बाजारोन्‍मुख हुई स्‍वातंत्र्योतर हि...

[caption id="attachment_8590" align="alignleft" width="260"] नरेंद्र अनि‍केत[/caption] हिंदी कहानी पर जब भी विचार किया जाता है तो स्‍वतंत्रता प्राप...

शिक्षा किसलिए है? : डेविड ओर...

आधुनिक शिक्षा की नींव के छह भ्रम, और उन्हें बदलने के लिए छह नए सिद्धांत [caption id="attachment_8584" align="alignleft" width="200"] डेविड ओर[/capt...

स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गो...

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्ग...

सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान...

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञा...

कविता

धूल फांको, मगर : रोज मिलिगन

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको मगर क्या इससे बेहतर नहीं कि एक ख़ूबसूरत तस्वीर उकेरो या फिर कोई चिट्ठी लिखो, लज़ीज़ खाना बनाओ या एक पौधा रो...

कहानी

गिरगिट : अन्तोन चेखव

[caption id="attachment_8533" align="alignleft" width="213"] अन्तोन चेखव[/caption] पुलिस का दारोग...

गजल

विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें

[caption id="attachment_8440" align="alignleft" width="245"] विवेक भटनागर[/caption] लगभग तीन दशक से साहित्य में सक्रिय विवेक भटनागर हिंदी...

परिक्रमा

अलविदा, चिरयुवा साथी दूधनाथ सिंह!

[caption id="attachment_8601" align="alignleft" width="300"] दूधनाथ सिंह[/caption] नई दि‍ल्‍ली : ‘आख़िरी क़लाम’ जैसे अविस्मरणीय महाकाव्यात्...

बच्चों की करामात

साइि‍कल के पंप से उड़ा राकेट : समीर मिश्रा

अगर आप कभी ओडिशा के गंजाम ज़िले से गुजरें तो वहां ग्राम विकास विद्या विहार स्कूल में ज़रूर जाइएगा। पूरबी घाटों के बीच में स्थित इस स्कूल म...

अलविदा, चिरयुवा साथी दूधनाथ सिंह!

दूधनाथ सिंह

नई दि‍ल्‍ली : ‘आख़िरी क़लाम’ जैसे अविस्मरणीय महाकाव्यात्मक उपन्यास और ‘रक्तपात’, ‘रीछ’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘माई का शोकगीत’ जैसी लम्बे समय तक चर्चा में बनी रहने वाली कहानियों के लेखक, जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष दूधनाथ सिंह नहीं रहे। उनका न रहना हिन्दी की दुनिया के लिए और विशेष रूप से जनवादी लेखक संघ के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे एक साल से प्रोस्ट्रेट कैंसर से पीड़ित थे। लगभग एक हफ़्ते पहले हालत बहुत बिगड़ने पर इलाहाबाद के फिनिक्स अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में उन्हें भर्ती कराया गया था। वहीं 11 जनवरी की रात 12 बजे उनका इंतकाल हुआ।

17 अक्टूबर 1936 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के एक गाँव में जन्मे दूधनाथ जी अपनी शुरुआती कहानियों के साथ ही हिन्दी में साठोत्तरी पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उभरे थे। सत्तर के दशक की शुरुआत में आलोचना-पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ के साथ वे आलोचना के क्षेत्र में भी प्रतिष्ठित हुए। सन साठ के आसपास शुरू हुए, तकरीबन साठ वर्षों के अपने रचनात्मक जीवन में उन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, संस्मरण और आलोचना—इन सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया। पूर्वोल्लिखित रचनाओं के अलावा ‘यमगाथा’ नाटक, महादेवी पर लिखी आलोचना-पुस्तक, और संस्मरणों की पुस्तक ‘लौट आ ओ धार’ उनकी यादगार कृतियाँ हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1957 में हिन्दी में एम.ए. करने के बाद दूधनाथ जी ने 1959 में कलकत्ता के रुंगटा कॉलेज से अध्यापन की शुरुआत की। कलकत्ता रहते हुए ही उन्होंने ‘चौंतीसवां नरक’ शीर्षक से एक उपन्यास-अंश और ‘बिस्तर’ कहानी लिखी जिसे कमलेश्वर के सम्पादन में निकलनेवाली ‘सारिका’ पत्रिका ने छापा और पुरस्कृत किया। दो साल बाद वे नौकरी छोड़कर इलाहाबाद लौट आये जहां कुछ समय बेरोज़गारी में गुज़ारने के बाद उन्हें इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तदर्थ प्राध्यापक के रूप में नौकरी मिली। रचनात्मक कार्य इस बीच लगातार जारी रहा। 1963 में प्रकाशित ‘रक्तपात’ कहानी के साथ कहानीकारों की उस समय उभर रही पीढ़ी के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में उनकी पहचान बनी।

दूधनाथ जी की महत्वपूर्ण पुस्तकों की संख्या बीस से ऊपर है: उपन्यास—‘आख़िरी क़लाम’, ‘निष्कासन’, ‘नमो अन्धकारम’; कहानी-संग्रह—‘सपाट चेहरे वाला आदमी’, ‘सुखान्त’, ‘प्रेमकथा का अंत न कोई’, ‘माई का शोकगीत’, ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’, ‘तू फू’; कविता-पुस्तकें—‘अगली शताब्दी के नाम’, ‘एक और भी आदमी है’, ‘युवा खुशबू’, ‘सुरंग से लौटते हुए’; नाटक—‘यमगाथा’; संस्मरण—‘लौट आ ओ धार’; आलोचना—‘निराला: आत्महंता आस्था’, ‘महादेवी’, ‘मुक्तिबोध: साहित्य में नई प्रवृत्तियां’; साक्षात्कार—‘कहा-सुनी’. इनके अलावा उन्होंने ‘भुवनेश्वर समग्र’ और शमशेर पर केन्द्रित पुस्तक ‘एक शमशेर भी है’ का सम्पादन किया।उन्हें मिलनेवाले पुरस्कारों और सम्मानों में भारत भारती सम्मान, भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान, शरद जोशी स्मृति सम्मान और कथाक्रम सम्मान प्रमुख हैं।

सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर सजग और पैनी निगाह रखनेवाले दूधनाथ जी का लेखन अपने समय को इतने कोणों से पकड़ता है कि उन्हें पढ़ना एक युग के आरपार गुज़रने की तरह है।आज हमारा मुल्क जिस दौर में है, वहाँ 2003 में प्रकाशित, बाबरी मस्जिद ध्वंस पर केन्द्रित ‘आख़िरी क़लाम’ को बार-बार पढ़े जाने की ज़रूरत है, जिसकी भूमिका के रूप में लिखे शुरुआती हिस्से में आया यह वाक्य जैसे हमारे समय पर एक इल्हामी टिप्पणी है: ‘हमें इस बात का डर नहीं कि लोग कितने बिखर जायेंगे, डर यह है कि लोग नितांत ग़लत कामों के लिए कितने बर्बर ढंग से संगठित हो जायेंगे।’

ऐसे दूधनाथ जी अब हमारे बीच नहीं हैं। वे हमारी स्मृतियों में सदा बसे रहेंगे और अपनी रचनाओं से हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे।

(जनवादी लेखक संघ के महासचि‍व मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और उप-महासचिव संजीव कुमार की ओर से जारी)

 

 

 

सावित्रीबाई फुले का संघर्ष भारतीय समाज के नवनिर्माण का संघर्ष था: डा. रामायन राम    

अमेठी : 3 जनवरी 2018 की सर्द सुबह देश के विभिन्न हिस्सों से जुटे साहित्यकार, लेखक, बुद्धिजीवी, शिक्षक सुल्तानपुर से लगे रामगंज बाजार के पास स्थित गाँव अग्रेसर में सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन के अवसर पर ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ के उद्घाटन के साक्षी बने। पुस्तकालय का उद्घाटन प्रेमचंद, रेणु और श्रीलाल शुक्ल की परंपरा के वाहक और वारिस, ग्रामीण जीवन के यथार्थ के सजग चितेरे कथाकार शिवमूर्ति ने किया। इस पुस्तकालय का निर्माण इसी गांव में रहने वाली युवा लेखिका और शिक्षिका ममता सिंह ने अपने मित्रों, परिवार और स्थानीय लोगों की सहायता से किया है और वही इसका संयोजन, संचालन करेंगी।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कथाकार शिवमूर्ति ने अपने बचपन की यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि किस तरह उन्हें अपने बचपन में एक मित्र के यहाँ किताबें पढ़ने को मिलती थीं, जिससे उनके भीतर पढ़ने की जिज्ञासा और लालसा पैदा हुई। उन्‍होंने कहा कि जिस प्रकार हमारे पारिवारिक वारिस होते हैं, ठीक उसी प्रकार हमारे लेखकीय, साहित्यिक वारिस भी होते हैं। अगर मैं कहानीकार के रूप में अपने को प्रेमचंद, रेणु और संजीव का वारिस मानूं तो ममता के रूप में हमें हमारा साहित्यिक वारिस मिल गया है, जो हमारे लिए बहुत गौरव की बात है। सावित्रीबाई फुले के स्त्री शिक्षा और समाज में दिए योगदान को याद करते हुए शिवमूर्ति ने बताया कि जब सावित्रीबाई ने स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने का निर्णय लिया तो लोगों ने उन्हें अनेक प्रकार से तंग किया। विद्यालय जाते समय उनके ऊपर छतों पर से कूड़ा फेंका जाता था, किंतु वे अपने संकल्प पर अडिग रहीं और भारत की पहली महिला शिक्षिका के रूप में जानी गईं।

