अधूरी आजादी : अनुराग

parliment house

देश की आजादी को 66 साल हो गए हैं, लेकि‍न हर बार की तरह इस बार भी सवाल सामने है कि‍ क्‍या हम सही अर्थों में आजाद हैं? क्‍या एक आजादी मुल्‍क की यह ही दशा और दि‍शा होनी चाहि‍ए जो आज भारत, माफ कीजि‍ए इंडि‍या की है? वि‍संगति‍यां हर व्‍यवस्‍था में होती हैं, लेकि‍न भारत में जैसा हाल लोकतंत्र का है शायद ही कहीं और हो। दुनि‍या भर में छोटे-छोटे मुल्‍क अपने बलबूते आगे बढ़ना का प्रयास कर रहे हैं, लेकि‍न यहां की स्‍थि‍ति‍यों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि‍ पक्ष, वि‍पक्ष, नौकरशाह या आम जनता में ही ऐसी कोई ललक है। वि‍संगति‍यां लगातार बढ़़ती ही जा रही हैं। पक्ष सत्‍ता के नशे में मदमस्‍त है और वि‍पक्ष इस जुगत में लगा रहता है कि‍ कैसे सत्‍ता हथि‍याई जाए। दोनों के लि‍ए सत्‍ता पर काबि‍ज रहना-होना अहम है। जि‍स आम आदमी के नाम पर यह सब हो रहा है, वह केवल चुनाव के दौरान माई-बाप होता है अन्‍यथा उसकी कि‍सी को चिंता नहीं है।

कुपोषण से मरने वाले बच्‍चे, स्‍कूल से वंचि‍त रह जाने वाले बच्‍चे, बच्‍चों की तस्‍करी और उनका यौन शोषण के आंकड़ों से ही कि‍सी का भी सि‍र शर्म से झुका सकते हैं। हम पूरे देश को साक्षर भी नहीं कर पाए हैं। कि‍सान आज भी परेशान होकर आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हैं। हर साल बाढ़ और सूखे से भारी जान-माल का नुकसान हो रहा है। लेकि‍न हम 21वीं सदी और न जाने क्‍या-क्‍या नारे उछालकर भ्रम में जी रहे हैं। हमारे लि‍ए वि‍कास देश की राजधानी और प्रदेश की राजधानि‍यों में और उनके आसपास रह रहे चंद लोगों के लि‍ए सुख-सुवि‍धाएं जुटाना भर है।

इससे शर्मनाक बात क्‍या हो सकती है कि‍ हम भाषा जैसे मसले का समाधान नहीं कर पाए हैं। भारत संभवत: दुनि‍या का एक मात्र देश है जहां अपनी भाषा के वि‍कास के नाम हर वर्ष करोड़ों-अरबों रुपये बहा दि‍ए जाते हैं और भाषा दि‍वस, सप्‍ताह और पखवाड़ा मनाया जाता हो। इन सब कर्मकांडों के बावजूद स्‍कूल-कॉलजों से ही नहीं, प्राथमि‍क शि‍क्षा से भी अपनी भाषा को बेदखल कि‍या जा रहा है। ऐसी उलटबांसी हो रही हो तो लोकतंत्र पर सवाल उठेंगे ही।

देश में भ्रष्‍टाचार, गरीबी, जाति‍वाद, क्षेत्रवाद, कुपोषण जैसी इतनी समस्‍याएं है कि‍ सबको गि‍नना भी एक समस्‍या है। ये ऐसी समस्‍याएं हैं जि‍नका समाधान संभव है। जरूरत है तो राजनीति‍क इच्‍छा शक्‍ति‍ की और सत्‍ता का मोह छोड़कर कठोर कदम उठाने की। लोगों को भी जन हि‍त में नि‍जी स्‍वार्थों को छोड़ना होगा। लेकि‍न कोई उम्‍मीद की कि‍रण फि‍लहाल दि‍खाई नहीं देती।

