स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गो...

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्ग...

सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान...

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बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : स...

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कविता

धूल फांको, मगर : रोज मिलिगन

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको मगर क्या इससे बेहतर नहीं कि एक ख़ूबसूरत तस्वीर उकेरो या फिर कोई चिट्ठी लिखो, लज़ीज़ खाना बनाओ या एक पौधा रो...

कहानी

गिरगिट : अन्तोन चेखव

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गजल

विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें

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परिक्रमा

पलायन की मजबूरी और छटपटाहट का चि‍त्रण- ‘नेचुरल रिंगटोन’  

चित्तौडगढ़ : ‘सम्भावना’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहानीकार कर्नल मुकुल जोशी ने अपनी कहानी ‘नेचुरल रिंगटोन’ का पाठ किया। विजन स्कू...

बच्चों की करामात

साइि‍कल के पंप से उड़ा राकेट : समीर मिश्रा

अगर आप कभी ओडिशा के गंजाम ज़िले से गुजरें तो वहां ग्राम विकास विद्या विहार स्कूल में ज़रूर जाइएगा। पूरबी घाटों के बीच में स्थित इस स्कूल म...

स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गोसाँई

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से था। उसके पिता माली का काम करते थे। माँ घरों में काम करती थी।

स्कूल में उच्च मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे पढ़ते थे तथा स्कूल की फीस भी बहुत ज्यादा थी। यह फीस उस नए बच्‍चे के परि‍वार के सामर्थ्य से बाहर थी। लिहाजा स्कूल संचालिका ने दाखिला देने से इन्‍कार कर दिया। लेकिन उनके बहुत आग्रह पर दयालुता दिखाते हुए स्कूल संचालिका ने बहुत मामूली फीस पर स्कूल में दाखिला दे दिया।

साथी अध्यापिकाओं ने उस बच्चे के स्कूल में दाखिले के प्रति अपना विरोध जताया। उन सबका मानना था कि इतने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बच्चा यदि स्कूल में प्रवेश पाता है, तो स्कूल की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा। आखिर एक घंटे सभी अध्यापिकाओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद उस बच्चे को मेरी कक्षा में भेज दि‍या गया।

नयी चमचमाती यूनिफार्म, स्कूल बैग, किताब-कॉपी जब बच्चे को स्कूल से मिली, तो उसकी आँखें प्रसन्नता से चमक उठीं। आमतौर पर छोटे बच्चे शुरुआती दिनों में स्कूल आने पर रोते है, लेकिन वह बच्चा बहुत खुश था। नयी किताब, कॉपी, पेंसिल और इन सबसे बढ़कर स्कूल में खेलने के लिए रखे गए तरह-तरह के खिलौने- गुड्डे-गुड़िया, टेडीबेयर, ब्लॉक्स आदि को देखकर वह अपने को एक अलग दुनिया में पाता। उसके हावभाव उसकी इस प्रसन्नता को प्रकट करते। मेरी कक्षा में लकड़ी की गोल मेज थी। उसके चारों ओर लकड़ी की छोटी कुर्सियां लगाई गई थीं। सारे बच्चे इन्हीं कुर्सियों में बैठकर चित्रों में कलरिंग, विभिन्न फलों, सब्जियों के चित्रों की कटिंग, पेस्टिंग आदि कॉपियों में करते थे। वह बच्चा इन क्रियाकलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। मेरे हाथों में रंग-बिरंगे चित्रों की किताबें देखकर जोर से चिल्लाकर कहता, ‘‘मैम, अब हम कलरिंग करेंगे।’’

कुछ अध्यापिकाओं ने मुझे यह सुझाव भी दिया कि इस बच्चे को अन्य बच्चों से अलग बैठाया करो, क्योंकि इसकी भाषा, बोलचाल अन्य बच्चों की भाषा की तुलना में खड़ी बोली में है। उनका यह सुझाव मैंने सिरे से ख़ारिज कर दिया। वह बच्चा सभी बच्चों के साथ बैठता तथा सभी बच्चे मिलजुल कर खेलते।

उस बच्चे को स्कूल आते हुए कुछ ही दिन हुए थे। स्कूल की छुट्टी होने पर आया ने जब उसका बस्ता उठाया तो उसे वह बहुत भारी लगा। बस्ता खोलकर देखा तो उसके अंदर स्कूल के खिलौने रखे थे। उसने शोर मचा दि‍या कि‍ बच्चे ने खिलौने चोरी कर बस्ते में रख लिए हैं। स्कूल हेड ने बच्चे को डांटा। अन्य अध्यापिकाओं ने भी अपना मत रखा कि‍  निम्न वर्गीय बच्चों को स्कूल में रखोगे तो ऐसे ही होगा। दाखिला दिया ही क्यों? एक अध्यापिका बोल पड़ी, ‘‘देखा है- कभी कोई और बच्चा स्कूल की कोई चीज या खिलौना इस तरह बैग में छुपाकर घर ले गया हो? इसलिए पहले ही चेताया था कि‍ इस बच्चे को स्कूल में एडमिशन मत दो।”

बच्चे को स्कूल संचालिका के कमरे में ले जाया गया। स्कूल संचालिका ने बच्चे की माँ को फ़ोन कर स्कूल आने को कहा तथा बच्चे को अपने कमरे में बैठा दिया। मुझे यह सब अटपटा लग रहा था। मैंने स्कूल संचालिका से कहा कि‍ हमें बच्चे को स्कूल से नहीं निकालना चाहिए। एक बार उससे पूछना चाहिए। वह बच्चा मेरी ही कक्षा का था। इसलि‍ए मैं उसे अपने साथ कक्षा में ले आयी। बाकी बच्चे घर जा चुके थे। मैंने बच्चे को अपने पास बैठाया। वह सहमा हुआ था। मैंने बहुत प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आपने मैम से बि‍ना पूछे खिलौने क्यों लिए?” वह चुप रहा। दो-तीन बार पूछने पर उसने जवाब दिया, “मैम, मेरी छोटी बहन है। हमारे घर में एक भी खिलौना नहीं है। मैं उसे दिखाना चाहता था। मैं कल ये खिलौने वापस ले आता।’’ यह कहते हुए उसके आँखों में आंसू थे।

