आजादी की जमीन पर फलते-फूलते दो स्कूल : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

‘स्कूल’ का नाम लेते ही हम सबके दिल-दिमाग में स्कूल की एक परम्परागत छवि उभरती है जिसमें एक भवन है, शि‍क्षक और शि‍क्षिकाएं हैं, घण्टी है, एक पूर्व निर्धारित कार्य योजना यानी समय सारिणी है, समय सारिणी से संचालित कुछ नीरस जड़ कक्षाएं हैं, और कक्षाओं में हैं डरे सहमे बच्चे। बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं, उनके मन में स्कूल आने की न तो ललक है और न ही उत्साह। उनके फीके चेहरे और स्वप्नहीन सूखी आंखों में उदासी और भय पसरा है। बच्चे जो समाज का भविष्य हैं, लेकिन जिनमें सीखने का आनन्द मर चुका है। क्या नहीं लगता है कि वे बच्चे जिनके कंधों पर परिवार और समाज की एक बड़ी जिम्मेवारी आने वाली है, वे मजबूत, कुशल और अन्दर से कुछ सीख पाने के आनन्द के भाव से भरे-भरे हों।

लेकिन नैराश्‍य की इस स्कूली मरुभूमि में कुछ स्कूल मरूद्यान की भांति जीवन की आस जगाने वाले भी हैं। जहां बचपन कलरव करता है। जहां बच्चों में प्रवाहमान ऊर्जा कुछ नया रचने को आतुर है, जहां कबाड़ में भी कला एवं सृजन के नव आयाम दिखाई पड़ते हैं। जहां कल्पना को विकसित करने को विस्तृत फलक उपलब्ध है और आजादी भी। तो आइए मिलते है दो ऐसे ही स्कूलों से जहां न कोई घण्टी है न कोई समय सारिणी। और हां, कक्षाएं भी नहीं हैं। पहले स्कूल का नाम है- ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल‘ भोपाल। प्रश्‍न उठता है कि आखिर यह कैसा स्कूल है और इसके पीछे क्या उद्देश्‍य रहे होंगे और परम्परागत स्कूलों से यह किन मायनों में अलग हैं।

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल भोपाल।

स्कूल के अकादमिक समन्वयक, अनिल सिंह जानकारी देते हैं, ‘‘शैक्षिक क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था ‘एकलव्य’ में काम करने वाले तीन व्यक्ति प्रमोद मैथिल, राजेष खिंदरी और टुलटुल बिश्‍वास एक ऐसे स्कूल का सपना देख रहे थे, जहां शि‍क्षक और छात्र एक धरातल पर खड़े होकर एक साथ सीखने-सिखाने की यात्रा आरम्भ करें, न कोई आगे न कोई पीछे, सब साथ-साथ बढ़ें, कदम-दर-कदम। जहां प्रत्येक बच्चे को अपनी बात रखने की पूरी आजादी हो और सवाल उठाने का अधिकार भी। जहां हाथ में हुनर हो और मन में कुछ नया सीख पाने का आत्मविश्‍वास भी। तो तीनों ने मार्च 2012 में 6 बच्चों के साथ ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल’ की शुरुआत की।’’

