आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो आप अपाहिज हैं : जीवन सिंह

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डॉ. जीवन सिंह

डॉ. जीवन सिंह हिंदी के प्रतिष्ठित, प्रतिबद्ध और ईमानदार आलोचक हैं। अलवर राजस्थान में रहते हैं। अब तक आलोचना की तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। लोकधर्मी कविता के लिए जाने-जानी वाली पत्रिका ‘कृति ओर’ में वह निरंतर लिखते रहे। अलीबख्शी ख्याल और मेवाती लोक संस्कृति पर गहरी पैठ रखते हैं। अपने गांव जुरहरा (भरतपुर) की रामलीला में पिछले पैंतालीस वर्षों से जुड़ाव और रावण का अभिनय करते रहे हैं। 1968 से 2004 तक राजस्थान के विभिन्न राजकीय कॉलेजों में अध्यापन करते रहे। प्रस्तुत है उनसे फेसबुक के माध्यम से महेश चंद्र पुनेठा  की हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश-

हमारे समाज में पढने की संस्कृति का जबरदस्त अभाव है। पढ़ना केवल परीक्षा पास करने के लिए जरूरी माना जाता है। पाठ्यपुस्तकों से इतर पढ़ना एक फालतू काम माना जाता है। इसके लिए बच्चों को हमेशा रोका जाता है। नयी पीढ़ी में पढ़ने की आदत विकसित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। आपको पढ़ने की संस्कृति के अभाव के पीछे कौन से कारण नजर आते हैं? आप विदेशों में भी रहे हैं क्या वहां भी पढ़ने की संस्कृति की स्थिति भारतीय समाजों की तरह ही है?

मैंने न पढ़ने और अपने घरों में किताब न रखने की बात इसलिए कही है कि हम पहले उस समाज को जान सकें जिसमें हम छंद-रचित कविता के लोकप्रिय होने की बात अक्सर करते रहते हैं। जहां कविता को पढ़ाने वाले अध्यापक तक अपने घरों में पुस्तक रखने से परहेज करते हों, वहां कौन है जो कविताओं से प्रेम कर रहा है, कुछ पता तो चले। दरअसल, हम मिथकों में जीने के अभ्यासी हो चुके हैं, वास्तविकता में कम। जो वास्तविकता को कुछ बदले हुए रूप में लाने का प्रयास करता है, उस पर धावा बोल देते हैं। जब मिथक टूटता है तभी वास्तविकता प्रकट होती है।

हमारा हिन्दी समाज इकसार समाज नहीं है, दूसरे भी नहीं हैं। एक बहुत बड़ा निम्न मेहनतकश वर्ग तो रोजी-रोटी के संकट से ही मुक्त नहीं हो पाता। वह अपने जीवन के भावात्मक पहलुओं को अपने लोकसाहित्य (मौखिक साहित्य) में ही पाकर संतुष्ट हो लेता है। अब रहा मध्यवर्ग, इस वर्ग में ही पढ़ने-लिखने वाला वर्ग निकलता है, वह भी उंगलियों पर गिना जा सकता है। हमारे यहां एक कविता संग्रह की ज्यादा से ज्यादा पांच सौ प्रतियां रोते-धोते छपती हैं। इसी से पता चल जाता है कि हमारा समाज कितना साहित्य प्रेमी है?  लगभग पचास करोड़ हिन्दी भाषी होंगे, उसमें कितने लाख या करोड़ साहित्य प्रेमी हैं। जरा हिसाब लगाकर देखें तो सब कुछ पता चल जायगा। एक-दो लाख ज्यादा से ज्यादा होंगे। किताबों की खरीद से अन्दाज लगाएं तो यह संख्या हजारों में सिमट जाएगी। मध्यवर्ग में कोई आसपास आपको नजंर आता है, जो अपने बच्चों को इंजीनियर या डॉक्टर के अलावा कुछ बनाना चाहता है। कितने लोग हैं जो अपने बच्चों को मन से अध्यापक बनाना चाहते हैं और उसमें भी साहित्य का और वह भी हिन्दी का। हिन्दी आज कहीं प्राथमिकता में ही नहीं है। हमारा मन पूरी तरह से धन का गुलाम बन रहा है, जो साहित्य-संस्कृति सिर्फ धनार्जन को मानता है। सब कुछ को मैनेज करता है। तकनीक और प्रबंधन ने हमारे दिमागों को आक्रांत सा कर लिया है और यह पिछले पच्चीस वर्षों में बहुत तेजी से हुआ है। जब पूंजी ही जीवन का ध्येय बन जाती है तो अन्य सब कुछ उसके सामने गौण हो जाता है। पूंजी अपने लिए अलग एक नई सभ्यता और संस्कृति विकसित करती जाती है और अपने प्रभाव में दूसरे वर्गों को भी लेती जाती है।

जहां तक विदेशों की बात है, पढ़ने-लिखने की संस्कृति में वे पहले से हमसे आगे हैं। वहां उन्होंने अपने लिए सारे प्रबंध एक तार्किक प्रक्रिया के तहत लगातार किए हैं। वहां पढ़ना-लिखना न होता तो आज ज्ञान-विज्ञान और नई से नई तकनीक का विकास कैसे होता? विश्व संचार क्रांति कौन करता? उन्होंने अपने शिक्षा-प्रबंधन पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। हमारे यहां शिक्षा नहीं,  मानव-संसाधन का प्रबंधन चलता है। ऐसे में पढ़ने की सहज संस्कृति का विकास कैसे संभव है। हमारे राजनेता जो सारी बातों के नियंता हैं, वे क्या इन सवालों पर गंभीर हैं। जिन्दगी जीने का एक सामान्य नैतिक बोध और मानवीय आकांक्षाएं जब तक हमारी प्राथमिकताओं में नहीं आएंगी, तब तक जो चल रहा है वही चलता रहेगा। इसके लिए हर स्तर पर, खासकर प्राथमिक, माध्यमिक स्कूली स्तर पर बहुत बड़े अभियान और नवजागरण की आवश्यकता है, जो शिक्षा को पारम्परिक तौर पर नहीं वरन आधुनिक सेक्युलर पद्धति पर आगे ले जाए। हमको अपनी शिक्षा को महंगे तरीकों से नहीं, बहुत सस्ते और सादगी से पूर्ण तरीकों से आगे बढ़ाने की जरूरत है। हमारा गरीब समाज तभी शिक्षित हो सकेगा।

आप के पोते आस्ट्रेलिया में पढ़ते हैं। आपने उनके साथ समय भी व्यतीत किया है। क्या आप बता सकते हैं कि वहां पाठ्यपुस्तक के अलावा बच्चे अन्य पुस्तकें भी पढ़ते हैं? स्कूल या शिक्षक उन्हें इस बात के लिए कितना प्रोत्साहित करते हैं? वहां पर स्कूलों में पुस्तकालयों की स्थिति कैसी है?