धूल फांको, मगर : रोज मिलिगन

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर क्या इससे बेहतर नहीं कि
एक ख़ूबसूरत तस्वीर उकेरो या फिर कोई चिट्ठी लिखो,
लज़ीज़ खाना बनाओ या एक पौधा रोपो;
लालसाओं और ज़रूरतों के बीच फासले पर सोचो.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर ज्यादा वक़्त नहीं है तुम्हारे पास
कितनी नदियां तैरनी हैंऔर कितने पहाड़ चढ़ने हैं;
संगीत में डूबना है और किताबों में खो जाना है;
दोस्तियां निभानी हैं और जीना भी है भरपूर.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
लेकिन बाहर धरती इंतज़ार कर रही है
सूरज तुम्हारी आँखों में उतरना चाहता है
और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है
बर्फ के फाहों की झुरझुरी और बारिश की फुहारें
तुम्हारे कानों में फुसफुसाना चाहते हैं,
यह दिन फिर लौटकर नहीं आएगा.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर एक दिन बेमुरव्वत बुढ़ापा घेर लेगा
और जब तुम विदा होगे (वो तो ज़रूर होगे)
तुम खुद धूल के बड़े ढेर में बदल जाओगे. 

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

दो बाल कवि‍ताएं : कंचन पाठक

कंचन पाठक

कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर कंचन पाठक की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं।

प्‍यारा भोलाभाला बचपन

उम्र यही है जब हम सबको
देखरेख और प्यार चाहिए,
निश्छल निर्मल भोले मन को
सबका स्नेह दुलार चाहिए,
दुनिया की विकृति से अछूता
प्यारा भोला-भाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।
बचपन तो कच्ची मिट्टी है
हर साँचे में ढल सकता है
तपकर जब कुंदन होगा तब
काँटों पर भी चल सकता है
शुभ मंगलमय संस्कार भी,
इन्हें चाहिए नेह प्यार भी
कल उन्नति पथ पर गतिमय हो
ऐसे दर्शन सद्विचार भी
मिल जाए यह सब तब बन जाए
अमृतमधु प्याला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

नन्हें नव-पादप को जैसे
उचित खाद-पानी मिल जाए,
बने सुपुष्ट तरु तब उस पर
कितने विहग ठिकाने पाए,
पर्ण सघन छाया में रुक कर
कितने पथिक सुकूँ हैं पाते,
फल फूलों से लदकर तरुवर
पर उपकार की कथा सुनाते,
कल का कीर्ति स्तंभ बनेगा
राष्ट्र भविष्य उजाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

शुभ चैतन्‍य सि‍तारे बच्‍चे

बड़े खिलंदड़ बड़े साहसी होते हैं ये प्यारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे

नहीं कभी थकते ऊर्जा की बहती इनमें ऐसी धारा
घर संसार इन्हीं से रोशन, रोशन इनसे ही जग सारा
इनकी नन्हीं बदमाशी में होती कितनी मासूमी है
गीली मिट्टी का सा दिल है संस्कारों की नम भूमि है
हर बच्चे के अन्दर होती है कोई न कोई क्षमता
वैमनश्य से दूर रहें बस चाहें थोड़ी माँ की ममता
ख़ुशी-ख़ुशी हर बात मानते शुभ चैतन्य सितारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

इनके मन में प्रश्न हजारों दिवा रैन चलते रहते हैं
एक साथ पलकों में सौ-सौ मधुर स्वप्न पलते रहते हैं
क्यों कोयल कु-कु करती है बुलबुल दिन भर किसे बुलाती
रात-रात भर चाँद की बूढी़ माई किसको लिखती पाती
अपनी उजली हँसी से भर देते मन में उजियारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान और हम’ : सुन्दर नौटियाल

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञान की पुस्तकों और लेखों में सरल-सहज हिंदी के प्रयोग से विज्ञान की जटिलता के हौवे को दूर करते मेवाड़ी जी का पाठक समाज को ये एक बेहतरीन तोहफा है। यह किताब बच्चों तक विज्ञान के सन्दर्भों को पहुँचाने की सरस और रोचक कोशिश है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह किताब केवल बच्चों के लिए ही बनी है। न जाने कितने ही प्रसंगों को कल्पना, तथ्यों, संस्मरणों, नाटकों, कवितांशों आदि के माध्यम से सामान्य विज्ञान और तत्कालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से रूबरू करवाती यह किताब पाठक में मानवीय मूल्यों, तर्कपूर्ण चिंतन, सामाजिक दायित्वों, जीवों के प्रति दया, जैव विविधता की समझ आदि विकसित करती है। साथ ही यह नए पाठकों को और अधिक पढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ अपने संस्मरणों को लिखित रूप देने के लिए भी प्रोत्साहन देती है।