किराये के भवन में संचालित आनन्द निकेतन स्कूल के एक पूरे दिन की गतिविधियां बच्चों को न केवल रिझाती हैं, बल्कि स्वतः सृजन की ओर उन्मुख भी करती हैं। सुबह का पहला सत्र आरम्भ होता हैं दौड़ भाग और कुछ एक्सरसाईज करने से। लेकिन वहां न तो कोई सीटी होती है न कोई निर्देश, और न पहले से तय कोई टीचर। बस बच्चे अपने मन से जो समझते हैं, उसे करते रहते हैं और एक-दूसरे को देखकर एक क्रम बना लेते हैं। सुबह नौ से पौने दस के बीच स्कूल का छोटा मैदान रंगबिरंगी तितलियों से सज जाता है, क्योंकि बच्चों की कोई यूनीफार्म तय नहीं है और विभिन्न रंगबिरंगी पोषाकों में बच्चे तितलियां और फूल ही तो हैं। सूरज की बढ़ती चमक के साथ ही शुरू होता है ‘मार्निंग गैदरिंग’ के रूप में दिन का संगीतमय, रोचक और मस्ती भरा दूसरा सत्र। इसे हम प्रार्थना सत्र भी कह सकते हैं पर यह परम्परागत स्कूली प्रार्थना सत्र से बिल्कुल अलग और ताजगी भरा है। यहां सब बच्चे मिलकर हर्ष-उल्लास और हास-परिहास के साथ विविध भावों एवं रस से ओतप्रोत गीत गाते हैं। ये गीत हिन्दी सहित विविध भारतीय भाषाओं-बोलियों यथा पहाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, भोजपुरी, बांग्ला, झारखण्डी, तमिल और अंग्रेजी में हैं, जिन्हे बच्चों ने शि‍क्षकों के साथ मिलकर खुद चुना है। इनसे बच्चे न केवल विविध भाषाओं के सौन्दर्य से परिचित होते हैं, साथ ही अपने अनुभव को भी समृद्ध कर रहे होते हैं। इन गीतों में जीवन के विविध पक्षों के चटकीले रंग समाहित हैं। प्रकृति से अनुराग एवं सह अस्तित्व है। नदी, पर्वत, धरती, जंगल, पक्षियों से संवाद है। मित्रता है, सबके लिए न्याय है और समानता व समरसता के उदात्त भाव भी। गीतों की सुरीली तान, लय, ताल, स्वरों का आरोह-अवरोह और ढपली एवं ढोलक की थाप। बस मन बंध सा जाता है और एक ऐसे विश्‍व की कल्पना में खो जाता है जहां आनन्द है बस अनिर्वचनीय आनन्द।

आनन्द निकतन डेमोक्रेटिक स्कूल का अगला सत्र ‘पोडियम’ कहलाता है, बच्चों की अपनी बातचीत करने और पिछले दिन के कामों की समीक्षा का सत्र। यह स्कूल की अद्भुत और महत्वपूर्ण गतिविधि है। पिछले दिन स्कूल में क्या कुछ घटित हुआ, कौन सी कहानी-कविता सुनी, कहां गये, क्या चित्रकारी की और उसमें कौन से रंग भरे। कैसा लगा, कौन-सी गतिविधि मजेदार थी और कौन-सी बोरिंग। घर और स्कूल दोनों जगह के अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति यहां देखी जा सकती है। यहां बच्चे लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन का सुमधुर परिवेश बनाते एवं जीते हुए दिखाई देते हैं। अपनी बात कहने और दूसरों की बातें धैर्य से सुनने एवं महत्व देने का पाठ अनायास सीख जाते हैं। स्कूल में बच्चों की कक्षाएं नहीं हैं, बल्कि उम्र वर्ग के समूह हैं। 3 से 4 वर्ष, 4 से 5 वर्ष, 6 से 8 वर्ष, 8 से 10 वर्ष, और 10 से 12 वर्ष के बच्चों के अलग-अलग पांच समूह है, जिन्हें क्रमश: बटरफ्लाई, बडर्स, स्क्वैरल, पीकॉक और डीयर नाम से जाना जाता है। यह नाम बच्चों ने अपने लिए खुद चुने हैं। बच्चे अपने समूहों में ही पोडियम की गतिविधि करते हैं, जिसमें उनके साथ एक फैसिलिटेटर होता है। फैसिलिटेटर बच्चों की अभिव्यक्ति को पोडियम रजिस्टर में अक्षरश: उनके कहे अनुसार ही दर्ज करता जाता है। बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति का यह मंच स्कूल की ताकत और पहचान है। बच्चों में इससे न केवल अपनी बात रखने का तरीका आया है, बल्कि कहने में निर्भीकता, स्पष्टता और तार्किकता भी बढ़ी है। फैसलिटेटर को भी पिछले दिन की कक्षाओं में की गई गतिविधियों का आभास मिलता है। इस गतिविधि‍ में नित नए प्रयोग होते रहे हैं। शुक्रवार के दिन बड़े बच्चों के लिए स्कूल द्वारा दिए गए या खुद से चुने विषय पर तैयारी करके बोलने की शुरुआत हुई है, इसे बच्चों ने ही आकार दिया है। इसके अतिरिक्त लिखने-पढ़ने की दक्षता वाले बच्चे पिछले दिन का विवरण अपने पोडियम रजिस्टर में लिख कर लाते और पढ़कर सुनाते हैं। पोडियम के लिए बच्चों में उत्सुकता, गंभीरता और उतावलापन बताता है कि यह उनके लिए कितना खास और रुचिपूर्ण सत्र होता है।

