सके।

हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं ने इस दिशा में सराहनीय काम किए हैं। कई पत्रिकाएँ युवा पीढ़ी की रचनाशीलता पर विशेषांक प्रकाशित कर सार्थक विमर्श की संभावनाओं को जन्‍म दिया है। उदाहरण के लिए वागर्थ, नया ज्ञानोदय, हंस, कथादेश, युद्धरत आम आदमी, समसामयिक सृजन, परिकथा, युवा संवाद आदि पत्रिकाओं के विशेषांकों के अलावा लगभग सभी गम्‍भीर पत्रिकाएँ युवाओं की रचनाओं को पर्याप्त जगह देती हैं।

अभी हमारे सामने ‘संवदिया’ का अंक अक्तूबर 2012-मार्च 2013 है, जो कि युवा हिन्दी कविता पर केन्द्रित है। ‘संवदिया’ बिहार के एक छोटे से कस्बाई शहर अररिया से निकलने वाली पत्रिका है- पूरी लघुपत्रिका। अररिया बिहार का एक जिला मुख्यालय है। ज्ञात हो कि अमर कथाशिल्पी फणीश्‍वरनाथ रेणु का औराही हिंगना गाँव इसी जिला में है। कोसी नदी की उद्दंड धाराओं का दंश झेलता हुआ एक जनपद जिसको अपनी साहित्य विरासत को बचाने की एक मुहिम के तौर पे देखा जा सकता है। इसीलिए इस पत्रिका के प्रधान सम्‍पादक भोला पंडित ‘प्रणयी’ और सम्‍पादिका अनीता पंडित और इनकी पूरी टीम निःसन्देह एक मुकम्‍मल अभियान ‘संवदिया’ के जरिये चला रहे हैं। ‘संवदिया’ रेणु की एक कालजयी कहानी है जिसमें रेणुजी ने सम्‍वाद पहुँचाने वाले की मनोदशाओं का लाजवाब चित्रण किया है। अररिया से कोई पत्रिका निकले तो उसका नाम ‘संवदिया’ ही होना चाहिए, इस नाते इस पत्रिका ने अपनी विरासत को बचाने की एक छोटी-सी, मगर गम्‍भीर पहल की है।

बात जब युवा हिन्दी कविता की हो तो ऐसे में कई तरह की सोच, संस्कार, विचारधारा और आग्रहों के बीच पल रही युवा रचनाशीलता को यहाँ पर वाजिब तव्व्जो दी गई है। इस पूरे अंक में प्रकाशित युवाओं की कविताओं को तीन हिस्सों मे रेखाँकित किया जाना स्वाभाविक है। (1) वैसे युवा कवि जिनके एकाधिक संग्रह प्रकाशित हैं और चर्चित हैं, (2) वैसे युवा कवि जो निरंतर पत्र-पत्रिकाओं मे लिख रहे हैं, रेखाँकित किए जा रहे हैं। इंटरनेट पर भी सक्रिय हैं, पर अभी संग्रह जिनके पास नहीं हैं, (3) वैसे युवा कवि जिन्‍होंने अभी-अभी लिखना शुरू किया है। कुछ तो बिलकुल पहली बार यहीं प्रकाशित हो रहे हैं, इन सबमें अपार संभावनाएं लक्षित की जा सकती हैं।

मुझे लगता है कि इस अंक के अतिथि सम्‍पादक देवेन्द्र कुमार देवेश ने कुशल सम्पादन का परिचय दिया है। बकौल देवेश जी, ‘अंक में शामिल 92 युवा कवियों मे से अधिकांश की कवितायें कई वर्षों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाती रही हैं, कुछेक कवियों के एकाधिक संकलन भी प्रकाशित हुए हैं। कुछ कवियों की कवितायें सभा-संगोष्ठियों और पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ी और प्रकाशित होने वाली समीक्षात्मक रचनाओं में भी रेखाँकित हो रही हैं। लेकिन इनमे से कई कवि सोशल वेबसाइट पर ही सक्रिय हैं, अथवा अभी हाल में ही लिखना शुरू किया है…।’