देश की समस्‍याओं का समाधान करने के लि‍ए कोई राजनेता दृढ़ संकल्‍प नहीं दि‍खता। उल्‍टा राजनेता इतने असहि‍ष्‍णु हो गए हैं कि‍ उनके कार्यकलापों को लेकर जरा सी स्‍वस्‍थ आलोचना भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रहे हैं। आए दि‍न आलोचना करने वाले के खि‍लाफ मुकदमा दर्ज करने जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। लोकतंत्र की दुहाई देने वाले इन राजनेताओं को लोकतंत्र में वि‍श्‍वास है, इस पर संशय होने लगा है। यह कैसे लोकतंत्र है जि‍समें अंधे, गुंगे, बहरों को दरकार है, जो कुछ देखें नहीं, बोले नहीं और सुने भी नहीं। क्‍या इसी के लि‍ए शहीदों ने कुर्बानि‍यों दीं कि‍ लोगों को अपनी बात कहने तक का हक न हो? क्‍या केवल सत्‍ता हस्‍तांतरण ही उनका मकसद था?

लोकसभा, राज्‍यसभा और प्रदेशों की वि‍धानसभाओं में पक्ष-वि‍पक्षा का हंगामा कोई नई बात नहीं रह गई है। हालत की गंभीरता इससे पता चलते है कि‍ हाल ही में राज्‍यसभा में लगातार हंगामे से क्षुब्‍ध सभापति‍ हामि‍द अंसारी को कहना पड़ा कि‍ नि‍यम पुस्‍ति‍का में लि‍खे हर नि‍यमों को तोड़ा जा रहा है। क्‍या सदन को फेडरेशन ऑफ एनार्किस्‍ट (अराजक तत्‍वों का महासंघ) बनाना चाहते हैं।

सभापति‍ के कथन में सच्‍चाई है। उच्‍च सदनों में ही नहीं, बाहर भी अराजकता का माहौल है। अपने राजनीति‍क आकाओं को देखकर लोग भी अराजक और दायि‍त्‍वहीन हो गए हैं। क्‍या अपने दायि‍त्‍वों को को न नि‍भाकर इस राजनीति‍क आजादी को भी लंबे समय तक कायम रख पाएंगे।

जंतर-मंतर पर धरना : मृत्युंजय

भ्रष्‍टाचार को लेकर राजनेताओं की पोल खोलती युवा कवि‍ मृत्युंजय की कवि‍ता-

भ्रष्टाचारी कांग्रेस की लीला की बलिहारी
लोकपाल, दिक्पालों के बस, जनता है बेचारी
नेता-अफसर सब लीलाधर, सत्ता मद में चूर
मिस्टर राहुल कुछ फरमाओ बोलो तनिक हुजूर

अन्ना बैठा है अनशन पर चश्मा हिन्दुस्तानी
संग साथ हैं जन गण मन, सो बेकल हो गयी रानी
कांग्रेस की बिल्ली को है याद आ रही नानी
एक आँख से दुनिया देखे साधो यह बौरानी

भाजपाईयों की नौटंकी, दसटंकी है चालू
कहाँ नहीं है भ्रष्टाचारी कौन नहीं घोटालू
यह ढांके तो वह खुल जाए वह ढांके तो पोल
राजनीति की चतुर चिकटई, यह दुनिया है गोल

नक्शा झाड़ रहे मंत्रीगण स्विस बैंक के बूते
टाटा, बाटा, अम्बानी के चाटो भईया जूते
धूर-मलाई चाभो, चाभो जनता के अरमान
सौ करोड़ की करो तस्करी, ऊंची भरो उड़ान

पान चबाओ, भीतर डालो मजदूरों का रक्त
नए नए बाबाओं के तुम नए नवेले भक्त
नाजायज पैसे के मारे जब अफराए पेट
चूरन फांक दलाली का फिर नया खोल दो रेट

अन्ना बाबा याद नहीं क्या यहीं कहीं सुखराम
हर्षद मेहता, तेलगी साहब सब करते विश्राम
यहीं यहीं पर शीबू सोरेन, यहीं प्रमोद महाज़न
राजा, कलमाडी, मधु कोड़ा, रामलिंगम सत्यम

लालू की यह चारागाह, यह माटी है बोफोर्स की
शशि थरूर की, मोदी की और तिकड़म-ताले-सोर्स की
अभिनन्दन हो औ वंदन हो, आरती करो शैतान की
इस माटी का तिलक लगाओ धरती यह बलिदान की