पोडियम सत्र के बाद बच्चे नाश्‍ता करने हेतु कुछ देर का अवकाश लेते हैं। फिर प्रारम्भ होता है ‘डे प्लानिंग’ यानी अपने समूहों में दिनभर की योजना बनाने का सत्र। बच्चों की शत-प्रतिशत भागीदारी, आपसी संवाद, नोक-झोक एवं सामान्य तरीके से व्यक्ति और संसाधन की उपलब्धता, सबकी सहमति और सुविधा, व्यावहारिकता, निरंतरता, जरूरत और उपयोगिता के आधार पर बच्चे दिनभर की गतिविधियों की योजना और क्रम तय करते हैं। इससे बच्चों में जहां खुद निर्णय लेने और उसमें अपनी जिम्मेदारी महसूस करने का भाव आता है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी रुचि, पसंद और जरूरत को भी जगह दे रहे होते हैं। यहां किए गए निर्णयों में अहम नहीं टकराते, बल्कि सामूहिक निर्णय करने एवं उदारमन से स्वीकारने का संस्कार जन्मता है।

अब बच्चे अपनी तय कार्य योजना के अनुसार विभिन्न अकादमिक कक्षों में जाते हैं, जहां पहले से ही फैसलिटेटर अपनी तैयारी के साथ मौजूद होते हैं। इन अकादमिक कक्षों में विषय की प्रकृति के अनुकूल रिसोर्स मैटेरियल, बच्चों के काम का डिस्प्ले मैटेरियल और दूसरी सहायक शि‍क्षण की सामग्री होती है, जो बच्चों को विषय से सहजता से जोड़ती है। ये कक्ष भी अनूठे हैं, लैंग्वेज एण्ड इन्क्वैरी रूम,  आर्ट एण्ड एस्थेटिक रूम, सेंस ऑफ हिस्ट्री एण्ड सोसाइटी रूम, चाइल्ड साईंटिस्ट रूम और रूम फार न्यूमरेसी एण्ड लाजिक। औपचारिक स्कूली ढांचे में बच्चों की रूढ़ कक्षाएं होती हैं, जिनमें बच्चे सुबह से शाम तक एक ही कक्ष में बैठे रहते हैं और शि‍क्षक आते-जाते रहते हैं। इसके उलट आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल में फैसिलिटेटर अकादमिक कक्ष में होते हैं और बच्चे अपनी योजना के अनुसार उस क्रम से अकादमिक कक्षों में जाते हैं। इससे जहां एक तरफ तो फैसिलिटेटर को अपने कक्ष में तैयारी करने का अवसर मिलता है और वह अपने कक्षों को लगातार बेहतर बना रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों को एक अकादमिक कक्ष से निकलकर दूसरे अकादमिक कक्ष में जाने का अवसर मिलता है। वह उन्हें एक विषय की प्रकृति के प्रभाव से निकलकर दूसरे में जाने की सुगमता देता है। कक्ष बदलने से नए अकादमिक कक्ष का वातावरण उस विषय के साथ जीवंत जुड़ाव बनाने में मददगार होता है।

तत्पश्‍चात आधे घंटे के लंच ब्रेक में सभी बच्चे और शि‍क्षक एक साथ बैठकर अपने-अपने टिफिन साझा करते हैं और इस तरह संगत व साथ खाने का मजा लेते हैं। सब्जियों, अचारों, रोटी, पूडी, पराठों का आदान-प्रदान इस सत्र को खास बनाता है। लंच के बाद बच्चे अपनी तय की हुई योजना के अनुसार अकादमिक कक्षों में जाते हैं और अंतिम सत्र में खेलकूद होता है। इसमें शि‍क्षक भी बच्चों के साथ खेलते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों बच्चों के साथ कबड्डी खेलते हुए अनिल जी के बायें हाथ में चोट लगी थी। पर पूरी तन्मयता एवं जिजीविषा के साथ खेलना जारी था, क्योंकि चोटें खेलों का एक हिस्सा ही तो हैं।