19 विभिन्न शीर्षकों से प्रस्तुत सन्दर्भ बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सजे हुए हैं। ‘सुनो मेरी बात’ शीर्षक से जहाँ लेखक ने अपने जीवन के अंशों को बच्चों के साथ साझा किया है, अपने आंचलिक शब्दों के प्रयोग से मात्रभाषा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है, वह किसी भी नव पाठक को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और इसे प्रसारित करने के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। किताब के पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ता पाठक देवीदा के साथ कभी ‘अनोखे सौरमंडल’ के तथ्यों से विस्मित होता है तो कभी एलियन के साथ कल्पना के यान पर सवार हो ‘प्यारी और निराली धरती’ की समझ विकसित करने आकाश में उड़ने लगता है। देवीदा की आँखों से उनकी लेखनी के शब्द समुंदर में ‘समन्दर के अन्दर की अनोखी दुनिया’ देख आता है, तो कभी ‘लो आ गया वसंत’ पाठ में शब्दों के गुलदस्तों में सजे फूलों, कलियों और नयी अंगडाई लेती धरती की महक को महसूस करता है। वसंत के खुशनुमा अहसास से पाठक अचानक ही गर्म होती धरती की उष्मता से पसीने में नहाने लगता है, जब वह रूबरू होता है ‘क्यों तपती है धरती’ से | बादलों के बनने-बरसने की घटनाओं से परिचय करने के लिए पाठक ‘कैसे-कैसे मेघ’ पढ़ता है और अचानक ही ‘आये पंछी दूर देश से’ पढ़कर प्रवासी पक्षियों के साथ सायबेरिया से भारत तक की यात्रा पर उड़ चलता है। घर के आंगन में गौरैया के घोंसले में नवान्गंतुक बाल पक्षी की पहली उड़ान ‘उड़ गयी गौरैया’ तो किसी भी उम्र के पाठक को सरल, सहज भाषा में अपने अनुभवों को संजोने की अद्भुत प्रेरणा दे जाती है। देवीदा के साथ ‘पेड़ों को प्रणाम’ करते गार्गी, शेफाली, गौरव, माधवी जैसे बच्चे चिप्स खाते-खाते बच्चों के साथ पाठक भी ‘आलू की कहानी’ सुनने लगता है, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट खाते-खिलाते बच्चे फ्रैंक स्मिथ द्वारा खोजी गयी ‘फूलों की घाटी में’ कब पहुँच जाते हैं, उनके साथ-साथ पाठक को भी पता नहीं चलता। आगे के पाठों में ‘बच्चों का विज्ञान और कवि के कबूतर’ उड़ाते बच्चे, ‘आ गये रोबोट’ पाठ से मानव जीवन में मशीनी मानवों की धमक को महसूस करते हैं। ‘ताबीज़’ पहने एक बेरोजगार युवक कहानी के माध्यम से समाज में फैले ‘चमत्कार या विज्ञान’ के अन्धविश्वास पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही में मजबूरी को अन्धविश्वास से जोड़कर भी दिखाता है। एक नाटक में बच्चों को ‘पर्यावरण के प्रहरी’ बनाकर ‘वृक्ष बचाओ-वृक्ष लगाओ’ की प्रेरणा देते लेखक जाते-जाते बच्चों को ‘आर्यभट्ट’ और ‘मेघनाथ साहा’ जैसे भारतीय विभूतियों से परिचित करवाते हैं और ‘माइकल फैराडे’ की जीवनी के एक प्रेरक प्रसंग ‘अनजान से बना महान’ से बच्चों को आत्मविश्वास से सरोबार कर जाते हैं |

विशेष– सुन्‍दर नौटि‍याल पेशे से शि‍क्षक हैं। उन्‍होंने मवोड़ी जी की यह किताब अपनी एक छात्रा नवमी को पढ़ने को दी। उसके अन्दर इस किताब से उमड़े-उपजे भावों की झलक देखने लायक है–

किताब में लिखे गये एक संस्मरण ‘उड़ गयी गौरैया’ को पढ़कर वह कहती है –“सर! हमने भी कई बार चिड़ियों को घोंसले में बच्चों को दाना देते और उन्हें उड़ाते हुए देखा है। आपने लिख दिया और हम लिखते नहीं हैं, परन्तु यह पाठ पढ़कर मुझे विश्वास हो गया है कि हम भी ऐसा ही अच्छा लिख सकते हैं |”

वैज्ञानिक, विज्ञान कथा लेखक को सम्बोधित करते हुए वह लिखती है– “सर! आपकी लिखी हुई किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी हुई है और इसमें कोई भी पाठ ऐसा नहीं था, जिसे मैं समझी न हूँ। आपने अपने बचपन की बातें लिखीं जो मुझे बहुत अच्छी लगीं। अनोखा सौरमंडल, फूलों की घाटी, ताबीज़, रोबोट और मेघनाथ साहा, ये सब कहानियां बहुत ही अच्छी लगीं।”

“हमारे सर भी आपके जैसे ही हैं। उन्होंने एक कविता लि‍खी जो मुझे बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने मेरी एक कविता भी अपने पास रखी हुई है। शायद उनका सपना हमें आपके जैसा वैज्ञानिक बनाने का है।”

वह देवीदा से गुजारिश करती है– “आपसे बस यह कहना है कि सर ! यदि कभी मौका मिले तो हमारे विद्यालय में जरूर आना। हम आपसे सवाल करना चाहते हैं, आपसे कुछ सीखना चाहते हैं। शायद! हमने आज तक वैज्ञानिक नहीं देखे हैं, किन्तु हमारे सर हमारे लिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं। हमारे सर हमसे कहानियां पढ़वाते हैं, गाना गाने को कहते हैं, हमें नयी चीज़ें दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात– हमे लिखने पर जोर देते हैं।”

इस पुस्तक से प्रभावित होकर उसने इस लेख में तीन कवितायें भी लिखीं– ‘बच्चों का अपना सपना है’, ‘ये दुनियां किसकी?’ और ‘वैज्ञानिक सोच’।

वैज्ञानिक सोच’

सर तक लदे विज्ञान से,
फिर भी कहे भगवान है।
जीवित हैं विज्ञान से,
फिर भी कहें भगवान है।
विज्ञान तो हर तरफ बस चुका,
भगवान कहाँ है आपका?
कोई दर्शन करवा दे भगवान के,
हम घुटने टेकें, माफ़ी मांग के।
बस सोच का फरक पड़ चुका
अन्धविश्वास बहुत ही बढ़ चुका।
वैज्ञानिक सोच अपनाकर बनें
वैज्ञानिक नए विचार के।
दुनियां चाहे कुछ भी कहे,
हम वैज्ञानिक नये संसार के।

नवमी, कक्षा 9
रा.इं.का. कोटधार गमरी, उत्तरकाशी

पलायन की मजबूरी और छटपटाहट का चि‍त्रण- ‘नेचुरल रिंगटोन’  

चित्तौडगढ़ : ‘सम्भावना’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहानीकार कर्नल मुकुल जोशी ने अपनी कहानी ‘नेचुरल रिंगटोन’ का पाठ किया।

विजन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में 14 नवंबर को आयोजि‍त कार्यक्रम में कर्नल जोशी ने प्रभावपूर्ण ढंग से कहानी सुनाई। कहानी में पहाडी़ गांव के वातावरण, खानपान, आस्थाओं, मानवीय पारिवारिक सम्बन्धों से लेकर गीत और परम्पराओं को पिरोया गया है। कुमाऊंनी भाषा के आंचलिक शब्दों ने कहानी को मर्मस्पर्शी बना दिया। आधुनिक जीवन में पढा़ई या आजीविका के कारण गांव छोड़कर मजबूरी में शहर में बस जाने पर होने वाली छटपटाहट भी कहानी में बारिकी से चित्रित हुई है।