शिवमूर्ति जी ने पुस्तकालय को आधुनिक और डिजिटल बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. रामदेव शुक्ल ने  लेखि‍का बेबी हालदार की कहानी के ज़रिए बताया कि पढ़ने और लिखने के अवसर मनुष्य को किस तरह बदल देते हैं। घरों में चौका-बर्तन करने वाली  एक स्त्री को  लिखने-पढ़ने का अवसर मिला और आज वह अंतरराष्ट्रीय ख्याति की लेखिका हैं। ‘आलो आंधारि’ उनकी चर्चित पुस्तक है। उनके बच्चे बहुत गर्व से कहते हैं कि उनकी माँ ऑथर हैं ।

दिल्ली से आईं लेखिका और शिक्षिका मृदुला शुक्ल ने आज के समाज में स्त्रियों की भयानक दुर्दशा और शोषण के ज़रिए सावित्रीबाई फुले के संघर्षों के महत्व को याद किया। आज आधुनिक कहा जाने वाला हमारा समाज स्त्रियों को एक खास तरह की सामंती और पितृसत्तात्मक सोच के दायरे से बाहर निकल कर नहीं देख पाता तो डेढ़ सौ साल पहले के हमारे रूढ़िवादी समाज में स्त्रियों के लिए विद्यालय खोलने और स्त्री शिक्षा के लिए काम करने का निर्णय कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। उन्‍होंने सावित्रीबाई फुले को इस रूप में भी याद किया कि वे न होतीं तो शायद हमारी स्त्रियों को इस तरह के पढ़ने के मौके न मिल पाते।

पहले सत्र की अध्यक्षता ‘युग तेवर’ पत्रिका के संपादक कमल नयन पाण्डेय ने की। उन्‍होंने अपने वक्तव्य में बच्चों, स्त्रियों, युवाओं, किसानों, कामकाजी महिलाओं सभी के लिए पुस्तकें रखने का सुझाव दिया। संचालन पुस्तकालय के सह संयोजक गीतेश ने तथा धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय की संयोजक ममता सिंह ने किया। अनेक शुभचिंतकों प्रो. राजेन्द्र कुमार, मीना राय, अनीस सिद्दीकी साहब आदि ने पुस्तकालय के लिए पुस्तकें भेंट की तथा शिवमूर्ति जी ने भविष्य में महत्वपूर्ण पुस्तकों, पत्रिकाओं के रूप में पुस्तकालय का सहयोग करते रहने का आश्वासन दिया।

पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान

इस मौके पर ललितपुर से आए युवा आलोचक और जन संस्कृति मंच उत्‍तर प्रदेश के राज्य सचिव डॉ. रामायन राम ने पहला सावित्रीबाई फुले व्याख्यान दिया। उन्‍होंने न केवल सावित्रीबाई के स्त्री शिक्षा में योगदान को याद किया, बल्कि हमारे समाज के लिए सावित्रीबाई के संपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। सावित्रीबाई फुले जब स्त्री शिक्षा के लिए निकलीं तो उनका विरोध सिर्फ रूढ़ विचार से ही नहीं, बल्कि शारीरिक हमलों के द्वारा भी किया गया। सावित्रीबाई फुले ने पुणे में विधवा गर्भवती स्त्रियों की प्रसूति के लिए आश्रम का निर्माण कराया तथा अपने जीवन काल में लगभग पाँच हजार ऐसी स्त्रियों को प्रसूति का अवसर उपलब्ध कराया। उन्होंने पूना में नाइयों की एक ऐतिहासिक हड़ताल कराई जिसमें शहर के नाइयों ने विधवा स्त्रियों का मुंडन करने से इन्कार कर दिया ।

रामायन ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि हमारे समाज के वे तत्व जो जाति के भेदभाव और शोषण को और सघन बनाना चाहते थे, वे जानते थे कि सामंतवाद और स्त्री की यौनिकता पर नियंत्रण उनका प्रमुख हथियार होगा। यही कारण है कि सावित्रीबाई के प्रयासों का इतना भयंकर विरोध हुआ।

कोरेगांव में दलितों पर हुए ताजा हमले को याद करते हुए रामायन ने कहा कि आज की सामंती और साम्प्रदायिक ताकतें नया इतिहास गढ़ने का काम कर रही हैं और इसमें सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत का जहर फैलाया जा रहा है, जिसके प्रतिरोध के लिए हमें किताबों की दुनिया में जाना होगा। यह पुस्तकालय इस लिहाज़ से भी एक महत्त्वपूर्ण पहल है।

अंत में रामायन राम ने सावित्रीबाई फुले की मौत को भी एक महान और प्रेरक मौत की तरह याद किया। उन्होंने बताया कि जब पुणे में प्लेग की महामारी फैली थी तो प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए वे बीमार हुईं जो उनकी मौत का सबब बना, किंतु वे अपने अंतिम समय तक रोगियों की सेवा में लगी रहीं। सावित्रीबाई फुले का अभियान केवल शिक्षा के लिए नहीं था। वह भारतीय समाज के नवनिर्माण का आन्दोलन था। शिक्षा से शुरू करके उन्होंने स्त्री मुक्ति तक का सफर तय किया जो जाति उन्मूलन की लड़ाई से जुड़ा, जिसे बाद में अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के जरिए उठाया। लोकतंत्र, समता, बराबरी अचानक से नहीं आते हैं। वे समाज के भीतर के आंतरिक संघर्षों और विचार को लेकर लोगों के संघर्ष से आता है। भारतीय समाज एक जटिल समाज है, इसमें आधुनिकता के एक-एक कदम के लिए संघर्ष करना पड़ा है। सावित्रीबाई फुले ने ऐसे ही समाज के भीतर स्त्री शिक्षा और विधवा पुनर्वास के लिए संघर्ष किया। यह सिर्फ स्त्री शिक्षा के लिए चलने वाला आन्दोलन नहीं था, बल्कि समाज को भीतर से बदलने वाला, उसे जड़ से हिलाने वाला आन्दोलन/अभियान था। सावित्रीबाई फुले के इस आन्दोलन को आज फिर से नए सिरे से शुरू करने का समय है, जिसका एक रूप यह पुस्तकालय है।

सावित्रीबाई के नाम पर आयोजित यह व्याख्यान वार्षिक रूप में उनके जन्मदिन पर मनाने की योजना है।

हिंदी की साहित्यिक पत्रिका ‘कथा’ का लोकार्पण

तमाम तामझाम से दूर ‘कथा’ के 21वें अंक का लोकार्पण ‘सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय’ अग्रेसर के उद्घाटन समारोह के दौरान  सादगी के साथ हुआ।   कथा के संपादक दुर्गा सिंह, कथाकार शिवमूर्ति, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. रामदेव शुक्ल और कमल नयन पाण्डेय ने पत्रिका का लोकार्पण किया। कथा का यह अंक अपनी सामग्री में बहुत समृद्ध और पठनीय है। पत्रिका का प्रकाशन कथाकार मार्कण्डेय की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला है तथा सम्पादक दुर्गा सिंह से उम्मीद है कि इसे आगे भी जारी रखेंगे।

 रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया गया

‘समकालीन जनमत’ के संपादक केके पाण्डेय ने इस अवसर पर रंगकर्मी, निर्देशक सफ़दर हाशमी की शहादत को याद किया। सफ़दर को याद करते हुए  पाण्डेय ने उनकी रंगकर्म के प्रति निष्ठा, राजनीतिक चेतना, किसान-मजदूरों के बीच उनके काम और उनकी लोकप्रियता का जिक्र किया तथा उनकी एक कविता का पाठ भी किया जो पुस्तकालय स्थापना के लिहाज से भी बहुत मौजूँ है-

किताबें करती हैं बातें
बीते जमानों की
दुनिया की, इंसानों की
आज की कल की
एक-एक पल की।
खुशियों की, गमों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की।
सुनोगे नहीं क्या
किताबों की बातें?

 पुस्तकालय का एक हॉल होगा त्रिलोचन के नाम पर

पुस्तकालय से जुड़े हुए एक रीडिंग हॉल को सुल्तानपुर की धरती के महाकवि त्रिलोचन के नाम पर ‘त्रिलोचन सभागार’ नाम दिया गया। ललित कला अकादमी से पुरस्कृत चित्रकार प्रभाकर राय द्वारा बनाये गए त्रिलोचन के पोर्ट्रेट कथाकार शिवमूर्ति ने ममता सिंह को भेंट किया,  जिसे हॉल में लगाया जाएगा।

दूसरा सत्र रहा कविताओं के नाम

 कार्यक्रम के दूसरे सत्र में केके पाण्डेय के संचालन में कविता पाठ हुआ जिसमें सर्वश्री ओमप्रकाश मिश्र, प्रदीप कुमार सिंह,  डॉ. सी.बी. भारती, अनिल सिंह , बृजेश यादव,  मृदुला शुक्ल, आशा राम जागरथ और बालेन्द्र परसाई ने कविता पाठ किया।

इस गरिमामय आयोजन में मध्य प्रदेश के पिपरिया से एकलव्य के गोपाल राठी ने शिरकत। उन्‍होंने अपने विचार साझा करते हुए पाठकों की गिरती संख्या और पढ़ने के प्रति अरुचि पर चिंता जाहिर की और इस विपरीत समय में इस प्रयास की सराहना की। कार्यक्रम में ममता सिंह की अर्मेनियाई मित्र  लूसी ने  अपने हिंदी भाषा के प्रति प्रेम को व्यक्त किया। अनुराग सिंह ने इस पूरे कार्यक्रम को अपने सपने के पूरा होने की शुरुआत के रूप में रेखांकित किया। इस कार्यक्रम में सम्भावना कला मंच, गाजीपुर  के राजकुमार, ममता और  टीम ने शानदार कविता पोस्टर  तैयार किये और प्रदर्शनी लगायी। कार्यक्रम में उपस्थित अनेक मित्रों ने अपने यहाँ भी इस तरह की पहल का वायदा किया और हम उम्मीद करते हैं कि इस अभियान का हम अन्य जगहों पर तेजी से प्रसार कर सकेंगे।