पहली बात तो यह है कि वहां के बच्चों के मन पर शिक्षा का वैसा प्रतियोगी दबाव नहीं होता,  जैसा हमारे यहां बच्चों के दिमाग पर रहता है। वहां बच्चों के पढ़ना शुरू करने की आयु 6 साल है। इससे पहले खेलने के सिवाय और कुछ नहीं करता। हमारे यहां शिक्षा लेते हुए बच्चे शायद ही सहज रह पाते हों। दूसरी बात यह है कि स्कूल भी बच्चों के प्रति सहज सहानुभूति पूर्ण व्यवहार रखते हैं। मैं जब वहां था, तब अपने पौत्र को एक प्ले स्कूल में ले जाता था क्योंकि वह 6 साल का नहीं हुआ था। हम दोनों रेल से 15 किलोमीटर दूर एक प्ले स्कूल में जाते थे, जहां मैं चार घण्टे तक पास में स्थित एक पब्लिक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ता था। उस लाइब्रेरी में सप्ताह में दो बार छोटे बच्चों को उनकी अध्यापिकाएं अपने साथ लेकर आती थीं। उनसे सामूहिक तौर पर छोटी-छोटी कविताएं भी बुलवाती रहती थीं। उनकी विशेषता इस बात में है कि वे.बच्चों को हमेशा हास्य-विनोद के वातावरण में रखते हैं। जगह-जगह बच्चों के खेलने-कूदने के पार्क हैं। उन पार्कों में पुस्तकालय भी हैं। स्कूल भी अपने बच्चों को उनमें सभी तरह के खेल खिलाने ले जाते हैं। कहने का मतलब यह है कि शिक्षा मन के ऊपर न बोझ है न ही उसका प्रतियोगी आतंक है और न ही वहां डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड है। वहां सुनियोजित और बेहद तार्किक ढंग से सभी तरह के जरूरी प्रबंधन किए जाने की परम्परा है। बच्चे बड़ों से और अपने परिवार से भी बहुत कुछ सीखते हैं, इसलिए बूढ़े-बूढे़ लोग भी वहां पुस्तकालय में जाकर कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। हमने पढ़ने की जगह केवल स्कूल को ही बना रखा है, जबकि बच्चे का पहला विद्यालय उसका अपना घर होता है। घर से ही वह पढ़ना सीखता है। मुक्तिबोध का एक निबंध है- मुझे मेरी मां ने प्रेमचंद का भक्त बनाया। हमारे यहां कुछ समय पहले तक स्त्री शिक्षा पर कितना बल था, हम अच्छी तरह से जानते हैं।

मैं फिर कहूंगा कि हमारे यहां कितने लोग अपने घरों में निजी पुस्तकालय बनाते हैं और किताबें खरीद कर पढ़ते हैं। घर में किताबें होंगी और मां-बाप भी कुछ न कुछ पढ़ते दिखेंगे तो बच्चा भी पढ़े बिना नहीं रह सकेगा। केवल स्कूल के भरोसे पुस्तकें पढ़ने का संस्कार डालना मुश्किल है। गनीमत है कि वहां पर वह अपना कोर्स ही पूरा और अच्छी तरह से पढ़ ले। स्कूलों में तो पुस्तकालय वहां हैं ही, खेलना भी है। इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय भी जरूरत के अनुसार खूब हैं।

वहां घरों में किताबों का क्या स्थान है? क्या वहां निजी पुस्तकालय दिखाई दिए? आप अमरीका भी कुछ समय रहे वहां पर क्या स्थिति है?

वहां के वासियों के घर देखने का कोई बड़ा अवसर तो मुझे नहीं मिला, किन्तु लाइब्रेरी से पुस्तकें इश्यू कराते और लौटाते देखा। जगह-जगह पुस्तकालय देखे, जिनका रखरखाव और अद्यतन सुविधाएं देखकर एक तरह की तसल्ली मिलती है और इच्छा भी होती है कि काश, हमारे यहाँ भी ऐसा हो। वैसे हमारे यहां ही अक्सर सुनने में आता है कि हमारी तुलना में बंगाली समाज अधिक पुस्तक प्रेमी व कला प्रेमी समाज है। अमरीका में पुस्तक स्टोर(माल) होते हैं जहां से यदि आपको पुस्तक पसंद न आए तो उसे पढ़कर निर्धारित अवधि में लौटा सकते हैं। मैं यहां सोवियत संघ का उदाहरण रखना चाहता हूं जिस व्यवस्था ने अपने देश में ही नहीं वरन हमारे जैसे देशों में भी एक पुस्तक प्रेमी समाज बना दिया था। सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने की उन्होंने लगातार कोशिश की थी। इसलिए यह व्यवस्था का सवाल भी है कि आप कैसा समाज बनाना चाहते हैं। अभी तो हमारी व्यवस्था का लक्ष्य है कि एक बड़े पूंजी प्रेमी समाज का निर्माण करना, जो बहुत तेजी से किया जा रहा है। यह समाज की जिम्मेदारी भी है कि वह विभिन्न स्तरों पर स्वयं भी प्रयत्न करे कि उसे कैसा समाज बनना है और किस दिशा में जाना है। सब कुछ सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए। सरकारें तो वही करेंगी, जो उनको करना है।

जिन देशों के आपने उदहारण दिए हैं, क्या वहां यह सरकारी प्रयासों से हुआ है या व्यक्तिगत प्रयासों से? आपने सस्ती और सुन्दर पुस्तकों की एक नई संस्कृति विकसित करने के सन्दर्भ में सोवियत संघ का उदाहरण दिया , इस बारे में कुछ और विस्तार से बताइए।