मन मोहा खूंखार सिंह ने माँगी मांगे तीन
अन्ना बाबा समझे रहना ये हैं चतुर प्रवीन
जान न देना और समझना इनकी मेहीं चाल
जन गण के संग राग जोड़ना अठहत्तरवें  साल

गांधी बाबा की समाधि पर आयोजित हो यज्ञ
समिधा नाजायज पैसा हो, होता जन सर्वज्ञ
लपटें निकलें संघर्षों की, यज्ञ धूम आन्दोलन
शुद्ध होय यह भूमि हमारी मुदित होएं जन गण मन

लोकपाल बिल से निकलेगी, होगी बहुत लड़ाई
दम लेकर औ जोड़ के कान्धा भिड़ने की रुत आई
दुश्मन है खूंखार चतुर्दिक पसरी है परछाई
आगे बढ़, तैयारी कर, है लम्बी बहुत चढ़ाई

संजीव कुमार को देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान

नई दि‍ल्‍ली : युवा आलोचक संजीव कुमार को इस साल का देवीशंकर अवस्थी सम्‍मान दि‍या जाएगा। उन्‍हें यह सम्‍मान उनकी आलोचना-पुस्तक ‘जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्य’ (स्‍वराज प्रकाशन) के लि‍ए दिया जा रहा है। यह नि‍र्णय 11 मार्च को रवीन्‍द्र भवन, नई दि‍ल्‍ली में देवीशंकर अवस्‍थी स्‍मृति‍ सम्‍मान के लि‍ए गठि‍त पॉंच सदस्‍यीय समि‍ति‍ की बैठक में कृष्‍णा सोबती, वि‍श्‍वनाथ त्रि‍पाठी, चंद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल द्वारा सर्वसम्‍मति‍ से लि‍या गया।

वर्ष 1967 में जन्‍में संजीव कुमार ने ‘प्रेमचंदोत्‍तर उपन्‍यासों की सैद्धांति‍की और उसका रचनात्‍मक उपयोग’ वि‍षय पर पीएच.डी. की है। पुरस्‍कृत पुस्तक में संजीव ने जैनेंद्र और अज्ञेय के बारे में हिंदी अकादमि‍क आलोचना में व्‍याप्‍त गलतफहमि‍यों का सप्रमाण प्रत्‍याख्‍यान कि‍या है और इस तरह की उपरीक्षि‍त धारणाओं का आलोचना द्वारा स्‍वीकार के बारे में गहरी आपत्‍ति‍ दर्ज की है।

प्रख्‍यात आलोचक देवीशंकर अवस्थी स्मृति में दि‍या जाने वाला यह सम्मान/पुरस्कार समकालीन हिंदी आलोचना के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण योगदान के लिए दिया जाता है। इसकी स्‍थापना 1995 में उनके परि‍वार ने की थी। अब तक यह सम्‍मान मदन सोनी, पुरुषोत्‍तम अग्रवाल, वि‍जय कुमार, सुरेश शर्मा, शंभुनाथ, वीरेंद्र यादव, अजय ति‍वारी, पंकज चतुर्वेदी, प्रणय कृष्‍ण आदि‍ को दि‍या जा चुका है।

समि‍ति‍ की संयोजि‍का और नि‍यामि‍का कमलेश अवस्‍थी ने बताया कि‍ देवीशंकर अवस्‍थी सम्‍मान 5 अप्रैल, 2011 को शाम 5 बजे साहि‍त्‍य अकादमी सभागार, नई दि‍ल्‍ली में आयोजि‍त समारोह में संजीव कुमार को प्रदान कि‍या जाएगा। इसके साथ ही उपन्‍यास और हमारा समाज वि‍षय पर वि‍चार-वि‍मर्श आयोजि‍त कि‍या जाएगा।

 

गीतांजलि के हिंदी अनुवाद का लोकार्पण 29 को

नई दिल्ली : गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की 150वी जयंती वर्ष और गीतांजलि की प्रकाशन शतवार्षिकी के अवसर पर युवा लेखक देवेंद्र कुमार देवेश की पुस्तक गीतांजलि के हिंदी अनुवाद का लोकार्पण 29 नवंबर को साहित्य अकादेमी के सभाकक्ष (तृतीय तल) में शाम 5.30 बजे किया जाएगा। इसका प्रकाशन विजया बुक्स ने किया है। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी करेंगे। प्रयाग शुक्ल, गंगाप्रसाद विमल, रणजीत शाह, शशिप्रकाश चौधरी मुख्य वक्ता होंगे। देवेंद्र कुमार देवेश लेखकीय वक्तव्य देंगे।