इस अंक में शामिल 92 युवा कवि भारत के विभिन्‍न हिस्सों से आते हैं, उनका अपना-अपना लोकचित्त और लोकसंस्कार है। कुछ शहर और महानगर की पृष्ठभूमि से भी हैं। पर ज़्यादातर ऐसे हैं जो गाँव-कस्बे से उठकर नगर-महानगर की खाक छानकर वहीं के हो जाने की तैयारी में हैं। पर जो युवा नगर-महानगर में रहकर भी दिल में अपने गाँव-कस्बे को बचाकर रखे हुए हैं, अपनी लोक सम्‍वेदना के सहारे जो दिल्ली में रहकर भी सुपौल जैसा जीवन जीते हैं- जाहिर सी बात है कि उनकी दिल्ली और आलाकमान की दिल्ली में अंतर है। इसीलिए ऐसे युवाओं ने भीतर अपने गाँव और जनपदीय संस्कार की तासीर को बचाए रखा है। तो कई के यहाँ लोक जीवन का अद्भुत समायोजन भी ध्यानाकृष्ट करता है। स्त्री जीवन की भी सार्थक और प्रभावी दखल क़ाबिले तारीफ़ है। कहना न होगा कि विचारधाराओं का इंद्रधनुषी रंग और अभिव्यक्ति का प्रभाव इस अंक में देखते ही बनता है। सर्जना के विविध स्वरूपों की पहचान भी की गयी है। एक तरफ इसमें अच्युतानंद मिश्र, अनुज लुगुन, अमित कल्ला, ज्योति चावला, कुमार अनुपम जैसे बहुचर्चित युवा कवियों की शानदार कवितायें हैं, वहीं दूसरी ओर अनुप्रिया, कुमार सौरभ, आलोक रंजन, सुधांशु फिरदौस, रविशंकर उपाध्याय, मिथिलेश कुमार राय, स्वाति ठाकुर, बृजराज सिंह, श्यामवीर सिंह, बलराम कांवट, नताशा, शंकरानन्द, असमुरारी नन्दन मिश्र, त्रिपुरारी कुमार शर्मा, अमित मनोज, घनश्याम कुमार देवांश, आकाश कुमार जैसे गम्‍भीर किन्तु कम चर्चित युवाओं की बेहतरीन कवितायें भी हैं। साथ ही नित्यानन्द गायेन, कनुप्रिया, दिव्या तोमर, रति अग्निहोत्री जैसी हिन्दी की एकदम टटकी फसल है, जो इंटरनेट के जरिये से कविताओं की दुनिया में आए हैं।

और भी बहुत सारे कवि इस अंक में शामिल हैं जिनकी कवितायें अच्छी बन पड़ी हैं, जिनका नाम मैं नहीं ले रहा हूँ, वे सब भी इस अंक की उपलब्धि ही हैं। कई ऐसी नई पौध भी यहाँ मौजूद हैं जो अपने सृजन कौशल से एक विशेष काव्यात्मक रुझान को मजबूती से यहाँ रखते हैं। इस अंक को देखकर इतना तो अनुमान लगाना लाजिमी है कि युवा रचनाशीलता की ऊर्वर भूमि हिन्दी कविता को दिशा देने का काम करेगी। इक्कीसवीं सदी के एक दशक बाद की हिन्दी युवा कविता की दुनिया बहुरंगी है तो सम्‍वेदना के धरातल पर यहाँ विविधताएँ हैं। इस अंक में एक खास बात ये भी है कि सभी युवा मित्र कवियों के बीच यह रचनात्मक डायरेक्टरी का भी काम करेगा, क्योंकि ‘संवदिया’ के इस अंक में सभी मित्रों के सम्‍पर्क सूत्र भी दिये गए हैं, जिससे संवाद भी बना रहेगा।

