आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं दिनेश कर्नाटक : डॉ शुक्ला

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हल्द्वानी:19 फ़रवरी 2017 को सत्यनारायण धर्मशाला में शैक्षिक दखल समिति के तत्वाधान में युवा कहानीकार दिनेश कर्नाटक के तीसरे कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने की तथा इसमें विशिष्ट अथिति डा. तारा चन्द्र त्रिपाठी तथा डा.प्रयाग जोशी रहे।

आधार वक्तव्य देते हुए उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. शशांक शुक्ला ने कहा कि वर्तमान दौर में ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव से साहित्य को बचाना बड़ी चुनौती है और दिनेश कर्नाटक के साहित्य में जो स्थानीयता है, वह सांस्कृतिक हमले को झेलती है। लेखक यदि अपने अनुभव क्षेत्र से बाहर चला जाये तो उसकी साहित्यिक यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं चल सकती, पर दिनेश जी के साथ ऐसा नहीं है। उनके इस कहानी संग्रह में ही पांच कहानियाँ उनके अनुभव क्षेत्र, माध्यमिक शिक्षा के तंत्र और उसकी समस्याओं पर चर्चा करती हैं।

उन्होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक भीष्म साहनी की तरह ही कहानी की शुरुआत में कोई वातावरण नहीं बनाते, बस बिना कोई औपचारिकता के कहानी कहना शुरू कर देते हैं। कहानी के परिवेश के स्थानीय होने के कारण पाठक आसानी से कहानी से जुड़ भी जाता है। वह व्यवस्था पर चोट करने के स्थान पर अपनी कहानियों में सांस्कृतिक चर्चा करते हैं। दिनेश जी आंतरिक हलचलों के कहानीकार हैं।

डा. शुक्ला ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की कहानियां प्रश्नों से भरी हुई होती हैं और इनमे पहाड़ का दर्द शामिल होता है। कम से कम तीन जगह मुझे ऐसा लगा कि कि वह पात्रों की अंतर्द्वन्दता का कोई मनोवैज्ञानिक उपचार नहीं करते, यह काम वह पाठक पर छोड़ देतें हैं। इनकी कहानियाँ सच से आँख मिलाने की कहानियाँ हैं जो पुरानी मान्यताओं पर चोट करती हैं और इनकी कहानियों का स्वर प्रतिरोध है।

इसके बाद दिनेश कर्नाटक ने अपनी एक कहानी ‘अच्छे दिनों की वापसी’ का वाचन किया। इसमें एक शिक्षक के अवसाद में जाने और फिर उससे लड़कर वापस आने का बड़ा मार्मिक चित्रण है। इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने यह बात उभारने का सफल प्रयास किया कि कैसे हमारे समाज में अवसाद को कोई रोग नहीं समझा जाता और यह भी कि इससे ग्रस्त व्यक्ति के प्रति समाज की प्रतिक्रिया कैसी रहती है। इस कहानी के वाचन से पूर्व दिनेश कर्नाटक ने कहा कि साहित्य की सबसे बड़ी खूबी है कि यह आपको जीवन के हर कोने में ले जाता है।”

युवा कथाकार खेमकरण सोमन ने कहा कि मेरा दिनेश कर्नाटक से सर्वप्रथम परिचय तब हुआ, जब मैंने उनकी कहानी ‘झाडियाँ’ को कथाक्रम नामक पत्रिका में पढ़ा था, जो सुअर के इंसान बन जाने की कहानी है। उन्‍होंने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक की सबसे अच्छी बात यह है कि वह सहजता और सरलता से कहानी कहते हैं। उनकी कहानियों में सामजिक जीवन, पर्यावरण, संस्कृति का विकृत रूप तथा उसका सही रूप भी दिखता है। उन्‍होंने कहा कि‍ ‘एक मूँछ प्रेमी का कुबुलनामा’ में परंपरा और आधुनिकता का गज़ब का संयोग है। इनके साहित्य को देखकर यह बात सही सिद्ध होती है कि साहित्यकार समाज के बारे में जितना चिंता करता है, उतना ही लिखता है।

