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माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे...

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है- ...

हामिद दाभोलकर

उदार और धर्मनिरपेक्ष परम्परा की निर...

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सुविधा के द्वीप  :   प्रेमपाल शर्मा...

दो बजते ही स्कूल से छूटे बच्चों की चहचहाहट से मन ऐसे प्रसन्न हो उठता है, जैसे- शाम को घर लौटती चिड़ि‍यों का चहकते हुए, शोर करते झुंड को देखना। दोन...

ओमा शर्मा

जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढ़ा ...

[caption id="attachment_7811" align="alignleft" width="253"] ओमा शर्मा[/caption] इसे एक पहेली ही माना जाना चाहिए कि स्मृति पर इधर पड़ते उत्तरोत्तर ...

कविता

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माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है- ...

कहानी

चिंतामणि जोशी

और दिलबर नठ गया : चिन्तामणि जोशी

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गजल

रमेश तैलंग

रमेश तैलंग की गजलें

02 जून 1946 को टीकमगढ़, मध्‍य प्रदेश में जन्‍में रमेश तैलंग ने प्रचूर मात्रा में बाल साहि‍त्‍य लि‍खने के अलावा कई महत्‍वपूर्ण गजलें भी ह...

परिक्रमा

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चोंद को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

विज्ञान केन्द्रों में प्रेमचंद

[caption id="attachment_7856" align="alignleft" width="640"] कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चोंद को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।[...

बच्चों की करामात

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बुद्धिमान राजा : फ़ैयाज़ अहमद

यह कहानी है जंगल के राजा शेर की। शेर और राजाओं की तरह नहीं था। यह राजा था बड़ा चालाक, बड़ा शातिर। हर काम सोच-विचार कर करता। हर निर्णय संभल...

माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है-

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और दिलबर नठ गया : चिन्तामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

अचानक उसका हाथ पेंट की पिछली जेब में गया। फिर अन्य सभी जेबें देखीं। जैकिट की भीतरी जेब को टटोलते ही दो वर्ष की बेरोजगारी झेलने के बाद सरकारी स्कूल में मास्टर बनने की सारी खुशी एक ही क्षण में फुर्र हो गई। चौबीस साल का युवक दोनों हाथों से सिर पकड़ कर रास्ते के किनारे पड़े पत्थर पर बैठ गया। लतड़-पथड़-पस्त। तीन सौ किलोमीटर बस से एवं बारह और छः, अठारह किलोमीटर पैदल यात्रा की थकान अचानक एकमुश्‍त उसके सिर पर सवार हो गई और उसके पूरे शरीर को शि‍थिल कर दिया। उसने जल्दी-जल्दी अपनी सभी जेबें टटोलीं। जैकिट उतारकर स्वेटर को झटका। पीठ से पिट्ठू उतार कर अंदर देखा। उसका बटुआ कहीं नहीं था। स्मृति को टटोला। कल की रात उसने विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के घर पर गुजारी थी। स्थानीय चतुर्थ श्रेणी कर्मी, लेकिन आतिथ्य में नम्बर एक। आदमी गरीब, लेकिन दिल का अमीर। सुबह चार बजे विदा होते समय उसने चारपाई की बगल में रखे बक्से पर से अपनी घड़ी पहनी थी और बटुआ उठाकर पूरे होशो-हवास में अपनी जैकिट की अंदर की जेब के हवाले किया था। फिर वह दौड़ पड़ा था बारह किलोमीटर का पैदल पथ दो घंटे में तय कर छः बजे की बस पकड़ने के उद्देश्‍य से। आधी दूरी तय भी कर चुका था लेकिन…..

उसने घड़ी देखी। पांच बजने में पांच मिनट बाकी थे। बिना पैसे के दो दिन की तीन सौ किलोमीटर लम्बी यात्रा असम्भव थी। नया इलाका। न जान न पहचान। पौ फटने लगी थी। दूर उत्तर-पूरब की चोटियां रक्ताभ होने लगीं थीं। उतरते पथरीले रास्ते की छाया अब दूर तक दिख रही थी। निर्जन अकेला रास्ता। वापस चलना होगा। उसने पिट्ठू लटकाया। इसी रास्ते के किनारे कहीं पड़ा मिलेगा, उसका बटुआ। न हो तो महिपाल या सती मास्साब ही जाने तक की व्यवस्था उधारी में कर देंगे। वह दो कदम चढ़ा, लेकिन थके पैर उसे चार कदम पीछे खींच लाये। फिर से बैठ गया, सिर पकड़कर।

कल नियुक्ति की औपचारिकता पूरी करने के बाद सती मास्साब ने उसे लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया था- ‘‘भाई जी! हम तो पांच साल से पड़े हैं, इस बीहड़ में। दूध-पानी, साग-भाजी कुछ नहीं मिलेगा। न बिजली, न सड़क, न अखबार। तीसरी दुनिया है। क्या करोगे, यहां नौकरी करके। वह भी एड-हॉक। इस बार तो लोग मात्र पांच सौ रुपए खर्च करके मनमाफिक जगह पर नियुक्ति पाए हैं। कल सामान लेने जा रहे हो, तो नैनीताल होते हुए चले जाओ। क्या पता अभी भी घर के नजदीक किसी जगह का जुगाड़ हो जाए। वरना इस गलती पर कई बरस पछताओगे।’’

वह पछता ही तो रहा था। काश! मास्साब का भाषण न हुआ होता तो वह सुबह यों हड़बड़ी में न भागता। पहले बीमार मां की तीमारदारी में ध्यान ही नहीं रहा कि नियुक्तियां भी हो रही हैं। नियुक्ति मिली तो घर से तीन सौ किलोमीटर दूर वह भी एट द इलेवन्थ आवर। सोच रहा था, उसके साथ ही यह सब क्यों होता है। तभी उस शांत पथ पर एक किशोर बालक की आवाज गूंजी- ‘‘ ऊपर से पत्थर आ रहे हैं, भागो। ’’

पन्द्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर उसका हाथ पकड़ कर खींचे लिये जा रहा था। अगले मोड़ पर जब दोनों रुके, तब तक पत्थरों का एक रेला गड़गड़ाते, धूल उड़ाते हुए ऊपर से आकर पहाड़ी की तलहटी में बहती नंदाकिनी नदी में समा गया था।

‘‘ साब, मैं अभी न आता तो आज आप बचते नहीं। आप इस इलाके के तो नहीं हो। यहां पर तो लगातार पत्थर गिरते रहते हैं। ऊपर देखकर नीचे भागना पड़ता है। आप हैं कि सिर देकर बैठे हैं।’’ उसकी आंखों में भोलापन, घबराहट, संदेह, जिज्ञासा जाने क्या-क्या था।

पत्थरों का अचानक आया रेला तो धड़धड़ाता हुआ नदी में समा गया था, लेकिन वह अब भी अपने अंदर की धड़धड़ को संयत करने का प्रयास ही कर रहा था। बाप रे बाप। बड़ी अनहोनी शायद टल गई थी।

‘‘धन्यवाद बेटे।’’ उसने कहा, ‘‘ तुम तो देवदूत बनकर आए। मैं कल ही ऊपर गांव के हाई स्कूल में आया था। नया मास्टर बनकर। अपने घर वापस जा रहा हूं, सामान लाने…।’’

बच्चे के चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के भाव आए। अंदर शायद कहीं सम्मान के किसी टुकड़े ने हिचकोला खाया।

‘‘ प्रणाम गूरजी…मैं दिलबर…गांव के स्कूल में नौ में पढ़ता हूं…मैं भी बाजार जा रहा…चलो… साथ चलते हैं…।’’ बच्चे ने मास्साब का पिट्ठू उठा लिया।

‘‘ मगर मैं तो वापस जा रहा हूं…स्कूल को।’’

‘‘ क्यों? ’’

‘‘ दरअसल, मेरा बटुआ हड़बड़ी में कहीं गिर गया है, रास्ते में। ’’

दिलबर के चेहरे पर कई भाव एक साथ आने-जाने लगे। वह कभी अजनबी मास्टर की तरफ देखता, कभी जमीन को घूरने लगता। फिर उसने जेब से एक काले रंग का बटुआ निकाला और मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘यह है? ’’

‘‘ अरे, हां। तुम्हें कहां मिला?’’ मास्साब ने उसके हाथ से बटुआ झपट लिया और सीने से ऐसे लगाया मानो निकलते हुए प्राण वापस चेप रहे हों।

‘‘ धन्यवाद दिलबर, मैंने तो तुम्हें एक भी पाठ नहीं पढ़ाया अभी,  लेकि‍न तुमने पहले ही मुझे गुरु दक्षिणा दे दी।’’ कहते हुए मास्साब ने बटुआ संभाल कर अपनी जेब के हवाले कर दिया।

‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये हैं। फिर कहोगे…।’’ अजीब से भाव आए थे, दिलबर के चेहरे पर।

‘‘अरे, नहीं यार। ’’ मास्साब ने बटुआ उसके सामने खोलते हुए सौ-पचास के नोटों पर यों ही हाथ फेरते हुए कहा।

‘‘ ठीक है। चलो चलते हैं।’’ बटुआ मिलते ही मास्साब के शि‍थिल शरीर में पुनः ऊर्जा का संचरण हो चुका था। उन्होंने दिलबर के हाथों से अपना पिट्ठू ले लिया।

दिलबर के साथ गपशप में बची हुई छः किलोमीटर की पैदल यात्रा कब पूरी हुई मास्साब को पता ही नहीं चला। उन्होंने दिलबर से इलाके और विद्यालय के बारे में तमाम जानकारी भी प्राप्त की। चहकती और बहकती कई बातों से कई बार मास्साब को लगा कि दिलबर कक्षा नौ में पढ़ने वाला सामान्य बच्चा नहीं है। दिलबर ने बताया था कि उनके स्कूल में कई साल से गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापक आए ही नहीं। चार गुरुजी में से तीन ही एक बार में स्कूल में रहते हैं। दूर का स्कूल हुआ। एक गुरुजी घर जाते हैं, बारी-बारी से। मास्साब ने वादा किया कि अगले सोमवार से वह उन्हें अंग्रेजी के साथ गणित और विज्ञान भी पढ़ाएंगे। दिलबर की तो हिन्दी और सामान्य अध्ययन में भी मदद करेंगे। मास्साब दिलबर की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। अब इस अति पिछड़े इलाके में सेवा करने का भाव उनके मन में मजबूती लेने लगा। स्थान परिवर्तन का प्रयास उन्हें व्यर्थ लगने लगा। उनके मन में कुछ योजनाएं आकार लेने लगीं। स्टेशन पहुंच कर बस में बैठते हुए पचास रुपये का एक नोट बटुए से निकाल कर दिलबर की तरफ बढ़ाते हुए मास्साब ने कहा, ‘‘बेटे! मैं और क्या दे सकता हूं तुम्‍हें, फिर भी…। ’’

‘‘नहीं, गूरजी नहीं।’ ’कहते हुए दिलबर सामने की गली में भागता चला गया।

नौकरी सरकारी थी, लेकिन पक्की नहीं। एक महीने का नोटिस या एक महीने का वेतन देकर कभी भी सेवा समाप्ति की शर्त थी, नियुक्ति पत्र में। लेकिन पहले विद्यार्थी से यह मुलाकात और संवाद कोई सामान्य बात नहीं थी। अंतिम बार जब दिलबर से नजरें मिली थीं, तो मास्साब को उसकी आंखों में अनेक डूबते-उतराते प्रश्‍न दिखे थे। एक उपेक्षा का भाव भी था, जो उन्हें पच नहीं पा रहा था। चालक ने एक लम्बा हॉर्न बजाया और बस छोटे से स्टेशन को छोड़कर घूं…घूं करती हुई पहाड़ी पर चढ़ने लगी। नन्हा दिलबर सहयात्री बनकर बैठ गया था मास्साब के मन-मस्ति‍ष्‍क में। उसकी बातें रास्तेभर उन्हें रह-रहकर याद आती रहीं।