गीतेश सिंह द्वारा सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय के लिए जारी

बाजारोन्‍मुख हुई स्‍वातंत्र्योतर हिंदी कहानी : नरेंद्र अनि‍केत

नरेंद्र अनि‍केत

हिंदी कहानी पर जब भी विचार किया जाता है तो स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के हुआ तीव्र विकास विवेचना के केंद्र में रहता है। बीसवीं सदी के आठवें दशक तक हिंदी कहानी पांच आंदोलनों से गुजर चुकी थी। सबसे ध्‍यान देने योग्‍य बात यही है कि सभी कहानी आंदोलन स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए। 19वीं सदी के आखिर से हिंदी कहानी शुरू होती है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति के समय तक हिंदी कहानी आदर्श के दायरे में बंधी रही। सदी के मध्‍य में देश आजाद हुआ और तीस साल बीतते-बीतते कथा लेखन में जिस तेजी से बदलाव आए, उस पर गौर करने की जरूरत है। छठे दशक के मध्‍य तक आते-आते कहानी में बदलाव आ जाता है। इसी बदलाव को ‘नई कहानी’ नाम दिया गया। नई कहानी को सबसे पहला कहानी आंदोलन कहा जाता है। आजादी मिले दस साल भी नहीं बीते थे और हिंदी कहानी के केंद्र में आदर्श के साथ जीने, संघर्ष करने वाला नायक गायब हो गया। उसकी जगह परिस्थिति की मार झेल समझौता करने वाला हताश नायक आ जाता है। यह हताश नायक तत्‍कालीन भारतीय समाज का यथार्थवादी चेहरा है।

कहानी में आए इस तरह के बदलाव का कारक आजादी के बाद देश में उत्‍पन्‍न परिस्थितियों को माना जाता है। देश में तैयार की जा रही बाजारोन्‍मुख व्‍यवस्‍था ने ही वैसी परिस्थितियां तैयार की थीं। स्‍वतंत्रता से पहले जो समाज अंग्रेजी राज की बाजार हितैषी व्‍यवस्‍था से उत्‍पीडि़त था, उसे सामंती व्‍यवस्‍था की मार झेलने वाला समाज माना गया। अंग्रेजों ने जो सामंती व्‍यवस्‍था तैयार की थी, वह केवल उनकी बाजार नीति को सहारा दे रही थी। सभी कर्णधारों ने इस बात की अनदेखी कर दी कि अंग्रेज भारत क्‍यों आए थे। उन्‍हें अपने औद्योगिक उत्‍पादों के लिए बाजार चाहिए था। दुनिया के जिन हिस्‍सों में मनुष्‍य श्रम और कृषि पर आश्रित था, उससे बेहतर क्रेता और कोई नहीं हो सकता था। ऐसे क्षेत्रों के लोगों को खरीदार बनाने के लिए अंग्रेजों ने वहां के पारंपरिक मूल्‍यों, मान्‍यताओं और जीवन शैली को पोंगापंथ कहा और उसे दरकिनार कराया। भारतीय इतिहास में अंग्रेजी राज की स्‍थापना से ही आधुनिककाल की शुरुआत माना गया है। मतलब औद्योगिक उत्‍पादों के विक्रय की परिस्थिति बनने के बाद के समय को ही आधुनिक काल कहा जाता है।

अंग्रेजी राज की स्‍थापना के बाद भारत में सुधार आंदोलन हुए। उसे अंग्रेजी संपर्क का प्रभाव माना गया। यह सच है कि कई कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन हुए और सफलता भी मिली। लेकिन हमें अंग्रेजी राज की स्‍थापना के मूल में क्‍या था, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ईस्‍ट इंडिया कंपनी व्‍यापार करने आई थी और उसे यहां शासन स्‍थापित करने का अनुकूल माहौल मिल गया था। अपने हितों के लिए आज के छोटे-बड़े कारोबारी भी गार्ड रखते हैं। ये गार्ड हथियार बंद भी होते हैं और खाली हाथ भी। 18वीं सदी में कंपनी को तत्‍कालीन सत्‍ता को कर देने के अलावा और किन्‍हीं बंदिशों का सामना नहीं करना पड़ा था। कंपनी के पहरेदार चौकीदार हथियार बंद हो गए थे और इन्‍हीं गार्डों ने लॉर्ड क्‍लाइब को बिहार, बंगाल जीतकर दिया था। शासन स्‍थापित होने के बाद अंग्रेजों ने यहां के पारंपरिक उद्योगों को बंद कराया था। ढाका के मलमल से प्रतिस्‍पर्द्धा खत्‍म करने के लिए उन्‍होंने एक लाख बुनकरों का अंगूठा कटवा दिया था। घरेलू स्‍तर पर खांड, शक्‍कर और रवा बनाया जाता था। इन्‍हें खत्‍म करने के लिए अंग्रेजी राज में चीनी मिलों के हित में गन्‍ना रिजर्व एरिया एक्‍ट बनाया गया था। इस कानून को आजाद भारत की विधायिका भी अपनी स्‍वीकृति दे चुकी है और इसके प्रावधानों को और कड़ा कर चुकी है। इन दोनों बातों पर नजर डालने के बाद सबकुछ साफ हो जाता है। यह कहना कहीं से भी अनुचित नहीं होगा कि शासन व्‍यवस्‍था केवल और केवल अपने उद्योगों के लिए बाजार बनने का साधन थी। अपना मकसद साधने के लिए अंग्रेजी राज ने वहां की समाज व्‍यवस्‍था के प्रति हेय दृष्टि अपनाई और उन्‍हें अपनी परिभाषा के अनुसार ढालने के लिए अपने मतलब के उपकरण तैयार किए। उन्‍होंने इस‍के लिए पारंपरिक चीजों और मान्‍यताओं के विरुद्ध एक विचार स्‍थापित किया जिसे उन्‍होंने आधुनिकता कहा। आजादी के बाद अंग्रेजी राज के समय की आधुनिकता का बोलबाला बनता चला गया। असल में भारतीय समाज बाजार के अनुसार ढलता चला गया।

जब देश आजाद हुआ तो अंग्रेजी राज की व्‍यवस्‍था लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ने लगी। जिस व्‍यवस्‍था की उम्‍मीद थी, वह स्‍थापित नहीं हो पाई। इसका असर व्‍यक्ति और समाज पर पड़ा। इन्‍हीं परिस्थितियों ने आम आदमी को निराश किया और उसमें असुरक्षा की भावना भी पैदा की। निराशा ने पहले उसे एकाकी बनाया तो बाद में असुरक्षा ने आक्रामक बनाया। सातवें दशक तक का हिंदुस्‍तानी समाज इसी निराशा, एकाकीपन और आक्रोश के बीच झूलता दिखता है। सातवें दशक के अंतिम समय तक यही समाज आक्रामक होने लगता है और आठवें दशक के आखिर में वह तनाशाही से लोहा लेता है। देश में इस तरह की सामाजिक परिस्थिति निर्मित करने के लिए स्‍वतंत्र भारत के नेतृत्‍व को जवाबदेह माना जा सकता है। स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले नेताओं ने आजाद भारत के जिस स्‍वरूप की कल्‍पना की थी, सत्‍ता मिलने के बाद वास्‍तविकता भिन्‍न थी। संघर्ष के दिनों में की गई कल्‍पना साकार नहीं होने पर व्‍यापक जनसमुदाय निराश हो गया था। स्‍वातंत्र्योत्‍तर भारतीय समाज सपने और वास्‍तविकता के बीच के द्वंद्व में फंस गया था। हिंदी कहानी इसी द्वंद्व में उलझे आदमी के सामूहिक मनोभावों को हमारे सामने रखती है।

असल में यह द्वंद्व महात्‍मा गांधी की कल्‍पना के भारत और नेहरू के सपनों के भारत के बीच का है। कहानी को यदि स्‍वतंत्रता प्राप्ति से पहले और स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद के समय में विभाजित करें हमें सबकुछ साफ नजर आएगा।

भारतीय समाज अवतारवाद की कल्‍पना में जीता चला आया समाज है। मजेदार है कि भगवान बुद्ध जिन्‍होंने अपने तात्‍कालिक समाज को पदार्थवादी बनाया था। जिनका मुक्ति संबंधी विचार पारंपरिक विचार से भिन्‍न था। उनके पदार्थवादी चिंतन और मुक्ति या निर्वाण संबंधी विचार के कारण पारंपरिक वैदिक विचारकों ने उन्‍हें वाममार्गी घोषित किया था। इसके बाद भी भारतीय समाज ने उन्‍हें भगवान का दर्जा दिया और बाद में वैष्‍णव विचारकों ने उन्‍हें विष्‍णु के नौवें अवतार के रूप में मान्‍यता दी थी। भगवान बुद्ध ने तात्‍कालिक जीवन और शासन व्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। उपदेश देने से पहले उन्‍होंने स्‍वयं पालन किया और खुद पर ही प्रयोग भी किया था। उसे ग्राह्य और सुगम साबित किया था। यही कारण है कि समाज ने उसे सामूहिक रूप से स्‍वीकार किया था।