स्कूल प्रायः 9 बजे प्रारम्भ होता है और 3 बजे छुट्टी हो जाती है। जरूरत के अनुसार बच्चे 5 बजे तक भी स्कूल में रह सकते हैं और अभिभावक उन्हें सुविधानुसार स्कूल से ले जाते हैं। साढ़े 3 से साढे़ 4 बजे तक फैसिलिटेटर अपनी शेयरिंग मीटिंग में एक-एक बच्चे की भागीदारी और उसकी लर्निंग पर बारीकी से बातें करते हैं। इस मीटिंग में हर फैसिलिटेटर को हर कक्षा के बारे में और हर बच्चे के बारे में जानकारी हो रही होती है। फैसलिटेटर एक दूसरे को फीडबैक और सुझाव भी देते हैं। शनिवार का दिन बड़े बच्चों के लिए स्वतंत्र रूप से अपना काम करने का होता है। इसमें वे अपने असाईनमेंट्स, प्रोजेक्ट्स, एक्सपेरीमेंट्स या फिर स्पेशल क्लास करते हैं। कोशि‍श होती है कि बच्चों को इसमें फैसिलिटेटर की कम से कम जरूरत पड़े। शनि‍वार का दिन फैसिलिटेटर्स के लिए भी अगले सप्ताह की प्लानिंग, सत्रों और गतिविधियों के लिए शि‍क्षण सामग्री निर्माण करने और बच्चों के पोर्टफोलियो (स्टूडेण्ट्स फाईल) अपडेट करने का दिन होता है। हर क्षण ऊर्जा और रचनात्मकता से भरा हुआ दिन सभी को बेहतर करने को उत्साहित और प्रेरित करता है।

आनन्द निकेतन स्कूल के बारे में बताते हुए अनिल सिंह कहते हैं, ‘‘जीवन का लक्ष्य है आनन्द प्राप्त करना, लेकिन परम्परागत शि‍क्षा में खुशी के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए एक ऐसी जगह बनाने की जरूरत थी जहां बच्चे खुश रह सकें। टीचर्स और अभिभावक भी आनन्द ले सकें। स्कूल बच्चों के लिए उनके घर का विस्तार हो। और सबसे बढ़कर अपने लिए खुद तय करने के मौके हो। उसी सोच का परिणाम है- आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल। कक्षा आठवीं तक की मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में आज 65 बच्चे अध्ययनरत हैं जो विविध सामाजिक स्तर एवं आय वर्ग से आते हैं। दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यवसायी, कर्मचारी एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के बच्चे एक समावेशी और बालमैत्री पूर्ण परिवेश में 5 शि‍क्षकों के साथ विविध गतिविधियों के माध्यम से हर पल सीखते-सिखाते हैं। यहां पाठ्यपुस्तकों का बंधन, अनुशासन की जकड़न, बोझिल नीरस कक्षाएं, बस्ते का बोझ और परीक्षाओं का भय नहीं है, बल्कि एक प्रकार का खुलापन है, आजादी है, हक है और मौके हैं। कुछ सत्रों में प्रायः अभिभावक भी शामिल होते हैं। सतत् और व्यापक मूल्यांकन पद्धति है। हर बच्चे की प्रोफाईल है जिसमें स्कूल में बच्चे की सत्रों में सहभागिता, अन्य बच्चों एवं शि‍क्षकों से व्यवहार एवं उसके रुझान, अभिव्यक्ति, अभिभावकों व सहपाठियों के विचार आदि के समग्र प्रदर्शन के आधार पर सामूहिक निर्णय होता है। यहां बच्चे को उसकी रुचि और समझ अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है। सच कहूं तो यहां हम सब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और सीखने-सिखाने की कोई जल्दबाजी भी नहीं है।’’