रमाकांत स्‍मृति समारोह 1 को

नई दिल्‍ली : 13वां रमाकांत स्‍मृति कहानी पुरस्‍कार समारोह 1 दिसंबर को शाम 5.30 बजे गांधी शांति प्रतिष्‍ठान, दीनदयाल उपाध्‍याय मार्ग, नई दिल्‍ली में आयोजित किया जाएगा। इस बार दीपक श्रीवास्‍तव की कहानी ‘लघुत्‍तम समापवर्तक’ को यह पुरस्‍कार दिया जा रहा है।

समोराह की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ आलोचक विश्‍वनाथ त्रिपाठी करेंगे। मुख्‍य अतिथि वरिष्‍ठ आलोचक कमला प्रसाद होंगे। वह पुरस्‍कृत कहानी पर टिप्‍पणी करेंगे। वरिष्‍ठ आलोचक आनंद प्रकाश अपने मित्र कथाकार रमाकांत को स्‍मरण करेंगे। पुरस्‍कृत कथाकार दीपक श्रीवास्‍तव अपनी रचना और सरोकारों की बात करेंगे।

इस अवसर पर आकृति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘बारहखड़ी’ का लोकार्पण भी किया जाएगा। इसमें अब तक पुरस्‍कृत 12 कहानियां संकलित हैं।

मासुमियत के सिक्‍के भले ही कागज के भी हो, चल सकते हैं : जसबीर भुल्‍लर

पंजाबी के लिए साहित्‍य अकादमी का पहला बाल साहित्‍य पुरस्‍कार सुप्रसिद्ध कथाकार जसबीर भुल्‍लर को प्रदान किया गया है। बाल साहित्‍य को लेकर समारोह में दिया गया उनका वक्‍तव्‍य-

हम जरा पीछे की ओर झांकें तो आदिकाल से मांओं, नानियों-दादियों ने मौखिक बाल साहित्‍य को अपनी स्‍मृतियों में संभालकर रखा है और बाल साहित्‍य की किस्‍मों के साथ बच्‍चों को बड़ा किया है।

मौखिक बाल-साहित्‍य की परंपरा अभी समाप्‍त नहीं हुई है।

बचपन में बहुत सारी बातें (कहानियां) मैंने भी सुनी थीं। उन कहानियों का परी-अंश मुझे मोह लेता था, लेकिन ज्‍यादातर वो साहित्‍य बच्‍चों की उम्र से बड़ा होता था। उदाहरण के लिए ‘पंच फूलां रानी’ वाली बात (कहानी) ही ले लो। उस कहानी की रानी को प्रत्‍येक सुबह पांच फूलों से तोला जाता था, लेकिन जिस रात वह रानी कहीं दूर देश के अपने चाहने वाले राजकुमार को मिल लेती थी तो उसका भार पांच फूलों से अधिक हो जाता था। वो कहानी औरत-मर्द के संबंधों की थी, परंतु बच्‍चों को सुनाई जाती थी।

दरअसल, पंजाब की मेरी वाली पीढ़ी के पास सही मायनों में बाल साहित्‍य था ही नहीं। बाल साहित्‍य के नाम पर तब जो कुछ भी उपलब्‍ध था, वो प्रेरणा से खाली था। उस समय की कहानियों में बहुत कुछ तिलिस्‍मी–सा होता था। दीया रगड़ने भर से चहल-पहल हो जाती थी। राख की चुटकी भर से गरीब आदमी राजा बन जाता था। सोना बनाने वाले पत्‍थर मिल जाते थे। गुप्‍त खजाना मिल जाता था।

बाल साहित्‍य के नाम पर जो कुछ भी था, वो सब बच्‍चों को अपाहिज बनाने के लिए था, उन्‍हें संघर्ष करने से रोकता था।

पंजाबी में बाल साहित्‍य का स्‍वतंत्र अस्तित्‍व और सर्जना के सचेत प्रयत्‍न दरअसल स्‍वतंत्रता के पश्‍चात ही समाने आए हैं।

