आशा के बादलों की बरसात करतीं कवि‍ताएं

पढना बहुत लोगों का शौक होता है। अपने-अपने तरीके से लोग इसके लिए समय निकालते हैं। लेकिन घुमते हुए भी पढना और वह भी सामूहिक रूप से, ऐसा आपने  कम ही सुना होगा। घूमना  हो और  उसके साथ पढना, साथ ही पढ़े पर चर्चा इसके तो क्या कहने। उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पि‍थौरागढ़ में कुछ शिक्षक-साहित्यकार साथी- महेश पुनेठा, चिंतामणि‍ जोशी, गि‍रीश पांडे, वि‍नोद उप्रेती, राजेश पंत, नवीन वि‍श्वकर्मा ‘गुमनाम’ आदि‍, जब सायंकालीन भ्रमण में जाते हैं, तो उनके हाथों में कोई-न-कोई पुस्तक होती है। वे उस पुस्तक को न  केवल पढ़ते हैं, बल्कि उस पर चर्चा भी करते हैं। उन्होंने इसे ‘चर्चा-ए-किताब’ नाम दिया है। इस अभियान की शुरुआत इस वर्ष (2016) मई से हुई। इसमें दो-तीन से लेकर कभी दस-बारह तक भी लोग हो जाते हैं। बाहर से  शहर में आने वाले साहित्यिक मित्र भी इसका हिस्सा बनते हैं। कभी-कभार पत्रिका या किताबों के लोकार्पण जैसे आयोजन भी इसमें होते है।

‘चर्चा-ए-किताब’ को ‘लेखक मंच’ पर इसी स्‍तंभ के तहत दि‍या जा रहा है। आप भी इस अनोखे ‘सायंकालीन भ्रमण’ का आनन्‍द लीजि‍ए। साथ ही अनुरोध है कि‍ आप भी जब अपने मि‍त्रों, परि‍चतों से मि‍लें तो इस पर चर्चा जरूर करें कि‍ पि‍छले दि‍नों कौन-सी अच्‍छी रचना या कि‍ताब पढ़ी। इससे समाज में रचनात्‍मक माहौल बनने में जरूर मदद मि‍लेगी।

9 मई 2016

rohit-kaushik

आज सायंकालीन भ्रमण के दौरान साथ में था, पिछले दिनों प्रकाशित रोहित कौशिक का काव्य संग्रह- ‘इस खंडित समय में’। संग्रह की कुछ  कविताओं का पाठ किया गया। इस संग्रह की कवितायें एक ऐसे समय को बारीकी से व्यंजित करती हैं, जिसमें ‘तार-तार हैं रिश्ते, तार-तार हैं संवेदनाएं, भरोसा तार-तार है, तार-तार हैं कल्पनाएँ और वहशीपन के  द्वारा मासूमियत को तार-तार किया जा रहा है।’ रोहित की कविता इस  तार-तार होते समय में जिसे वह खंडित समय कहते हैं, एक भरोसा पैदा करने की कोशिश करती हैं। वह दुःख-पीड़ा-करुणा, हर्ष-उल्लास के जीवद्रव्य से हृदयहीनता की बंजर जमीन पर कविता का पौधा पैदा करते हैं। यह कविता का पौधा उनके लोकजीवन के अनुभव और संवेदना से फलता-फूलता है। उसमें किसान-मजदूर का पसीना भी चमकता है और  कूड़ा बीनती फटेहाल बच्ची की करुणा भी फूटती है। उनकी कविता  अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ तनकर खडी हो जाती है। इस तरह निराशा के वातावरण में घिर आए आशा के बादलों की बरसात करती है। हमसे बढ़ती हमारी दूरी को ही ख़त्म करती है। साथ ही धर्म के हथियार से चेतना को कुंद करने की सत्ता की साजिश का पर्दाफाश करते हुए उसमें चोट भी करती है। अच्छी बात यह है कि रोहित अँधेरे के पसर जाने को जिंदगी का ख़त्म हो जाना नहीं मानते हैं, बल्कि वह मानते हैं कि अँधेरे से ही आती है रौशनी की लौ। हमारी जिंदगी को नयी राह दिखाता है अँधेरा। ऐसा वही कवि मान सकता है, जो जिंदगी के कागज़ पर अहसास की कलम से कविता लिखता है। वही गाँव से गायब होते गाँव को देख सकता है। अपने समय और समाज में घट रही समसामयिक घटनाओं को अपनी कविताओं का विषय बना सकता है। रोहित ने साम्प्रदायिकता, किसानों की आत्महत्या, उग्र राष्ट्रवाद, दामिनी बलात्कार काण्ड जैसे विषयों पर कवितायें लिखी हैं। उनका यह पहला ही संग्रह है और इसमें कथ्य और शिल्प के स्तर पर जैसी परिपक्वता दिखाई देती है, वह उनके भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती है।

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