दरअसल, जितने भी सामाजिक कार्य हैं, उनको केवल सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता। समाज और सरकार दोनों की पारस्परिक सहयोग से ही इनमें सफलता हासिल की जा सकती है। यदि कोई पुस्तक पढ़ना चाहता है तो कौन सी ऐसी सरकार है, जो उसे पढ़ने से रोकने आती है। स्कूलों,  शिक्षकों को पुस्तक संस्कृति की शुरुआत करने में सबसे बड़ी और प्राथमिक भूमिका अदा करनी होगी,  क्योंकि सबसे ज्यादा पुस्तकों से वास्ता उन्हीं का पड़ता है। जिस समाज में शिक्षक स्वयं कोर्स के अलावा और कुछ पढ़ने और जानने की इच्छा शायद ही रखते हों, उस समाज में पुस्तक संस्कृति का विकास कर पाना बहुत मुश्किल है। एक ही तरह के प्रयास करने से सामाजिक और सामूहिक स्तर पर कुछ नहीं होता। व्यक्ति और समाज दोनों स्तरों पर काम करने से ही बदलाव आते हैं। इस मामले में विकसित देशों का वातावरण हमारे यहां के वातावरण से बहुत अलग है। ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पा लेने के बावजूद हमारे समाज की प्रकृति, परिस्थिति और जरूरतों के अनुसार बड़े और बुनियादी बदलाव करने के बजाय उन्हीं के द्वारा स्थापित व्यवस्था को अपना लिया। उसमें इतना सा बुनियादी बदलाव भी न कर पाए कि यहां पठन-पाठन की संस्कृति अपनी भाषाओं में विकसित हो। बच्चा भाषाओं को अपने परिवेश और वातावरण से सीखता है और उसी में बिना किसी दबाव के सहजता तथा आनंद भाव से अपनी विभिन्न प्रवृत्तियों का विकास करता है। अंग्रेजी दो सौ साल बाद भी हमारे अपने घर-परिवारों के वातावरण की भाषा कहां बन पाई है। उसे अर्जित करने के लिए अतिरिक्त अस्वाभाविक प्रयास करना पड़ता है। जबकि हम अपनी भाषाओं को मां के दूध के साथ सीख लेते हैं। इस वजह से भी बच्चे पढ़ने के प्रति अनमना और उदासीनता का भाव रखते हैं।

अपनी भाषा में लिखी किताब को पढ़ने की स्वप्रेरणा विकसित होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं। सोवियत संघ का ध्येय था कि पूरी दुनिया में पूंजी बाजार की गलाकाटू प्रतिस्पर्धा खत्म हो और यह दुनिया सभी के रहने लायक एक सुखद शान्तिपूर्ण दुनिया हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षा से बेहतर कोई दूसरा माध्यम नहीं है। इसलिए अपने देश के अलावा मित्र देशों की भाषाओं में भी उन्होंने एक सस्ती, उन्नत और सुन्दर पुस्तक संस्कृति को सर्वत्र विकसित किया। उनके द्वारा मुद्रित पुस्तकें सस्ती ही नहीं,  दिखने में भी बहुत आकर्षक होती थीं। उनको देखते ही खरीदने का मन हो जाता था। बाल साहित्य भी बहुत सस्ता और आकर्षक होता था। वे जगह-जगह पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाते थे। इससे सामाजिक स्तर पर वातावरण बनता था। हर साल प्रदर्शनी का इंतजार रहता था। पूंजीवादी व्यवस्था में पढ़ना ही इतना मंहगा और प्रतियोगिता से बोझिल बना दिया जाता है कि इस वातावरण में सिर्फ धन कमाने वाली पढ़ाई करने के अलावा कोई कुछ सोच ही नहीं पाता।

सस्ता और अच्छा साहित्य पहुंचाने के लिए हमारे यहां सरकारी या व्यक्तिगत स्तर पर अब तक किस तरह के प्रयास आपको दिखाई दिए?

देश को आजादी मिलने के बाद पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का एक जज्बा लोगों में मौजूद रहा। मैं अपने एक छोटे से गांव का उदाहरण आपको बतलाता हूं। आजादी मिलने के दिनों में दो-तीन हजार की आबादी से ज्यादा गांव की आबादी नहीं होगी, लेकिन तब भी गांव का अपना एक पुस्तकालय और वाचनालय- सुधारिणी समिति के नाम से चलता था। इसमें हंस, माधुरी जैसी उस समय की पत्रिकाएं तक मंगाई जाती थीं। उस पुस्तकालय में अधिकांश किताबें स्वाधीनता के भाव को जगाने वाली थीं। हमारा गांव तत्कालीन भरतपुर रियासत का आखिरी गांव था, जो इस समय के हरियाणा और उस समय के पंजाब की सीमा से लगता था। उस समय की स्वाधीनता आंदोलन के सेनानी स्वाधीनता पाने के लिए पठन-पाठन को जरूरी मानते थे कि ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है। इसी उद्देश्य से छोटे-छोटे गांवों में भी पुस्तकालय खोले गए थे। आजादी का भाव पैदा करने में इन पुस्तकालयों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उस समय लालटेन की रोशनी में लोग इनमें रात्रि को भी पढ़ने जाते थे। तब यह सब एक बड़े आंदोलन के तहत हुआ है। ऐसे ही हमारे पास के कस्बों कामां, डीग, कुम्हेर आदि में पुस्तकालय और वाचनालय खुले हुए थे। डीग में हिंदी साहित्य समिति और उसका एक बड़ा पुस्तकालय था, जो आज भी मौजूद है किन्तु पहले जैसा जज्बा अब नहीं है। भरतपुर में एक जमाने में वहां की हिंदी साहित्य समिति एकमात्र ज्ञान चर्चा और पठन-पाठन का सबसे बड़ा केन्द्र थी। इसके एक सम्मेलन में शायद 1930 में रवींद्रनाथ टैगोर आए थे। वह वातावरण व माहौल ही अलग होता है, जो लोगों में बड़े स्तर पर ज्ञान की भूख जगाता है। आज का युवा पहले से कम पढा़कू नहीं है। वह खूब पढ़ता है। पढ़ने में रात-दिन एक कर अपनी जी-जान लगा रहा है, किन्तु अब उसके अध्ययन का उद्देश्य अच्छे से अच्छा व्यवसाय हासिल कर थोड़े समय में अधिकतम पूंजी हासिल करना हो गया है। अब वह समाज परिवर्तन की जगह बाजार में अपनी जगह बनाने के लिए खूब पढ़ता है। प्रयोजन बदल जाने से पुस्तकों की दिशा और उपयोगिता दोनों बदल जाती हैं।