ठीक इसी तरह भगवान राम वनवास के लिए भेजे जाते हैं। राजमहल के ऐश्‍वर्य में जीने वाले राम वनवासियों की जीवनशैली अपनाते हैं। कंदमूल फल खाते हैं। राम की यही सादगी, यही त्‍याग भारतीय समाज को भाता है। एक तर्क दिया जाता है कि राम गरीबों के बीच गरीबों की तरह जीने के लिए मजबूर किए गए इसीलिए मजबूर भारतीय समाज ने उन्‍हें दयावश स्‍वीकार किया। भारतीय समाज पारंपरिक रूप से सहज और प्रकृति के साथ साम्‍य रखने वाला समाज है। सहजता ही वह मूल बिंदु है जो भारतीय समाज को राम और बुद्ध की तरफ ले जाता है। गौर करें तो भगवान बुद्ध और राम दोनों जीवन की कसौटी पर एक जगह ही खड़े नजर आते हैं। दोनों अवतारों के व्‍यापक आधार से स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय गांधी को मिले जनसमर्थन का कारण भी साफ हो जाता है। गांधी भी अपनी निजी जीवनशैली और हर बुराई के खात्‍मे के प्रति अडिग रहने की अपनी प्रवृत्ति के कारण व्‍यापक रूप से स्‍वीकृत हुए थे। उन्‍हें उसी भारतीय समाज का आधार मिला था जिसे अवतारवाद का समर्थक माना जाता है। उस समाज ने गांधी के रामराज के नारे पर भरोसा किया था। उसे उम्‍मीद थी कि देश जब आजाद होगा तो उसके सभी दुखों का अंत हो जाएगा। भारतीय समाज के लिए गांधी एक अवतार की तरह थे इसलिए उनके हर आह्वान पर लोग गोलबंद हो रहे थे। आजादी के बाद गांधी की कल्‍पना का भारत खो गया। उसकी जगह एक ऐसी व्‍यवस्‍था आकार ले रही थी जिसमें आदमी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा था। यही वह परिस्थिति थी, जिसमें नई कहानी उठ खड़ी हुई थी।

जिन सामाजिक परिस्थितियों को नई कहानी आंदोलन की कहानियां हमारे सामने रखती हैं, उसके लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है। लेकिन मजेदार है कि नई कहानी के कथाकार त्रयी में से एक राजेंद्र यादव ने करीब ढाई दशक पहले एक विचार गोष्‍ठी में कहा था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद देश में कोई विजनरी नेता नहीं हुआ। राजेंद्र यादव के मुताबिक, नेहरू के विजन ने देश की समाजव्‍यवस्‍था, अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभावित किया था। राजेंद्र यादव ने नेहरू के सपने के भारत को सत्‍य मानते हुए उनके विजन के संबंध में यह विचार व्‍यक्‍त किया था। जीवन में बदलाव आया, उद्योगों की आधारशिला रखी गई, विकास के काम शुरू हुए और शहरों का विकास होने लगा। इन सभी बदलावों के मूल में नेहरू के विजन को मुख्‍य कारक माना जाता है। यह निर्विवाद सत्‍य है कि आजादी के बाद हुए विकास का लोगों के जीवन पर कई रूपों में असर पड़ा। लेकिन भारतीय समाज पर विकास का नकारात्‍मक असर भी पड़ा। लोगों में निराशा बढ़ी और जीवन की शर्तें आसान होने की जगह और दुरूह होती चली गईं। बेहतर जीवन की उम्‍मीद में लोग शहर की ओर बढ़ने लगे थे, लेकिन वहां उनके लायक रोजगार नहीं थे। अकेले आ रहे लोग अकेले हो रहे थे और जीवन का, पीछे छूटे परिवार की उम्‍मीदों का बोझ उठाए चल रहे थे। ऐसे में भारतीय जनमानस में निराशा का पनपना स्‍वाभाविक था। निराशा के उसी वातावरण से जूझ रहे शहरी समाज का चेहरा छठे दशक के मध्‍य में आई कहानियों में दिखाई देता है। कहा जा सकता है कि आजादी के बाद जो सामाजिक परिस्थिति विकसित हुई थी, वह नेहरू के विजन की ही देन थी।

नेहरू के सपनों के भारत में पश्चिम का ऐश्‍वर्य था। वह भारत को ब्रिटेन और दिल्‍ली को लंदन बनाना चाहते थे। यही गांधी और नेहरू के बीच का अंतर था। जब आजादी आसन्‍न हो गई थी, तब भावी भारत के स्‍वरूप को लेकर गांधी और नेहरू दो भिन्‍न सिरों पर खड़े हो चुके थे। नेहरू के सपनों का भारत जिस भ्रष्‍टाचार में डूबने वाला था, उसकी झलक मिलने लगी थी और कांग्रेस में जो लोग खादी पहन अपने लिए जगह बना रहे थे, वे आने वाले दिनों का संकेत दे रहे थे। इस स्थिति को फणीश्‍वरनाथ रेणु ने अपने उपन्‍यास ‘मैला आंचल’ में रखा है।

‘मैला आंचल’ का बामन दास गांधीवादी विचारधारा पर अडिग रहने वाला वह मनुष्‍य है, जिसे आजाद भारत या यह कहिए कि नेहरूबियन मॉडल का भारत बेकार या आउट डेटेड मान रहा है। ‘मैला आंचल’ में आजादी के आसपास के समय में गलत लोगों को कांग्रेस का नेता बनते दिखाया गया है। इस उपन्‍यास के अंतिम पड़ाव में भारत और पूर्वी पाकिस्‍तान के बीच चल रही तस्‍करी और उससे जुड़े लोगों को दर्शाया है। बैलगाडि़यों पर तस्‍करी का सामान ले जाया जा रहा है। नागर नदी को दोनों देशों की सीमा मान ली गई है। इसी नदी के चोर घाट से बैलगाडि़यां पार कराई जाती हैं। इस तस्‍करी में सप्‍लाई इंस्‍पेक्‍टर, हवलदार, सिपाही सभी मिले हुए हैं। इसका लीडर दुलारचंद कापरा है, जो अफसरों को मोरंगिया शराब (बिहार के सीमावर्ती इलाके में नेपाल को मोरंग कहा जाता है) परोसता है। कटहा का दुलारचंद जुआ घर चलाता है और मोरंगिया ल‍ड़कियों, गांजा शराब का कारोबार करता रहा है। वह कपड़ा, चीनी, सीमेंट पूर्वी पाकिस्‍तान भेजता है। यही दुलारचंद कापरा कटहा थाना कांग्रेस कमेटी का अध्‍यक्ष भी बन गया है। यहां दुलारचंद आजाद भारत में निचले स्‍तर पर शासकों के चरित्र की झलक देता है। इसके माध्‍यम से रेणु ने यह बताया है कि देश तो बस अंग्रेजी चंगुल से आजाद हुआ, लेकिन उसकी व्‍यवस्‍था से उसे मुक्ति नहीं मिल सकी।

नेहरू यूरोप के जिस वैभव से बंधे थे, गांधी पश्चिम के उसी ऐश्‍वर्य के विरुद्ध खड़े थे। गांधी भारतीय समाज के अनुरूप साबित हो रहे थे इसलिए उन्‍हें हर वर्ग का समर्थन प्राप्‍त हुआ था। प्रेमचंद ने अपने उपन्‍यास ‘रंगभूमि’ में सूरदास के माध्‍यम से गांधी के इसी रूप को सामने रखा है। आलोचकों की दृष्टि में यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के बीच के टकराव को सामने रखता है। लेकिन यह उपन्‍यास दो संस्‍कृतियों के वैचारिक टकराव तक ही सीमित नहीं है। यह बाजार में गांधीवाद के गुम हो जाने की दास्‍तां को भी सामने रखता है।

भारत में अंग्रेजी सामान या भारत को अपना बाजार बनाने के क्रम में अंग्रेजों ने आधुनिकता के बारे में जो दृष्टि फैलाई थी, इस उपन्‍यास में सूरदास उसी दृष्टि के खिलाफ भारतीय विचारधारा के प्रतीक के रूप में खड़े हैं। गौर किया जाए तो सूरदास उसी आधुनिक भोगवादी लालसा से लिप्‍त आधुनिक समाज के विरुद्ध दिखाई देते हैं। इस उपन्‍यास का नायक सूरदास उस भारतीय समाज का प्रतिनिधित्‍व कर रहे हैं, जो दूसरों के लिए त्‍याग करना धर्म समझता है। वह अपनी जमीन की कीमत नहीं देखते, अपने दुखों से मुक्ति पाने के लिए वह जमीन की ऊंची कीमत की लालसा नहीं पालते। जमीन पर मि. जान सेवक की नजर पड़ जाती है और वह उन्‍हें पांच रुपये देने लगता है। बग्‍गी के साथ मीलों दौड़ता चले आए सूरदास यह कहते हुए रुपये लेने से इन्‍कार कर देते हैं, ‘धर्म में आपका स्‍वार्थ मिल गया, अब यह धर्म नहीं रहा।’

इन दोनों उपन्‍यासों और उसके गांधीवादी नायकों का जिक्र इसलिए किया है कि दोनों के गांधीवादी नायक उसी शहरी प्रपंच के शिकार हो जाते हैं, जिसमें आजाद भारत का आम आदमी फंस गया है। दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो गांधी और गांधीवाद जिस बाजार के खिलाफ खड़े थे, आजाद भारत में उसी गांधीवाद को औद्योगिक साम्राज्‍य का बाजार निगल जाता है और बदलती सत्‍ता उन्‍हें समय-समय पर अप्रासंगिक करार देती रहती है। दोनों उपन्‍यासों में दोनों कहानीकारों ने प्रतीकात्‍मक ढंग से गांधीवाद की इसी स्थिति को दर्शाया है।