अगले सोमवार को रोजमर्रा की आवश्यकता का हल्का-फुल्का सामान लेकर मास्साब अपने विद्यालय पहुंचे। प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में उनकी आंखें दिलबर को ही तलाश रहीं थीं, लेकिन वह नहीं दिखा। मास्साब ने परिचय संबोधन में बच्चों से कहा कि वह बच्चों के साथ बच्चा बनकर ही रहेंगे और उनकी प्रत्येक समस्या का समाधान करने का प्रयास करेंगे। अंग्रेजी के साथ गणित-विज्ञान भी उन्हें पढ़ाएंगे। बच्चों को उनसे डरने की जरूरत नहीं। उन्हें अपना दोस्त समझें। अपने मन की बातें कहें। जितने अधिक चाहें, प्रश्‍न पूछें। किसी तरह की डर या झिझक महसूस न करें। अच्छे बच्चे जिज्ञासु होते हैं और प्रश्‍न पूछते हैं। जो बच्चे पूछते हैं, वही सीखते हैं। सीखने की शुरुआत ही प्रश्‍न से होती है। ऐसा नहीं कि शि‍क्षक के पास हर प्रश्‍न का उत्तर हमेशा उपलब्ध होता है। ऐसे बहुत सारे प्रश्‍न होते हैं, जिनके उत्तर शि‍क्षकों को भी पता नहीं होते हैं। लेकिन आप-हम मिलकर उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाश करने की कोशि‍श करेंगे। उत्तरों की तलाश करते हुए ही तो हम बहुत कुछ सीखते जाते हैं और यही ज्ञान है। ज्ञान पहले से तैयार कोई माल नहीं है, बल्कि इसी तरह उसका सृजन होता है। प्रश्‍न ही हैं, जो  ज्ञान सृजन की खिड़की को खोलते हैं। इसलिए प्रश्‍नों का हमेशा स्वागत रहेगा। मास्साब की बातें सुन बच्चों के चेहरों में एक अलग सी चमक छा गई। शि‍क्षकों के बीच खुसर-पुसर शुरू होने लगी थी।

मास्साब को कक्षा नौ की कक्षाध्यापकी सौंपी गई थी। पहले वादन में उन्होंने कक्षा में जाकर उपस्थिति ली।

‘‘ महिधर प्रसाद ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ खुशाल सिंह ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’

‘‘ …………………. ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’ मास्साब ने जोर से दोहराया।

‘‘ नठ गया।’’ पीछे के बेंच से दबी-सी आवाज आई।

‘‘ नठ गया मतलब? ’’ मास्साब ने पीछे बैठे बच्चे से पूछा।

महिधर ने खामोशी से सिर झुका लिया। अन्य बच्चे भी खामोश हो गए। मास्साब ने हाजिरी पूरी की और पहले दिन का पहला कक्षा शि‍क्षण प्रारम्भ किया। पहला दिन बच्चों के साथ जान-पहचान में ही बीत गया। यद्यपि दिलबर कई बार मास्साब के मानस पटल पर आता-जाता रहा, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं।

यह बात लोगों को पता चल चुकी थी कि नये मास्साब हैं तो अंग्रेजी के, लेकिन गणित-विज्ञान भी पढ़ाएंगे। महिधर के पिता गिरधर तिवारी अभिभावक संघ के अध्यक्ष थे और पूर्व सैनिक भी। उन्होंने बेटे की पढ़ाई की गरज से तुरत-फुरत अपने मकान में मास्साब के रहने की व्यवस्था कर दी। बच्चे स्कूल से एक टेबल और दो कुर्सी भी ले आए। आज पहला ही दिन था। तखत पर अपना बिस्तर फैलाकर मास्साब ने महिधर के घर पर ही भोजन किया। इस बीच जान-पहचान की छुटमुट बातें भी होती रहीं। महिधर के पिता ने बताया कि महिधर कक्षा एक से आठ तक लगातार कक्षा में दूसरे स्थान पर रहता आया है। अब मास्साब के साथ रह कर पढ़ाई करेगा तो पहला आया करेगा।

भोजन के बाद मास्साब कुर्सी लेकर आंगन में बैठ गए। पूर्णिमा की रात थी। चांद अपने पूरे शबाब पर था। गांव का स्कूल बसासत के अंतिम छोर पर था और स्कूल से ही लगा महिधर का मकान। ऊपर की ओर बांज का हरा-भरा जंगल और नीचे की ओर नदी घाटी तक फैले हुए छोटे-छोटे तोक। पत्थर की स्लेटों से ढकी घरों की छतें चांदनी में छोट-छोटे शीशे के चौकस टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। मास्साब के मानस पटल पर रह-रह कर दिलबर की यादें और बातें टकरा रही थीं। तभी महिधर आकर सामने बैठ गया। सिर झुकाकर। मास्साब बतियाने लगे, ‘‘कहो महिधर! तो तुम दूसरे ही रहते हो कक्षा में। पहला कौन रहता है, भाई? ’’

‘‘ जी दिलबर। गूरजी! दिलबर चोर नहीं था।’’

‘‘ मैंने कब कहा? ’’ मास्साब चौंक पड़े।

‘‘ गुलाब सिंह सेठ ने शि‍कायत की कि दिलबर ने उसकी दुकान से दो सौ रुपये निकाल लिए। ’’

‘‘ अच्छा!’’

‘‘ सती मास्साब ने प्रार्थना में दिलबर की बहुत बेइज्जती की और बहुत मारा उसे। फिर सभी बच्चे भी दिल्वा रचो! दिल्वा रचो! कह कर हर समय उसे चिढ़ाने लगे। गुलाब सिंह सेठ सरपंच भी हैं। पंचायत ने बेचारे दिलबर के पिता पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगा दिया। उन्होंने बकरी बेचकर जुर्माना भरा और उस दिन दिलबर को खूब मारा।’’

‘‘ फिर क्या हुआ?’’ मास्साब के चेहरे में दुःख और आश्‍चर्य के मिश्रित भाव थे।

‘‘ उस दिन फीस डे था। दिलबर सुबह अंधेरे में ही मेरे घर आया। वह मेरा अच्छा दोस्त था। उसने खिड़की के पास आकर मुझे जगाया। एक कापी और पेन मांगकर वह अंधेरे में ही कुछ लिखने लगा। उसने अपने पिताजी के लिए चिट्ठी लिखी और पचास रुपये मुझे पकड़ाए और दिलबर नठ गया। गूरजी! डर के कारण मैंने चिट्ठी और रुपये छुपा दिए। किसी को नहीं बताया।’’

महिधर रुआंसा हो गया और चिट्ठी और रुपये मास्साब के हाथ में पकड़ाकर चला गया। मास्साब चन्द्रमा के मध्यम प्रकाश में चिट्ठी पढ़ने लगे-‘‘पिता जी! मुझे माफ कर देना। घर छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुआ हूं। गुलाब सेठ अपने को बहुत बड़ा अंग्रेज समझता है। मैंने उसकी दुकान से एक कापी खरीदी थी। कापी अंदर से फटी निकली। मैं कापी लौटाने गया तो उसने  कहा, ‘‘ यू ब्लडी लेबर्स’ सन।’’ पिता जी यह अंग्रेजी में गाली होती है। मैंने भी उससे कह दिया, ‘‘ यू ब्लडी, युअर फादर ब्लडी।’’ उसने मुझे एक झापड़ मार दिया। मैं चुपचाप चला आया। मुझे दुःख है कि मेरी बात न आपने सुनी, न पंचायत ने। स्कूल में मास्साब ने भी नहीं। ऐसे गांव में रहकर, ऐसे स्कूल में फीस देकर पढ़ने से मैं क्या सीखूंगा। इसलिए फीस के पैसे भी वापस भेज रहा हूं। आपका दो महीने का तमाखू का खर्चा तो होगा। मुझे ढ़ूंढने मत आना। मैं बहुत दूर जा रहा हूं। आपका अभागा बेटा- दिलबर।

मास्साब चिट्ठी पढ़कर सन्न रह गए। लोग अपने-अपने घरों में दुबक चुके थे। गांव में शांति थी। गांव की सीमा से पहाड़ी की चोटी तक पसरा जंगल खामोश था। सीढ़ीदार खेत लमलेट थे। सिर्फ पहाड़ों से उतरकर ढलान पर बहती नंदाकिनी का शोर रात के सन्नाटे में कानों से टकरा रहा था। अचानक आसमान में चमकते चांद को एक काले बादल के टुकड़े ने आकर ढक लिया और पूरी घाटी स्याह हो गई। मास्साब अपने कमरे में जाकर तखत पर पसर गए। ज्यों ही नींद पास आती दिलबर की आवाज कान खींच देती, ‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये थे। फिर कहोगे…।’’

सुबह प्रार्थना स्थल पर खुद के द्वारा कही बातें बार-बार प्रश्‍न के रूप में उनके सामने खड़ी हो जा रही थीं। वह कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे।

( चिंतामणि जोशी राजकीय इंटर कालेज टोटानोला, पिथौरागढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्‍ता हैं। कविता और कहानी लिखते हैं। एक कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुका है। वह दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।)

उदार और धर्मनिरपेक्ष परम्परा की निरन्तरता जारी रहेगी : हामि‍द दाभोलकर

हामिद दाभोलकर

हामिद दाभोलकर

हामि‍द दाभोलकर अंधवि‍श्वास के खि‍लाफ संघर्षरत रहे नरेंद्र दाभोलकर के पुत्र है, जि‍नकी 20 अगस्त 2013 में पूणे में हत्या कर दी गई थी। हामि‍द अपने पि‍ता की वि‍रासत को उसे तेवर के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। हामि‍द दाभोलकर से लेला बावदम की बातचीत-

सभी सार्वजनिक मन्दिरों में स्त्रियों के प्रवेश की माँग को लेकर आपके पिता ने सन् 2000 में एक आंदोलन की शुरुआत की थी। उनके इस संघर्ष के बारे में कुछ बताएं।

शनि सिगनापुर मध्य महाराष्ट्र में एक जगह है, जिस पर वर्ष 1998 में गुलशन कुमार द्वारा ‘सूर्य पुत्र शनिदेव’ नाम से एक फि़ल्म बनाने के बाद इस स्थान की मान्यता बढ़ी और यह स्थान एक चर्चित तीर्थस्थल बन गया। बहुत से लोगों का विश्वास है कि यह मन्दिर एक जागृत देवस्थान है। शाब्दिक रूप से ‘जागृत’ का अर्थ होता है कि मन्दिर में स्थापित प्रतिमा में ईश्वर का वास है। अत: दृश्यमान रूप से देखें तो ईश्वर नहीं चाहता कि उसके पवित्र स्थान पर महिलाएं प्रवेश करें, इसलिए पारम्परिक रूप से यहाँ उनका प्रवेश वर्जित रहा। मजेदार तथ्य यह है कि यहाँ मन्दिर के चारों तरफ दीवार नहीं है और यह पवित्र स्थल महज एक चबूतरा है जिस पर एक काले पत्थर के रूप में देवता स्थापित है। यह भी मान्यता है कि यहाँ देवता चोरी करने वालों को दंड देते हैं इसलिए इस गाँव में चोरी की घटनाएं नहीं होतीं तथा घरों के दरवाजों पर ताला भी नहीं लगाया जाता। हालाँकि सिगनापुर की कोतवाली में दर्ज एफ.आई.आर. कुछ अलग ही कहानी कहती हैं। नरेंद्र दाभोलकर के नेतृत्व में ‘महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति’ ने इन्हीं मान्यताओं के खिलाफ गत पन्द्रह वर्षों में लम्बा संघर्ष किया था।

यह सब वर्ष 1998 में शुरू हुआ जब सत्यशोधक सभा नाम की एक संस्था (जिसका गठन महात्मा फुले के समता और न्याय सम्बन्धी विचारों के प्रसार हेतु किया गया था) द्वारा अहमदनगर में एक राज्य स्तरीय महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया, जिसमें इस मन्दिर की भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाए गए। सत्यशोधक सभा ने इस मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाया, परन्तु महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने संघर्ष का मन बना लिया था। इस तरह व्यापक प्रारम्भिक तैयारी तथा समाज और मीडिया में गहन विचार-विमर्श के बाद नवम्बर 2000 में एम.ए.एन.एस. ने शनि सिगनापुर की तरफ मार्च करने की घोषणा कर दी। महाराष्ट्र की अनेक सामाजिक विभूतियां जैसे डॉ एनडी पाटिल, बाबा अधव, श्रीराम लागू आदि ने इस आंदोलन को समर्थन दिया और इस मार्च में शामिल होने का भी निश्चय किया। इस मार्च में करीब 1200 एम.ए.एन.एस. स्वयंसेवक अपनी-अपनी पत्नियों के साथ शामिल हुए। दाभोलकर इस बात को लेकर प्रयत्नशील थे कि यह आन्दोलन पूरी तरह सत्याग्रह के सिद्धांतों पर आधारित रहे और कोई भी व्यक्ति कानून अपने हाथ में न ले तथा बलपूर्वक इस पवित्र स्थल में प्रवेश न करे।

क्या उस वक्त तीव्र विरोध का सामना नहीं करना पड़ा था, जबकि राजनीति और धर्म का मिश्रण किया जा रहा था और हिन्दू धार्मिक संगठनों के साथ-साथ शिवसेना और बीजेपी भी इस आंदोलन के विरोध में डटे हुए थे?

महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा इस आंदोलन की घोषणा के बाद बीजेपी, शिवसेना और अन्य कट्टर समूहों ने विरोध शुरू कर दिया, जो हिंदुत्व का इस्तेमाल घृणा फ़ैलाने के लिए कर रहे थे। इनकी तरफ से यह विरोध अपेक्षित था, परन्तु दुर्भाग्य से कांग्रेस ने भी इस आंदोलन का विरोध किया, हालाँकि वे यह विरोध अपरोक्ष रूप से कर रहे थे। विडम्बना देखि‍ए कि महाराष्ट्र के तत्कालीन सामाजिक न्याय मंत्री दिलीप सोपल ने दाभोलकर को खुलेआम धमकी देते हुए कहा कि यदि उन्होंने शनि सिगनापुर की तरफ बढ़ने की कोशिश की तो उनके हाथ-पैर काट दिए जाएंगे।

दाभोलकर और एम.ए.एन.एस. के सक्रिय सदस्यों को यह चुनौती भी दी गई कि वे इस मार्च में अपने साथ अपनी माताओं और पत्नियों को भी साथ लाकर दिखाएँ और शनि के प्रकोप को भुगतें। यही कारण था कि आंदोलन से जुड़े सभी एक्टिविस्ट के साथ या तो उनकी माँ थी या फिर पत्नी। जैसा कि अंदेशा था दाभोलकर और एम.ए.एन.एस. के सभी कार्यकर्ताओं को अहमदनगर जिले में प्रवेश करते ही गिरफ्तार कर लिया गया, परन्तु इस आंदोलन ने जो लहर पैदा की, उस पर नियंत्रण नहीं किया जा सका। हमें लगता है कि अभी दो महीने पहले जिस महिला ने वहाँ पूजा-अर्चना की तथा अन्य संगठनों द्वारा महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को लेकर जो आवाज बुलन्द की जा रही है दरअसल, इसी आंदोलन को अपनी तरह से आगे बढ़ाने की ही मुहिम है।

यह आंदोलन आगे कैसे बढ़ा था?

इस आंदोलन के शुरू होने के बाद हमने इसे और मजबूत बनाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया की राह पकड़ी। इस मुद्दे को लेकर दाभोलकर तथा एम.ए.एन.एस. की वरिष्ठ साथी शालिनी ओक द्वारा बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई। इस याचिका पर अनेक बार सुनवाई हुई, परन्तु अत्यंत धीमी न्यायिक प्रक्रिया के चलते यह मामला पन्द्रह साल तक अटका रहा।

एक बार फिर इस जनहित याचिका की तरफ लोगों का ध्यान गया जब सबरीमाला से सम्बंधित इसी तरह की एक और जनहित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई और नवम्बर 2015 में एक महिला द्वारा शनि सिगनापुर के पवित्र स्थल पर पूजा आदि सम्पन्न की गई। महाराष्ट्र अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति द्वारा इस रोक के खि‍लाफ इसी सप्ताह एक राज्य स्तरीय विरोध आयोजित किया और जनहित याचिका के मामले में जल्दी सुनवाई के लिए एक याचिका दायर की गई। पिछले सप्ताह एडवोकेट नलिनी वर्तक द्वारा इसी मुद्दे को लेकर एक अलग जनहित याचिका भी दायर की गई और एम.ए.एन.एस. की याचिका को भी इसी के साथ जोड़ दिया गया। उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय इसी जनहित याचिका के सन्दर्भ में आया है।

इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय बात है कि इसी भेदभाव पर हाजी अली दरगाह को लेकर दो मुस्लिम महिलाओं द्वारा दायर की गई जनहित याचिका। मुझे लगता है कि‍ इस जनहित याचिका को जितना ध्यान मिलना चाहिए था, उतना मिला नहीं। मुस्लिम महिलाओं का दरगाह के खि‍लाफ इस तरह जनहित याचिका के लिए आगे आने का निर्णय ऐतिहासिक है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से भी स्वीकार किया है कि यह प्रेरणा उन्हें शनि सिगनापुर से संबंधित जनहित याचिका से मिली थी। दाभोलकर हमारे बीच नहीं हैं, परन्तु हाल ही में हुए संघर्ष के दौरान एम.ए.एन.एस. ने इस मुद्दे को तार्किक परिणिति तक ले जाने की पूरी कोशिश की है।

न्यायिक लड़ाई में बहुत लम्बा समय लगा, परन्तु इसने कुछ लोगों को इस दौरान शिक्षित भी किया। उदाहरण के लिए शिव सेना और बीजेपी ने पलटी खाते हुए वर्ष 2011 में कोल्हापुर के महालक्ष्मी मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सफल मुहिम चलाई थी।

यह एक तरह का आदर्श न्याय (poetic justice) ही कहा जाएगा कि जिन लोगों ने सन् 2000 में महालक्ष्मी मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर दाभोलकर का विरोध किया था, उन्हीं के द्वारा सन् 2011 में इस मुद्दे के पक्ष में मुहिम चलाई गई। अब तो आर.एस.एस. तक खुलेआम इस मुद्दे को अपना समर्थन दे रही है।

दाभोलकर कहा करते थे कि यदि हम किसी भी मुद्दे को लेकर समाज के भीतर लगातार अपनी बात करते रहें तो समाज की गुणात्मक व्यवस्था में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। इन दिनों इस मुद्दे को लेकर यही सब महसूस किया जा सकता है।

कुछ अत्यंत उग्र तत्वों और उन समूहों को छोड़कर जिनके आर्थिक हित सीधे तौर पर जुड़े हुए है। जैसा कि शनि सिगनापुर के ट्रस्ट का मामला है, जहाँ यह मुद्दा धर्म से अधिक स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा है, बाकी समाज की मुख्यधारा में बहुत कम समूह हैं, जो इस आंदोलन के विरोध में हैं, क्योंकि इन दिनों लैंगिक समानता लगभग स्वीकार्य है।

महिलाओं को मन्दिर में प्रवेश करने से रोकना पूर्वाग्रह के साथ- साथ असंवैधानिक भी है। इसके बावजूद इस असमानता को विभिन्न हलकों से सहयोग मिल रहा है। क्या यह आधुनिक भारत और उदारवादी महाराष्ट्र का मज़ाक उड़ाना नहीं है? वास्तव में यह महाराष्ट्र की उदारवादी सोच की परम्परा पर हमला है। आपके पिता तथा गोविन्द पानसरे दोनों की हत्या मूलत: विचारधारा, तर्क और धर्म की रचनात्मक आलोचना पर हमला है?

इन दिनों यह एक मिथक है कि महाराष्ट्र एक उदार राज्य है। अधिक-से-अधिक हम यही कह सकते हैं कि यह एक उदार राज्य था। हम इसे किस मुँह से उदार कह सकते हैं, जब दिनदहाड़े दाभोलकर और कॉमरेड पानसरे की हत्याएं की गई हों और सालों बाद भी हत्यारों का कोई पता नहीं चल सका हो। यह बेहद दु:खद है कि यह धरती न सिर्फ महात्मा फुले, छत्रपति शिवाजी महाराज और डॉ अम्बेडकर की जन्मभूमि है, बल्कि नाथूराम गोडसे और अन्य धार्मिक कट्टर संगठनों की भी जन्मस्थली है, जो सम्भवत: दाभोलकर, कॉमरेड पानसरे और प्रो. कलबुर्गी के हत्यारे हैं। अपने नेतृत्वकर्ताओं को खोने के बावजूद एम.ए.एन.एस. जैसे संगठन महाराष्ट्र के उदारवादी चरित्र और धर्मनिरपेक्ष परम्परा को जीवित रखने के लिए कठिन संघर्ष कर रहे हैं।

आपने कहा था कि आर.एस.एस. और बीजेपी तथा दक्षिणपंथी विचारधारा से लैस अन्य संगठनों पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना बहुत सुविधाजनक विरोध का रास्ता है और जरूरत इस बात की है कि इन संगठनों को इनके कृत्यों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए। कृपया इस बात की हाल ही में आए न्यायालय के फैसले, तर्कशीलता और धर्म की रचनात्मक आलोचना के सन्दर्भ में व्याख्या करें?

यह सच है। किसी भी सामाजिक आंदोलन के बारे में एक आत्मश्लाधापूर्ण विकल्प के बारे में सोचना बहुत आसान काम है। परन्तु एक राजनीतिक कालखण्ड में जहाँ बीजेपी जो योजनाबद्ध रूप से साम्प्रदायिक है और कांग्रेस जो व्यावहारिक रूप से सांप्रदायिक है और इन दोनों दलों के बीच इस देश का आम नागरिक पिस रहा हो, तब इस तरह की लम्बी लोकतान्त्रिक लड़ाई का रास्ता ही एक मात्र विकल्प के रूप में बचता है।

हम इस बात को लेकर सचेत हैं कि हाल ही में आया न्यायलय का फैसला महज शुरुआत है। इस फैसले के बाद की घटनाओं को यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमें अपने संघर्ष को जारी रखना होगा ताकि किसी भी अन्य धार्मिक स्थल पर लैंगिक आधार पर भेदभाव न हो सके। यही नहीं संगठित धर्म द्वारा जारी शोषण के खि‍लाफ भी आमजन को शिक्षित करना होगा तथा धर्म की रचनात्मक आलोचना के प्रति सचेत करने की दिशा में भी काम करना होगा।

फ्रंटलाइन (फरवरी अंक) से साभार
अनुवाद : मणि मोहन

विज्ञान केन्द्रों में प्रेमचंद

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चों को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

कौशाम्बी में आयोजि‍त कार्यक्रम में बच्चोंद को प्रेमचंद की कहानी सुनाती छात्रा।

नई दि‍ल्ली : 31 जुलाई 2016 को कथाकार मुंशी प्रेमचंद की 136वीं जयंती को पहली बार प्रथम विज्ञान केन्द्रों में मनाया गया। पांच केन्द्रों इलाहाबाद, झाल्डा, मसूदा, रालेगांव और सालिपुर में इस अवसर पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍ए गए। इनमें मुख्यतौर पर सत्यजीत रे द्वारा निर्मित फीचर फिल्म सद्गति व पूस की रात दिखाई गई। बच्चों ने कहानियों का पाठ किया, चित्र बनाए, उनकी प्रदर्शनी लगाई गई और नाटक भी किए। हालांकि यह ऐसा पहला मौका था, जब विज्ञान केन्द्रों को इस तरह का कोई आयोजन कि‍या गया, लेकिन सभी ने पूरे उत्‍साह से कार्यक्रमों में भाग लि‍या। वि‍शेष रूप से बच्‍चे बढ़चढ़कर आयोजन का हि‍स्‍सा बने। इस तरह के कार्यक्रमों की सार्थकता यह है कि‍ इससे विज्ञान के साथ-साथ समाज के प्रति भी बच्चों के सकारात्मक नजरिये को विकसित किया जा सकता है। केंद्रों की कार्यक्रम की रि‍पोर्ट-

झाल्दा कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर पर किया गया, जिसमें 43 बच्चों की भागेदारी रही। सभी बच्चों को सत्यभान व केशब ने दो कहानियां पढ़कर सुनाईं। उन पर बात की और उन कहानियों पर चित्र बनाने के लिए कहा। सभी ने चित्र बनाए। बच्चों ने खुद जज करके कुछ बेहतरीन चित्रों को चुना, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए इनाम भी दिए गए। बाकी सभी बच्चों को सांत्वना पुरस्कार दिए गए। बिजली न होने के कारण फिल्म का शो नहीं हो पाया।

सालिपुर  कार्यक्रम का आयोजन साइंस सेंटर में किया गया, जिसमे 12 बच्चों ने हिस्सा लिया। कई बच्चे प्रेमचंद के बारे में नहीं जानते थे। उन्‍हें प्रेमचंद के जीवन और रचनाकर्म के बारे में बताया गया। सद्गति फिल्म दिखाई गई।

मसूदा मसूदा ब्लॉक में दो जगह बाल विज्ञान खोजशाला मसूदा व बाल विज्ञानं खोजशाला नगर में कार्यक्रम का आयोजन हुआ। दोनों जगह कुल 62 (56 बच्चे, 5 अभिभावक व 1 अध्यापक) लोगों ने भागेदारी की। प्रेमचंद की तीन कहानियां पढ़ी गईं। उन पर चर्चा की गई व बच्चों ने चित्र बनाए। इसके अलावा दोनों ही जगह सद्गति फिल्म के शो हुए।