कहानी पाठ के बाद महेंद्र खेरारू के प्रश्‍न के जवाब में कहानीकार ने बताया कि आधुनिक सोशल मीडिया के कारण बडी़ संख्या में रचनाएं इन पर आ रही हैं, पर जल्दबाजी के चलते इनमें सार्थकता की कमी है। हालांकि नये रचनाकारों को इससे प्रोत्साहन मिल रहा है। इन रचनाओं में से वे ही बचेंगी, जो शाश्‍वत होंगी। एम.एल. डाकोत ने पश्‍चि‍मी संस्कृति ओैर भारतीय संस्कृति में बेहतर कौन का सवाल उठाया। जोशी ने बताया कि भारतीय संस्कृति विश्‍व में प्राचीन और श्रेष्ठतम मानी जाती है, पर हमें सभी से उपयोगी तत्वों को ग्रहण करना चाहिए। कवि नन्दकिशोर निर्झर ने कहानी पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि रचना में रचनाकार बोलता है। कहानी पर योगेश शर्मा ने भी अपने विचार प्रकट किये। कार्यक्रम का संचालन कर रहे लक्ष्मण व्यास के प्रश्‍नों के जवाब में कर्नल जोशी ने बताया कि सेना में काम करना नौकरी मात्र नहीं है, यह देश की सेवा और जीवन जीने की शैली और कला है।

प्रारम्भ में कहानीकार का परिचय देते हुए डॉ. कनक जैन ने बताया कि मुकूल जोशी का कहानी संग्रह ‘मैं यहां कुशल से हूं’  प्रकाशि‍त हो चुका हैं। उनकी कहानियां हंस, ज्ञानोदय, कथादेश जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। वे चित्तौड़गढ़ के सैनिक स्कूल सहित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई एवं पंचमढ़ी आदि स्थानों पर कार्य कर चुके हैं। कार्यक्रम में स्थानीय कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष अखिलेश चाष्टा, चित्रकार मुकेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार नटवर त्रिपाठी, विकास अग्रवाल, गोपाल जाट,  पूजा जोशी आदि‍ साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। विजन कॉलेज की निदेशक डॉ. साधना मण्डलोई ने कहानीकार जोशी का स्वागत कि‍या। संभावना के अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रस्‍तुति‍ : डॉ. कनक जैन

बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।

कभी धूमिल नहीं होगी कुँवर नारायण की स्मृति 

कुँवर नारायण

नई दि‍ल्‍ली : मुक्तिबोध ने उन्हें पसंद किया और उनके दूसरे कविता-संग्रह ‘परिवेश : हम-तुम’ की समीक्षा करते हुए लिखा था कि वह ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना’ के कवि हैं।

इससे पहले मुक्तिबोध मस्तिष्काघात के चलते अपने अंतिम समय में दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में लगभग एक महीने तक कोमा में रहे थे।

उसके बाद आसन्न साहित्यिक इतिहास में शायद दूसरी बार उतनी दुखद और भयावह घटना घटी है कि उस समय के मुक्तिबोध के प्रिय युवा कवि और इन दिनों हिंदी के शीर्ष कवियों में अग्रगण्य श्री कुँवर नारायण का 15 नवम्‍बर 2017 को  दिल्ली के एक अस्पताल में मस्तिष्काघात के चलते लम्बे समय तक कोमा में रहने के बाद देहावसान हो गया।

स्तब्ध कर देनेवाली इस मुश्किल घड़ी में हम उनके उत्कृष्ट रचनात्मक और वैचारिक अवदान को समकालीन सन्दर्भों में बेहद प्रासंगिक और मूल्यवान् मानते हुए उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि व्यक्त करते हैं और यह संकल्प कि शोक की इस वेला में हम उनकी जीवन-संगिनी श्रीमती भारती नारायण और उनके बेटे अपूर्व नारायण जी के साथ हैं।

हमारा समय बेशक कठिन है, जो कुँवर नारायण की विदाई से और कठिन ही हुआ है। लेकिन जब तक मनुष्यता रहेगी, कविता भी रहेगी और उसमें कुँवर जी के समुज्ज्वल हस्ताक्षर से हमें उसी तरह रौशनी मिलती रहेगी, जैसे कि उन्होंने स्वयं मनुष्यता में यह अविचलित आस्था व्यक्त की थी-

”कहीं कुछ भूल हो
कहीं कुछ चूक हो कुल लेनी देनी में
तो कभी भी इस तरफ़ आते जाते
अपना हिसाब कर लेना साफ़
ग़लती को कर देना मुआफ़
विश्वास बनाये रखना
कभी बंद नहीं होंगे दुनिया में
ईमान के ख़ाते।”

( ‘जन संस्कृति मंच’ की राष्ट्रीय परिषद की ओर से पंकज चतुर्वेदी द्वारा जारी)