‘मैला आंचल’ के बामन दास नेहरूबियन मॉडल के भारत के विरोध में खड़े हो जाते हैं और नेहरूबियन मॉडल का भारत उन्‍हें कुचलकर मार डालता है। उनकी लाश नागर नदी के पार पूर्वी पाकिस्‍तान में फेंक दी जाती है। दूसरी तरफ के सिपाही बामन दास की लाश को नदी में प्रवाहित कर देते हैं और उनका झोला भारतीय सीमा में एक पीपल के पेड़ पर टांग देते हैं। समय के थपेड़े में झोला चीथड़ा हो जाता है और लोग पीपल को चे‍थरिया पीर समझने लगते हैं। फिर वहां पेड़ में कई चीथड़े लटक जाते हैं। ‘रंगभूमि’ में उद्योग से गांव का समाज बदल जाता है। लोगों का आपसी व्‍यवहार बदल जाता है और नायक सूरदास का अंत होता है, लेकिन उनके हठ और जनोन्‍मुखी स्‍वभाव के कारण उनकी मूर्ति लगाई जाती है। एक दिन उनकी प्रतिमा को उद्योग समर्थक राजा क्षतिग्रस्‍त कर देता है।

रेणु ने तो आजादी के बाद ‘मैला आंचल’ लिखा था, लेकिन प्रेमचंद ने ‘रंगभूमि’ आजादी से बहुत पहले लिखा था। तत्‍कालीन परिस्थितियों को देख प्रेमचंद भावी भारत के स्‍वरूप के बारे में सटीक अनुमान लगा बैठे थे। जिस समय ‘रंगभूमि’ की रचना हुई थी, उस समय आजादी के लिए संघर्ष ही चल रहा था। आजादी आसन्‍न भी नहीं थी, लेकिन प्रेमचंद ने यही कल्‍पना की थी कि यह देश गांधी को प्रतिमाओं में समेट देगा और उसी बाजार के व्‍यामोह में जा फंसेगा, जिसके खिलाफ गांधी खड़े हैं।

आजाद भारत में आधुनिक कौन इसकी परिभाषा बदल जाती है। शिक्षा और ज्ञान आधुनिक होने की पहचान के सबसे निचले पायदान पर आते हैं, लेकिन पहनावा आदमी को समाज में प्रतिष्‍ठा दिलाता है। नई पीढ़ी की नजर में खादी पहनना पिछड़ेपन की निशानी बन चुका है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपने से अलग मानती है। मूल्‍यों और मान्‍यताओं में आए इस बदलाव को दीप्ति खंडेलवाल ने अपनी कहानी ‘मूल्‍य’ में बेहतर तरीके से चित्रित किया है – ‘ओ माई गॉड ! पिताजी, क्‍या हुलिया बनाए रहते हैं आप भी ? ढंग के कपड़े तो पहना कीजिए। कितनी बार आपको बताया कि टेरीकॉट का एक सूट बनवा लीजिए, तो झंझट मिटे। लेकिन आप तो खादी की लादी लादे रहेंगे और उन पर मां प्रेस करेगी, लोटे में कोयला डालकर। क्‍या आप लोगों के लिए ढंग से रहने की कोई वैल्‍यू नहीं ?’

वैल्‍यू ?
मूल्‍य ?

पंडित जी भरपूर नजर से बेटे को देखते हैं। टेरीकॉट की तंग पैंट और ब्‍लाउजनुमा चुस्‍त बुशर्ट में कलमें बढ़ाए यह उनका अपना खून कितने निर्द्वंद्व भाव से उन्‍हें मूल्‍यों का अर्थ समझा रहा है।1

इस तरह के बदलाव का शहरी जीवन और परंपरागत पेशा पर बुरा असर पड़ा था। बदीउज्‍जमा ने ‘चौथा ब्राह्मण’ कहानी संग्रह में ‘मिटते साए’ कहानी में इसी स्थिति को दर्शाया है। ये दोनों कहानियां आठवें दशक की हैं। इस दशक तक आते-आते हर दो-तीन साल बाद मानदंडों में तेजी से बदलाव आता है। इन बदलावों का कारण वैज्ञानिक उन्‍नति, औद्योगिक प्रगति, महानगरीय सभ्‍यता का तेजी से विकास, शिक्षा और कला आदि में परिवर्तन था। इन सबके मूल में पश्चिम का भौतिकवादी चिंतन था। जिस तरह की सोच और जिस तरह के चिंतन से महानगरीय संस्‍कृति लैस थी, उसमें पुराने मूल्‍यों और संस्‍कारों के लिए कोई जगह नहीं थी। महानगरों में रहने वाले और रहने आए लोगों ने अपने अनेक संस्‍कारों के विपरीत नई जीवन पद्धति अपनाई। इस बदलाव ने समाज को दिखावे के अध्‍यात्‍म से बांधा। यह अध्‍यात्‍म भी भौतिकता के रंग में डूबा और उसने भी बाजार बनाया। उस बाजार में आज के कई साधु-संत दिखते हैं।

शहरीकरण ने संयुक्‍त परिवार को तोड़ा, परिवार में भी तनाव, फूट और संबंधों में बिखराव पैदा हुआ। इसी स्थिति ने अकेलापन, सूनापन, बेगानापन और जटिलताओं को न केलव जन्‍म दिया, बल्कि उसे पाला भी। गोविंद मिश्र की ‘कचकौंध’ कहानी में पंडित जी जैसे पात्र इस व्‍यथा से पीडि़त हैं कि शहर आकर उनके बेटे-पोते उन सब प्रतिमानों को ध्‍वस्‍त कर रहे हैं, जिसका उन्‍होंने जीवनभर निष्‍ठापूर्वक पालन किया है। उन्‍हें लगता है कि शहर में आ गई उनकी अगली पीढ़ी ‘हर चीज को मटियामेट कर रही है।’2

इस नए पनप रहे समाज ने आठवें दशक में ही वैवाहिक संबंधों को लेकर भी भिन्‍न विचार को जगह दे दी थी। रमेश बक्षी ने ‘पिता दर पिता’ कहानी में इसे बखूबी दर्शाया है। कहानी की नायिका एनी विवाह को स्‍त्री के स्‍वतंत्र अस्तित्‍व के लिए हानिकारक मानती हुई कहती है, ‘विवाह का अर्थ खुद को समाप्‍त करना है।’3

बाजार के प्रभाव में सबसे पहले नगर ही आए। नगर से ही नई सोच का प्रसार शुरू हुआ। नौवें दशक के पहले तक टेलीविजन सिर्फ महानगर तक ही सीमित था। प्रचार का सबसे बड़ा माध्‍यम रेडियो था और दृश्‍य श्रव्‍य के रूप में सिनेमा। ऐसे में दबे पांव नई धारणाएं और विचार कस्‍बों तक पहुंचे। नगरों में नए-नए बोधों का जन्‍म हुआ। भैरू लाल गर्ग ने इस संबंध में लिखा है- ‘आधुनिकता, परंपरा से मुक्ति के लिए प्रयत्‍न, कृत्रिम जीवन प्रणाली, कालाबाजारी, अनैतिकता, काम की उग्रभूख, जीवन मूल्‍यों और जीवन दृष्टि में तीव्र परिवर्तन, संबंधों में परिवर्तन, प्राचीनता और नवीनता के मध्‍य संघर्ष, अपरिचय ऊब, अकेलापन, अविश्‍वास, फिट न होने की स्थिति, क्षण बोध, स्‍त्री-पुरुष का जूझना और अंत में टूटना, दिग्‍भ्रम आदि स्थितियों का प्रादुर्भाव हुआ है।’4

हिंमाशु जोशी की कहानी ‘कोई एक मसीहा’ में आजाद भारतीय राजनीतिक का चेहरा सामने रखा गया है। जनता के प्रतिनिधि सुरेश भाई आश्रम का निरीक्षण करने पहुंचे हैं। उनका ध्‍यान वहां की सुंदर कन्‍याओं पर है। आश्रम की संचालिका उनकी सेवा में सावित्री नाम की लड़की को भेज देती है। सुरेश भाई सावित्री को भी शराब पिलाते हैं और रात भर उसकी सेवा लेते हैं। सुबह जब जाने लगते हैं तो उसे खादी की धोती पुरस्‍कार में देने के लिए कह जाते हैं।5

गिरिराज किशोर की कहानी ‘मंत्रीपद’ में नेताओं के स्‍वार्थ को उजागर किया गया है। कहानी के पंडित भूतपूर्ण मंत्री और मौजूदा सांसद हैं। यह नेता बातें तो आदर्श की करते हैं, लेकिन व्‍यवहार में अत्‍यंत कुटिल हैं। पंडित जी कहते हैं, ‘बड़ा दुख होता है। मंत्री लोग शाहों में नौकरशाह हैं। जनतंत्र में नौकरशाह ही सबसे बड़ा शाह होता है। बाकी तो सब गुलाम हैं। वे लोग जनता चुने गए प्रतिनिधियों जैसा व्‍यवहार नहीं करते। उनका जनता से कोई संपर्क नहीं है। इनका तामझाम राजकुमारों वाला है। गांधी जी की आत्‍मा क्‍या कहती होगी। क्‍या मैंने इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ी थी। पटेल की आत्‍मा रोती होगी। जब राजकुमारों को रहना ही था तो बेकार ही मैंने उन कदमी राजवाड़ों का खात्‍मा किया। धत्‍त तेरी की।’