बाल साहित्‍य की सर्जना के आरंभ के दौर में हम ने बच्‍चों को बहुत नुकसान किया है और बाल साहित्‍य का भी। बाल साहित्‍य के नाम पर हम सामाजिक कद्रों-कीमतों की घनी खुराक बच्‍चों को पिलाते रहे हैं। पत्रिकाओं और पाठ्य पुस्‍तकों की जरूरतों की पूर्ति हेतु रचनाएं लिखी गई हैं और उस बचकाने साहित्‍य को हमने बाल साहित्‍य की संज्ञा दी है। बाल साहित्‍य का निर्झर हमने सहज रूप से नहीं बहने दिया।

आधुनिक साहित्‍यकार इसके प्रति चेतन हुआ है। उसने बाल मनोविज्ञान को भी समझने का प्रयत्‍न किया है और बच्‍चों की आवश्‍यकताओं को भी। उसे मालूम है कि दुनिया की कोई ताकत किसी बच्‍चे को उसकी इच्‍छा के विरुद्ध साहित्‍य नहीं पढ़वा सकती। वह पढ़ते हुए सो सकता है, जम्‍हाई ले सकता है और पुस्‍तक को परे हटा सकता है।

जब कोई यूं करता है तो वह अपने ढंग से मुझे बाल साहित्‍य की समझ भी प्रदान कर रहा होता है। वह साफ शब्‍दों में कहता-सा प्रतीत होता है- ‘‘मुझसे जो भी बात करनी है, सरलता से करो, साफ व स्‍प्‍ष्‍ट। कहानी को मुश्किल मत करो। कहानी को पंख लगे होने चाहिए ताकि मैं भी उस कहानी के साथ उड़ पाऊं। आपकी रचना मेरे अंदर इतनी उड़ान भर दे कि मैं किसी ग्रह तक पहुंच सकूं। आप मेरे लिए परी-कथा के दरवाजे भी खोल दो। किसी भी और दुनिया को कोई दरवाजा मेरे लिए बंद न रखो।’’ यह मांग बच्‍चे बाल साहित्‍य के प्रत्‍येक लेखक से करते हैं।

बाल साहित्‍य लिखने के लिए कलम उठाने से पहले मैं अपने बचपन की ओर लौटा था। मेरे बाल साहित्‍य के बीज वहीं पर बिखरे पडे़ थे और मैंने एक-एक करके चुने हैं।

जब मेरे पिताजी थके-हारे अपने काम से लौटते तो कमीज उतार कर खूंटी पे टांग देते थे और कुछ पल आराम के लिए लेट जाते थे। तब मैं चार वर्ष का नन्‍हा बालक उनकी नाभि में से रूई निकालता और उस रूई से रजाई बनाने की कल्‍पना करता।

क्‍या तीन-चार वर्ष का वह बालक कभी उस रूई के साथ रजाई बना पाया। वह बच्‍चा बड़ा हो गया है। इस प्रश्‍न के उत्‍तर में मैं आपके समक्ष खड़ा हूं। देख लो, चाहे मैंने वो रजाई बना ली है। कल्‍पना की इंतहा के साथ मैं कुछ भी बना लूं।

बाल साहित्‍य की बातें करते हुए बचपन की एक घटना मेरे सामने आ गई है, जिसने साहित्‍य की शक्ति का एहसास भी मुझे करवा दिया है।

वह घटना इस प्रकार है-

तब मैं मुश्किल से चार साल का था। मेरी मां धागे से सीने-पिरोने का कुछ काम कर रही थी। धागे का गोला उनके पास ही पड़ा था। उस गोले में गत्‍ते का एक गोल टिक्‍का फंसा पड़ा था। गत्‍ते का वह गोल टिक्‍का पैसे की भांति लग रहा था। उस टिक्‍के पर सुनहरी अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। वो शायद फैक्‍टरी का नाम था, जिसने धागा बनाया था। मुझे लगा गत्‍ते का वह गोल टिक्‍का एक पैसा था जिसे में खर्च कर सकता हूं।