गिरगिट : अन्तोन चेखव

अन्तोन चेखव

पुलिस का दारोगा ओचुमेलोव नया ओवरकोट पहने, बगल में एक बण्डल दबाये बाजार के चौक से गुजर रहा था। उसके पीछे-पीछे लाल बालोंवाला पुलिस का एक सिपाही हाथ में एक टोकरी लिये लपका चला आ रहा था। टोकरी जब्त की गई झड़बेरियों से ऊपर तक भरी हुई थी। चारों ओर खामोशी।…चौक में एक भी आदमी नहीं। ….भूखे लोगों की तरह दुकानों और शराबखानों के खुले हुए दरवाजे ईश्वर की सृष्टि को उदासी भरी निगाहों से ताक रहे थे, यहां तक कि कोई भिखारी भी आसपास दिखायी नहीं देता था।
“अच्छा! तो तू काटेगा? शैतान कहीं का!” ओचुमेलोव के कानों में सहसा यह आवाज आयी, “पकड़ तो लो, छोकरो! जाने न पाये! अब तो काटना मना हो गया है! पकड़ लो! आ…आह!”
कुत्ते की कि‍कि‍याने की आवाज सुनायी दी। आचुमेलोव ने मुड़कर देखा कि व्यापारी पिचूगिन की लकड़ी की टाल में से एक कुत्ता तीन टांगों से भागता हुआ चला आ रहा है। कलफदार छपी हुई कमीज पहने, वास्कट के बटन खोले एक आदमी उसका पीछा कर रहा है। वह कुत्ते के पीछे लपका और उसे पकड़ने की कोशिश में गिरते-गिरते भी कुत्ते की पिछली टांग पकड़ ली। कुत्ते के कि‍कि‍याने और वहीं चीख- ‘जाने न पाये!’ दोबारा सुनाई दी। ऊंघते हुए लोग दुकानों से बाहर गरदनें निकालकर देखने लगे, और देखते-देखते एक भीड़ टाल के पास जमा हो गयी, मानो जमीन फाड़कर निकल आयी हो।
“हुजूर! मालूम पड़ता है कि कुछ झगड़ा-फसाद हो रहा है!” सिपाही बोला।
आचुमेलोव बाईं ओर मुड़ा और भीड़ की तरफ चल दिया। उसने देखा कि टाल के फाटक पर वही आदमी खड़ा है। उसकी वास्कट के बटन खुले हुए थे। वह अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाये, भीड़ को अपनी लहूलुहान उँगली दिखा रहा था। लगता था कि उसके नशीले चेहरे पर साफ लिखा हुआ हो, “अरे बदमाश!” और उसकी उँगली जीत का झंडा है। आचुमेलोव ने इस व्यक्ति को पहचान लिया। यह सुनार खूकिन था। भीड़ के बाचोंबीच अगली टांगें फैलाये अपराधी, सफेद ग्रेहाउँड का पिल्ला, छिपा पड़ा, ऊपर से नीचे तक कांप रहा था। उसका मुंह नुकिला था और पीठ पर पीला दाग था। उसकी आंसू-भरी आंखों में मुसीबत और डर की छाप थी।
“यह क्या हंगामा मचा रखा है यहां?” आचुमलोव ने कंधों से भीड़ को चीरते हुए सवाल किया। “यह उॅँगली क्यों ऊपर उठाये हो? कौन चिल्ला रहा था?”
“हुजूर! मैं चुपचाप अपनी राह जा रहा था, बिल्कुल गाय की तरह,” खूकिन ने अपने मुँह पर हाथ रखकर, खाँसते हुए कहना शुरू किया, “मिस्त्री मित्रिच से मुझे लकड़ी के बारे में कुछ काम था। एकएक, न जाने क्यों, इस बदमाश ने मरी उँगली में काट लिया।..हुजूर माफ करें, पर मैं कामकाजी आदमी ठहरा,… और फिर हमारा काम भी बड़ा पेचीदा है। एक हफ्ते तक शायद मेरी उँगुली काम के लायक न हो पायेगी। कुछ  मुझे हर्जाना दिलवा दीजिए। और हुजूर, कानून में भी कहीं नहीं लिखा है कि हम जानवरों को चुपचाप बरदाश्त करते रहें।..अगर सभी ऐसे ही काटने लगें, तब तो जीना दूभर हो जायेगा।”

“हुंह..अच्छा..” ओचुमेलाव ने गला साफ करके, त्योरियाँ चढ़ाते हुए कहा, “ठीक है।…अच्छा, यह कुत्ता है किसका? मैं इस मामले को यहीं नहीं छोडूँगा! कुत्तों को खुला छोड़ रखने के लिए मैं इन लोगों को मजा चखाऊँगा! जो लोग कानून के अनुसार नहीं चलते, उनके साथ अब सख्ती से पेश आना पड़ेगा! ऐसा जुर्माना ठोकूँगा कि छठी का दूध याद आ जायेगा। बदमाश कहीं के! मैं अच्छी तरह सिखा दूँगा कि कुत्तों और हर तरह के ढोर-डंगर को ऐसे छुट्टा छोड़ देने का क्या मतलब है! मैं उसकी अक्‍ल दुरुस्त कर दूँगा, येल्दीरिन!”