गिरधर गोपाल की कहानी ‘मुझे बचाओ’ में स्‍वतंत्रता के बाद के भ्रष्‍टाचार का चित्रण किया गया है। सोमेश एक ईमानदार नागरिक है और आजादी की लड़ाई लड़ता है। देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार को देखकर सोमेश कहता है, ‘यहां आदमी इतना गिर चुका है कि थोड़े से लाभ के लिए देश का बड़े से बड़ा अहित करने में उसे शर्म नहीं आती। ईमान बेच सकता है और ईमान खरीद सकता है।’ स्थिति को देख सोमेश कहता है, ‘खादी और गांधी टोपी भ्रष्‍टाचार की ध्‍वजा बन गई है।’

इन कहानियों में जिस समाज और जिस राजनीतिक, प्रशासनिक व्‍यवस्‍था की तस्‍वीर को कहानीकारों ने समाज के सामने पेश किया है, वह उसका यथार्थवादी चेहरा है। यह पूरी व्‍यवस्‍था बाजार में खड़े सक्षम खरीदार और अक्षम खरीदार के बीच के भेद को स्‍पष्‍ट करता है। सच तो यही है कि आजादी के बाद बाजार में हेराए गांधीवाद को हिंदी कहानी ने परखा और पेश किया है।

संदर्भ संकेत

1 संपादक योगेंद्र कुमार (लल्‍ला) : श्रीकृष्‍ण, हिंदी लेखिकाओं की श्रेष्‍ठ कहानियां (कहानी संग्रह), राष्‍ट्रभाषा प्रकाशन 1991, पृष्‍ठ 38
2 गोविंद मिश्र, कचकौंध, सारिका 1972
3 रमेश बक्षी, पिता दर पिता, रूपांबरा प्रकाशन, इलाहाबाद, 1971, पृष्‍ठ 24
4 भैरू लाल गर्ग, स्‍वातंत्र्योत्‍तर हिंदी कहानी में सामाजिक परिवर्तन, चित्रलेखा प्रकाशन, 1979
5 हिंमाशु जोशी, चर्चित कहानिया, कोई एक मसीहा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्‍ली

साभार : अभि‍मत

शिक्षा किसलिए है? : डेविड ओर

आधुनिक शिक्षा की नींव के छह भ्रम, और उन्हें बदलने के लिए छह नए सिद्धांत

डेविड ओर

हम सीखने को अपने-आप में अच्छा मानने के आदी हैं। मगर जैसा पर्यावरण शिक्षक डेविड ओर बताते हैं, हमारी अब तक की शिक्षा ने एक तरह से एक दानव को पैदा किया है. यह निबंध उनके 1990 में अरकांसस कॉलेज के अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को दिए गए वक्तव्य में से लिया गया है। इसे पढ़कर हमारे ऑफिस में कई लोगों को लगा कि ऐसे भाषण कॉलेज जीवन की शुरूआत के बजाय आखिर में क्यों कराए जाते हैं।

डेविड ओर मीडोक्रीक प्रोजेक्टके संस्थापक हैं, जो फॉक्स, एरिज़ोना, में एक पर्यावरण शिक्षा केंद्र है, और वे ओहायो के ओबर्लिन कॉलेज में शिक्षक भी हैं। आर्क इंटरनेशनल के त्रैमासिक पत्र ऐनल्स ऑफ़ अर्थ, वॉल्यूम VIII, नं. 2 से पुनर्प्रकाशित-

अगर आज पृथ्वी का कोई औसत दिन है, तो आज हम 116 वर्ग मील वर्षावन खो देंगे, यानी लगभग एक एकड़ प्रति सेकंड। इंसानों के कुप्रबंधन और अत्यधिक जनसंख्या के कारण बढ़ते हुए रेगिस्तानों के सामने हम 72 वर्ग मील वन और खो देंगे। आज हम 40 से 100 प्रजातियां खो देंगे, और कोई नहीं जानता है कि यह संख्या 40 है या 100। आज इंसानों की आबादी में 2,50,000 लोग और जुड़ जाएंगे। और आज हम 2,700 टन क्लोरोफ्लोरोकार्बन और डेढ़ करोड़ टन कार्बन वायुमंडल में डाल देंगे। आज रात पृथ्वी थोड़ी और गर्म हो जाएगी, इसका पानी थोड़ा और अम्लीय हो जाएगा, और जीवन का ताना-बाना थोड़ा और उधड़ जाएगा।

सच तो यह है कि ऐसी अधिकांश चीजें गंभीर खतरे में हैं, जिन पर आपके भविष्य का स्वास्थ्य और सम्पन्नता टिके हैं- पर्यावरणीय स्थिरता, प्राकृतिक तंत्रों की सहनशीलता और उत्पादकता, प्राकृतिक जगत की सुन्दरता, और जैव विविधता।

ध्यान देने लायक बात यह है कि यह सब कुछ अनपढ़ अज्ञानी लोगों का करा-धरा नहीं है। यह अधिकांशतः BA, BS, LLB, MBA जैसी ऊंची डिग्रियों वाले लोगों की करतूतों का परिणाम है। पिछले साल मोस्को के ग्लोबल फोरम में एली वीसल ने ऐसा ही कुछ कहा था, जब उन्होंने कहा कि नाज़ी होलोकॉस्ट की क्रूरता के योजनाकार और कर्ता, इमैनुएल कांट और योहान गेटे जैसे लोगों की धरोहर के उत्तराधिकारी थे। कई मामलों में जर्मन लोग दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षित लोगों में से थे, मगर उनकी शिक्षा उनकी बर्बरता को रोकने में नाकाम रही। उनकी शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? वीसल के शब्दों में, उनकी शिक्षा में “मूल्यों के बजाय थ्योरी की ज्यादा अहमियत थी, मनुष्यों के बजाय अवधारणाओं की, प्रश्नों के बजाय उत्तरों की, और विवेक के बजाय विचारधारा और कार्यक्षमता की।”

हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक जगत के बारे में हमारी शिक्षा ने हमें भी ऐसा ही सोचने का आदी बनाया है। यह कोई मामूली बात नहीं है कि इस ग्रह पर लम्बे समय तक सामंजस्य और स्थिरता से रहने वाले लोग पढ़ नहीं सकते थे, या कम-से-कम पढ़ने की हवस नहीं रखते थे। मेरा कहने का तात्पर्य इतना है कि शिक्षा अपने आप में सभ्यता, बुद्धिमता या विवेक नहीं देती है। इसी तरह की शिक्षा जारी रखने से हमारी समस्याएं बढ़ने वाली ही हैं। मैं अज्ञानता की वकालत नहीं कर रहा हूं, बल्कि यह कह रहा हूं कि अब हमें शिक्षा का मोल सभ्य समाज के निर्माण और मनुष्यों के बचे रहने के पैमानों पर नापना होगा- 1990 और इसके बाद के दशकों में हमारे सामने मौजूद ये दो सबसे बड़े मुद्दे हैं।

सही साधन, वहशी उद्देश्य

आधुनिक संस्कृति और शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? साहित्य में कुछ उत्तर मिलता है-  क्रिस्टफर मार्लो का फॉस्ट, जो ज्ञान और शक्ति पाने के लिए अपनी आत्मा बेच देता है; मैरी शेली का डॉक्टर फ्रेंकेंस्टाइन, जो अपने सृजन की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर देता है; हर्मन मेलविल का कैप्टेन अहाब जो कहता है- “मेरे सारे साधन सही हैं, मेरी मंशा और उद्देश्य वहशी हैं।” इन पात्रों में हम आधुनिक समाज की प्रकृति को जीत लेने की उन्मादी हवस दिखती है।

ऐतिहासिक रूप से, फ्रांसिस बेकन ने ज्ञान और शक्ति का जो समागम सुझाया था, वह आज की सरकारों, उद्योगों और ज्ञान की मिलीभगत का पूर्व-सूचक था जिसकी वजह से इतना विनाश हुआ है। गैलिलीयो का बुद्धिमता को ऊंचा स्थान दिलाना विश्लेषक दिमाग का रचनात्मकता, हास्य और आतंरिक पूर्णता पर हावी होने का पूर्व-सूचक था। और देकार्ते की ज्ञानमीमांसा में स्वयं और वस्तु के जबरदस्त अलगाव की जड़ें दिखती हैं। इन तीनों ने मिलकर आधुनिक शिक्षा की नींव रखी, ऐसी नींव जो उन भ्रमों का हिस्सा बन चुकी है जिन्हें हम बिना सवाल किए स्वीकार कर चुके हैं। मैं ऐसे छह भ्रम बताऊंगा।

पहला भ्रम यह है कि अज्ञानता की समस्या सुलझाई जा सकती है। अज्ञानता की समस्या सुलझाई नहीं जा सकती है, बल्कि यह मानवीय अस्तित्व का अभिन्न अंग है। ज्ञान की बढ़ोतरी अपने साथ हमेशा किसी दूसरे तरह की अज्ञानता भी बढ़ाती है। 1930 में जब टॉमस मिज्ले जूनियर ने CFC खोजे, तो अभी तक जो सिर्फ एक मामूली अज्ञानता थी, अब वह मनुष्य की जीवमंडल (biosphere) के बारे में समझ की एक बेहद गंभीर और घातक कमी के रूप में उभरी। 1970 की शुरूआत तक किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि “यह पदार्थ किस चीज को कैसे प्रभावित करता है?” और 1990 तक CFC से वैश्विक स्तर पर ओजोन परत पतली हो चुकी थी। CFC की खोज की वजह से हमारा ज्ञान बढ़ा; मगर एक फैलते हुए वृत्त की परिधि की तरह हमारी अज्ञानता भी बढ़ी।