इस अंक मे सम्‍पादकीय के बाद ‘वर्तमान समय में हिन्दी कविता के समक्ष चुनौतियाँ’ विषय पर एक गम्‍भीर चर्चा करवाने की कोशिश की गई है। इसमें आज के मूर्धन्य कवियों और साहित्यकारों ने हिस्सा लिया है, जिनमें चन्द्रकान्त देवताले, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, अशोक वाजपेयी, लीलाधार जगूड़ी, नन्द किशोर आचार्य, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, अरुण कमल, मदन कश्यप, अनामिका, निरंजन श्रोत्रिय जैसे सीनियर कवियों-आलोचकों ने वर्तमान समय में लिखी जा रही कविता की रचना-प्रक्रिया, इस समय के संकटों और चुनौतियों पर वाजिब बहस को अंज़ाम दिया है। दूसरी तरफ आज की कविता के कथ्य, शिल्प, रूप एवं अंतर्वस्तु पर ठोस जवाब दिये गए हैं। पर आज की युवा कविता पर बहुत कारगर बहस नहीं हो पायी है। इसके अलावा युवाओं के सामने जो सामाजिक-साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर चुनौतियाँ हैं, उसको ध्‍यान में रखते हुए युवा कविता की उपलब्धियों और सीमाओं के वाज़िब विश्लेषण की उम्मीद इन महत्वपूर्ण साहित्यकारों से की जा सकती थी, पर उन सब पर सतही बात करके सभी लोग तेज़ी से आगे बढ़ गये हैं। नीलेश रघुवंशी, अरविंद श्रीवास्तव से तो ज्यादा उम्मीदें थीं पर इनकी टिप्पणियाँ भी व्यावहारिक अनुपालन से आगे नहीं बढ़ पायी हैं। रही-सही कसर को जितेंद्र श्रीवास्तव का आलेख भी पूरा नहीं कर पाता है।

मैंने अपनी ओर से किसी कवि मित्रों की रचनाओं को विशेष रेखाँकित न करके थोड़े से  में चीज़ों को समझने-सीखने की कोशिश की है। इस क्रम में मैं बस प्रवृत्तियों पर ही एक हल्की सी बात कहने की कोशिश कर रहा हूँ। यह एक संग्रहणीय अंक है जिसमें प्रस्तुतीकरण को लेकर थोड़ी-बहुत कमियाँ हैं, वैसे कमियाँ किस चीज़ में नहीं होतीं। पर संपूर्णता में यह वाजिब काम है जिसका स्वागत अवश्य होना चाहिए…ऐसे विलक्षण अंक के अतिथि सम्‍पादक देवेन्द्र कुमार देवेश और अंक में शामिल सभी युवा-मित्रों को अशेष बधाई और शुभकामनायें।

संवदिया (त्रैमासिक), युवा हिन्‍दी कविता अंक (अक्‍तू 2012-मार्च 2013)

अतिथि संपादक : डॉ. देवेन्‍द्र कुमार देवेश
प्रधान संपादक : भोला पंडित प्रणयी, संपादक : अनीता पंडित
इस अंक का मूल्‍य : 40 रुपये
संपर्क सूत्र : संवदिया प्रकाशन, जयप्रकाश नगर, वार्ड नं. 7, अरिरया 854311 (बिहार)
मोबाइल : 09931223187

One comment on “इक्कीसवीं सदी की हिन्दी युवा कविता : अरुणाभ सौरभ

  1. Devesh says:

    एक सराहनीय अंक! युवा-तेज दिखा!
    किन्तु एक विशेष बात पर ध्यान गया, कि इतने रचनाकारों में छंदोदबद्ध कविता की कमी दिखी। छंद-लय में सिर्फ एक रचना दिखी (कुछ त्रुटियों के साथ) ‘कमाई’. अन्य सभी कविताएँ मुक्त-छंद में थीं।

    उम्मीद है कि नवोदित कवि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए व्याकरण और छंद-लय का भी अध्ययन करेंगे।

    – देवेश

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