सिपाही को संबोधित कर दरोगा चिल्लाया, “पता लगाओ कि यह कुत्ता है किसका, और रिपोर्ट तैयार करो! कुत्ते को फौरन मरवा दो! यह शायद पागल होगा।…मैं पूछता हूं, यह कुत्ता किसका है?”
“शायद जनरल जिगालोव का हो!” भीड़ में से किसी ने कहा।
“जनरल जिगालोव का? हुँह…येल्दीरिन, जरा मेरा कोट तो उतारना। ओफ, बड़ी गरमी है।…मालूम पड़ता है कि बारिश होगी। अच्छा, एक बात मेरी समझ में नही आती कि इसने तुम्हें काटा कैसे?” ओचुमेलोव खूकिन की ओर मुड़ा, “यह तुम्हारी उँगली तक पहुंचा कैसे? यह ठहरा छोटा-सा जानवर और तुम हो पूरे लम्बे-चौड़े। किसी कील-वील से उँगली छील ली होगी और सोचा होगा कि कुत्ते के सिर मढ़कर हर्जाना वसूल कर लो। मैं खूब समझता हूं! तुम्हारे जैसे बदमाशों की तो मैं नस-नस पहचानता हूं!”
“इसने उसके मुंह पर जलती सिगरेट लगा दी थी, हुजूर! यूं ही मजाक में और यह कुत्ता बेवकूफ तो है नहीं, उसने काट लिया। यह शख्स बड़ा फिरती है, हुजूर!”
“अबे! झूठ क्यों बोलता है? जब तूने देखा नहीं, तो गप्प क्यों मारता है? और सरकार तो खुद समझदार हैं। वह जानते हैं कि कौन झूठा है और कौन सच्चा। और अगर मैं झूठा हूँ तो अदालत में फैसला करा लो। कानून में लि‍खा है… अब हम सब बराबर हैं। खुद मेरा भाई पुलिस में है..बताये देता हूं….हाँ…।”
“बंद करो यह बकवास!”
“नहीं, यह जनरल साहब का कुत्ता नहीं है।” सिपाही ने गंभीरतापूर्वक कहा, “उनके पास ऐसा कोई कुत्ता है ही नहीं, उनके तो सभी कुत्ते शिकारी पौण्डर हैं।”
“तुम्हें ठीक मालूम है?”
“जी सरकार।”
“मैं भी जनता हूं। जनरल साहब के सब कुत्ते अच्छी नस्ल के हैं। एक-से-एक कीमती कुत्ता है उनके पास। और यह तो बिल्कुल ऐसा-वैसा ही है, देखो न! बिल्कुल मरियल है। कौन रखेगा ऐसा कुत्ता? तुम लोगों का दिमाग तो खराब नहीं हुआ? अगर ऐसा कुत्ता मास्‍को या पीटर्सबर्ग में दिखाई दे तो जानते हो क्या हो? कानून की परवाह  किये बिना, एक मिनट में उससे छुट्टी पा ली जाये! खूकिन! तुम्हें चोट लगी है। तुम इस मामले को यों ही मत टालो।…इन लोगों को मजा चखाना चाहिए! ऐसे काम नहीं चलेगा।”
“लेकिन मुमकिन है, यह जनरल साहब का ही हो।” सिपाही बड़बड़ाया, “इसके माथे पर तो लिखा नहीं है। जनरल साहब के अहाते में मैंने कल बिल्कुल ऐसा ही कुत्ता देखा था।”
“हां-हां, जनरल साहब का तो है ही!” भीड़ में से किसी की आवाज आयी।
“हुँह।…येल्दीरिन, जरा मुझे कोट तो पहना दो। अभी हवा का एक झोंका आया था, मुझे सर्दी लग रही है। कुत्ते को जनरल साहब के यहां ले जाओ और वहां मालूम करो। कह देना कि मैने इस सड़क पर देखा था और वापस भिजवाया है। और हॉँ, देखो, यह कह देना कि इसे सड़क पर न निकलने दिया करें। मालूम नहीं, कितना कीमती कुत्ता हो और अगर हर बदमाश इसके मुँह में सिगरेट घुसेड़ता रहा तो कुत्ता बहुत जल्दी तबाह हो जायेगा। कुत्ता बहुत नाजुक जानवर होता है। और तू हाथ नीचा कर, गधा कहीं का! अपनी गन्दी उँगली क्यों दिखा रहा है? सारा कुसूर तेरा ही है।”
“यह जनरल साहब का बावर्ची आ रहा है, उससे पूछ लिया जाये।…ऐ प्रोखोर! जरा इधर तो आना, भाई! इस कुत्ते को देखना, तुम्हारे यहां का तो नहीं है?”
“वाह! हमारे यहां कभी भी ऐसा कुत्ता नहीं था!”
“इसमें पूछने की क्या बात थी? बेकार वक्त खराब करना है,” ओचुमेनलोव ने कहा, “आवारा कुत्ता है। यहां खड़े-खड़े इसके बारे में बात करना समय बरबाद करना है। तुमसे कहा गया है कि आवारा है तो आवारा ही समझो। मार डालो और छुट्टी पाओ?’’
“हमारा तो नहीं है।” प्रोखोर ने फिर आगे कहा, “यह जनरल साहब के भाई का कुत्ता है। हमारे जनरल साहब को ग्रेहाउँड के कुत्तों में कोई दिलचस्पी नहीं है, पर उनके भाई साहब को यह नस्ल पसन्द है।”
“क्या? जनरल साहब के भाई आये हैं? ब्लादीमिर इवानिच?” अचम्भे से ओचुमेलोव बोल उठा, उसका चेहरा आह्वाद से चमक उठा। “जर सोचो तो! मुझे मालूम भी नहीं! अभी ठहरेंगे क्या?”
“हां।”
“वाह जी वाह! वह अपने भाई से मिलने आये और मुझे मालूम भी नहीं कि वह आये हैं! तो यह उनका कुत्ता है? बहुत खुशी की बात है। इसे ले जाओ। कैसा प्यारा नन्हा-सा मुन्ना-सा कुत्ता है। इसकी उँगली पर झपटा था! बस-बस, अब कांपों मत। गुर्र…गुर्र…शैतान गुस्से में है… कितना बढ़िया पिल्ला है!
प्रोखोर ने कुत्ते को बुलाया और उसे अपने साथ लेकर टाल से चल दिया। भीड़ खूकिन पर हंसने लगी।
“मैं तुझे ठीक कर दूंगा।” ओचुमेलोव ने उसे धमकाया और अपना लबदा लपेटता हुआ बाजार के चौक के बीच अपने रास्ते चला गया।

वीरेनियत-2 : एक बहुविध कविता गोष्ठी

वीरेन डंगवाल की स्मृति में आयोजि‍त सालाना काव्य-जलसे का संचालन करते आशुतोष कुमार।

नई दि‍ल्‍ली : हरदिलअजीज कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में होने वाले जन संस्कृति मंच के सालाना काव्य-जलसे का यह दूसरा आयोजन था। 29 नवम्बर की शाम 6 बजे से ही श्रोता और कवि हैबिटेट सेंटर, दिल्ली के गुलमोहर सभागार पर जुटाने लगे थे। मनमोहन, शुभा, उज्जवल भट्टाचार्य और दिगंबर जैसे वरिष्ठों के साथ अनुपम, निखिल, सुनीता, कुंदन, आशीष जैसे युवा भी कविता-पूर्व की गहमागहमी भरी बहस में सभागार के बाहर घास के मैदान पर बतकही में मशगूल थे। ठीक 6:30 पर वीरेन डंगवाल पर बने दस्तावेजी सिनेमा का एक अंश दिखाया जाना शुरू हुआ। वीरेन डंगवाल की कवितायें उनकी जुबान से सुनना रससिक्त कर देनेवाला अनुभव तो था ही, इस वीडियो-पाठ ने होने वाले कवि सम्मलेन का एक गहरा पर्यावरण रच दिया।

वीरेन डंगवाल की कविता  के बहुतेरे रंग हैं, उनमें से कई रंग कवि-सम्मलेन में उभरे, चमके, दिपे। उनके समकालीन कवियों की काव्य-भूमि तो उनकी साझे की थी ही, युवा कवियों ने भी अपनी कविताओं की मार्फ़त इस काव्य-भूमि को आपेक्षिक विस्तार दिया।

संयोजक-संचालक आशुतोष कुमार के बुलावे पर सबसे पहले अनुज लुगुन कविता पढने आये। अनुज की कविताओं की अलहदा दुनिया हम श्रोताओं को उन इलाकों तक ले गयी जहां सचमुच रवि की पहुँच नहीं है। एक अलग आँख से दुनिया को भांपती अनुज की कविता हमारे पारंपरिक आस्वाद-बोध को चुनौती देती है।अनुज द्वारा पढी गयी ‘हमारा दुःख, उनका दुःख’ कविता एक रूपक बनकर उभरी, जो दो दुनियाओं के बीच की जगह को ठीक-ठीक पहचानती है।