इलाहाबादयहाँ दो जगहों पर कार्यक्रम हुए। पहला कार्यक्रम श्रीमती लखपती देवी जूनियर हाई स्कूल बिरौली बेरुवा कौशाम्बी में हुआ। यहां कुल 127 लोगों ने भागीदारी की। दूसरा कार्यक्रम साइंस सेंटर पर हुआ, जिसमे कुल 27 लोगों की भागीदारी रही। मुंशी जी की कथा और उपन्यास के गँवई परिवेश से जुड़े पात्रों को 22 बच्चों ने अपनी  चित्रकारी से प्रदर्शित किया। इतना ही नहीं बच्चों ने प्रेमचंद की कहानी- ईदगाह, पूस की रात, घास वाली और बलि‍दान आदि कहानियां सुनाईं। इसके अलावा लोगों को सत्यजीत राय द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सद्गति एवं पूस की रात’ भी दिखाई गई।

रालेगांव कार्यक्रम का आयोजन ब्रह्मगुप्‍त साइंस सेंटर रालेगांव, बाल विज्ञान शोधिका डोंगरखरडा और बाल विज्ञान शोधिका हिंगनघाट तीन जगह किया गया। इनमें कुल 35 बच्चों की भागीदारी रही।  मुंशी प्रेमचंद के बारे में बच्चों को जानकारी दी गई जिस के आधार पर बच्चों ने चित्र बनाए।

सुविधा के द्वीप  :   प्रेमपाल शर्मा

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दो बजते ही स्कूल से छूटे बच्चों की चहचहाहट से मन ऐसे प्रसन्न हो उठता है, जैसे- शाम को घर लौटती चिड़ि‍यों का चहकते हुए, शोर करते झुंड को देखना। दोनों ही खुद भी खिलखिलाते हैं और दुनिया को भी। मैं बात कर रहा हूं, सोसाइटी के एकदम बगल में बने सरकारी स्कूल की। चिल्लागांव का स्कूल। लगभग तीन हजार बच्चे पॉश कॉलोनियों के बीचों बीच। लेकिन इसमें इन सोसाइटियों का एक भी बच्चा पढ़ने नहीं जाता। बीस वर्ष के इतिहास को भी टटोलें तो भी नहीं। प्राचार्य ने खुद बताया था- ‘बीस-तीस हजार की आबादी वाली सोसाइटियों का एक भी बच्चा, कभी भी इस सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ा।‘ असमानता के ऐेसे द्वीप हर शहर में बढ़ रहे हैं। उनके लिए अलग और आभिजात्य बेहद महंगे स्कूल हैं। इनमें कई स्कूल किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी या बिल्डर के हैं। दरअसल, ऐसे सभी निजी स्कूल ऐसे ही मालिकों के हैं। पुराने धंधों की बदौलत एक नया धंधा स्कूल का, जो अब पुराने सारे धंधों से ज्यादा चमकार लिए है।

खैर, मेरे अंदर सरकारी स्कूल से छूटे बच्चों की खिलखिलाहट हिलोरे ले रही है। पूरी सड़क भरी हुई। बच्चे-बच्चियों दोनों। पैदल चलता अद्भुत रेला। कुछ बस स्टैंड की तरफ बढ़ रहे हैं, तो कुछ चिल्लागांव की तरफ। जब से मेट्रो ट्रेन आई है, पास के अशोक नगर, नोएडा तक के बच्चे इस सरकारी स्कूल में लगातार बढ़ रहे हैं। जमुना के खादर में बसे यू.पी, बिहार के मजदूरों का एक मात्र सहारा भी है, यह सरकारी स्कूल। जिस स्कूल को यहां आसपास की संभ्रांत कॉलोनियों के बाशिंदे गंदा और बेकार मानते हैं, चिल्ला गांव, खादर के बच्चों के लिए इस स्कूल का प्रांगण बहुत महत्त्व रखता है। केवल स्कूल ही तो है, जहां वे खेल पाते हैं। चीजों की कीमत वे जानते हैं, जिन्हें मिली न हो। भूख हो या नींद या जीवन की दूसरी सुविधाएं। अभाव ही सौन्दर्य भरता है।

कभी-कभी इन हजारों बच्चों की खिलखिलाहट को नजदीक से सुनने का मन करता है। सरकारी स्कूल के न गेट पर एक भी कार, न स्कूटर। न स्कूली बस। और तो और नन्हें-मुन्ने बच्चों तक को लेने आने वाले भी नहीं। कौन आएगा? मां किसी अमीर के घर काम कर रही होगी और पिता कहीं मजदूरी कर रहे होगा। इन्हें उम्मीद भी नहीं। इन के पैरों ने चलना खुद सीखा है। इसके बरक्स तीन सौ मीटर के फासले पर ही एक निजी स्कूल है। उसे उसके अंग्रेजी नाम ए.एस.एन. से ही सभी जानते हैं, आदर्श शिक्षा निकेतन के नाम से नहीं। स्कूल प्रबंधन भी नहीं चाहता कि‍ हिन्दी नाम से पहचाने जाना। हिन्दी नाम से स्कूल का शेयर भाव नीचे आ जाएगा। फिर धंधा कैसे चमकेगा? बड़ी-बड़ी फीस, किताबों, ड्रेस, स्कूल बस के अलग पैसे और फिर रुतबा। इसी रुतबे का खामियाजा पड़ोस की सार्वजनिक सड़क को भुगतना पड़ता है। सुबह स्कल खुलते और बंद होते दोनों वक्त ए.एस.एन. की विशाल पीली-पीली बसें आड़ी-तिरछी प्रवेश करती, लौटती, गुर्राती, कंडक्‍टर के हाथों से पिटती-थपती, जो कोहराम मचाती हैं, उससे वहां के पॉश बाशिंदे अपने-अपने ड्राइंगरूम में बैठे कुढ़ते हैं, लेकिन चुप रहते हैं। कारण या तो उनके बच्‍चों पर इस स्‍कूल ने उपकार किया है अथवा निकट भविष्य में उन्हें दाखिले के लिए भीख मांगनी पड़ सकती है। इन अपार्टमेंटों में प्रसिद्ध पत्रकार, बुद्धिजीवी, लेखक और फिल्मकार भी हैं, जो अपने स्वार्थ और सुविधा के लिए किसी की भी र्इंट से र्इंट बजा देंगे। लेकिन इन स्कूलों की इतनी ऊंची फीस, शोर और शोषण के खिलाफ कभी मुंह नहीं खोल सकते। पड़ोस की सड़कें और फुटपाथ इन स्कूलों से त्रस्त हैं। किनारे बैठे सब्जी-ठेले वालों को भी स्कूल में होने वाले सत्संग के दिन भगा दिया जाता है! कोई है पूछने वाला कि स्‍कूल-मदरसों में सत्‍संग, कीर्तन का क्या काम?

जहां सरकारी स्कूल के गेट पर एक भी कार, स्कूटर नहीं था, इन निजी स्कूलों के गेट पर सैकडों कारें लगी होती हैं। यहां बच्चे कम, कारें ज्यादा दिख रही हैं। इसीलिए बच्चों की चहचहाट के बजाये कार के हार्न की आवाजें। दो बजे से पहले ही इनके अभिभावक अपनी बड़ी-बड़ी कारें ए.सी. चालू कर के ऐसे सटा कर लगाते हैं कि उनके चुन्नू मुन्नू और वयस्क बच्चे भी स्‍कूल के दरवाजे से निकलते ही उसमें आ कूदें। इन कार और बसों ने थोड़ी देर के लिए पूरी सड़क रोक दी है। केवल यहां नहीं पूरे शहर में। एक-एक बच्चे को कभी-कभी लेने वाले दो-दो। बावजूद इसके इन मोटे-मोटे बच्चों के चेहरों पर उदासी, थकान क्यों पसरी हुई है? सरकारी स्कूल के बच्चे इन्हीं कारों के बीच बचबचाकर रास्ता तलाशते गुजर रहे हैं और मुस्करा भी रहे हैं।  वाकई सड़क अमीरों की, स्कूल और देश भी। गरीबों का तो बस संविधान है, जिसकी प्रस्तावना में समाजवाद, समानता जैसे कुछ शब्द लिखे हुए हैं। पता नहीं यह सपना कब पूरा होगा!

फोटो : कमल जोशी

शहरयार से एक मुकम्मल मुलाक़ात : संजीव ठाकुर

Shahryar

ज्ञानपीठ पुरस्कार से पुरस्कृत उर्दू शायर शहरयार की प्रसिद्धि उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने से पहले से ही रही है । उनकी शायरी उर्दू से बाहर– विशेष रूप से हिन्दी के पाठकों के बीच अरसे से पढ़ी–सुनी जा रही है । हालांकि एक सच और है कि शहरयार की प्रसिद्धि में चार चाँद लगाने का काम उनकी उन ग़ज़लों ने किया है जो उन्होंने  फिल्मों– खासकर ‘उमराव जान’ के लिए लिखीं थीं । फिल्म का असर समाज पर ज्यादा व्यापक पड़ता है इसलिए शहरयार का नाम भी ज्यादा लोगों की जुबान पर चढ़ा । लेकिन  शहरयार नहीं चाहते थे कि उनकी पहचान फिल्मी गीतकार के रूप में बने । उन्हें ‘उमराव जान’ के गीतकार के रूप में स्वयं का परिचय देने में परेशानी भी होती थी । प्रेम कुमार को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है– “पहले इस इंटरोडकशन पर कि मैंने उमराव जान के लिए गाने लिखे हैं, मुझे उलझन होती थी। लेकिन अब मैंने इस उलझन पर काबू पा लिया है। कभी-कभी मुझे एहसास होता है कि मैं अपनी अदबी अहमियत की वजह से फिल्म में गया था- और अब अदब में फिल्म की वजह से वापस आ रहा हूँ।“ (पृ.69)

शहरयार साहब ने ऐसी अनगिनत बातें की हैं प्रेम कुमार को दिए साक्षात्कारों में! प्रेम कुमार ने उन साक्षात्कारों को ‘बातों-मुलाकातों में शहरयार’ नाम से संकलित कर दिया है। वैसे तो इस किताब में संकलित तीन लंबे साक्षात्कारों से शहरयार साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व की काफी बातें निकलकर सामने आती हैं, लेकिन सन 2011 के आठ महीनों की कई बैठकों में कभी किसी, तो कभी किसी मुद्दे पर शहरयार साहब से बात कर तिथिवार जो सामग्री प्रेम कुमार ने प्रस्तुत की है, उसमें शहरयार साहब के जीवन, उनके परिवेश, उनके घर-परिवार, उनके साहित्य आदि की अनेकानेक बातें कभी सायास तो कभी अनायास पाठकों के सामने आ गई हैं। साक्षात्कार करने की प्रेम कुमार की खासियत है कि बहुत कम पूछकर वह किसी से बहुत अधिक कहलवा लेते हैं। प्रेम कुमार की यह खासियत इस किताब में भी बखूवी दिखाई दे जाती है। बहुत ही शालीनता से प्रेम कुमार वैसे सवाल भी पूछ डालते हैं, जिन्हें पूछने में आम-तौर पर किसी को झिझक हो सकती है। मसलन सेक्स, स्त्री-पुरुष संबंध, समलैंगिकता, विवाहेतर संबंध आदि से जुड़े सवाल! जवाब देने वाले शायर शहरयार की ईमानदारी की बात भी कबूल करनी पड़ेगी कि उन्होंने पूरी ईमानदारी से सवालों के जवाब दिए हैं। अपने बारे में कही उनकी यह बात काबिले गौर है- “सेक्स की जानकारी मुझे बहुत कम उम्र में हो गई थी। ये मेरी बहुत कमजोरी रही। मैं बहुत इमेजिनेटिव था। जिस्म मुझे अट्रेक्ट करता रहा। अच्छी ज़िंदगी गुजारने का बहुत शौक रहा। यही कि अच्छा खाना, अच्छा पहनना, ताश खेलना…! शराब पीना बहुत जल्दी शुरू कर दिया था।“ (पृ.36)

इसी तरह अपनी पत्नी से अलगाव की बात भी वह बड़े आराम से कह जाते हैं। (पृ.75) पत्नी पर बिना किसी दोषारोपण के जिस तरह वह इस हकीकत का बयान करते हैं, वह उनके बड़प्पन का एहसास कराए बिना नहीं रहता। प्रेम कुमार तो उनसे दूसरी शादी के बारे में भी सवाल पूछने से नहीं चूकते! इसके जवाब में वह अपना ही शेर प्रेम कुमार को सुना देते हैं- “बुझने के बाद जलना गवारा नहीं किया/हमने कोई भी काम दोबारा नहीं किया।“

इस किताब को पढ़कर शहरयार साहब के बचपन, घर-परिवार, पिता, बच्चे, मित्र आदि के बारे में पता चलता ही है, धर्म, ईश्वर, आम-आदमी, स्त्री-पुरुष संबंध, स्त्री आरक्षण बिल, विश्वविद्यालय, समकालीन साहित्यकारों, हिन्दी के साहित्यकारों आदि के बारे में भी उनके विचारों का पता चल जाता है। मंचों पर शायरी कम पढ़ने के बारे में भी उनका एक खास तर्क था। मंच पर पापुलर शायरी पढ़ने को वह अच्छा नहीं मानते थे- “बहुत पापुलर करना वल्गराइज़ करना भी हो जाता है बहुत बार!” (पृ.26)

शहरयार साहब ने गज़लों से ज्यादा नज़्मो को अपनी शायरी में महत्त्व दिया था, लेकिन लोग उन्हें गज़लकार ही ज्यादा मानते थे। इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा था- “आमतौर से जब मेरी शायरी पर बात की जाती है तो आम लोग गज़ल को ही सामने रखते हैं… जबकि मैंने नज़्में गज़लों से ज्यादा लिखी हैं और नयी उर्दू शायरी के सिलसिले में मेरा ज़िक्र मेरी नज़्मों के हवालों से ज्यादा किया जाता है।“ (पृ.64)

और जब प्रेम कुमार शहरयार साहब से उनके ‘साहित्यिक प्रदेय’ के बारे में पूछते हैं तो वह बड़ी विनम्रता से कहते हैं- “हिन्दोस्तान और दुनिया में इतने बड़े-बड़े लोग…. कारनामे करने वाले लोग पैदा हुए हैं…। उस पर… हम अपनी ढपली बजाते रहें…। हमारी क्या विसात… समंदर में कतरा! ऊपर से देखिए…. नुक्ता-नुक्ता नज़र आता है आदमी! नीचे से आप देखते रहें…आईना सामने रखकर खुद को देखते हैं और बड़ा समझते हैं। मगर सच तो यह है…जैसा यगाना चंगेजी का एक शेर है….