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल की अधिगम की इस रसवती धारा में बच्चे और शि‍क्षक अवगाहन कर नित नवीन तौर तरीके विकसित करते रहेंगे। मुझे विश्‍वास है- स्कूल का परिवेश बच्चों के मधुर हास्य और कोमल सृजन से सदैव जीवन्त बना रहेगा। प्रेम, न्याय एवं समतायुक्त एक अहिंसक लोकतांत्रिक समाज रचना की ओर उनके अनथके कदम बढ़ते रहेंगे।

इधर लगभग दो दशकों से शि‍क्षा विषेशकर प्राथमिक शि‍क्षा क्षेत्र की चुनौतियों एवं सतह पर उभरे सवालों से जूझते हुए समाधान की दिशा में सार्थक कदम बढ़े हैं। इस पहलकदमी को शि‍क्षा की बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ये प्रयास जहां सरकारी स्तर पर राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 तथा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शि‍क्षा अधिकार अधिनियम 2009 के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिसमें स्कूलों में ढांचागत बदलाव करते हुए किसी बच्चे की शि‍‍क्षा प्राप्ति के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करने की एक कोशि‍श की गई हैं, वहीं विस्तृत शैक्षिक फलक पर निजी प्रयासों से भी शि‍क्षा के गुणात्मक सुधार हेतु कुछ उल्लेखनीय नवीन प्रयास हुए है। आपको ऐसे ही एक स्कूल से परचित कराने जा रहा हूं जिसने प्राथमिक शि‍क्षा की परम्परागत छवि, शि‍क्षण एवं मूल्यांकन पद्धति तथा धारणा को न केवल तोड़ा है, बल्कि एक विकल्प भी प्रस्तुत किया है। हालांकि उसके नाम से कहीं दूर-दूर तक भी आभास नहीं होता कि यह किसी स्कूल का नाम है। आप नाम जानना चाहेंगे ? तो लीजिए नाम हाजिर है- ‘इमली महुआ’। पड़ गए न आप अचरज में कि यह कैसा नाम है, क्या कभी ऐसा भी नाम होता है किसी स्कूल का। पर यह सच है और इमली महुआ स्कूल ने अपने प्रदर्शन से एक राह बनायी है जिस पर चलकर विद्यालयों की एक कैदखाने की बन गई छवि से मुक्ति पाकर बालमैत्रीपूर्ण लोकतांत्रिक परिवेश रचा जा सकता है।

इमली महुआ स्कूल के बारे में जानकारी देते हुए संस्थापक प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘इमली महुआ स्कूल छत्तीसगढ़ राज्यान्तर्गत बस्तर के जंगल के बीच कोंडागांव जिला के मुरिया एवं गोंड़ जनजाति बहुल गांव बालेंगापारा में स्थित है। पास में तीन गांव है- कोकोड़ी, कोदागांव और जगड़हिन पारा। ये सभी गांव स्कूल से 3 से 4 किमी की दूरी पर हैं। यह स्कूल नर्सरी से कक्षा 8 तक संचालित हैं। वर्तमान सत्र में 40 बच्चे अध्ययनरत हैं, जो 3 से 15 आयु वर्ग के हैं। वर्तमान में स्कूल का अपना भवन है, पर स्कूल की शुरुआत ‘घोटुल’ में 2 बच्चों, जिसमें एक लड़की थी, और 3 शि‍क्षकों के साथ अगस्त 2007 में हुई थी। यहां कोई परीक्षा नहीं होती है। स्कूल को वित्तीय मदद ‘आकांक्षा पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, चैन्नै’  द्वारा दी जाती है, जोकि एक सत्र में अधिकतम 60 बच्चों के लिए निश्‍चि‍त है। स्कूल के तीन चौथाई बच्चे मुरिया एवं गोंड़ जनजाति के हैं। शेष बच्चे अनुसूचित और पिछड़ी जातियों यथा कलार, गांडा एवं पनका जाति समूहों से सम्बंधित हैं। 90 प्रतिषत बच्चे पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं।’’