रुचि भल्ला हिन्दी कविता की दुनिया में अपेक्षाकृत नया नाम हैं, वे गोष्ठी की दूसरी कवि थीं। लगभग बतकही के शिल्प में रची रुचि की कविताओं ने दिखाया कि  रोजमर्रा की जिन्दगी की नगण्य चीजें-बातें कैसे कविता बन जाती हैं। एक कविता में स्वर्णाबाई की नज़र से देखी गयी दिल्ली का रंग यों उभरा- ‘दिल्ली वही है जहां शिंदे साहब टूर पर जाता है’। शरीफे पर लिखी उनकी कविता ने वीरेन डंगवाल की ‘पपीता’ जैसी कविताओं की याद ताजा कर दी। चर्च हिन्दी कविता में कम ही आया है, रुचि ने इलाहाबाद और गोवा के चर्चों की। चर्चा के जरिये श्रोताओं को ‘चर्च के पीछे के उस पेड़’ की याद दिलाई जो कभी किसी चर्च के पीछे था ही नहीं।

तीसरे कवि थे संजीव कौशल जिनकी कविताओं में राजनीतिक रंग साफ़ दिखे। ‘सत्ता की सोहबत बिजूकों को भी नरभक्षी बना देती है’ जैसी पंक्ति इस कठिन-कठोर समय में सत्ता के चरित्र और असर का जायजा लेती है। ‘चूल्हे’ और ‘कठपुतलियाँ’ जैसी कविताओं के सहारे संजीव हमारे वक्त का विद्रूप चेहरा दिखाते हैं, पर तरीका उनका बेहद संवेदनशील था।

अगले कवि महेश वर्मा अपने गहरे संवेदना बिंबों और अपनी अनूठी दार्शनिक नज़र के कारण  सराहे गए। डिस्टोपिक यथार्थ की बारीक समझ वाले संवेदन-बिम्ब मसलन ‘तालाब में उतराती अपनी ही लाश’ श्रोताओं को गहरे परेशान कर गए।

बिहार से आए वरिष्ठ कवि अमिताभ बच्चन की कवितायें जीवन प्रसंगों से कविता बुनने की विलक्षणता से भरी हुई थीं। व्यंग्य, जिसे आचार्यों ने कविता की जान कहा है, से भरी-पूरी अमिताभ जी की कवितायें आख़िर में एक गहरी उदासी छोड़ गयीं। हमारे वक़्त की शिनाख्त करती ये कवितायें एक हल्का कथा ढाँचा रखती हैं जिससे  तादात्मीकरण में बेहद आसानी हुई।

वीरेन डंगवाल के चिर-सखा और हिंदी के अप्रतिम कवि मंगलेश डबराल की कवितायें एक दूसरी, ज़्यादा इंसानी दुनिया की तलाश की कवितायें हैं, ऐसा उन्हें सुनते हुए फिर महसूस हुआ। ‘हमारे देवता’ जैसी कविता देव-लोक को मानुष-लोक में बदलकर समाज के सांस्कृतिक द्वंद्वों को रेखांकित कर गयी। मंगलेश जी के कलम में ही वह ख़ूबी है जो ‘बेटी पलटकर पूछती है/पापा आपने कुछ कहा’ जैसी पंक्ति पूरे काव्य-वैभव के साथ श्रोताओं के  दिलों में चुभ गयी।  अपनी एक गद्य कविता के माध्यम से उन्होंने राज की मुश्किलों व उसके भविष्य की ओर  इशारा किया।

गोष्ठी के आख़िरी कवि बल्ली सिंह चीमा की गजलें हिंदी कविता के छांदस रंग को उकेरने वाली थीं। उर्दू से हिंदी में आकर गजल का  न सिर्फ़ स्वर, बल्कि सँवार भी बदल जाता है,यह महसूस किया गया। जनता से संवाद करने की भाषा और लबों-लहजा इन गजलों की ख़ासियत थी। जैसे –

“कुछ तो किरदार नए मंच पर लाए जाएं
और नाटक को सलीके से निभाया जाए।”

एक और शेर था-” मेन दुश्मन को हारने के लिए लाज़िम है/हर विरोधी को ही दुश्मन न बनाया जाए।”

तीन घंटों तक चली इस बहुविध कविता गोष्ठी में ठसाठस भरे सभागार में मौजूद श्रोताओं की सक्रिय भीगीदारी इसे और समृद्ध बना गयी।

प्रस्‍तुति‍ : मृत्युंजय
संयोजक, कविता समूह, जन संस्कृति मंच

कब दूर होगी शिक्षकों की कमी: प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

शिक्षा के नाम पर होने वाले विमर्श के तहत आए दिन लंबी-चौड़ी बातें होती रहती हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी और उनकी भर्ती प्रक्रिया को लेकर मुश्किल से ही कोई बहस होती है। शिक्षा का प्रश्न इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार कोई भी आए, देश और समाज के हित में उससे बच नहीं सकती। एक लंबे अर्से से ऐसी खबरें आ रही हैं कि हर स्तर पर शिक्षकों के पद खाली हैं। हाल की एक खबर के अनुसार देश में प्राथमिक विद्यालयों के स्तर पर शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं। इन रिक्त पदों में आधे से अधिक बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शिक्षकों के तीन लाख पद रिक्त हैं। हालांकि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के मार्ग में शिक्षकों की कमी आड़े आने पर संसद की स्थायी समिति ने चिंता जताई, लेकिन यह ध्यान रहे कि ऐसी चिंता पहले भी जताई जाती रही है। प्राथमिक शिक्षा के विद्यालयों की तरह विश्वविद्यालयों में हजारों पद खाली पड़े हैं। विश्वविद्यालय के स्तर पर शिक्षकों की कमी पूरी करने के लिए संविदा या तदर्थ आधार पर शिक्षक नियुक्त अवश्य किए जा रहे हैं, लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। क्या ऐसे गुरु देश को विश्व गुरु बना सकते हैं?