यदि सर्वेक्षण किया जाए तो आज पहले से बहुत ज्यादा बड़ा पुस्तकों का बाजार है और शिक्षा पाने के प्रति भी लोगों में जागरूकता आई है। लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत तेजी से गांवों को छोडकर शहरों में आकर बस रहे हैं। गांव बहुत तेजी से वीरान जैसे हो रहे हैं। जो किसी वजह से गांव में ही रहने को मजबूर हैं, वे ही अब गांवों में रह रहे हैं। गांव छोड़ने के पीछे उनका उद्देश्य बच्चों को अच्छी और ऊंचे स्तर की शिक्षा, खासकर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में दिलवाने का है। यह अलग बात है कि उस शिक्षा का गहरा रिश्ता सिर्फ बाजार से है।

सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य आज के माहौल के अनुकूल ही नहीं है। हर कोई अपने बच्चों को डॉक्टर,  इंजीनियर बनाने की होड में लगा हुआ है। पुस्तकें खूब हैं और उनको पढ़ने वाले भी। प्राइवेट स्कूलों में बहुत ऊंची फीस होने पर भी उनमें जगह खाली नहीं हैं। सरकारी संस्थानों पर से विश्वास स्वयं सरकारों ने ही उठा दिया है। वे सब कुछ को प्राइवेट हाथों में सौंप देने के लिए व्यग्र हो उठी हैं। अब तो केवल निजी प्रयास ही रह गए हैं।

आजादी मिलने के शुरूआती दिनों में पुस्तकें पढ़ने और जीवन को ज्ञान सम्पन्न करने का जो जज्बा था, उसके कम होने के पीछे आप मुख्य रूप से क्या कारण देखते हैं? एन.बी.टी. जैसे सरकारी प्रकाशन आज भी चल रहे हैं जो सस्ता और सुरुचिपूर्ण साहित्य प्रकाशित करने, उसको लोगों तक पहुंचाने और पढ़ने के लिए कुछ-कुछ कार्यक्रम करते रहते है। इसको आप किस रूप में देखते हैं?

मुख्य कारण है आजादी के बाद बदला हुआ माहौल और स्वाधीनता मिल जाने के बाद यह मान लिया जाना कि स्वाधीनता मिल जाने से अब सब कुछ अपने आप हो जाएगा। जबकि स्वाधीनता कभी एक दिन में नहीं आती, यह एक सतत प्रक्रिया है। आज जब आजादी मिले सत्तर साल होने को जा रहे हैं, तब भी हमारा समाज कितने ही तरह के सामाजिक-आर्थिक बंधनों से मुक्त नहीं हुआ है। इसलिए जहां-जहां भी दलित, स्त्री, आदिवासी और गरीबी,  गैरबराबरी जैसे अनेक मुद्दे हैं, उनका समाधान लगातार आंदोलन से ही संभव हो सकता है। जिस समाज में अनेक तरह के वर्ग होते हैं, उसमें आजादी का उपभोग व्यावहारिक तौर पर केवल उच्च वर्ग ही करता है। आजादी मिल जाने के बाद इन मुद्दों को लेकर संघर्ष तो अवश्य हुए, किंतु आजादी के समय का आन्दोलन जैसा जज्बा खत्म होता चला गया। इससे यहां के लोग सत्ता की हिस्सेदारी करने जैसी नयी प्रवृत्तियों में ज्यादा उलझ गये। मध्य वर्ग ऊंची नौकरी पाने, नए नौकरशाह आदि बनने की हिस्सेदारी करने में लग गया। यही वजह रही कि पुराने पुस्तकालयों की आवश्यकता की बात पुरानी पड़ने लगी। एनबीटी जैसा संस्थान इतने बड़े देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे आम जन में रोजगारी साहित्य पढ़ने-पढ़ाने का भाव पहले से काफी बढ़ा है। पढ़ना-लिखना पहले से बढ़ा है, लेकिन नीचे का एक बहुत बड़ा वर्ग आज भी अपनी रोजी-रोटी के मसले से उबर नहीं पाया है। मध्यवर्ग व्यावसायिकता और सिर्फ बाजार की शिक्षा लेने तक सीमित होकर रहने की स्थिति में सिमट गया है। पुस्तक छापने और बेचने के कुछ-कुछ कार्यक्रम केवल नौकरी पूरी करना और एक तरह की रस्म अदायगी जैसे बनकर रह गए हैं। वे कुछ पढ़ने वाले लोगों की पूर्ति कर देते हैं। गीताप्रेस द्वारा जैसे धार्मिक साहित्य के बेहद सस्ते साहित्य प्रकाशन का अभियान चलाया गया। कुछ इसी तर्ज पर अन्य विषयों पर पुस्तक प्रकाशन के अभियान चलें और एक माहौल बने तो इन स्थितियों में बदलाव संभव है।

मध्यप्रदेश की शैक्षिक संस्था एकलव्य द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों को आप किस रूप में देखते हैं? क्या इस तरह के प्रयास राजस्थान में भी कोई संस्था कर रही है?

एकलव्य ने इस दिशा में बहुत बड़ा और प्रशंसनीय काम किया है जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ है, किन्तु लगभग पचास करोड़ हिन्दी आबादी के लिए इस तरह के सौ कार्य भी पर्याप्त नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी बहुत बड़ी आबादी शिक्षा से महरूम है। सच तो यह है कि समाज को बदलना है तो शिक्षा के सम्पूर्ण ढांचे में बुनियादी बदलाव जरूरी है जिससे वह अभावग्रस्त वर्ग के अनुकूल बन सके। कुल मिलाकर बात यह है कि हमारे यहां महौल अभी सच्ची शिक्षा के अनुकूल नहीं है। शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं है। जबकि हिन्दुस्तान में हर बात सरकार के भरोसे छोड़ दिए जाने का रिवाज सा बन चुका है। सरकारें ऐसी शिक्षा क्यों देना चाहेंगी, जो समाज में उनका प्रतिरोध खड़ाकर एक और बड़ा एवं उदार जनतांत्रिक विकल्प खड़ा करने में मददगार हो। मुझे मालूम नहीं कि छुटपुट प्रयासों को छोड़कर राजस्थान में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कार्य हो रहा है। मेरी जानकारी में नहीं है। संभव है कोई गैर सरकारी संगठन इस क्षेत्र में काम कर रहा हो।

