अनंत भटनागर की कवि‍ताएं

अनंत भटनागर

वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है

संकरी सड़कों पर
दाएं-बाएं
आजू-बाजू से काट
वाहनों की भीड़ में
अक्सर
सबसे आगे
निकल जाती है
वह लड़की
जो
मोटरसाइकिल
चलाती है

सोचता हूँ
जब लड़कियों के लिए
दुनिया में
वाहन चलाने के
अनेकानेक
सुन्दर व कोमल
विकल्प मौजूद हैं
तब भी आखिर
वह लड़की
मोटरसाइकिल ही
क्यों चलाती है ?

कभी लगता है कि
यह उसके भाई ने
खरीदी होगी
और वह
छोड़ गया होगा
घर परिवार
या फिर
हो सकता है
यह उसके पिता की
अन्तिम निशानी हो
और,
बेचना उसे
नहीं हो
स्वीकार

हो सकता है
वह लड़की
एक्टिविस्ट हो
और मर्दों की दुनिया
के अभेद्य दुर्ग को
सुनाना चाहती ह
अपनी ललकार

कभी-कभी
सोचने लगता हूँ
क्या करती होगी
वह लड़की
जब कभी जाती होगी
अपने बॉयफ्रेंड के साथ
मोटरसाइकिल पर
पीछे बैठकर

क्या
बलखाती / मुस्काती
लतिका सी पुलकित
सिमट जाती होगी
अपने हर अंग में
हर वांछित/अवांछित
ब्रेक पर
या झुंझलाती/झल्लाती
रहती होगी
उसकी
धीमी रफ्तार पर

अवसरों की वर्षा में
दिनोंदिन
घुलती दुनिया में
जल, थल, वायु
के भेद भुलाकर
जब लड़कियां
चलाने लगी है
रेल, जहाज,
हवाई जहाज
एक लड़की
के मोटर साईकिल
चलाने पर इतना
सोच-विचार
आपको बेमानी लग
सकता है

मगर,
इन दकियानूसी सवालों
की गर्द
आप हटाएं
इससे पहले ही
पूछ लेना चाहता हूँ
एक सवाल

क्या
आप नहीं चौंके थे
उस दिन
जब आपने
पहली बार किसी
एक लड़की को
मोटरसाइकिल चलाते
हुए देखा था ?

विरासत में मिले
हजारों साल पुराने
खजाने को
मस्तिष्क में समेटते हुए
क्या आपको नहीं लगता
कि
आकाश-पाताल को
पाटने से
कठिन होता है
सोच की खाइयों को
भर पाना
जल थल
भेदने से
कठिन होता है
जड़ तन्तुओं को
सिल पाना
हाथ पैर
काटने से
कठिन होता ह
सड़े घावों
को चीर पाना

इसलिए
उस लड़की के
सामने से गुजरते हुए
सोचता हूँ अक्सर
क्या शादी के बाद भी
चला पाएगी वह
मोटरसाइकिल
क्या बदल पाएगी
वह
वक्त के पहिये की
रफ्तार
क्या
वह आगे बैठी होगी
और पति
होगा
पीछे सवार ?

मोबाइल फोन

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां भेजे
सन्देश
कबूतरों के हाथ
और/करती रहें
जवाब की
अनवरत प्रतीक्षा

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां जागें
रात-रात
और छिपकर
रेशमी कपड़ों पर
सिल दें
कोई एक नाम

अब नहीं रहा
वह समय/कि
लड़कियां लिखें
कविताएं
और/गुनगुनाती
इठलाती
गुजार दें
सुबह-शाम

प्रेम जैसी
सरल चीज के लि
इतनी कठिनाई
सहने का
समय नहीं है यह

प्रेम के लिए
अब उपलब्ध है
एक मोबाइल दुनिया
मोबाइल दुनिया
जहाँ
हर वक्त/हर जगह
किया जा सकता है
प्रेम
जहाँ हर क्षण
पलटी जा सकती है
प्रेमियों से
मनुहार
जहाँ हर रोज
बदले जा सकते है
प्रेमी

मोबाइल दुनिया में
प्रेम के लिए
शब्द ही नहीं
सम्पूर्ण शब्दावली है
प्रेम के लिए
क्षणिक चित्र नहीं
गति‍क दृश्‍यावली है
कविता ही नह
गीत है, स्वर है
ध्वनि गत्यावली है

इस गतिशील दुनिया में
प्रेम के लिए
लम्बी तपस्या/गहन
साधना करते रहन
का समय नहीं है
अब किसी के पास
इतने अन्तराल में तो
किए जा सकते हैं
अनेकानेक प्रेम
एक के बाद एक
या फिर
एक साथ