मैं वो पैसा लेकर बाहर की तरफ चल पड़ा। गली के मोड़ पर हलवाई की दुकान थी। गत्‍ते का वो सिक्‍का हलवाई को देकर मैंने गुलाब जामुन की ओर संकेत किया।

हलवाई ने एक बार हाथ में पकड़े गत्‍ते के पैसे की ओर देखा और एक बार मेरी ओर। वह मुस्‍कुराया और दोने में गुलाब जामुन रखकर मेरी ओर सरका दिया।

तब मुझे मालूम नहीं था, लेकिन आज मैं मानता हूं कि मासुमियत के सिक्‍के भले ही कागज के भी हो, चल सकते हैं।

मेरे भीतर का वह बच्‍चा अभी तक जीवित है। मैंने उसे अपने सांसों में बसाया हुआ है। उसकी मासुमियत, सहजता और सादगी बरकरार है… और यही बाल साहित्‍य की शक्ति है।

जिस साहित्‍यकार के भीतर का बच्‍चा समय की गर्दो- गुब्‍बार में कहीं  खो जाता है, उसे बाल साहित्‍य नहीं लिखना चाहिए। उसे बाल साहित्‍य लिखने का कोई अधिकार नहीं है।

मेरे बचपन के पास बाल साहित्‍य की सर्जना हेतु बड़ी उपजाऊ मिट्टी थी। अभी भी मैं उसी मिट्टी से कहानी उगा रहा हूं। उस मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ने कभी भी खत्‍म नहीं होना है।

मैं चाहता हूं बाल साहित्‍य के द्वारा बच्‍चों को सुंदर दुनिया का सपना दूं ताकि वे अपना परी लोक खुद सर्ज सकें। वे अच्‍छे मनुष्‍य बनने के मार्ग की ओर चलते रहें।

बाल साहित्‍य के द्वारा कितनी सुंदर दुनिया बन सकती है, फिलहाल तो हम इसका अनुमान ही लगा सकते हैं।

आज आप सब विशेष रूप में बाल साहित्‍य के जश्‍न में शामिल होने के लिए आए हैं तो बच्‍चों के लिए एक कहानी अपने साथ लेकर जाना।

‘‘अण्‍डे के अंधेरे में जन्‍म ले रहे चूजे ने चोंच के साथ टुक-टुक अण्‍डा तड़क गया, टूट गया और चूजा अण्‍डे से बाहर आ गया। बाहर आकर उस चूजे ने अपने से पहले अण्‍डों में से निकले चूजों को बताया, आज तो कमाल हो गई। एक बहुत बढि़या बात का पता चला है। हमें हमेशा टुक-टुक करते रहना चाहिए, कुछ न कुछ हो जाता है।’’

बस कहानी इतनी ही है। आपने देख ही लिया है कि बाल साहित्‍य की इस टुक-टुक के साथ कुछ हो गया है।

बेलगाम में सम्‍मान समारोह व खरी-खरी की प्रदर्शनी

बेलगाम (कर्नाटक)। पिछले दिनों यहां राष्ट्रीय स्तर की शैक्षिक/साहित्यिक व सामाजिक संस्था शिक्षक विकास परिषद, गोवा की ओर से एक दिवसीय सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इसमें देश भर से पधारे सैकड़ों साहित्यकारों, शिक्षकों और समाज सेवियों ने भाग लिया।

समारोह के प्रथम सत्र का शुभारम्भ मुख्य व विशिष्ट अतिथियों डा. सी. के. कोकटे (कुलपति, केएलई विवि, बेलगाम), ले. कर्नल राज शुक्ला,  डा. एकरूप कौर,  डा. विनोद गायकवाड़, लक्ष्मी एस जोग एवं डा. जयशंकर यादव ने द्वीप प्रज्जवलित कर किया। स्थानीय स्कूली बच्चों ने गीत एवं नृत्य के रंगारंग कार्यक्रम पेश किए। इस अवसर पर स्थानीय कलाकारों की चित्र प्रदर्शनी लगाई गई। दिल्ली के किशोर श्रीवास्तव की 25वें वर्ष में चल रही जन चेतना कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’  का प्रदर्शन भी किया गया। समारोह में दिनेश चंद्र दुबे (ग्वालियर), डा. तारा सिंह (मुंबई), राजेश पुरोहित (राजस्थान), किसान दिवान (छत्तीसगढ़), देवेन्द्र मिश्र (मध्‍य प्रदेश), नमिता राकेश (फरीदाबाद) एवं अखिलेश द्विवेदी अकेला व किशोर श्रीवास्तव (दिल्ली) सहित देश भर से चयनित साहित्य, संगीत, चित्रकला एवं शिक्षा क्षेत्र की अनेक हस्तियों को सम्‍मानित किया गया। समारोह का संयोजन शिक्षक विकास परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेश वी. कुलकर्णी ने किया।