हमारे कवि मित्र राजेश उत्साही जो लम्बे समय तक बाल पत्रिका चकमकके संपादक और एकलव्य संस्था से जुड़े रहे, पिछले दिनों एक बातचीत में कहा कि बाजार ने एक भ्रम बनाया है कि हिंदी की किताबें बिकती नहीं हैं। जहां प्रयास हुए हैं, वहां यह भ्रम टूटा भी है। होशंगाबाद के एक मित्र हैं अशोक जमनानी। वे अब तक सात-आठ उपन्यास लिख चुके हैं। उन्होंने पहले किसी व्यावसायिक प्रकाशक को दिए थे। बाद में खुद जोखिम उठाकर छपवाए और खुद ही गांव-गांव जाकर बेचे। उनके उपन्यासों के छह से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। यह एक उदाहरण भर है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताबों में से कुछ की अब तक पचास हजार से ज्यादा प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। हां, यह बात अलग है कि उनमें से अधिकांश सरकारी या थोक खरीद में जाती हैं। यह भी एक उदाहरण है। महाराष्ट्र  में बालसाहित्य में काम करने वाले लोग गांव-गांव जाकर अपनी किताबें बेचते रहे हैं। मुझे लगता है वर्तमान समय पढ़ने की आदत को टीवी जैसे माध्यम से बहुत कड़ी टक्कर मिल रही है। चाहे वह समाचार हो, या विचार। सब कुछ तो टीवी से आ रहा है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं है कि पढ़ने की संस्कृति नहीं है। आप इस पर क्या टिप्पणी करेंगे? क्या बाजारू उपन्यासों या पत्रिकाओं का बड़ी संख्या में पढ़ा जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अभाव पढ़ने की संस्कृति का नहीं, बल्कि किसी और बात का है?

जिस देश की आबादी एक अरब तीस करोड़ के आसपास हो उसमें इतना तो अवश्य होगा ही कि दो चार या दस पांच करोड़ लोग ठीक-ठाक ढंग से पढ़-लिख रहे हों। सवाल जब सौ-पचास करोड़ का आता है तो हिन्दी में आज किसी भी अच्छी किताब का एक-दो करोड़ का संस्करण होना चाहिए, लेकिन अभी तो यह लाखों तक भी नहीं पहुंची हैं। पढ़ना तो पहले से ज्यादा हुआ ही है। पुस्तकें भी पहले से ज्यादा प्रकाशित हो रही हैं और मुनाफा बटोरने वालों के पक्ष में जा रही हैं। पुस्तकों के व्यवसायी करोडों तभी कमा सकते हैं, जब पुस्तकें प्रकाशित करें इसलिए पुस्तकें तो छप रही हैं, किन्तु उनके अनुसार पाठक नहीं हैं। निसंदेह मुनाफाखोर प्रकाशक इस विभ्रम को फैलाता है किन्तु इसमें कुछ सचाई भी है। मैं तो इस धारणा की जांच अपने मोहल्ले के लोगों के बीच से करता हूं, जिसमें मेरे साथी पढ़े-लिखे समझे जाने वाले लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि आजकल आप क्या काम कर रहे हैं? मैं जब जवाब में कहता हूं कि मैं तो पढ़ता-लिखता हूं तो वे फिर पूछते हैं कि आप यह बतलाइए कि सेवानिवृत होने के बाद क्या काम करते हैं? पढ़ना-लिखना हमारे यहां काम करने की कोटि में नहीं आता। काम की परिभाषा में सिर्फ उसे ही काम कहा जाता है जिससे आपको धन की प्राप्ति होती है। यह है हमारे समाज का सामूहिक शैक्षिक मनोविज्ञान। हमारे आसपास अडोस-पडोस में रहने वाले सभी पढ़े-लिखे और खाते-पीते लोग हैं किन्तु लगभग सभी का दृष्टिकोण यही है कि सिर्फ और हमेशा धन कमाना ही काम करना होता है। वैसे तो आजादी मिलने के बाद से ही समाज का सामूहिक दृष्टिकोण कुछ इसी तरह का बना, किंतु जब से नवउदारवादी अर्थव्यवस्था का तेजी से प्रचलन हुआ है और एक नव धनाढ्य वर्ग पैदा हुआ है, तब से तो धन ही जीवन का एकमात्र प्रतिमान बना दिया गया है कि धन में ही विकास है और धन में ही गति है। अन्यत्र सभी जगह दुर्गति है। ऐसे माहौल में अपवाद स्वरूप ही एक समुदाय विशेष पुस्तक संस्कृति की लड़ाई लड़ता है। वह हमारे देश में भी चल रही है, उसको व्यापक जीवन स्तरों और जरूरत के अनुसार फैलाने की आवश्यकता है। हिन्दी जाति की तुलना में बंगाली और मराठी जातियां हमसे पहले से आगे रही हैं,  उनमें जातीय एकता का भाव सदा से ज्यादा रहा है। इस मामले में हिन्दी का कभी कोइ एक केन्द्र नहीं रहा। वह प्रशासनिक और राजनीतिक तौर पर बहुत बड़े और गहरे विभाजन का शिकार रही है। संस्कृति सभी तरह की होती है। पचास करोड़ आबादी में यदि पचास लाख लोग भी पढ़ने-दिखने लग जाएं तो यह संख्या बहुत बड़ी लगती है, किन्तु जब पचास करोड़ के सामने पचास लाख को रखते हैं, तब वास्तविकता मालूम पड़ती है।

बाजारू बातें हर युग में रही हैं। बाजारू साहित्य भी और उस सामान्य अभिरुचि का साहित्य और उसी तरह की पत्र-पत्रिकाएं भी। कई बार इसी में से रास्ता निकलता है। लेकिन इसके लिए समाज में लगाव की भावना होनी चाहिए, जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का पहला ही पड़ाव होता है अलगाव और अजनबीपन। पूंजी जोड़ने के साथ-साथ तेजी से बांटने का काम भी करती है, जिससे सामूहिक भावना का क्षरण होता जाता है। जबकि कोई भी संस्कृति सामूहिकता के बिना संभव नहीं है।

बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने में परिवार की क्या भूमिका है? कैसे यह आदत विकसित की जा सकती है?