‘बुलंद हो तो खुले तुझपे राज़ पस्ती का
इस ज़मीन में दरिया समाए हैं क्या-क्या!’

इस किताब में एक लंबा साक्षात्कार पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज पर भी है। इस साक्षात्कार में फैज के बार में शहरयार साहब ने कई महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं। एक प्रस्तुत है-“हाँ, हाँ, मेरी उनसे बारहा मुलाक़ात हुईं। बहुत ही निजी तरह की महफिलें। उन मुलाकातों में कभी हिंदुस्तान-पाकिस्तान की समस्याओं या रिश्तों वगैरह पर बातें नहीं हुआ करती थीं। वो यहाँ या वहाँ के मसायलों के बारे में कभी गुफ्तगू नहीं किया करते थे। वो कहते थे कि हम तो भाई मुहब्बत के सफ़ीर हैं। और इसके अलावा कुछ सोचते नहीं। उनकी पूरी शायरी में भी कोई ऐसी फीलिंग नहीं है जिसमें नफरत, जंग की हिमायत, दूरी फैलाने या फासला पैदा करने वाला कुछ हो। ऐसा कुछ दूर-दूर तक वहाँ नहीं है।“ (पृ.81)

इस किताब की एक और खासियत है कि इसमें प्रेम कुमार ने शहरयार साहब की चुनी हुई शायरी भी पेश कर दी है। इससे यह किताब शहरयार साहब की शायरी से अनजान पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी बन गई है। शहरयार साहब के व्यक्तित्व, उनके जीवन, उनके विचार वगैरह के साथ-साथ उनकी शायरी को पढ़कर पाठक शहरयार साहब से एक मुकम्मल मुलाक़ात इस किताब के जरिये कर सकते हैं। शहरयार साहब के ज्ञानपीठ मिलने के बाद उनसे हुई मुलाक़ात और उनकी मृत्यु के बाद का विवरण भी प्रेम कुमार ने इस किताब में प्रस्तुत कर दिया होता तो यह किताब शहरयार साहब की और मुकम्मल तस्वीर पेश करने में कामयाब होती !

पुस्तक : बातों–मुलाकातों में शहरयार
साक्षात्कारकर्ता : प्रेम कुमार
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, नई दिल्ल
मूल्य : 395 रुपये            

प्रेमचंद और बच्चे

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्र

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर जगह-जगह कार्यक्रम हुए और उनमें आम लोगों खासकर बच्‍चों की जो भागेदारी रही, वह सुखद संकेत है। जरूरत इसी बात की है कि‍ हम अपने लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानि‍कों, चिंतकों और अन्‍य महापुरुषों के माध्‍यम से लोगों से जुड़ें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो तब का समाज, आज से बेहतर ही होगा।

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजि‍त दो कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर लेखक मंच प्रकाशन को भी मि‍ला। 31 जुलाई को वसुंधरा, गाजि‍याबाद स्थि‍त जनसत्ता अपार्टमेंट में जन संस्कृति मंच की ओर से मशाल-ए-प्रेमचंद का आयोजन किया गया। इसमें प्रेमचंद के साहि‍त्‍य और जीवन पर वि‍शेष प्रस्‍तुति‍ हुई। इसके साथ ही प्रेमचंद के सपनों का भारत विषय पर परिचर्चा हुई, प्रेमचंद की कथा पर एक नाट्य प्रस्तुति, मशहूर रंगमंडली ‘संगवारी’  ने जनगीत गाए, सत्यजित राय की फ़िल्म ‘सद्गति’ का प्रदर्शन हुआ और एक छोटा-सा पुस्तक मेला भी लगा। इसमें लेखक मंच प्रकाशन की ओर से भी स्‍टाल लगाया गया। कि‍ताबें देखने और खरीदने में बच्‍चों और बड़ों ने रुचि‍ दि‍खाई।

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

बुक स्टाेल पर कि‍ताब पढ़ती परी

कि‍ताबों को उलटते-पलटते करीब पांच वर्ष की परी ने चहकते हुए कहा कि‍ आपकी कि‍ताबें तो बहुत अच्‍छी हैं। कुछ क्षण बाद फि‍र बोली- क्‍या में क्या कि‍ताब पढ़ सकती हूं। हमने उसे कुर्सी दे दी। वह कुर्सी पर बैठकर कि‍ताबों के पन्‍ने पलटने लगी। उसकी सहेली तरु ने भी कहा- अंकल, मैं भी कि‍ताब पढ़ सकती हूं। फि‍र दोनों सहेलि‍यां कि‍ताबों के पन्‍ने पलटते रहीं।

इस अवसर पर प्रेमचंद की कहानि‍यों पर आधारि‍त बच्चों के बनाए चित्रों‍ की प्रदर्शनी तो इस आयोजन की एक खास उपलब्‍धि‍ रही। इससे बच्‍चों की कलात्मकता तो सामने आई ही, इस बहाने उनका प्रेमचंद साहि‍त्‍य से भी परि‍चय हुआ।

शाइनिंग स्टार में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

शाइनिंग स्टा्र स्कूल में कार्यक्रम का आनंद लेते बच्चे

2 अगस्त को शाइनिंग स्टार स्कूल, रामनगर में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। वहां भी बच्‍चों के बीच जाने के अवसर मि‍ला। बच्‍चों ने प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन कि‍या। बहुत से बच्‍चों ने प्रेमंचद की कहानि‍यां सुनाईं और उनके जीवन और साहि‍त्‍य के बारे में अपने वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ए। दो छात्रों  ने तो प्रेमचंद की दो कहानि‍यों को गढ़वाली और कुमांउनी में रूपांतरि‍त कर सुनाया। स्‍कूल के नि‍देशक डीएस नेगी जी ने बताया कि‍ बच्‍चों ने यह सारी तैयारी तीन-चार दि‍न में ही की है। जि‍न छात्रों  ने गढ़वाली और कुमाउनी में रूपांतरण कि‍या है, उन्‍हें आधे घंटे पहले ही कहानि‍यां दी गई थीं। उन्‍होंने एक बार कहानी को पढ़ा और फि‍र बि‍ना देखे, बि‍ना कि‍सी रूकावट या घबराहट के पूरी कहानी सुना दी।

यहां लगाए गए बुक स्टाल में भी बच्चों ने अपने लि‍ए कि‍ताबें पसंद कीं।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, उत्तराखंड में 31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती समारोह हुआ। यहां हम तो नहीं जा पाए, लेकि‍न यहां की रि‍पोर्ट भी उत्‍साहजनक है।

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

डॉ डीडी पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला में कार्यक्रम प्रस्तुत करते बच्चे

प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 10 से ज्यादा विद्यालयों के करीब 125 बच्चों ने पूरे जोशोखरोश से विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 68 बच्चों द्वारा प्रेमचंद की कहानियों पर बनाए गए चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। दो कहानियों- ‘दो बहनें’ और ‘राष्ट्र का सेवक’ का मंचन किया गया। छह बच्चों ने कहानियों का पाठ किया। मगर सबसे प्रभावशाली था रा.बा.इ.का. बेरीनाग की कक्षा 6 की छात्रा भावना द्वारा ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी का स्वअनूदित कुमांउनी पाठ। इन सब के अलावा कई शिक्षकों ने भी बच्चों का उत्साहवर्धन किया।समारोह का समापन कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित रे निर्देशित फिल्म से किया गया।

साथि‍यो, जन संस्कृति मंच की ओर से प्रेमचंद  जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित कार्यक्रम के बारे में गौरव सक्सेनाजी ने सुखद जानकारी भेजी है—

prem chand

31 जुलाई को प्रेमचंद जयंती पर जनसत्ता अपार्टमेंट, वसुंधरा में आयोजित ‘मशाल-ए-प्रेमचन्द’ कार्यक्रम में कोठारी इंटरनेशनल स्कूल, नॉएडा ने भी भागीदारी की। इस कार्यक्रम के तहत विद्यालय में बच्चों को प्रेमचंद की कहानियां सुनाई गईं। बच्चों को कहानी के आधार पर पोस्टर बनाने के लिए प्रेरित किया गया। इस कार्यक्रम में हिंदी विभाग की अध्यापिकाओं (श्रीमती गीता शर्मा, श्रीमती रश्मि सिन्हा,  श्रीमती पंकजा जोशी) ने पूरे उत्साह से साथ भागीदारी की। हफ्तेभर चले इस कार्यक्रम के अंत में मन को हर लेने वाले तीस पोस्टर मिले। सबसे ज्यादा पोस्टर ईदगाह और नन्हा दोस्त पर बनाए गए। पंच परमेश्वर पर भी  बेहद सुन्दर पोस्टर बनाए गए। बच्चों को प्रेमचन्द तक और प्रेमचन्द को बच्चों तक लाने की इस अनूठी पहल का हिस्सा बनना बच्चों और विद्यालय के लि‍ए सुखद अनुभव रहा।

विद्यालय प्रबंधन द्वारा इस पहल को सराहा गया और भविष्य में इस तरह के आयोजन करते रहने व भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। विद्यालय की ओर से गौरव सक्सेना इस कार्यक्रम का हिस्सा बने। अगले वर्ष प्रेमचन्द जयंती को विद्यालय में हर्षोउल्लास के साथ मानाने का प्रण किया गया।

खेल : प्रेमचंद

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तीसरा पहर हो गया था। किसान अपने खेतों में पहुँच चुके थे। दरख्तों के साये झुक चले थे। ईख के हरे-भरे खेतों में जगह-जगह सारस आ बैठे थे। फिर भी धूप तेज थी और हवा गरम। बच्चे अभी तक लू के खौफ से घरों से न निकलने पाए थे कि यकायक एक झोंपड़े का दरवाजा खुला और एक चार-पाँच साल के लड़के ने दरवाजे से झाँका। झोंपड़े के सामने नीम के साये में एक बुढिय़ा बैठी अपनी कमजोर आँखों पर जोर डाल-डालकर एक टोकरी बुन रही थी। बच्चे को देखते ही उसने पुकारा, ”कहाँ जाते हो,  फुन्दन? जाकर अन्दर सोओ, धूप बहुत कड़ी है। अभी तो सब लड़के सो रहे हैं।”

फुन्दन ने ठनककर कहा, ”अम्मा तो खेत गोडऩे गईं। मुझे अकेले घर में डर लगता हैं।”

बुढिय़ा गाँव भर के बच्चों की दादी थी, जिसका काम बच्चों की आजादी में बाधक बनना था। गढिय़ा के किनारे अमियाँ गिरी हुई थीं, लेकिन कोई बच्चा उधर नहीं जा सकता, गढिय़ा में गिर पड़ेगा। बेरों का दरख्त लाल और पीले बेरों से लदा हुआ हैं। कोई लड़का उस पर चढ़ नहीं सकता, फिसल पड़ेगा। तालाब में कितना साफ पानी भरा हुआ है, मछलियाँ उसमें फुदक रही हैं, कमल खिले हुए हैं, पर कोई लड़का तालाब के किनारे नहीं जा सकता, डूब जाएगा। इसलिए बच्चे उसकी सूरत से विमुख अप्रसन्न थे। उसकी आँखें बचाकर सरक जाने की युक्तियाँ सोचा करते थे। मगर बुढिय़ा अपने अस्सी वर्ष के तजुर्बे से उनकी हर एक हरकत को ताड़ जाती थी और कोई-न-कोई उपाय कर ही लेती थी।

