आओ हमें ठगो

ठगो खूब ठगो। हमारी तो नियति ही ठगे जाना है। जन्म से लेकर मरने तक कदम-कदम पर ठगे ही तो जा रहे हैं। इस नेक काम में तुम ही पीछे क्या रहते हो।जो ज्योतिष अपने भविष्य के बारे में नहीं जानते, वे हमारे भविष्य को उज्जवल करने के नाम पर ठग रहे हैं। कोई हाथ की लकीरें देख रहा है तो कोई ताश के पत्तों से भविष्य बांच रहा है। हम खुश हैं। उनके पास बार-बार जा रहे हैं।
नेता देश के नाम पर, तरक्की का वास्ता देकर ठगते हैं। चुनाव के दौरान हंस-हंस कर बात करते हैं। हम जानते हैं कि यह एक चालाक ठग की हंसी है। इसमें फंसकर पांच साल तक हाथ मलते रहेंगे। फिर भी उनके चंगुल में फंस ही जाते हैं।
न्याय के नाम पर भी कम ठगी नहीं होती। पुलिस प्रशासन अपनी मर्जी से धाराएं लगाकर केस को कच्चा-पक्का कर देता है। मनमुताबिक जांच की जाती है। वकील भी पीछे नहीं रहते। हमें पता है कि वकील को न्याय-अन्याय से कुछ लेना-देना नहीं है। उसका मकसद केवल मुवक्किल को जीत दिलाना है ताकि मोटी कमाई हो सके। इसके लिए कुछ इधर-उधर करना भी पड़े तो उसे कोई गुरेज नहीं होता। फिर हम न्याय की आस में जिंदगीभर इंतजार करते रहते हैं।
जिन डॉक्टरों को भगवान का रूप कहा जाता है, वह भी कौन से कम हैं? मनमानी फीस वसूलते हैं और गैरजरूरी टेस्ट भी लिख देते हैं। कुछ ने तो फाइव स्टार नुमा हास्पिटल खोल दिए हैं। उनका मकसद पैसा कमाना है। कई बार तो मरे आदमी को भी आईसीयू में रखकर खाल खींचते हैं। पति-पत्नी भी एक-दूसरे को उल्लू बनाते हैं। मन ही मन जलेंगे-भुनेंगे, लेकिन बाहर प्यार का दिखावा करते रहेंगे। शादी से पहले एक-दूसरे की खुशी में खुशी और गम में गम की कसम खाने वाले प्रेमी-प्रेमिका को ठगी का पता शादी के बाद ही चलता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। और फिर जिंदगीभर एक-दूसरे को ठगते रहते हैं।
अब अगर कुछ समझदार लोगों ने रुपये दोगुने-तिगुने करने या आशियान दिलाने के नाम पर ठग ही लिया है तो क्या बुरा किया। क्योंं इतनी हाय-तौबा मच रही है। ठगी का शिकार होने वाले क्या अनपढ़ और गंवार हैं? अधिकांश लोग पढ़े-लिख हैं। फिर क्यों फंसे जाल में। उन्होंने क्यों नहीं सोचा कि चार-छह महीने में रुपये दोगुने-तिगुने कैसे बढ़ सकते हैं? जब जीवनभर की कमाई लगा रहे तो बिल्डर के बारे में भी कुछ पता कर लेें।
मैं तो ठगजी की बुद्धि की दाद देता हूं कि उन्होंंने कम खर्च कर करोड़ों पैदा कर लिए। ऐसे लोग न बरोजगारी का रोना रोते हैं और न ही महंगाई का। ये सांप्रदायिक भी नहीं होते। हिंदू-मुस्लिम हो या सिख-इसाई सभी को ठग लेते हैं। समानता का व्यवहार करते हैं। ऊंच-नीच, अमीर-गरीब जैसे झमेले में नहीं पड़ते। आज देश को ऐसे ही कर्मवीरों की जरूरत है।
और फिर जब लोग ठगने के लिए तैयार हैं तो कोई क्या न ठगे।



2 comments on “आओ हमें ठगो

  1. यकीनन इस ठगों की नगरी में बचना मुमकिन नहीं,लेकिन वजूद बनाए रखने के लिए महाठग का किरदार निभाना होगा। ये जो बोलने वाला जीव और पंचतत्‍व से बना शरीर है न ये भी एक दूसरे को ठग रहे हैं। जैसे बिजली चले जाने के बाद सभी बल्‍ब और ट़यूब बेमतलब हो जाते है। उजाला पलों में अंधेरे में बदल जाता है ठीक उसी तरह यह जीव जब गायब हो जाता है तो पंचतत्‍वों का शरीर स्‍थूल हो जाता है। यह किसी काम का नहीं पिफर भी जब जीव और शरीर एक दूसरे को ठग रहे हैं तो बाकी पर तोहमत लगाने का क्‍या फायदा। अत: जिदंगी जिंदादिली से जीयो ठगों को महाठग के किरदार के दीदार कराओं। वह खुद-ब-खुद ठगना बंद कर देंगे। अच्‍छी रचना के लिए साधुवाद। ऐसे ही कलम चलाते रहिए।

  2. BIJAY says:

    अरे, आपके पास ठगने के लिए है ही क्या? यदि मैं आपको ठगने चलूंगा तो खुद ही ठगा जाऊंगा।

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