प्रस्तुतिः लाल बिहारी लाल

लघुकथा आज विकासोन्मुख: बलराम

नई दिल्ली। नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिका हम सब साथ साथ ने देश भर से चयनित दो दर्जन से अधिक युवा एवं 80 वर्ष से भी अधिक आयु तक के लघुकथाकारों की श्रेष्ठ लघुकथाओं का पाठ व उनको सम्मानित किया। मुख्‍य अतिथि  प्रख्यात लेखिका चित्रा मुद्गल व विशिष्‍ट अतिथि प्रतिष्ठ‍ित कथाकार बलराम और व्‍यवसायी एपी सक्‍सेना थे। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कैपिटल रिपोर्टर के संपादक सुरजीत सिंह जोबन ने की।

इस अवसर पर चित्रा मुद्गल ने लघुकथा के विकास पर संतोष व्यक्त किया और कहा कि इसकी दशा व दिशा दोनों ही ठीक है। अब भावी पीढ़ी का दायित्व है कि वे इसे कहाँ तक ले जाते हैं। बलराम ने लघुकथा के विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लघुकथा आज विकासोन्मुख है। अध्‍यक्षता कर रहे सुरजीत सिंह जोबन ने कहा कि लघुकथा अपने आप में संपूर्ण कहानी समाहित किए हुए रहती है।

इसके पूर्व सम्मेलन की शुरूआत रेडियो सिंगर सुधा उपाध्याय की सरस्वती वंदना से हुई।

सम्मेलन के लिए उत्‍तर प्रदेश,  मध्‍य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल एवं दिल्ली आदि से दो दर्जन से भी अधिक लघुकथाकारों को चयनित किया गया था। इनमें से उपस्थित लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया। उन्हें स्मृति चिह्न,  प्रमाणपत्र, पुस्तकें प्रदान कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। सम्‍मानित होने वाले कथाकारों में मुइनुद्दीन अतहर, सनातन वाजपेयी, के. एल. दिवान, मनोहर शर्मा, देवेन्द्र नाथ शाह, गणेश प्रसाद महतो, प्रदीप शशांक, तेजिन्द्र, माला वर्मा, शरदनारायण खरे, दिनेश कुमार छाजेड़, आरती वर्मा, गीता गीत, देवांशु पाल, ज्योति जैन, एम. अशफाक कादरी, महावीर रवांल्टा, संतोष सुपेकर, शोभा रस्तोगी, समद राही, नरेन्द्र कुमार गौड़, कैलाशचंद्र जोशी, पंकज शर्मा, लाल बिहारी लाल आदि थे।

समारोह का संचालन विनोद बब्बर एवं विवेक मिश्र ने किया। आभार पत्रिका के कार्यकारी संपादक किशोर श्रीवास्तव ने व्यक्त किया।

प्रस्तुतिः इरफान राही

अश्‍लील: हरिशंकर परसाई

चैनलों पर अश्‍लील और फूहड़ कार्यक्रमों का प्रसारण धड़ल्‍ले से हो रहा है। कॉमेडी के नाम पर द्व‍िअर्थी डॉयलॉग बोलकर जबरदस्‍ती दांत दिखाए जा रहे हैं। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि समाचारों में भी इन कार्यक्रमों की बेहूदगियों सुर्खियां बनाई जा रही हैं। हालांकि सड़क से लेकर संसद हर कोई इनका विरोध कर रहा है, लेकिन फिर भी इनका प्रचार-प्रसार बढ़ता जा रहा है। नया कार्यक्रम शुरू होता है तो वह पहले से ज्‍यादा फूड़ह भी होता है और हिट भी। ऐसा क्‍यों हो रहा है। इसका जवाब देता वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार हरिशंकर परसाई का व्‍यंग्‍य-

शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहां भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएंगे।

उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा- आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएंगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पडे़गा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख्‍ लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।

दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा- किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूं। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।

किताब कोई लाया नहीं था।

एक ने कहा- कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।

दूसरे ने कहा- अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।

उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।

तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।

एक ने कहा- अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।

दसरे ने कहा- अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊंगा।

तीसरे ने कहा- भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूंगी।

चौथे ने कहा- अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।

अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।

(विकलांग श्रद्घा का दौर से साभार)

सादतपुर में 21 नवंबर को नागार्जुन जन्‍मशती समोराह

नई दिल्‍ली : बाबा नागार्जुन की जन्‍मशती के अवसर पर सादतपुर में समोराह का अयोजन किया जा रहा है। प्रभातफेरी से शुरू होकर कार्यक्रम दिनभर चलेगा।

यह वर्ष हिंदी-उर्दू के कई बडे़ रचनाकारों का जन्‍मशती वर्ष है। इस संदर्भ में जनपक्षधर सरोकारों के लिए समादृत बाबा नागार्जुन का जन्‍मशती समारोह सादतपुर (नागार्जुन नगर) साहित्‍य समाज की ओर से 21 जून को जीवन ज्‍योति सीनियर सेकेंडरी स्‍कूल, सादतपुर विस्‍तार, करावलनगर रोड, दिल्‍ली में मनाया जा रहा है।

सुबह 7 बजे बाबा नागार्जुन के चित्रों/पोस्‍टरों और बैनरों सहित उनकी कविताओं का सस्‍वार पाठ करते प्रभात फेरी निकाली जाएगी।

मुख्‍य समारोह की शुरुआत दोपहर 2 बजे होगी। चर्चित चित्रकार हरिपाल त्‍यागी द्वारा निर्मित बाबा के कविता पोस्‍टरों तथा बाबा की पुस्‍तकों और उन पर केंद्रित पत्र-पत्रिकाओं की प्रदर्शनी का उद्घाटन बाबा की पोती कणिका और कवि कुबेर दत्‍त करेंगे।

2.30 बजे हरिपाल त्‍यागी द्वारा रचित बाबा के तेलचित्र का अनावरण वरिष्‍ठ लेखक और बाबा के आत्‍मीय वाचस्‍पति करेंगे। विद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा सामुहिक गायन किया जाएगा। इसके बाद श्रीराम लेडी कॉलेज में लेक्‍चरार प्रीति प्रकाश प्रजापति बाबा नागार्जुन की कविता की संगीतबद्ध प्रस्‍तुति देंगी।

3 बजे विभिन्‍न रचनाकारों द्वारा बाबा की गद्य और पद्य रचनाओं से चुनिंदा अंशों का पाठ किया जाएगा। यह पाठ दिनेश कुमार शुक्‍ल, रामकुमार कृषक, लीलाधर मंडलोई, मणिकांत ठाकुर, भारतेंदु मिश्र, गंगेश गुंजन, अरविंद कुमार सिंह आदि वरिष्‍ठ लेखक/कवि करेंगे।

3.30 बजे बाबा को लेकर सादतपुरवासी अपने अनुभव साझा करेंगे और बाबा के महत्‍व और मूल्‍यांकन को रेखांकित किया जाएगा। इसमें विश्‍वनाथ त्रिपाठी, भगवान सिंह, विष्‍णुचंद्र शर्मा, रेखा अवस्‍थी, मैनेजर पांडेय, सुधीर विद्यार्थी आदि वरिष्‍ठ रचनाकारों के अलावा आम लोगों की भी भागेदारी होगी।

5 बजे चाय-नाश्‍ते के लिए विराम के बाद 5.30 बजे बाबा से संबंधित कुछ प्रस्‍तावों को रखा जाएगा। इसके साथ ही बाबा नागार्जुन पर केंद्रित साहित्‍य अकादमी और एनसीईआरटी द्वारा निर्मित फिल्‍मों का प्रदर्शन किया जाएगा।

इस संबंध में विस्‍तृत जानकारी के लिए मोबाइल नंबर 9868935366, 9810481433 पर संपर्क किया जा सकता है।