बुढिय़ा ने डाँटा, ”मैं तो बैठी हूँ। डर किस बात का है? जा सो रह, नहीं तो उठती हूँ।”

लड़के ने दरवाजे के बाहर जाकर कहा, ”अब तो निकलने की बेला हो गई।”

”अभी से निकल के कहाँ जाओगे? ”

”कहीं नहीं जाता हूँ, दादी।”

वह दस कदम और आगे बढ़ा। दादी ने टोकरी और सूजा रख दिया और उठना ही चाहती थी कि फुन्दन ने छलाँग मारी और फिर सौ गज के फासले पर था। बुढिय़ा ने अब सख्ती से काम न चलते देखकर नरमी से पुकारा, ”अभी कहीं मत जा बेटा।”

फुन्दन ने वहीं खड़े-खड़े कहा, ”जतीन को देखने जाते हैं।” और भागता हुआ गाँव के बाहर निकल गया।

जतीन एक खोमचेवाले का नाम था। इधर कुछ दिनों से उसने गाँव का चक्कर लगाना शुरू किया था। हर रोज शाम को जरूर आ जाता। गाँव में पैसों की जगह अनाज मिल जाता था और अनाज असल कीमत से कुछ ज्यादा होता था। किसानों का अंदाज हमेशा दानशीलता की ओर उन्मुख होता है। इसीलिए जतीन करीब के कस्बे से तीन-चार मील का फासला तय करके आता था। उसके खोंमचे में मीठे ओर नमकीन सेव, तिल या रामदाने के लडडू, कुछ बताशे और खुटिटयाँ, कुछ पट्टी होती थीं। उस पर एक मैला-सा फटा-पुराना कपड़ा होता था, मगर गाँव के बच्चों के लिए वह अच्छी-अच्छी खाने की चीजों से भरा थाल था, जिसे खड़े होकर देखने के लिए सारे बच्चे बेताब रहते थे। इनकी बालोचित प्रसन्नता, तत्परता में यह एक दिलचस्पं इजाफा हो गया था । सब-के-सब तीसरे पहर ही से जतीन का इंतजार करने लगने लगते थे हालाँकि ऐसे खुशनसीब लड़के कम थे, जिन्हें इससे कोई लाभ पहुँचता हो। मगर खोंमचे के निकट जमा होकर थाल पर ढके कपड़े को आहिस्ता से उठते और उन नेमतों की रानियों की तरह अपनी-अपनी जगह संकोच से बैठे देखना स्वयं में बेहद खुशनुमा था। हालाँकि जतीन का आना हर एक घर में कुहराम मचा देता था। और आध घंटे सारे गाँव में हंगामा-सा उपस्थित हो जाता था, मगर बच्चे इसका स्वागत करने को अधीर रहते थे। यह जानते हुए भी कि जतीन का आगमन उनके लिए हँसी का नहीं, रोने का मैाका है। सब-के-सब बड़ी बेसब्री से उसके इंतजार में रहते थे, क्योंकि मिठाइयों के दर्शन से चाहे जबान संतुष्ट न हो, पर मन की तसल्ली जरूर होती थी। फुन्दन भी इन्हीं गरीब लड़कों में था। और लड़के मिठाइयाँ खाते थे, वह सिर्फ भूखी निगाहों से देखता था। रोने और रुठने, बालसुलभ मिन्नत और खुशामद, एक से भी उसकी उद्देश्य-पूर्ति न होती थी, गोया नाकामी ही उसकी तकदीर में लिखी हो। मगर इन नाकामियों के बावजूद उसका हौसला पस्त न होता था।

आज फुन्दन दोपहर को न सोया। जतीन ने आज कच्ची गरी और इमरतियाँ लाने का जिक्र किया था। यह खबर लड़कों की उस दुनिया में किसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना से कम न थी। सुबह से ही जतीन की तरफ मन लगा हुआ था। फिर ऐसी आँखों मे नींद कहाँ से आती?

फुन्दन ने बाग में पहुँचकर सोचा- क्या अभी सबेरा हैं? इस वक्त तो जतीन आ जाता था, मगर नहीं, अभी सबेर है। चून्नू, सोहन और कल्लू एक भी तो नहीं उठे। जतीन सड़क पर पहुँच गया होगा। इमरतियाँ जरूर लाएगा, लाल और चिकनी होंगी। एक बार न जान कब… ‘हाँ’, दशहरे के मेले में एक इमरती खाई थी। कितनी मजेदार थी! उस जायके को याद करके उसके मुँह में पानी भर आया। लालसा और भी तेज हो गई। वह बाग के आगे निकल गया। अब सड़क तक समतल मैदान था, लेकिन जतीन का कहीं पता न था।

कुछ देर तक फुन्दन गाँव के निकास पर खड़ा जतीन की राह देखता रहा। उसके दिल में एक गुदगुदी उठी- आज मैं सबसे पहले जतीन को पुकारूँगा। मैं जतीन के साथ-साथ गाँव में पहुंचूंगा। तब लोग कितना चकराएँगे। इस ख्याल ने उसकी बेसब्री में और इजाफा कर दिया। वह तालियाँ बजा-बजाकर दिल-ही-दिल में चहकता हुआ सड़क की ओर चला।

संयोग से उसी वक्त गेंदा आ गया। यह गाँव का पंचायती कुत्ता था, चौकीदार का चौकीदार, खिलौने का खिलौना। नित्य नियमानुसार तीसरे पहर का गश्त लगाने निकला था। इसी वक्त साँड और बैल खेतों में घुसते थे। यहाँ पहुँचा तो फुन्दन को देखकर रुक गया और दुम हिलाकर गोया पूछा- तुम आज यहाँ क्यों आए? फुन्दन ने उसके सिर पर थपकियाँ दीं, मगर गेंदा को ज्यादा बातचीत करने की फुरसत न थी। वह आगे बढ़ा तो फुन्दन भी उसके पीछे दौड़ा। अब उसके दिल में एक ताजा उमंग पैदा हा रही थी। वह अकेला न था। उसका दोस्त भी साथ था। वह अब कच्ची सड़क पर जतीन का स्वागत करना चाहता था। सड़क पर पहुँचकर उसने दूर तक निगाह दौड़ाई। जतीन का कहीं नामोनिशान तक नहीं था। कई बार उसे भ्रम हुआ, वहाँ जतीन आ रहा है, मगर एक लम्हें में उसका भ्रम टूट गया। सड़क पर दर्शनीय दिलचस्प चीजों की कमी न थी। बैलगाडिय़ों की कतारें थीं। कभी-कभी एक्के और पैर-गाडिय़ाँ भी निकल जाती थीं। एक बार एक ऊँट भी नजर आया, जिसके पीछे वह कई सौ कदम तालियाँ बजाता गया, मगर इन दिलचस्पियों में वह लालसा किसी मीनार की तरह खड़ी थी।

सड़क के किनारे आमने-सामने दो दरख्त खड़े थे। उनमें आम के दरख्त भी थे। इस लालसा में उसे आमों पर निशाना मारने का एक दिलचस्प खेल हाथ आया, मगर आँखें जतीन के लिए ठीक रास्ते पर लगी थीं। यह बात क्या है, आज वह आ क्यों नहीं रहा है?

धीरे-धीरे साया लम्बा होता गया। धूप किसी थके हुए मुसाफिर की तरह पाँव फैलाकर सोती हुई मालूम हुई। अब तक जतीन के आने की उम्मीद रही। उम्मीद में वक्त चला जाता था। मायूसी में वह गोया घुटने तोड़कर बैठ गया। फुन्दन की आँखों से निराशा के आँसू बहने लगे। हिचकियाँ बँध गईं। जतीन कितना बेरहम है! रोज आप ही दौड़ा आता था। आज जब मैं दौड़ा आया तो घर बैठ रहा। कल आएगा तो गाँव में घुसने न दूँगा। उसकी बालोचित आरजुएँ अपने सारे उत्साह के साथ उसके दिल को मथने लगीं।

सहसा उसे जमीन पर एक टूटा हुआ झब्बा नजर आया। इस निराशा और असफलता के आलम में बचपन की नैसर्गिक निश्चिंतता ने दु:ख दूर करने का सामान पैदा कर दिया। कुछ पत्तियाँ चुनकर झब्बे में बिछाईं। उसमें कुछ बजरियाँ और कंकड़ चुनकर रखे। अपना कुरता उतारकर उसको ढाँका और उसे सिर पर रखकर गाँव की और चला। अब वह जतीन को ढूँढऩे वाला लड़का न था, खुद जतीन था। वही अच्छी-अच्छी खाने की चीजों से भरा थाल सिर पर रखे उसी तरह अर्थहीन आवाज लगाता हुआ, रफ्तार भी वही, बात करने का ढंग भी वही। जतीन के आगे-आगे चलकर क्या उसे वह खुशी हो सकती थी, जो इस वक्त जतीन बनकर हो रही थी, वह हवा में उड़ा जा रहा था- मृगतृष्णा में हकीकत का मजा लेता हुआ, नकल में असल की सूरत देखता हुआ। खुशी के कारण से किस कदर निस्पृह है। इसकी चाल कितनी मस्तानी थी। गुरूर से उसका सिर कितना उठा हुआ था!

यथार्थत: उसके बालोचित चेहरे पर ऐसी स्वाभाविकता थी कि क्या मजाल कि जरा भी हँसी आ जाए। इस शान से वह गाँव में दाखिल हुआ। लड़कों ने उसकी आवाज सुनी, ”रेबड़ी कड़ाकेदार!” और सब-के-सब दौड़े आन-की-आन में। फुन्दन उत्सुक सूरतों से घिरा हुआ है, उसी तरह जैसे जतीन घिर जाया करता था। किसी ने न पूछा, ‘यह क्या स्वाँग हैं?’ दिल ने दिल की बात समझी। मिठाइयों की खरीद होने लगी। ठीकरों के पैसे थे, कंकड़ और बजरियों की मिठाई। इस खेल में लुत्फ कहीं ज्यादा था। भौतिकता में आध्यात्मिकता का अंदाज कहाँ, मुसर्रत कहाँ, उडऩे का अनुभव कहाँ!

मुन्नू ने एक ठीकरा देकर कहा, ”जतीन, एक पैसे की खुट्टियाँ दे दो।”

जतीन ने एक पत्ते में तीन-चार कंकड़ रखकर दे दिए।

खुट्टियों में इतनी मिठास, इतना स्वाद कब हासिल हुआ था!

(लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त पुस्तक ‘प्रेमचंद : बच्चों की कहानि‍यां’ से साभार)

जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढ़ा : ओमा शर्मा

ओमा शर्मा

ओमा शर्मा

इसे एक पहेली ही माना जाना चाहिए कि स्मृति पर इधर पड़ते उत्तरोत्तर निर्मम प्रहारों के चलते जब सुबह तय की गई कोई जरूरी बात शाम तक मलिन और पस्त हालत में बच जाने पर राहत और हैरानी देने लगी है तब, प्रेमचन्द की ‘ईदगाह’ कहानी के तन्तु 34-35 वर्ष बाद कैसे जेहन में बचे पड़े रह गए हैं? कक्षा सात या आठ की बात रही होगी। कोर्स में ‘ईदगाह’ थी। तब हमें न तो कविता, कहानी से कोई वास्ता होता था न उसके लेखक से। खेती-क्यारी करने के बीच पढ़ाई ऐसा जरूरी व्यवधान थी, जिसमें खेती-क्यारी से मुक्ति की संभावनाएं छिपी थीं। परीक्षा में ज्यादा नहीं, ठीक-ठाक नम्बर मिल जाएं। बाकी लेखक या उसके सरोकारों से किसी को क्या वास्ता? होते होंगे किसी परलोक के जीव, जो पहले तो लिखते हैं और फिर अपने लिखे से दूसरों पर बोझ चढ़ाते हैं। पता नहीं किस परम्परा के तहत लेखक की लघु जीवनी सी रटनी होती थी… आपका जन्म सन अलाँ-फलाँ को अलाने प्रदेश के फलाने गाँव में हुआ, आपकी शिक्षा बीए-सीए तक हुई, आपकी प्रमुख कृतियों के नाम हैं… आपकी रचनाओं में तत्कालीन समाज की झांकी प्रस्तुत होती है। सन इतने में आपका निधन हो गया…।

सारी विद्या चौखटेबद्ध और रटंत।

इसी सब के बीच जब प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ पढ़ी तो पहली बार ऐसा आनन्द प्राप्त हुआ जो पढ़ाई से सरासर अनपेक्षित था। नाम और परिवेश ही तो कुछ अलग थे वर्ना सब कुछ कितना अपना-अपना सा था। हिन्दू बहुल हमारे गाँव में मुस्लिम परिवार चार-छह ही थे, मगर दूसरे भूमिहीनों की तरह पूरी तरह श्रम पर आश्रित और इतर समाज में घुले-मिले। विनय और शील की प्रतिमूर्ति। लिबास और चेहरे-मोहरे से थोड़ा मुसलमान होने का शक पनपे अन्यथा जुबान में भी वैसा जायका नहीं था। गाँव में मस्जिद नहीं थी इसलिए ईद के रोज तीन कोस दूर बसे कस्बे ‘पहासू’ जाना पड़ता था। उसके सिमाने पर अजल से तैनात एक भव्य, भक्क सफेद मस्जिद गाँव से ही दिखती थी। इसी के बरक्स तो लगा कि ईदगाह हमारे गाँव के, हमारे साथ खेलते-कूदते अकबर, वजीरा, बशीरा या अहमद खाँ की कहानी है। यूँ हमारे गाँव में बृहस्पतिवार के दिन साप्ताहिक हाट लगती थी, जिसमें हम बच्चों को पड़ाके (गोल-गप्पे), चाट-पकौड़ों के साथ प्लास्टिक के खिलौने देखने-परखने को मिल जाते थे, मगर कस्बे के लाव-लश्कर, तड़क-भड़क और भीड-भड़क्के के मुकाबले वह सब नितान्त फीका और दोयम था। एक अकिंचन परिवार के प्रसंग से शुरू होकर ‘ईदगाह’ उसी कस्बे की रंगत में गो उंगली पकड़कर हामिद के साथ मुझे सैर कराने ले गई… रास्ते में आम और लीचियों के पेड़, यह अदालत है, यह कॉलेज, हलवाइयों की दुकानें, पुलिस लाइन… हरेक का स्पर्शरेखिक संदर्भ देकर कहानी अपने उदात्‍त मकाम की तरफ इस सहजता से आगे बढ़ती है मानों उसे अपने पाठकों पर पूरा यकीन हो कि उसके संदर्भों को वे अपनी तरह से जज्ब करने को स्वतंत्र रहेंगे। कुछ हद तक कहें तो यहाँ बात ईद या ईदगाह की नहीं है; वह तो जैसे एक माध्यम है, ग्रामीण कस्बाई समाज के संदर्भों को उकेरते हुए एक मूलभूत मानवीय रचना को पैबस्त करने का। ईद यानी उत्सव।

कोई तीज-त्योहार निम्न-मध्य वर्गीय समाज में कितनी उत्सवधर्मिता के साथ प्रवेश करता है, उसकी कितनी बाह्य और आन्तरिक छटाएं होती हैं, यह हम कहानी पढ़ते हुए लगातार महसूस करते रहे। ‘सालभर का त्योहार है’ जैसे जुमले-फलसफे की अहमियत अन्यत्र नहीं समझी जा सकती है। उसी के साथ अमीना का मन जब बेसबब आ धमकी ‘निगोड़ी ईद’ से ‘मांगे के भरोसे’ के साथ दो-चार होता है तो वह सारा परिवेश अपनी उसी शालीन क्रूरता के साथ पेश हो उठता है, जिससे हमारा गाँव-समाज किसी महामारी की तरह आज भी पीड़ित है। आज की स्थितियों के उलट उस कैश-स्टार्व्ड दौर में मेरा मन हामिद के साथ एकमएक होते हुए उन तमाम बाल-सुलभ लालसाओं और प्रतिबंधित आकर्षणों से मुक्त नहीं हो पाता था, जिसके संदर्भों के विपर्यास के बतौर कहानी आकार लेती है। आपातकाल से जरा पहले के उस वक्त में एक या डेढ़ रुपये (जो पचास वर्ष पूर्व हामिद के तीन पैसे ही बनते) के सहारे पूरे बाजार का सर्वश्रेष्ठ निगल डालने की हसरत कितने असमंजसों और ग्लानियों का झूला-नट बनती होती थी, उसे याद करके आज हंसी और कंपकंपी एक साथ छूटती है। दस पैसा के तो खांगो पड़ाके, पच्चीस पैसा में मिलंगी दो केला की गैर (‘गैर’ आज कौन कहता है ?) पचास पैसे को कलाकन्द, पच्चीस पैसा की गुब्बारे वाली पीपनी, गाँव में हिंडोला कहां आवे है सो एक चड्डू तो… और एक चिलकने का चश्मा।

ठहरो ठहरो मियां, बजट बिगड़ रहा है।
क्या करूं, किसे छोड़ूं ?
चलो, केला केन्सिल।
नहीं, नहीं एक तो ले लूं।

मगर वह नामुराद एक केला के पंद्रह पैसे ऐंठता है। साढ़े बारह बनते हैं, भाई तू तेरह ले ले। खैर कोई बात नहीं, अपन के पास कभी ढेर सारे पैसे हुए न तो दोनों टैम केले ही खाया करूंगा। तंगहाली में ये जुबान मरी कितनी चुगली करती है। रेवड़ी भी चाहिए, गुलाब-जामुन और सोहन हलवा भी। बाल-मन के कितने भीतर तक घुसा है, यह तिकौनी मूंछों वाला लेखक। हामिद से चिमटा जरूर खरीदवा लिया है, मगर इतने सजे-धजे बाजार में लार तो उसकी जरूर टपकी होगी। लिखा ही तो नहीं है बाकी जो पंक्तियों के बीच से झांक रहा है, वह कुछ कम बयान कर रहा है।

कक्षा में जब कहानी खत्म हुई तो मास्साब ने पूछा – कहानी का शीर्षक ‘ईदगाह’ क्यों है ? ये क्या बात हुई मास्साब। लेखक को यही शीर्षक अच्छा लगा इसलिए। नहीं। यह ईदगाह में आकर ईद मनाते लोगों के बारे में है, इसलिए। नहीं, यह हमारे भीतर ईदगाह सी पाक और मजबूत भावनाओं के बारे में है, जो तमाम अकिंचन और विषम परिस्थितियों के बीचोंबीच रहकर भी अपना वजूद नहीं खोने देती है। कभी मरती नहीं है, हारती नहीं है। यही हैं प्रेमचंद। अमीचन्द- मास्साब बिल्कुल सही कह रहे हैं सतपाल। अरे सतपाल, एक बात कहूँ। ये जो लेखक है ना प्रेमचंद, इनकी शक्ल गाँव के हमारे बाबूलाल ताऊ से एकदम मिलती है। कसम से।

किताबों की दुनिया में जीवन के अक्स निहारती उस कच्ची उम्र में बाबूलाल ताऊ की भूमिका अपनी जगह बनाती जा रही थी। हमारे जीते जी मानो सदियों से वे एकसा, खरहरा जीवन और जीवनचर्या पहने चले आ रहे थे… कमर में कमान सा झुकाव, बिवाइयाँ जड़े चपटे निष्ठुर पैर, खिचड़ी बेगरी दाढ़ी और चलते समय बाजुओं का बैक-लॉक। बोली में हतकाय-हतकाय यानी इसलिए के आदतन बेशुमार प्रयोग के बावजूद बाबा आदम के समय से चले आ रहे उनके किस्सों में हमें भरपूर कथारस और रोमांच मिल जाया करता था।

एक रोज उन्होंने हीरा-मोती नाम के दो बैलों की कथा छेड़ दी… कि कैसे वे मन-ही-मन एक-दूसरे की बात समझ जाते थे, अपने मालिक (झूरी) से कितना प्यार करते थे, कैसे उन्होंने किसी दूसरे (गया) के घर पानी-सानी ग्रहण करने से इन्कार कर दिया, कैसे एक बिजार (सांड) के साथ संगठित होकर लड़े, कैसे सींग मार-मारकर मवेशी खाने की दीवार में छेद करके छोटे जानवारों को मुक्ति दिलाई और कैसे वे वापस अपने ठीये पर लौट आए। रवायती अन्दाज के बावजूद लगा कि ताऊ ने इस बार कुछ अलग और ज्यादा अपनी-सी कहानी सुनाई है। फितरत मासूमियत और तेवर के स्तर पर यह कहानी दो बैलों की है या दो बच्चों की ? या अभावों-पराभवों के बीच उम्र गुजारते उन तमाम निरीह असंख्यों की जिन्हें नियति और मूल्यों पर भरोसा है, मगर जिनका वजूद हीरा-मोती जैसे बेजुबानों सा है। जिन्दगी जिन्हें दर रोज के हिसाब से दुलत्ती जड़ती है और जिसे किस्मत का लेखा समझकर वे कबूल करते चलते हैं। यह निराशावादी नहीं, जीवन को उसके नग्न यथास्वरूप में स्वीकार करने का फलसफा है। ‘पड़ने दो मार, बैल का जन्म लिया है तो मार से कहां तक बचेंगे’ यह मानो हीरा नहीं मास्टर हीरालाल कह रहे हैं, जो विवाह के सात वर्ष बाद विधुर हो गए और कुछ वर्ष बाद जब दूसरा विवाह किया तो पहले विवाह से उत्पन्न बड़ा लड़का घर छोड़कर भाग गया। मालकिन की लड़की से उन्हें हमदर्दी है कि कहीं खूंटे से भगा देने के इल्जाम में सौतेली माँ से न पिटे। लड़ाई में जब सांड बेदम होकर गिर पड़ा तो मोती उसे और मारना चाहता है मगर हीरा की बात कि ‘गिरे हुए बैरी पर सींग नहीं चलाना चाहिए’ ग्रामीण और महाभारतीय संस्कारों के आगोश में वॉइस ऑफ सेनिटी की तरह फैसलाकुन हो जाती है। ग्लोबलाइजेशन और उससे जुड़ी सांस्कृतिकता से कोसों पहले के उस साठोत्तरी काल और अपने लड़कपन के उस दौर में श्वेत-श्याम मानसिकताओं के पहलुओं को रेखांकित-दर्ज करती इस कहानी में बाद में पता लगा लेखकीय आदर्शवादी यथार्थ चाहे भले हो, मगर मिथकीय पात्रों के बावजूद यह कहानी के उस सर्वप्रमुख गुण यानी पाठकीय कौतूहल की भरपूर आपूर्ति करती जा रही थी, जो इन दिनों लिखी जा रही अनेक कहानियों में पुरानी शुष्क गांठ की तरह अटकता है। कहानी की शुरूआत में गधे और सीधेपन को लेकर जरूर संक्षिप्त आख्यान सा है, मगर वह इंजैक्शन लगाने से पूर्व स्प्रिट से त्वचा को तैयार किए जाने जैसा ही है। और भाषा तो ऐसी कि बच्चा पढ़े तो सरपट समझता जाए और बूढ़ा पढ़े तो उसके काम का भी खूब असला निकले। खुदरा वादों-विवादों की किस दौर में कमी रही है, लेकिन अपने रचे-उठाए पात्रों और उनकी स्थितियों को लेकर कहानीकार की निष्ठा अडिग तरह से पवित्र और सम्पन्न खड़ी दिखती है।

आदर्शोन्मुखी नैतिकता की चौतरफा मंडराती हवा में दूसरी शक्ति कदाचित फिर भी नहीं होती कि खेत-खलिहान और ढोर-डंगरों को सानी-पानी देने के बीच मिले अवकाश में पाठ्यक्रम के अलावा कुछ और पढ़ने को विवश हो जाते (मानस का गुटका और ‘कल्याण’ के अंक इसकी चौकसी में तैनात थे) बशर्ते कि उस ‘पढ़ाई’ में आनन्द का इतना स्वभावगत पुट न होता कि प्रेमचन्द नाम के महाशय की जो कहानी जब जहां मिल जाए, मैं उसे निगल डालने को लालायित रहता। ‘पंच-परमेश्वर’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘पूस की रात’, ‘दूध का दाम’, ‘मंत्र’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसी अनेक कहानियाँ उस सिलसिले में चिन दी गईं।

उपन्यास जरूर देर से पढ़े, लेकिन कोर्स में कोई था ही नहीं और लाइब्रेरी जैसी चिड़िया तो दूर-दूर तक नहीं थी।

प्रेमचन्द की कहानियों को लेकर एक आदिम अतृप्ति भाव तो अलबत्ता आज भी बना हुआ है।

 

बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं : दिनेश कर्नाटक

shekshik dakhal

इस बार मई माह में देहरादून में प्राथमिक शि‍क्षकों के मॉड्यूल निर्माण हेतु आयोजित एक कार्यशाला में प्रतिभाग किया। वहां एस. सी. आर. टी., उत्तराखंड की प्रवक्ता हेमलता तिवारी हमारे समूह की संयोजक थीं। हेमलता दीदी उत्साही शि‍क्षक प्रशि‍क्षिका हैं। उनकी शि‍क्षण प्रक्रिया तथा बाल मनोविज्ञान को लेकर समझ साफ है। जब समझ साफ होती है तो आत्मविश्वास होना स्वाभाविक है। हेमलता दीदी समूह के समक्ष हंसते-मुस्कराते हुए आतीं। खुलकर बातें करती। इसका असर यह होता कि प्रतिभागी जबरदस्ती ओढ़ी जाने वाली गंभीरता से मुक्त होकर सहज हो जाते और अपनी बात खुलकर कहने लगते। अपने इस अंदाज से हेमलता दीदी कटे-कटे रहने वाले प्रतिभागियों को भी बगैर कुछ कहे कार्य करने के लिए प्रेरित करतीं। एक ओर जहां वे माहौल को बिलकुल सहज बना देती थीं, वहीं अपनी कार्ययोजना पर दृढ़ता तथा गंभीरता से काम करतीं। इस प्रकार वे अपने शैक्षणिक उद्देश्‍य की ओर तेजी से बढ़ती जातीं।

इस उदाहरण से एक बात स्पष्‍ट है कि सीखना-सिखाना भयमुक्त, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल में ही अच्छा हो सकता है। भयभीत तथा तनावग्रस्त शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं अपने विद्यार्थियों को प्रेरित नहीं कर सकते। वे उन्हें भय और तनाव ही दे सकते हैं। परिवार तथा शि‍क्षा से जुड़े लोगों का यह दायित्व है कि वे अपने आस-पास सहज, प्रसन्न तथा उत्साहजनक माहौल की रचना करें। अच्छा शि‍क्षण; अच्छी कहानी, अच्छी कविता तथा अच्छे गीत की तरह विद्यार्थी में आत्मविश्‍वास पैदा करता है। उसे बोलने, भागीदारी तथा प्रश्‍न करने के लिए प्रेरित करता है। बच्चों के मूल्यांकन की एक बड़ी कसौटी उनका मौलिक प्रश्‍न करना है। पढ़े हुए को उगल देना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि पढ़े हुए से प्रश्‍नों का जन्म लेना। अगर एक शि‍क्षक के पढ़ाने के बाद बच्चे सवाल करने लगते हैं तो यह शि‍क्षक की सफलता है।

बच्चे जन्म के साथ अपार ऊर्जा, उत्साह तथा जिज्ञासा लेकर जन्म लेते हैं। यह गुण हर बच्चे में जन्मजात होता है। अगर इन गुणों को सही दिशा मिल जाती है तो ये बच्चे अपने घर-परिवार, समाज-देश को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। लेकिन ज्यों-ज्यों बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनकी ऊर्जा, उत्साह और जिज्ञासा क्षीण पड़ने लगती है। इसके कारण हमारे परिवार तथा समाज में विद्यमान हैं। कम बच्चे ही होते हैं, जो अपने शि‍क्षकों, अभिभावकों की सहायता से अपने रास्ते को पहचानकर पूरी तन्मयता से उस दिशा की ओर बढ़ चलते हैं। शेष बच्चों को उनकी राह खोजने में सहायता करने वाला न तो घर में होता है, न स्कूल में और न समाज में। ऐसे दिशाविहीन नागरिकों से घर, समाज तथा देश भी दिशाहीनता का शि‍कार हो जाता है।

बच्चों के साथ कैसा बर्ताव किया जाए ? इस बारे में हमारे वहां न तो घर-परिवार और न ही देश-समाज की कोई स्पष्‍ट समझ है। अधिकांश लोग मौका मिलने पर स्त्रियों और बच्चों से अच्छा व्यवहार नहीं करते। हमारे वहां विवाह लोगों के लिए स्त्री-पुरुष मिलन की स्वीकृत संस्था भर होती है। लोग इसके साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारियों से परिचित नहीं होते। उनके पास अपने घर तथा बच्चों के लिए कोई योजना नहीं होती। जैसे ही जिम्मेदारियों का बोझ पड़ना शुरू होता है, वे मैदान छोड़कर भागने लगते हैं। ऐसे लोगों के जीवन में बच्चों का आगमन अनामंत्रित अतिथि की तरह होता है। वे उनके आगमन को स्वीकार नहीं कर पाते और बच्चों को मां-बाप का सहज प्रेम तथा प्रोत्साहन नहीं मिल पाता। वे जन्म के बाद से ही बच्चों का उत्पीड़न करने लगते हैं। उत्पीड़ित बच्चे उत्पीड़ित समाज की रचना करते हैं। वे जहां भी जाते हैं, आधे-अधूरे मन के साथ जाते हैं। न वे स्कूल में रम पाते हैं और न समाज में। आत्मकेन्द्रित समाज के लिए बच्चों की जिज्ञासा, उनके सवालों का कोई अर्थ नहीं होता। उनके सवालों को वे परेशान करने की चीज समझते हैं। अतः डांटकर या मारकर चुप करा देते हैं।

घर के बाद बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण की दूसरी महत्वपूर्ण संस्था स्कूल है। स्कूल तथा वहां के शि‍क्षक-शि‍क्षिकाएं बच्चों के प्रति सकारात्मक होंगे तो बच्चे खुलकर उनसे सवाल कर सकेंगे। उनकी जिज्ञासा को पंख लगेंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। बहुत दिन हुए सोशल मीडिया में किसी प्रतिष्‍ठि‍त स्कूल के हॉस्टल में रह रहे बच्चों के साथ वहां के वार्डन द्वारा की जा रही मारपीट का एक वीडियो देखा था। वार्डन सामने खड़े प्राइमरी स्तर के बच्चों को एक-एक कर सामने लाता, उन्हें बेंत से पीटता, फिर उठाकर फैंक देता। बच्चों के साथ मारपीट का वह वीडियो दिल दहला देने वाला था। लोगों ने अपने बच्चों को अच्छी शि‍क्षा के लिए उस तथाकथित नामीगिरामी स्कूल में भेजा होगा और वहां उनके साथ इस तरह का अमानवीय बर्ताव हो रहा है। वह वार्डन बच्चों को भयभीत करके नियंत्रण में रखना चाहता है। वही नहीं हम सब भी यही करते हैं। हम सब को यही तरीका सबसे आसान लगता है। बच्चे से बात करने, उसकी समस्या को ध्यान से सुनकर समाधान निकालने के लिए न तो हमारे पास, न हमारी शि‍क्षा व्यवस्था में और न ही हमारे पाठ्यक्रम में समय है, न ही धैर्य है और न ही इस पद्धति पर हमें यकीन है। परिणाम यह है कि हम अपने निजी तथा सार्वजनिक जीवन में भय के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

बच्चे के जीवन में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं का महत्व माता-पिता के बराबर है। जितना समय वे घर में रहते हैं, लगभग उतना ही समय वे स्कूल में शि‍क्षक-शि‍क्षिकाओं तथा अपने साथियों के साथ बिताते हैं। स्कूल न सिर्फ बच्चों के शैक्षिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, मानसिक तथा कलात्मक उन्नयन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उनके सामाजीकरण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि बच्चों के प्रति इतनी तरह से जिम्मेदार स्कूल इन भूमिकाओं को निभाने के लिए तैयार है ? क्या स्कूल को अपनी इन जिम्मेदारियों का एहसास है ? जवाब में यही कहा जा सकता है कि अपने देश में स्कूल की अवधारणा कई तरह के उद्देश्‍यों में उलझकर रह गई है। कहीं इसका उद्देश्‍य पैसा कमाना है। कहीं अपने धर्म या मत का प्रचार करना। कहीं किसी खास उद्देश्‍य के लिए दीक्षित करना, जैसे सैनिक स्कूल, धार्मिक शि‍क्षा आदि-आदि। कहीं शि‍क्षा दिए जाने का दिखावा भर किया जाता है।

शि‍क्षा से जुड़े लोग;  मुख्यतः शि‍क्षक या प्रशासक भी क्या शि‍क्षा की अवधारणा को समझते हुए इस क्षेत्र में हैं या केवल नौकरी या आजीविका के लिए ? सच तो यह है कि हमारे समाज का मूल ध्येय किसी भी तरह पैसा कमाना हो चुका है। उसमें भी शार्टकट से कमाने का प्रचलन अधिक होता जा रहा है। यानी मेहनत,  उद्यमशीलता तथा रचनात्मकता का कोई महत्व नहीं है। हमारे समाज में अभी भी लोग केवल इंजीनियर, डॉक्टर, व्यापारी, क्रिकेट का खिलाड़ी, अभिनेता, आईएएस, पीसीएस, मैनेजर ही बनना चाहते हैं। बहुत कम लोग हैं जो शि‍क्षा, कृषि‍, उद्यमीता आदि क्षेत्रों में जाना चाहते हैं। शि‍क्षा में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है जो जाना तो कहीं और चाहते थे, लेकिन वहां नहीं पहुंच पाने के कारण यहां आ गए। यहां आने में कोई बुराई नहीं है। जब आ ही गए हैं तो यहीं का हो जाना चाहिए। लेकिन अधिकांश लोग यहां के नहीं हो पाते। वे इस पेशे को आजीविका के रूप में निभाते चले जाते हैं।

नौकरी करना और किसी पेशे को जीना दो अलग बातें हैं। नौकरी करने वाला किसी काम से आत्मिक रूप से नहीं जुड़ता। वह निर्लिप्त भाव से दिया गया काम कर देता है। शि‍क्षा का कार्य केवल शरीर ही नहीं आत्मा की भी संलिप्तता की मांग करता है। जब शि‍क्षक अपनी कक्षा के बच्चों से जुड़ने की कोशि‍श करता है तो बच्चे भी उससे जुड़ने लगते हैं। तब सीखना-सीखाना मिला-जुला कार्य हो जाता है। जब अपने विद्यार्थियों से जुड़ने की इच्छा न हो तो शि‍क्षण की प्रक्रिया नीरस हो जाती है। एक शि‍क्षक को अपने आप से हमेशा पूछना चाहिए कि क्या वह अपने विद्यार्थियों से अपने बच्चों की तरह पेश आता है ? क्या वह जब अपने विद्यार्थियों के पास जाता है तो उसी तरह से आह्लादित होता है, जैसे वह अपने बच्चों से मिलने के समय होता है ? अगर वह अपने शि‍क्षण को इस तरह करता है तो वह शि‍क्षण का आनंद उठाता है। जब शि‍क्षक आनंद में होता है तो उसके विद्यार्थियों को भी पढ़ने-लिखने में आनंद आता है। तब बच्चे सीखने लगते हैं और प्रश्‍न करने लगते हैं। दोनों के बीच आत्मीयता उत्पन्न होती है।

हिन्दी से एम.ए. करने के दौरान प्रोफेसर ओमप्रकाश गंगोला से मेरा कुछ ऐसा आत्मीय संबंध बना, जो आज 22-23 साल बाद भी कायम है। बात इतनी थी कि वे अपने विषय भारतीय तथा पश्‍चि‍मी काव्यशास्त्र से प्रेम करते थे और मुझे उस विषय को जानने-समझने की ललक थी। उनके लैक्चर के दौरान मैं उनसे तमाम सवाल करता और वे बड़े उत्साह से मेरी जिज्ञासाओं को शांत करते। मैं उनके जैसा गुरु पाकर आनंदित था और वे शायद एक जिज्ञासु छात्र को पाकर प्रसन्न थे। कई बार तो पूरी क्लास हम दोनों के प्रश्‍नोत्तर को सुनते रहती थी। प्राध्यापक और भी थे, मगर उनसे वह आत्मीयता नहीं बनी। कारण साफ है, उनमें से अधिकांश लोग सिर्फ नौकरी करते थे। वे क्लास में आते और अपना लैक्चर देकर चलते बनते। उन्हें किसी तरह की चुनौती पसंद नहीं थी। उनकी पाठ योजना पहले से तय होती थी। वे संवाद से बचना चाहते थे। उनका सारा ध्यान कोर्स को पूरा करने में होता था। ऐसे में स्वाभाविक है कि वे प्रश्‍न और संवाद को पसंद नहीं करते। शायद तभी उनमें से अधिकांश को मैं भूल चुका हूं।

बच्चे प्रश्‍न नहीं करते क्योंकि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्‍न नहीं करते। हम प्रश्‍न करते तो बच्चे भी प्रश्‍न करते।

(शैक्षि‍क दखल, जुलाई 2016 से साभार)