जीवन में किसी भी बेहतर प्रवृति के विकास के लिए एक सामाजिक-सांस्कृतिक और नैतिक वातावरण होता है,   कोई भी अच्छी प्रवृति तभी सामूहिक तौर पर विकसित हो पाती है। निजी और व्यक्तिगत तौर पर या छोटे-मोटे आंचलिक स्तरों पर भी अपवाद स्वरूप कुछ प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावनाएं खूब रहती हैं और इस तरह के काम करने वाले भिन्न रुचियों वाले लोग सभी क्षेत्रों में होते हैं और अपना काम भी करते हैं । उन क्षेत्रों में वातावरण भी बनता है किन्तु वह बड़े समर्थन के अभाव में दीर्घजीवी नहीं हो पाता। बनता है और एक बिन्दु तक पँहुचकर खत्म हो जाता है। जैसे- निजी स्तर पर कुछ खिलाड़ी ओलम्पिक में पदक ले आते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि हमारे देश में खेलों का कोई वातावरण बना हुआ है। यहाँ निजी स्तर पर तो बहुत कुछ है । प्रतिभाएं हैं, अपार धन दौलत है। आज के अखबार में ही आया है कि दौलत के मामले में हमारा देश दुनिया के सबसे अमीर देशों में सातवें पायदान पर है, लेकिन इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि हम गरीब देशों की श्रेणी में नहीं हैं। ऐसे ही अन्य बातों में भी हैं। पुस्तकें पढ़ने वाले खूब पढ़ रहे हैं किन्तु पढ़ने-लिखने का वातावरण नहीं है। इसकी प्रमुख वजह है कि गैरबराबरी से या अन्य किसी भी तरह की विषमता से मुक्ति पाने का कोई बड़ा आन्दोलन नहीं है। जितने बड़े आकार का आन्दोलन है, उतने ही आकार का पठन-पाठन भी है।  जब से देश में दलित आन्दोलन में तेजी आई, तब से उसका अलग साहित्य भी प्रकाशित हुआ और नए पाठक भी पैदा हुए। स्त्री साहित्य के बारे में भी यह बात कही जा सकती है। दरअसल, मुक्ति आन्दोलन के बिना व्यापक स्तर पर पुस्तक आन्दोलन भी नहीं चल सकता। मुक्ति आन्दोलन से एक स्पष्ट जीवनोद्देश्य सामने आ जाता है जिसकी पूर्ति के लिए लोगों में उससे सम्बंधित साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने की जरूरत होती है। नई सोच विकसित होती है तो नई राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करती है।

बच्चा हमेशा अनुकरण से सीखता है। वह वही भाषा बोलता है और वैसे ही सोचता और आचरण करता है जैसे उसके परिवार के दूसरे लोग करते हैं। बच्चे को कहाँ मालूम होता है कि वह किस जाति और धर्म का है । यह उसका वातावरण ही होता है जो उसे बड़ा होने पर जाति और धर्म दोनों सिखा देता है। फिर वह स्कूल जाता है तो वहाँ भी उसके ये परिवार से प्राप्त बंधन टूटने के बजाय और ज्यादा मजबूत होते हैं। यही बात पुस्तकों के बारे में भी है। सबसे पहले हमारे देश का सामान्य युवक बेरोजगारी से जूझता है और उसके लिए जी जान एक कर देता है। माता-पिता, अभिभावक आदि भी यही चाहते हैं कि वह सिर्फ वही पढ़े, जिससे रोजगार मिले।  रोजगार मिल जाने के बाद पढ़ने-लिखने का सारा काम खत्म हो जाता है। हमारे यहाँ रोजगार पा लेना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, जो उसे अलौकिक स्तर की संतुष्टि से भर देती है। एक कहावत भी इस बारे में है- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नबाव। जो समाज नबाव बनने के लिए पढे़गा, वह नबाव बन जाने के बाद किसलिए पढ़े। जहाँ तक इस आदत को विकसित करने का सवाल है कि यदि घर, परिवार से लेकर स्कूल स्तर तक यदि पढ़ने पढ़ाने का वातावरण मिले तो इसको विकसित किया जा सकता है। जब परिवार वाले और शिक्षक पढ़ते हुए दिखाई देंगे तो बच्चे पर इसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।

इसके अलावा सार्वजनिक पुस्तकालय-वाचनालय श्रृंखला का विकास किया जाए और स्कूल स्तर पर पुस्तकें पढ़ने वालों के लिए हर साल ऐसे आयोजन हों जिनमें पाठ्येतर पुस्तकें पढ़ने वालों से उनके विचार व्यक्त कराये जाएं और उनको सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया जाए।

दीवार पत्रिकाओं में ऐसे पाठकों के लिए अलग से कालम हो कि वे आजकल क्या नया पढ़ रहे हैं। सुगम, सुबोध और रोचक साहित्य की आसान सुलभता निश्चित की जाए।

आपकी यह बात बिलकुल सही है कि हमारे परिवारों की भी यही धारणा बनी हुई है कि पढ़ना-लिखना सिर्फ रोजगार पाने के लिए होता है। इसके चलते केवल वही किताबें पढ़ी जाती हैं जो प्रतियोगिता परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होती हैं। इसी तरह स्कूली शिक्षा के दौरान भी वही किताबें और पाठ पढ़े जाते हैं जो परीक्षा में अधिक अंक दिला सकें। सार रूप में कहा जाए तो हमारा पढ़ना परीक्षा केन्द्रित होता है। इस धारणा के चलते साहित्यिक किताबें बहुत कम पढ़ी जाती हैं। कहानी-कविता-उपन्यास तो मनोरंजन और समय व्यतीत करने के लिए ही पढ़े जाते हैं। स्कूली बच्चों के लिए तो ये समय बर्बाद करने वाली मानी जाती हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं या अच्छे अंक प्राप्त करने की दृष्टि से क्या साहित्यिक किताबों की कोई उपयोगिता है? आखिर विज्ञान-गणित के विद्यार्थियों के लिए साहित्यिक पुस्तकों की क्या जरूरत है?