मोबाइल फोन
ने कर दिया हैं
प्रेम करना
बहुत आसान

सचमुच !
प्रेम की अनुपस्थिति में ही
होता है
प्रेम करन
बहुत आसान।

महात्माजी

महात्माजी
खाते नहीं हैं
अन्न
वस्त्र धारण नहीं करत
खुला ही रखते हैं
तन-बदन
वर्षों पहले त्याग चुके हैं
गृहस्थ जीवन

तुम्हारे जैसे नहीं हैं वह
पदार्थ-अपदार्थ के लिए
ललचाता नहीं है
उनका मन

पेट भरने के लिए
खा लेते हैं
सूखी मेवा
शि‍ष्यों ने करवा दिया है
आश्रम
वातानुकूलन
शि‍ष्यायें चंचल हैं
करती हैं
अविचल सम्पूर्ण सेवा

महात्माजी
परम त्यागी हैं।

शुक्र है

बाल खुशनसीब है
अब तक साथ निभा रही है
हिना

अपनी उम्र को
उम्र में मिलाते हुए
उसने भी गुजार दी है
एक लम्बी उम्र

डर है कि कुछ
भूरे-भूरे विभीषण
असलिय
बताने लगे हैं.

शुक्र है
पतझड़
अभी बहुत दूर है

अनामिका, अंकल!

हँसी की
हजारों वॉट
बरसाकर
धीरे से
उसने रख लिय
अपनी जींस की
पिछली पॉकेट में
सेलफोन

फिर लेपटॉप के
दोनो पंखों को फैलाकर
उड़ने लगी असीम
आकाश में

एयरपोर्ट के
वेटिंग लाऊंज में
मित्रता के तमाम
पर्यायवाचियों को
दुहराते हुए
मैंने उससे पूछा था
उसका नाम

मित्रता की तमा
संभावनाओं को खारिज
करते हुए
उसने कहा-
अनामिका, अंकल !

काँप रहा है मन

देहरी पर
रखते हुए
बाहर
काँपता है
जैसे दिया
काँप रहा हैं मन
मीत तुम्हें
स्कूल को सौंपते हुए.

फूल/तुम
घबरा ना जाना
अजनबी पंखुरियों के साथ
डरना मत
स्कूल की अनजानी
हवाओं से
न होना बेचैन
क्लासरूम की
अपरिचित गंध से

डर रहा हूँ मैं
कहीं टीचर के
रंगबिरंगी सूट में तुम्हें
दिखने न लगे गुब्बारे
बच्चों की खिलखिलाहट से
याद न आ जाएं
तुम्हें अपने
खासमखास खिलौने

कुछ कहना चाहो
तुम
और न कह पाने की
जुम्बिश में
फूट न पड़े
रूलाई

रोशन
जिन्दगी की आस में
दीप तुम्हें
सौंप रहा हूँ
दुनिया को

काँप रहा है मन

औरत एक सवाल है

धरती पर उसके
जमते कदम
बढ़ती गति
और
पंखिल परवान
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

उसकी खिलखिलाहट
चहकती हँसी
महकती मुस्‍कान
उसकी खिलती आँख
खुलती हुई वाक्
दिन पर दिन
ऊँची उठती नाक
उसके कपड़ों की नाप
कर्मों की छाप
कदमों की थाप

उसकी आस
उसके अहसास
खुद पर बढ़ता
विश्‍वास
जिनि‍क लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक सवाल है

युग-युग से
मानस की कुन्द कारा में
द्रोपदी के केश
सीता का पुनर्प्रवेश
अहिल्या निर्निमेष
गार्गी के प्रश्‍न
मांडवी का मन
और
मीरा का नर्तन.
माधवी का मोल
गांधारी कर कौल
और
उर्मिला का अनबोल
जिनके लिए सवाल है
उन सबके लिए
औरत एक  सवाल है

आदिम इच्छाओं के तल
कुचलते आए हैं जो सपनों को
वे ही कि‍या करते है
सवाल
औरत को लेकर
वे ही दिया करते हैं
जवाब
अपने चेहरे बदलकर.

सिर्फ इन चेहरों से
पर्दा उठने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गूंगा होने तक
सिर्फ इन चेहरों के
गुमनां बनने तक
औरत एक सवाल है

(कवि‍ता संग्रह ‘वह लड़की जो मोटरसाइकिल चलाती है’ से साभार)

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