इसके पहले कि मैं इमली महुआ स्कूल के बारे में विस्तार से बात करूं, मुझे लगता है कि हम उस आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को समझने का प्रयास करें जिनके बीच ‘स्कूल’ काम कर रहा है। इससे जहां हम एक ओर आदिवासी जीवन के रीति-रिवाज, ज्ञान, परम्परा एवं विश्‍वास की एक झलक देख सकेंगे, साथ ही स्कूल की राह आ रही कठिनाइयों, चुनौतियों एवं शि‍क्षकों के समर्पण को भी जान-समझ सकेंगे। आजादी के 68 साल बाद भी बालेंगापारा का चतुर्दिक वनवासी जीवन विकास से दूर एवं आधुनिकता से अछूता है। वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीते हैं। अपनी आजीविका एवं भोजन के लिए वे खेती और शि‍कार पर आश्रित हैं। मछली पकड़ना, छोटे जानवरों खरगोश, सुअर आदि का शि‍कार करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। पशुपालन भी करते हैं, पर दूध के लिए नहीं, बल्कि गोश्‍त के लिए। क्योंकि आदिवासी समाज दूध पर बछड़े का ही हक मानता हैं, मनुष्‍य का नहीं। आदिवासी समाज अपने बच्चों के साथ इज्जत से बर्ताव करता है। माता-पिता बच्चों के स्वाभिमान की रक्षा करते हैं। छोटे बच्चों से काम नहीं करवाया जाता हालांकि बच्चे अपने बड़ों को काम करते हुए देखकर काम करने का तरीका सीख जाते हैं और बड़े होने पर उनकी मदद करते हैं। आदिवासी समाज में स्पर्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। परस्पर सहयोग भावना इन्हें मजबूत बनाए हुए हैं। उनकी भावना को सम्मान देते हुए स्कूल में भी कोई प्रतिस्पर्धा आयोजित नहीं की जाती। आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर स्कूल बन्द कर दिया जाता है क्योंकि वे स्कूल को खुशि‍यों का घर मानते हैं और ऐसे मौके पर स्कूल खोलना उनके प्रति असंवेदना का ही प्रदर्शन होगा। आदिवासी समाज, विशेषरूप से मुरिया और गोंड जानजातियों में अपने बच्चों को परम्परागत ज्ञान,  नृत्य,  संगीत एवं कला सीखने-सिखाने की संस्था ‘घोटुल’ होती है, जिसमें एक बड़े कुटीर में सभी युवक-युवतियां शाम से सुबह तक निवास करते हैं। इसमें अपना जीवन साथी चुनने की भी छूट होती है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। यहां वे पारिवारिक और सांसारिक समझ विकसित करते हैं। हालांकि यह चलन शहरी संस्कृति के दबाव एवं बाहरी लोगों के दखल से अब बहुत कम हो गया है।