कुमायूनी के ख्याति प्राप्त कवि और लेखक जगदीश जोशी ने कहानी संग्रह पर चर्चा करते हुए कहा कि‍ ये कहानियां मानवीय मूल्यों की स्थापना करती हैं और मैकाले के ज़माने से लेकर आज तक जारी शिक्षा प्रणाली का ‘मुआइना तदंतो’ मतलब पोस्टमॉर्टम करती हैं। उन्‍होंने कहा कि‍ यथार्थ दो प्रकार का होता है- एक देखा हुआ और दूसरा भोगा हुआ। दिनेश कर्नाटक की कहानियों में भोगा हुआ यथार्थ है।

शम्भूदत्त पाण्डेय, शैलेय ने कहा कि‍ दिनेश कर्नाटक व्यक्ति मन के कथाकार हैं। दिनेश को सलाह है कि जब भी वे अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक पक्ष को उठायें तो उनकी मूल स्थितियों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।

युवा कथाकार अनिल कार्की ने कहा कि‍ ‘मैकाले का जिन्न’ कहानी को पढ़ते हुए मुझे तब कि याद आती है, जब मैं गाँव से कक्षा ग्यारह में प्रवेश लेने मिशन स्कूल पिथौरागढ़ गया, तो अंग्रेजी के मासाब ने मेरी कमीज़ के पैन्ट से बाहर निकली होने के कारण मुझे एक झापड़ लगाया जिस कारण मैं आज तक अंग्रेजी नहीं सीख पाया। इसके बाद संस्कृत की कक्षा में भी जाति और वर्ण के आधार पर भेदभाव किया जाता था। उन्‍होंने ‘पीताम्बर मास्साब’ की चर्चा करते हुए कहा कि‍ इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे अपने प्राइमरी के मासाब पान सिंह याद आते हैं कि कैसे वो स्कूल शराब पी कर पहुँचते थे और हम सब बच्चे उनके आने तक धारे से पानी भर के लाते थे। उन्‍होंने कहा कि‍ मेरी समझ में कहानी की सफलता इसमें है कि मैं उसे पढ़ते हुए कितना कहानी के साथ खुद को जोड़ पाता हूँ। दिनेश कर्नाटक की कहानियां मेरी इस कसौटी पर पास होती हैं। इनकी कहानियां समाज द्वारा खड़े किये गए फ्रेमों से टकराती हैं और अभिव्यक्ति को बंद करने के इस दौर में भी टिकी रहती हैं।

प्रयाग जोशी ने कहा कि दिनेश की कहानियाँ बहुत रसीली तथा सहज होती हैं जिन्हें पढ़कर मैं तनावमुक्त महसूस करता हूँ।

लोकार्पण कार्यक्रम के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि दिनेश के इस कहानी संग्रह के बहाने मुझे उत्तराखंड के साहित्य का पुनरावलोकन करने का अवसर मिला है। बटरोही ने कहा कि‍ लेखक के सामने एक चुनौती यह होती है कि वो अपने परिवेश को अपनी कथा भाषा में लाये, दिनेश इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। इन्होंने एक नई कथा भाषा शैली को जन्म दिया है।

कार्यक्रम में प्रभात उप्रेती, कस्तूरी लाल, तारा चन्द्र त्रिपाठी ने भी कहानी संग्रह पर वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए।

कार्यक्रम की शुरुआत ‘शैक्षिक दखल‘ समिति के कोषाध्यक्ष डा. दिनेश जोशी ने समिति के बारे में जानकारी देकर की। उन्‍होंने दिनेश कर्नाटक के इस कहानी संग्रह के संदर्भ में कहा कि‍ लेखक अपने लिए नहीं,  समाज के लिए लिखता है।

अंत में शैक्षिक दखल समिति की ओर से डा. विवेक ने लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

कार्यक्रम के संचालक डा. महेश बवाड़ी ने दिनेश कर्नाटक के इतनी कम उम्र में तीसरे कहानी संग्रह का छपने को पूरे हल्द्वानी के लिए गौरव की बात बताया।

कार्यक्रम में शशांक पाण्डेय, गिरीश पाण्डेय, बसंत कर्नाटक, गणेश खाती, नवेन्दु मठपाल, सुरेन्द्र सूरी, राजेंद्र पाण्डेय, कन्नू जोशी, हेम त्रिपाठी, हिमांशु पाण्डेय सहित शहर के कई साहि‍त्‍यप्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्तुति‍ : गिरीश पांडे 

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