दूसरा भ्रम यह है कि पर्याप्त ज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ हम पृथ्वी का प्रबंधन कर सकते हैं। “पृथ्वी का प्रबंधन करना” सुनने में बहुत अच्छा लगता है। यह हमारे कंप्यूटर, बटनों और गैजेटों के प्रति आकर्षण को बढ़ाता है। मगर पृथ्वी और इसके जैविक तंत्रों की जटिलता का कभी भी सुरक्षित प्रबंधन नहीं किया जा सकता है। हमें तो अभी ऊपरी मिट्टी के सबसे ऊपरी इंच की पारिस्थिकी (ecology) के बारे में ही ज्यादा कुछ नहीं पता है, और ना ही इसका जीवमंडल के विशाल तंत्रों के साथ सम्बन्ध के बारे में।

अगर किसी चीज का प्रबंधन किया जा सकता है तो वह हम  हैं: मानवीय इच्छाएं, आर्थिकी, राजनीति, और समुदाय। मगर राजनीति, नैतिकता और व्यावहारिक बुद्धि जो कठिन विकल्प सुझाते हैं, हम उनसे आंखें चुराते रहते हैं। यह कहीं ज्यादा बुद्धिमता भरा है कि हम खुद को एक सीमित ग्रह के अनुरूप ढाल लें। बजाय कि इस ग्रह को अपनी असीमित इच्छाओं के अनुरूप बदलें।

तीसरा भ्रम यह है कि ज्ञान बढ़ रहा है और इसके साथ मानवीय अच्छाई भी बढ़ रही है। अभी एक सूचना क्रान्ति हो रही है, जिससे मेरा तात्पर्य है डाटा, शब्द, कागज़ से। मगर इस सूचना क्रान्ति को ज्ञान या विवेक की क्रान्ति मानना बेवकूफी होगा, जिसे इतनी आसानी से नापा नहीं जा सकता है। सच तो यह है कि कुछ प्रकार का ज्ञान बढ़ रहा है और दूसरे प्रकार का ज्ञान खो रहा है। डेविड एहरन्फील्ड ने बताया है कि जीव विज्ञान विभाग अब वर्गीकरण-विज्ञान (taxonomy) और पक्षी-विज्ञान में नए लोगों को नहीं ले रहा है। यानी मॉलिक्यूलर बायोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग, जो आकर्षक हैं मगर ज्यादा जरूरी नहीं, उन पर अत्यधिक जोर के कारण दूसरे तरह का महत्वपूर्ण ज्ञान खो रहा है। हमारे पास अभी भी भूमि स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरी विज्ञान नहीं है, जिसका आह्वान अल्डो लियोपोल्ड ने आधी सदी पहले किया था।

हम केवल कुछ ही क्षेत्रों में ज्ञान नहीं खो रहे हैं, बल्कि समुदायों का पारंपरिक ज्ञान भी खो रहे हैं। बैरी लोपेज़ के शब्दों में:-

“मैं यह निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य हो रहा हूं कि अगर खतरनाक नहीं तो कुछ अजीब जरूर हो रहा है। साल-दर-साल जमीनी अनुभव रखने वाले लोगों की संख्या घट रही है। ग्रामीण लोग शहर पलायन कर रहे हैं… यह व्यक्त कर पाना मुश्किल है, पर व्यक्तिगत और स्थानीय ज्ञान के पतन के इस दौर में, वह ज्ञान जिस पर वास्तविक समुदाय टिका होता है और जिस पर आखिरकार एक देश को खड़ा होना होता है, बहुत खतरनाक और असहज होता जा रहा है।”

सूचना और ज्ञान की इस भ्रान्ति में एक गहरी भूल छुपी हुई है, जो यह है कि ज्यादा सीखने से हम बेहतर इंसान बन जाएंगे। मगर सीखना, जैसा लोरेन ईज़्ली ने एक बार कहा था, अंतहीन है और “यह अपने-आप हमें ज्यादा नैतिक इंसान नहीं बना पाएगा1” आखिर में, बाकी सभी क्षेत्रों में हमारे विकास के कारण सबसे ज्यादा खतरा अच्छाई की हमारी समझ को है। सभी चीजों को मद्देनजर रखते हुए यह संभव है कि हम लोग ऐसी चीजों के बारे में अज्ञानी होते जा रहे हैं जो पृथ्वी पर सामंजस्य और स्थिरता से जीने के लिए जरूरी हैं।

उच्च शिक्षा का चौथा भ्रम है कि हम जो कुछ भी बिगाड़ चुके हैं, उसे फिर से पर्याप्त रूप से बहाल किया जा सकता है। आधुनिक पाठ्यक्रम में हमने प्रकृति को अलग-अलग अकादमिक विशेषज्ञताओं के टुकड़ों में बांट दिया है। इसलिए 12, 16 या 20 साल की शिक्षा के बाद अधिकतर छात्र सभी चीजों की परस्पर एकता की मोटी-मोटी समझ बनाए बिना ही स्नातक हो जाते हैं। उनके व्यक्तित्व और इस ग्रह के लिए इसके बहुत भीषण परिणाम होते हैं। उदहारण के लिए, हम लगातार ऐसे अर्थशास्त्री पैदा करते हैं जिन्हें पारिस्थिकी की बुनियादी जानकारी भी नहीं होती है। इससे पता चलता है कि क्यों हमारे राष्ट्रीय आर्थिक लेखा-जोखा तंत्र में सकल राष्ट्रीय उत्पाद (gross national product- GNP) से जैविक क्षति, भू-क्षरण, वायु-जल प्रदूषण, और संसाधनों का दोहन घटाया नहीं जाता है। हम 25 किलोग्राम गेहूं की कीमत तो GNP में जोड़ते हैं, लेकिन उसको उगाने में जो 75 किलोग्राम मिट्टी की ऊपरी परत नष्ट हुई है, उसे घटाना भूल जाते हैं। ऐसी अपूर्ण शिक्षा के कारण हमें लगता है कि हम दिन-ब-दिन संपन्न होते जा रहे हैं।

पांचवा भ्रम यह है कि शिक्षा का उद्देश्य आपको समाज में अपनी हैसियत ऊपर उठाना और सफल होने के औजार देना है। टॉमस मर्टन ने कहा था कि यह “ऐसे लोगों का व्यापक उत्पादन है जो कुछ भी करने लायक नहीं है, सिवाय एक विस्तृत और पूर्ण रूप से कृत्रिम ढोंग में भाग लेने के।” जब मर्टन से उनकी सफलता के बारे में लिखने को कहा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया, “अगर मैंने कभी कोई सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखी तो यह एक दुर्घटना मात्र थी, मेरी लापरवाही और अबोधता के कारण, और मैं बहुत ध्यान रखूंगा कि ऐसी गलती दोबारा न हो।” छात्रों को उनकी सलाह थी, “तुम जो बनना चाहते हो बनो, पागल, शराबी, हर किस्म का लफंगा, मगर एक चीज से हर कीमत पर दूर रहना: सफलता।”

सीधी सी बात यह है कि इस ग्रह को ज्यादा ‘सफल’ लोग नहीं चाहिए. मगर इसे शांतिदूतों, जख्म भरने वालों, पुनर्वास करने वालों, कहानियां सुनाने वालों, और हर किस्म के आशिकों की जरूरत है। इसे जरूरत है ऐसे लोगों कि जो जहां भी रहते हैं, अच्छे से रहना जानते हैं। इसे नैतिक साहस वाले ऐसे लोगों की जरूरत है जो इस दुनिया को मानवीय और रहने लायक बनाने की लड़ाई में हिस्सा लेने को राजी हैं। और ये सारी चीजें उस सब से कोसों दूर हैं, जिसे हमारी संस्कृति ‘सफलता’ मानती है।

आखिर में, हमें भ्रम है कि हमारी संस्कृति मानवीय उपलब्धि का चरम बिंदु है:- केवल हम ही आधुनिक, तकनीक-विज्ञ, और विकसित हैं। जाहिर है कि यह सांस्कृतिक घमंड का सबसे घटिया स्वरूप है, और साथ ही इतिहास और मानव-शास्त्र की गलत समझ भी। हाल ही में इस घमंड ने नया रूप ले लिया है- ‘हमने शीत युद्ध जीत लिया है और पूंजीवाद ने साम्यवाद को पूर्ण रूप से हरा दिया है।’ साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि वह बहुत अधिक कीमत पर बहुत कम उत्पादन करता था। मगर पूंजीवाद भी असफल ही है, क्योंकि यह यह बहुत ज्यादा उत्पादन करता है, बहुत कम बांटता है, और हमारे बच्चों और पोते-पोतियों की पीढ़ियों से बहुत बड़ी कीमत वसूलता है। साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसमें अभाव की नैतिकता थी। पूंजीवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि यह नैतिकता को ही समाप्त कर देता है। यह वह हसीन दुनिया नहीं है जो गैर-जिम्मेदार विज्ञापन निर्माता या राजनेता हमें दिखाते हैं। हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत संपत्ति है और बढ़ती हुई गरीब आबादी के पास भीषण विपन्नता है1 अपने सबसे वीभत्स रूप में यह दुनिया गलियों में पसरे नशे, अतृप्त हिंसा, अनैतिकता और सबसे विकराल तरह की गरीबी से भरी हुई है। सच तो यह है कि हम एक बिखरती हुई संस्कृति में जी रहे हैं. ‘होलिस्टिक रिव्यु’ के संपादक रॉन मिलर के शब्दों में:-