इमली महुआ स्कूल।

विद्यालय का आरम्भिक नाम रखा गया था ‘इमली महुआ नई तालीम सेण्टर फार लर्निंग’। पर यह बच्चों के लिए याद कर पाने और बोलने के लिए बहुत लम्बा था, तो बच्चो ने आपसी निर्णय से एक नया नाम चुना- ‘इमली महुआ स्कूल’। स्कूल बारहों महीने सोमवार से शनिवार प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक लगता है। हरेक बच्चे का नाम किसी न किसी कक्षा में अंकित होता है, पर बच्चे सामूहिक रूप से पढ़ते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले तक स्कूल में कक्षाओं की बजाय आयु आधारित बच्चो के चार समूह थे जो सपरी (3-5 वर्ष), सेमर (7-12 वर्ष), सीताफल (8-10 वर्ष) और सूरजमुखी (11-15 वर्ष) नाम से पहचाने जाते थे। यहां पढ़ाये जाने वाले विषयों में अंग्रेजी, गणित, हिन्दी, विज्ञान, पर्यावरण शि‍क्षण/सामाजिक बदलाव, योग, संगीत, मिट्टी का काम, चित्रकला, कढ़ाई-बुनाई जैसे विषय शामिल हैं। स्कूल के शि‍क्षण की माध्यम भाषा हिन्दी के और हल्बी हैं। क्लास बच्चों की मांग पर होती है। बोर होने पर बच्चे मना कर देते हैं। बच्चे रोजाना कई अलग-अलग तरह की गतिविधियां करते हैं और पढ़ाई भी उन्हीं का एक हिस्सा है। लूडो, कैरम, सांप-सीढ़ी, शतरंज, क्रिकेट के साथ ही लकड़ी के गुटकों और मांटेसरी की शैक्षिक सामग्री से भी अनेक आकृतियां बनाते-बिगाड़ते हुए बच्चे खेलते रहते हैं। दरअसल, यह खेलना भी एक प्रकार का सीखना है। कुछ बच्चे दिनभर खेलते हैं। स्कूल में न तो घण्टी बजती है, न स्कूल का गेट बंद होता है। बच्चे कभी भी आ सकेते हैं और जब चाहें घर जा सकते हैं। समय का आकलन सूरज को देखकर कर लेते हैं। बड़े बच्चे घर का काम करके आते हैं। यहां कक्षाएं और टाइम टेबिल का बंधन नहीं हैं। खुला सत्र भी होता है जिसमें बच्चे कोई भी प्रश्‍न पूछ सकते हैं। हर बच्चा अलग-अलग चीजें करता है। एक ही समय में कुछ बच्चे सिलाई-कढ़ाई और मिट्टी का काम करते हैं तो कुछ तबला-हारमोनियम पर अभ्यास कर रहे होते हैं। हम प्रत्येक दिन छोटी चैकियों पर बहुत सारी किताबें और लर्निंग मैटेरियल इस तरह से बिछा देते हैं कि बच्चे आसानी से उन्हें देख सकें और तब वे अपनी रुचि एवं सुविधा अनुसार सामग्री चुन लेते हैं और शि‍क्षक के साथ काम करते हैं। फिर दो घण्टे बाद मिलते हैं तब हाजिरी ली जाती है और बातचीत करते हैं। दोपहर का समय सामूहिक भोजन का समय होता है। बच्चे भोजन अपने घरों से लाते हैं, पर हरेक दिन कुछ बच्चे टिफिन नहीं ला पाते, तब स्कूल से उतनी थालियां ली जाती हैं और सभी बच्चे एवं शि‍क्षक अपने टिफिन में से भोजन का थोड़ा हिस्सा थालियों में क्रमश: रखते जाते हैं। इस प्रकार टिफिन साझा करते हुए बच्चे भोजन का आनन्द लेते हैं। सप्ताह में एक बार पूरे स्कूल का एक साथ लाईब्रेरी क्लास होती है जहां बच्चे पुस्तकों को पढ़ने के साथ-साथ उनका रखरखाव, रजिस्ट्ररों में पुस्तकें दर्ज करने एवं उनको एक पहचान संख्या देने, पुस्तकें निर्गत करने एवं जिल्दसाजी करने जैसे काम सीखते हैं। गत सत्र में पास के सरकारी स्कूल के बच्चे भी शामिल हो जाते थे, लेकिन अब उनका आना बन्द हो गया है।

शुक्रवार के दिन स्कूल आधे दिन का होता है और शुरुआत सामूहिक गान से होती है। उसके बाद स्कूल की सफाई, रखरखाव, मरम्मत और सामान की गिनती का वक्त होता है जिसमें बाल्टी, मग, लोटा, झाड़ू आदि की गिनती होती है। कच्चे फर्श की गोबर से लिपाई की जाती है। साढ़े दस बजे तक ये काम निबटाने के बाद सामूहिक नाश्‍ते का समय होता है और तब चने, मौसमी फल, खजूर, आदि मिल बांटकर खाते हैं। वैसे कुछ साल पहले तक शुक्रवार की दोपहर के बाद का समय हाट जाने का होता था और सूरजमुखी समूह के बच्चे अपने बनाये हुए मिट्टी के काम- खिलौने, घड़े आदि बाजार बेचने जाते थे और स्कूल के लिए सप्ताह भर का राशन एवं हरी सब्जियां लाते थे, पर अब इसमें बदलाव किया गया है और लगातार बदलाव करते रहना ही इमली महुआ की खूबी है। लेकिन ये बदलाव बच्चों का सामूहिक निर्णय है जो संवाद आधारित होता है। स्कूल में बच्चे अपनी दिनचर्या खुद तय करते हैं। पढ़ने के लिए कोई भी किसी बच्चे को मजबूर नहीं कर सकता। प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘यहां हरेक को छूट और स्वतंत्रता है। आजादी के कारण हम फलते-फूलते हैं और उसके अभाव में मुरझाते हैं।’’