दरअसल, हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली उन अंग्रेजी शासक वर्ग की बनाई हुई है, जो हमारे ऊपर लम्बे समय तक राज करते हुए यहाँ के मानवीय श्रम और प्राकृतिक सम्पदा का दोहन एवं शोषण करके अपने देश को सम्पन्न करने के उद्देश्य से यह सब कुछ करना चाहते थे। जो उन्होंने किया भी। उनके जमाने की शिक्षा पद्धति आज भी चली आ रही है, जो अंग्रेजी शासक वर्ग ने अपने लिए एक नौकरशाही निजाम तैयार करने के लिए बनाई थी, जिसके माध्यम से वे हिन्दुस्तान पर शासन कर सकें। उनका उद्देश्य यहाँ की जनता को ज्ञान-वि‍ज्ञान सम्पन्न और वास्तविक तौर पर शिक्षित करना था ही नहीं, कि यहाँ के निवासी अपनी रूढ़ियों से लड़ते हुए एक आधुनिक समाज का निर्माण कर सकें। अफसोस की बात यह है कि आजादी मिल जाने के बाद भी हमारी सरकारों का जितना ध्यान पूँजी के प्रभुत्व वाले विकास पर रहा, उतना श्रम शक्तियों की एकजुटता और जनजागरण पर नहीं। इस काम के लिए अँग्रेजी शिक्षा पद्धति को बुनियादी तौर पर बदलने की जरूरत लोकतांत्रिक शासक वर्ग ने समझी ही नहीं। इसी का परिणाम है कि आज का युवा वर्ग एक समग्र शिक्षा प्रणाली से महरूम है। वि‍ज्ञान पढ़ने वाले युवा को साहित्य, इतिहास, दर्शन का ज्ञान नहीं और साहित्य, इतिहास आदि पढ़ने वाले को विज्ञान से दूर रखा जाता है जबकि हमारा जीवन इस तरह से ज्ञान-वि‍ज्ञान के मामले में विभाजित नहीं होता। व्यक्ति का जीवन समग्र होता है। उसे सुविधा के लिए विभाजित जब से किया गया है, तब से वैसे ही चला आ रहा है। जबकि आज वि‍ज्ञान तकनीक को जाने बिना कोई एक कदम आगे नहीं बढ़ सकता। इसी तरह से हरेक व्यक्ति का काम मानवीय भावनाओं से पड़ता है। उस इतिहास,  दर्शन से पड़ता है, जिससे हर व्यक्ति अपनी जिन्दगी में गुजरता है। यह हमारे जीवन की समग्रता ही है कि व्यक्ति को जीवन के हर क्षेत्र के ज्ञान की जरूरत है। ज्ञान का ऐसा संकायपरक विभाजन मनुष्य और उसकी मनुष्यता को विभाजित करने जैसा काम है। यह विभाजन किसी भी समय के शासक वर्ग के लिए फायदेमंद रहता है। वि‍ज्ञान वाला साहित्य से अलग और साहित्य वाला वि‍ज्ञान से कोसों दूर। यह बहुत कृत्रिम है।

जब इस पृथ्वी पर सोवियत संघ का अस्तित्व था, तब के शिक्षा के अनेक तरह के अनुभव निकल कर आए थे, जिनका ज्ञान और जागरण की दृष्टि से आज भी महत्व जरा सा भी कम नहीं हुआ है। उस समय शिक्षा के पहले जन-कमिसार लेनिन ने लुनाचार्स्की को बनाया था। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में विशेषज्ञता के साथ सामान्यता के रिश्तों पर विचार करते हुए बतलाया था कि शिक्षित आदमी वह है ,जिसे सबका सामान्य और संक्षिप्त ज्ञान होता है, लेकिन जिसके पास अपनी विशेषज्ञता भी होती है, जो अपने कार्य को भली भाँति जानता है और जो शेष चीजों के बारे में भी कह सकता है कि कोई भी मानवीय चीज मेरे लिए पराई नहीं है। वह आदमी, जिसे टेक्नोलॉजी, औषधि विज्ञान, कानून,  इतिहास के मूल तत्वों और निष्कर्षों का ज्ञान होता है, वास्तव में शिक्षित आदमी है। लुनाचार्स्की ने यह भी माना है कि किसी को भी अज्ञानी नहीं रहना चाहिए। सबको सभी विज्ञानों और कलाओं के मूल तत्वों का ज्ञान होना चाहिए। चाहे आप मोची हों या रसायन शास्त्र के प्रोफेसर। यदि आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो इसका मतलब है कि आप काने और बहरे की भाँति अपाहिज हैं। क्योंकि आदमी की शिक्षा वस्तुतः इसमें है कि वह सब कुछ, जिसमें मानव जाति अपने इतिहास और संस्कृति का निर्माण करती है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी या सांत्वनाप्रद अथवा जीवन में आनंद प्रदान करने वाली कृतियों में प्रतिबिंबित होता है– यह सब कुछ प्रत्येक आदमी की पँहुच के भीतर हो, पर साथ ही उसके पास विशेषज्ञता भी हो। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ज्ञान की दुनिया में सबको सबकी जरूरत होती है किसी एक विषय में विशेषज्ञता के साथ। ज्ञान और शिक्षा की दुनिया में कोई विभाजन नहीं होता।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से साहित्य किस तरह से मददगार है?

दुनिया में प्राप्त किसी भी क्षेत्र का ज्ञान सभी तरह की परीक्षाओं में कहीं न कहीं मददगार होता है। सामान्य ज्ञान के प्रश्न पत्र में भी साहित्य के बारे में कुछ न कुछ पूछा जाता है । इससे ज्यादा कुछ परीक्षाओं में यह विषय इन्टरव्यू में मदद करता है। दूसरे साहित्य पठन का असर भाषा के माध्यम से परीक्षार्थी के अभिव्यक्ति कौशल पर होता है। निबंध जैसे प्रश्न पत्र में निबंध लेखन की कला साहित्य के माध्यम से सीखी जा सकती है। साहित्य से जीवन के प्रति समग्र दृष्टिकोण का विकास होता है जो पाठक को इतिहास,  दर्शन, समाजशास्त्र आदि विषयों की जानकारी भी देता है। कुल मिलाकर बात यह है कि साहित्य पढ़ने वाला कभी नुकसान में नहीं रहता,  उसका जीवन के प्रति आत्मविश्वास बढ़ता है और वह विभिन्न चरित्रों के बीच स्वयं की स्थिति का आकलन आसानी से कर सकता है। लेकिन. आज ज्ञान क्षेत्रों में विशेषीकरण इस हद तक बढ़ गया है कि उसने व्यक्ति को समाज से अलग करके एकांगी और आत्मकेन्द्रित बना दिया है। ज्ञान के क्षेत्रों में बढ़ते विशेषीकरण ने मानव जीवन का रूप ही बिगाड़ दिया है। यह विशेषीकरण एक अच्छे भले इंसान को अपाहिज बना रहा है। इससे व्यक्ति की रचनात्मक भूमिका कमजोर होती जा रही है और वह ज्यादा से ज्यादा एय्याश तथा सामन्ती स्वभाव जैसा बनता जा रहा है। यही कारण है कि आज आसपास हमें सच्चे और सम्पूर्ण ढंग से शिक्षित लोग नहीं मिलते। शिक्षा के नाम पर आधे-अधूरे और अपाहिज लोग ज्यादा नजर आते हैं।