शिक्षकों की कमी कोई आज का संकट नहीं है। यह कमी रातोंरात पैदा नहीं हुई। पिछले तीन दशक या कहें उदारीकरण की शुरुआत सबसे पहले शिक्षा, बीमा, बैंक जैसे क्षेत्रों में हुई और तदर्थ नौकरियों के तहत शिक्षा मित्र, शिक्षा सहायक जैसे नामों का आरंभ भी विश्व बैंक और दूसरे पश्चिमी सलाहकारों की अगुआई में ही हुआ। कहने की जरूरत नहीं है कि इस बीच केंद्र और राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों की सरकारें रहीं, लेकिन हालात में कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ। दबे स्वरों में इसका विरोध अवश्य किया जाता रहा है, लेकिन न तो तब और न ही अब जनता या बुद्धिजीवी इसके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरे। पता नहीं क्यों यह सवाल नहीं उठता कि आज आइआइटी, एम्स और आइआइएम जैसे चुनिंदा संस्थानों में भी शिक्षकों के पचास प्रतिशत से अधिक पद क्यों रिक्त पड़े हैं? विद्यार्थियों के जातिगत कोटे की एक भी सीट इधर-उधर हो जाए तो सड़कों पर हंगामा मचने लगता है, लेकिन इतने महत्वपूर्ण संस्थानों में पढ़ा कौन रहा है और उसकी योग्यता कितनी है, इस प्रश्न पर हमेशा चुप्पी छाई रहती है। विशेषकर बुद्धिजीवियो के बीच, क्योंकि उनके बच्चों को तो देश के ही अच्छे कॉलेजों में जगह मिल जाती है। इस बार की विश्व रैंकिंग में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरु और आइआइटी आदि ही शामिल नजर आ रहे हैं। आखिर एक भी विश्वविद्यालय विश्व के चुनिंदा शिक्षा संस्थानों में अपनी जगह नहीं बना पा रहा है? जब पड़ोसी चीन अकादमिक स्तर पर लगातार बेहतर और दुनिया के अव्वल संस्थानों को चुनौती दे रहा हो तो हमें भी तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। विशेषकर तब जब हमारे पास दुनिया की सबसे नौजवान आबादी है।

शिक्षा में गिरावट के जिस एक मुख्य कारण की सभी अनदेखी कर रहे हैं वह है शिक्षकों की कमी और उनकी कामचलाऊ भर्ती प्रक्रिया। अधिकतर शिक्षकों की नियुक्ति पूरी तरह साक्षात्कार के माध्यम से ही होती है। विश्वविद्यालयों में तो शिक्षकों की भर्ती से आसान कोई नौकरी ही नहीं है। बस साठगांठ या कोई जुगाड़ होना चाहिए। न यूजीसी कुछ कर सकता है और न सरकारें। यही कारण है कि इस पेशे में आजादी के बाद से ही सबसे ज्यादा भाई-भतीजावाद कायम है और इसी कारण परिवार विशेष के लोग ही तमाम पदों पर काबिज हो जाते हैं। भर्ती की यही स्थिति अन्य अनेक क्षेत्रों में है। देश भर में हजारों कोर्ट केस भर्ती के इन मसलों पर लंबित हैं।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों में लगभग पचास प्राचार्यो की नियुक्ति को हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के ऐसे आरोपों के मद्देनजर रद किया है, लेकिन किसी भी सरकार की नींद अभी भी नहीं टूटी। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएस सुब्रमण्यम की अगुआई में बनी समिति ने अपनी सिफारिशों में सबसे ऊपर शिक्षकों की भर्ती में सुधार, पारदर्शिता, ईमानदारी के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसे किसी बोर्ड को बनाने की बात कही थी, लेकिन सरकार, विपक्ष और विश्वविद्यालयों में सभी राजनीतिक पार्टियों के जेबी संगठन चुप रहे। हमें यह समझना होगा कि शिक्षा में गिरावट का सबसे मुख्य कारण उपयुक्त शिक्षकों का अभाव ही है। जब शिक्षक ही सुयोग्य नहीं होंगे तो भला शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा? क्यों अयोग्य शिक्षकों को लाखों की मोटी तनख्वाह दी जानी चाहिए? क्यों दिल्ली विश्वविद्यालय सहित सभी विश्वविद्यालयों में कक्षाएं खाली हैं? यह किसी से छिपा नहीं कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद रिक्त हैं तो दूसरी ओर तमाम विद्यार्थी लाखों की फीस देकर कोचिंग सेंटरों में पढ़ रहे हैं। कोचिंग की एक-एक क्लास में तीन-तीन सौ तक की संख्या होती है। क्या शिक्षकों समेत सरकारी कर्मचारियों को बड़ी-बड़ी तनख्वाहें, सुविधाएं देने से संविधान में लिखा समाजवाद आ जाएगा? क्या शिक्षक भी लोक सेवक नहीं हैं? आखिर उन्हें भी तो सरकार के आला अफसरों की तर्ज पर लाखों रुपये का वेतन मिलता है? फिर उन्हें क्यों भर्ती की वस्तुनिष्ठ लिखित परीक्षा, गोपनीय रिपोर्ट, शोध की अनिवार्यता, समय पालन आदि से एतराज है।

भर्ती प्रक्रिया के गोरखधंधे पर एक न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि लोक सेवक वेतन और सुविधाओं की होड़ में बड़े संगठित गिरोह में तब्दील हो चुके हैं। अध्ययन, अध्यापन, शोध में अपनी भाषाओं से परहेज और अंग्रेजी के आतंक को भी नजरअंदाज करने की ऐसी प्रवृत्ति हावी है कि समस्या पर चोट की नौबत ही नहीं आती। सभी जिम्मेदार लोग जानते-समझते हुए भी इसे विमर्श के केंद्र में लाने से बचते हैं। आप पश्चिमी देशों से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात से लेकर ग्रेडिंग, सतत मूल्यांकन परीक्षा, प्रयोगशाला, सेमेस्टर जैसी कितनी बातें अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करते हैं, लेकिन शिक्षक की योग्यता और उनकी उचित भर्ती प्रक्रिया के प्रश्न को उसी अंदाज में नजरअंदाज करते आ रहे हैं मानो किसी कबीले के सरदार की तैनाती या पंसारी की दुकान पर सहायक की नियुक्ति की जा रही हो। दूसरी तमाम बातों के साथ-साथ इन सवालों का जवाब हासिल किए बिना शिक्षा व्यवस्था में सुधार असंभव है।