शनिवार का दिन बाहर घूमने का दिन होता है। छोटे बच्चे दो समूहों में जंगल या किसी पहाड़ी पर पिकनिक मनाने जाते हैं। बड़े बच्चे साईकिल से आसपास के गांवों, महत्वपूर्ण इमारतों, सांस्कृतिक स्थानों की यात्रा पर जाते हैं। यह यात्रा 20 से 50 किमी तक की हो सकती है। स्वाभाविक है कि वापसी पर वे अपने अनुभव लिखते हैं और अन्य बच्चों के साथ साझा करते हैं। रविवार का दिन आराम और आगामी कार्य योजना बनाने का होता है। एपीसीटी  की ओर से प्रत्येक बच्चे को छात्रवृत्ति दी जाती है, जो बच्चे और उसकी मां के संयुक्‍त खाते में जमा की जाती है।

स्कूल की अब तक की शैक्षिक-सामाजिक यात्रा पर खुशी जताते हुए प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘आदिवासी बच्चों को ऐसी शि‍क्षा दी जाए, जिससे उनकी विशि‍ष्‍ट सभ्यता बरकरार रहे और नई समस्याओं एवं चुनौतियों से निबटने की कुशलता पैदा हो। तीन-चार साल तक शि‍क्षण पद्धति शि‍क्षक केन्द्रित थी और बच्चों के हित का निर्णय शि‍क्षकों के हाथ में था। लेकिन स्कूल ने देखा कि आदिवासी जीवन में हरेक व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता है तो स्कूल ने भी बदलाव किया। अब यहां किसी मुद्दे पर सबकी राय ली जाती है और एक सामूहिक निर्णय लिया जाता है। हरेक का एक वोट निश्‍चि‍त होता है। समय-समय पर निर्णयों की समीक्षा भी होती है। साल में एक बार बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं ताकि बच्चे शहरी जीवन की वास्तविकता को नजदीक से समझ सकें। अमीर से अमीर व्यक्ति के घर ले जाते हैं और गरीब व्यक्ति के घर भी। पिछलें दिनों कुछ रेड लाईट एरिया और रैनबैक्सी के मालिक के बंगले पर ले गए थे। फुटपाथ पर जिंदगी जीते लोगों से भी भेंट होती है ताकि बच्चों का अनुभव विस्तृत हो सके और बडे़ होने पर बच्चे अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को कहीं अधिक गंभीरता के साथ निर्वाह कर सकें। हम यहां हमेशा के लिए नहीं आए हैं। वर्ष 2030 तक हम यहां रहेंगे, पर हमें विश्‍वास है, तब तक स्कूल संचालन के लिए पर्याप्त लोग तैयार हो चुके होंगे।’’

‘इमली महुआ स्कूल’ के परिवेश में लोक का संस्कार है और जीवन का लययुक्त प्रवाह भी। यहां श्रम के प्रति सम्मान है तो जिजीविषा का आह्वान भी। यहां बच्चों को उनके बालपन के निश्‍छल व्यवहार के साथ जीने की स्वीकृति है न कि पग-पग पर बड़ों का हस्तक्षेप और आपत्ति। यहां पल-पल रचनात्मक उत्साह और उल्लास है और कुछ नया गढ़ पाने का विश्‍वास भी। यहां के प्रयोग को हम प्राथमिक शि‍क्षा के क्षेत्र में एक सार्थक पहल के रूप में देख सकते हैं।

3 comments on “आजादी की जमीन पर फलते-फूलते दो स्कूल : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

  1. Dr Kewal Anand Kandpal says:

    शानदार आलेख बधाई मलय जी

  2. Aarav says:

    I support it. Sarah a student of class at. Kg

  3. swati melkani says:

    आज ऐसे ही अनेको स्कूलों की ज़रुरत है …. आपके प्रयास को सफलता के विस्तार हेतु मेरी हार्दिक शुभकामनाएं ..

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