इसी वजह से हमारे यहाँ शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की सारी प्रणाली एकांगी एवं विशेषीकृत होने को अभिशप्त है।

प्रसिद्ध कथाकार मोपांसा ने अपने समय के अनुभव के आधार पर कभी कहा था कि आदमी हमेशा अकेला होता है और उसका सर्वोत्तम मित्र भी उसके लिए एक पहेली होता है। दरअसल, यह पहेली बनती है उस निजी पूँजी की व्यवस्था से, जो आदमी के ज्ञान को विशेषीकृत करते हुए उसे उसके सच्चे और वास्तविक जीवन से अलग करती जाती है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न भी आज विशेषीकृत ज्ञान से ज्यादा जोड़ दिए गये हैं। इससे समाज के भीतर ज्ञानात्मक विभाजन और विशेषीकरण की प्रक्रिया तेज हुई है। इस वजह से भी आज के लोग अपने आज के साहित्य से दूर होते जा रहे हैं।

साहित्य की इस महत्वपूर्ण भूमिका को आज बिलकुल नजरंदाज किया जा रहा है। पब्लिक स्कूलों में तो हाईस्कूल के बाद साहित्य और मानविकी विषय पढा़ए ही नहीं जा रहे हैं। उच्च शिक्षा में भी केवल वही विद्यार्थी इन्हें पढ़ रहे हैं, जो विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ने में अक्षम पाते हैं। मेरा तो मानना है कि विज्ञान वर्ग के हर विद्यार्थी के लिए साहित्य पढ़ना अनिवार्य होना चाहिए। आप क्या कहेंगे?

आपका मानना सही है। साथ ही साहित्य पढ़ने वालों को भी विज्ञान का सामान्य ज्ञान उतना ही आवश्यक है, जितना विज्ञान पढ़ने वालों को साहित्य का। ज्ञान की यात्रा कभी इकतरफा नहीं होती। सामान्य ज्ञान सभी को सबका और विशेष ज्ञान किसी एक क्षेत्र का। जीवन समग्र है और विशेष भी। मानव भावनाओं की जानकारी विज्ञान से नहीं हो पाती इसलिए साहित्य की जरूरत होती है। और दुनिया गतिशील कैसे रहती है, इसकी वस्तुस्थिति का पता विज्ञान से चलता है और ऐसी अनेक तरह का अदृश्य सचाइयों का भी, जो विज्ञान के बिना संभव ही नहीं थी। ज्ञान कभी इकहरा और सपाट नहीं होता। आदमी ने अपनी हजारों सालों की जीवन यात्रा में बहुत कुछ अपने अनुभवों से जाना है और उसे ही ज्ञान में परिवर्तित किया गया है। इसका उपयोग हर कोई अपने जीवन में करता है। पब्लिक स्कूल नामधारी प्राइवेट स्कूल अपना धंधा करने के लिए हैं, समाज को शिक्षित करने के लिए नहीं। उनके यहां वही माल तैयार किया जाता है, जो बाजार में बिकता है। साहित्य और मानविकी जिस रोज बाजार में बिकने लग जाएंगी, ये स्कूल उनको पढ़ाने लगेंगे। जनशिक्षा का असली काम कभी बाजार नहीं कर सकता। यह काम तो उन स्कूलों को करना होगा, जो जनशिक्षण की भूमिका में हैं। दरअसल, हमारे देश में युवकों और अभिभावकों पर एक ही दबाव है, रोजगार हासिल करने का। साहित्य और मानविकी बाजार और रोजगार के मामले में छोटी सी भूमिका में हैं। इस वजह से ऐसा हुआ है। दूसरी बात यह भी है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में विज्ञान और तकनीक की भूमिका बहुत अग्रणी और जरूरी हो गई है। हमारी सारी शिक्षा व्यवस्था सीधे रोजगार पाने का जरिया है इसलिए ऐसा हुआ है। सरकारें तो वही काम करने लगती हैं जो जनता की जरूरत बन जाता है। उनको वास्तविक जन-शिक्षण से ज्यादा लेना-देना नहीं होता। वास्तविक शिक्षा बहुत अलग बात है। वह पूँजी की शिक्षा से बहुत भिन्न होती है।

यह काम समाज के जागरूक और संवेदनशील लोगों को स्वयं आगे आकर और अपना सब कुछ दाव पर लगाकर करना पडे़गा। ऐसे स्कूल चलाने पडे़गे जो समाज को सम्पूर्ण मुक्ति की ओर ले जाएं। जो रोजगार देने के साथ समाज का शिक्षण मानवता के विश्व मानदंडों के आधार पर करें। तब ही इस समस्या का कोई हल निकल सकता है। सरकारी स्कूलों से यह काम तभी किया जा सकता है, जब शिक्षकों का दृष्टिकोण समग्रता वाला हो और जीवन के प्रति उनकी दृष्टि आधुनिक एवं वैज्ञानिक हो। शिक्षा में एक अलग तरह के राष्ट्रीय अभियान से ऐसा संभव किया जा सकता है। एक अलग तरह की स्कूली शिक्षा व्यवस्था चलाकर।

2 comments on “आपकी आत्मा में किसी कला के लिए स्थान नहीं है, तो आप अपाहिज हैं : जीवन सिंह

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति विश्व जल दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर … अभिनन्दन।।

  2. श्रीवास्तव जी आभार।
    अनुराग

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