“हमारी संस्कृति मनुष्यों की अच्छाई और उत्कृष्टता का पोषण नहीं करती है। यह दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता, सौन्दर्यबोध या आध्यात्मिक संवेदना विकसित नहीं करती है। यह कोमलता, उदारता, दूसरों का ख्याल रखना और करुणा प्रोत्साहित नहीं करती है। बीसवीं सदी का अंत आते-आते आर्थिक-तकनीकी-सांख्यिकीवादी नजरिया बड़ी क्रूरता से इंसानों में वह सब कुछ नष्ट कर रहा है जो प्रेमपूर्ण और जीवनदायी है।”

शिक्षा किसलिए होनी चाहिए

इंसानी जीवन संजोए रखने के उद्देश्य से, हम शिक्षा पर पुनर्विचार कैसे कर सकते हैं? मैं छह सिद्धांत सुझा रहा हूं-

पहला, सारी शिक्षा पार्यावरण शिक्षा है। हम शिक्षा में क्या शामिल करते हैं और क्या नहीं, इससे हम छात्रों को यह सिखाते हैं कि वे प्राकृतिक जगत हिस्सा हैं या उससे अलग. उदहारण के लिए, ऊष्मागतिकी (thermodynamics) या पारिस्थिकी के नियमों को सिखाए बिना अर्थशास्त्र पढ़ाने से छात्रों को एक महत्वपूर्ण बुनियादी सीख मिलती है:- कि भौतिकी और पारिस्थिकी का अर्थव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है। यह साफ़ तौर पर गलत है।1 यही बात पाठ्यक्रम के अन्य विषयों पर भी लागू होती है। दूसरा सिद्धांत ग्रीक अवधारणा पाइडेआ (paideia) से आता है। शिक्षा का उद्देश्य विषय-वस्तु पर नहीं, बल्कि स्वयं पर महारथ पाना है। विषय-सामग्री तो साधन मात्र है। जिस तरह हथौड़ी और छेनी से कोई व्यक्ति पत्थर या लकड़ी को आकार देता है, उसी तरह विचारों और ज्ञान को हम अपना चरित्र ढालने के लिए इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर समय हम साधन और साध्य में भ्रमित रहते हैं, और यह सोचते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ छात्र के मस्तिष्क में हर तरह के तथ्य, सूचना, पद्धतियां, तरीके ठूंसना है, भले ही इनका इस्तेमाल किसी भी उद्देश्य के लिए किया जाए। ग्रीक इस बारे में बेहतर समझ रखते थे।

तीसरा, ज्ञान अपने साथ यह जिम्मेदारी भी लेकर चलता है कि संसार में उसका उपयोग भले उद्देश्यों के लिए किया जाएा आज किए जाने वाले अधिकांश शोध मैरी शेली के उपन्यास जैसे हैं: तकनीक-जनित दानव जिनके लिए कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है और न किसी से जिम्मेदारी लेने की उम्मीद की जाती है। लव कैनाल किसकी जिम्मेदारी है? चर्नोबिल? ओजोन का क्षरण? वैल्डेज़ तेल रिसाव? इनमें से हर त्रासदी इसलिए संभव हुई क्योंकि ऐसे ज्ञान का सृजन किया गया था जिसके लिए आखिरकार कोई भी जिम्मेदार नहीं था। अंततः इन्हें ‘बड़े पैमाने के उत्पादन से उपजी स्वाभाविक समस्या’ की नज़रों से देखा जाएगा। बेहद विशाल और जोखिम भरी परियोजनाओं को करने का ज्ञान हमारा उन्हें जिम्मेदारी से क्रियान्वित करने की क्षमता को पछाड़ चुका है। इसमें कुछ ज्ञान तो ऐसा है जो जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया ही नहीं जा सकता है, यानी उसे सुरक्षित तरीके से और निरंतर भले उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

चौथा, हम तब तक यह नहीं कह सकते हैं कि हम कुछ समझते हैंजब तक हम उसका वास्तविक इंसानों और और उनके समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को नहीं समझते हैं। मैं ओहायो के यंग्सटाउन शहर के नज़दीक बड़ा हुआ, जिसे मुख्य रूप से उद्योगों द्वारा उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में निवेश न करने के निर्णय ने तबाह कर दिया। खरीद-बिक्री, कर छूट, पूंजी संचलन के दांव-पेंच में पारंगत MBA पढ़े लोगों ने वह कर दिखाया जो कोई आक्रमणकारी सेना भी नहीं कर सकती थी:- उन्होंने अपने मुनाफे की ‘बॉटम लाइन’ के खातिर एक अमरीकी शहर को पूरी कानूनी छूट के साथ तबाह कर दिया। मगर एक समुदाय को इस बॉटम लाइन की दूसरी कीमतें चुकानी पड़ती हैं, बेरोज़गारी, अपराध, बढ़ते तलाक, नशाखोरी, बाल उत्पीड़न, गवांई हुई बचत, और बर्बाद जिंदगियां। इस वाकिये में हम देख सकते हैं कि प्रबंधन कॉलेजों और अर्थशास्त्र विभागों ने इन छात्रों को जो सिखाया, उसमें अच्छे मानव समुदायों का मूल्य पहचानना शामिल नहीं था, और न ही कार्यक्षमता और अमूर्त आर्थिक अवधारणाओं को इंसानों और समुदायों से ज्यादा अहमियत देने वाली संकीर्ण आर्थिक नीति से उपजने वाली मानवीय त्रासदी की कीमत पहचानना।

मेरा पांचवा सिद्धांत विलियम ब्लेक से प्रेरित है। यह है बारीकियों पर ध्यान देना और शब्दों के बजाय कर्म से उदहारण पेश करना। छात्रों को वैश्विक जिम्मेदारी के पाठ पढ़ाए जाते हैं, जबकि उनके संस्थान खुद बहुत गैर जिम्मेदाराना चीजों में निवेश करते हैं। जाहिर है कि वास्तविकता में इससे छात्रों को पाखण्ड और अंततः निराशा का पाठ पढ़ाया जाता है। बिना किसी के बताए छात्र यह जान जाते हैं कि वे आदर्शों और यथार्थ के बीच की गहरी खाई पाट पाने में असहाय हैं। ऐसे शिक्षकों और प्रबंधकों की बेहद जरूरत है जो सत्यनिष्ठा, विवेक व संरक्षण का आदर्श प्रस्तुत करें और ऐसी संस्थानों की भी जो अपने हर कार्य में इन आदर्शों को जीएं।

आखिर में, सीखने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विषय-वस्तु. सीखने की प्रक्रिया बहुत मायने रखती है। व्याख्यान की शैली में पढ़ाए गए विषयों से निष्क्रियता पैदा होती है। बंद कमरों में पढ़ते रहने से यह भ्रम पैदा होता है कि सीखना केवल चहारदीवारी के अन्दर होता है, उस संसार से कटकर जिसे हास्यास्पद तरीके से छात्र “वास्तविक दुनिया” कहते हैं। मेंढक का डाइसेक्शन करने से छात्र वह सीखता है जो कितने भी शब्द कहकर नहीं सिखाया जा सकता है। संस्थानों की बनावट भी अक्सर निष्क्रियता, संवाद-शून्यता, दमन और कृत्रिमता का भाव उपजती है। मेरा तात्पर्य है कि छात्र विषय-वस्तु के अलावा भी कई सारी चीजों से सीखते हैं।

आपके संस्थान के लिए एक असाइनमेंट

अगर शिक्षा को सामंजस्य और स्थिरता के पैमानों पर नापा जाए, तो क्या किया जा सकता है? सबसे पहले मैं यह प्रस्ताव रखना चाहूंगा कि आप परिसर-स्तर पर एक संवाद शुरू करें कि आप शिक्षक के रूप में अपना काम किस तरह से कर रहे हैं। क्या आपके संस्थान में चार साल बिताने के बाद आपके छात्र बेहतर वैश्विक नागरिक बन रहे हैं या वे, वेन्डेल बेरी के शब्दों में, “पेशेवर घुमंतू गुंडे” बन रहे हैं? क्या यह कॉलेज एक स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान दे रहा है, या कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर विनाश के चक्र बढ़ा रहा है?

मेरा दूसरा प्रस्ताव है कि आप इस परिसर में संसाधनों के प्रवाह का निरीक्षण कीजिए:- भोजन, ऊर्जा, पानी, सामान, और कचरा। शिक्षक और छात्र साथ-साथ उन कुंओं, खदानों, खेतों, गोदामों, पशुबाड़ों, और जंगलों का अध्ययन करें जहां से परिसर में सामान आता है और उन जगहों का भी जहां यहां से कचरा भेजा जाता है। सामूहिक रूप से प्रयास कीजिए कि इस संस्थान की खरीद कैसे उन विकल्पों से की जाए जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करते हैं, जहरीले पदार्थों का कम उपयोग करते हैं, ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल करते हैं व सौर ऊर्जा उपयोग में लाते हैं, स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान देते हैं, दीर्घकालीन लागत कम करते हैं, और दूसरे संस्थानों के लिए उदाहरण पेश करते हैं। फिर इन अध्ययनों की खोजों को पाठ्यक्रम में अलग-अलग विषयों, सेमिनारों, व्याख्यानों, और शोधों में शामिल करें। कोई भी छात्र यहां से न निकले जिसे संसाधनों के प्रवाह का विश्लेषण करना न आता हो और जिसने वास्तविक समस्याओं के वास्तविक समाधान खोजने में हिस्सा न लिया हो।

तीसरा, पुनर्विश्लेषण करें कि आपका संस्थान अपना पैसा कहां लगा रहा है। क्या आपका निवेश वैल्डेज़ के सिद्धांतों के अनुसार हो रहा है? क्या यह उन कंपनियों में लग रहा है जो ऐसे काम कर रही हैं जिनकी दुनिया को वाकई जरूरत है? क्या इसका कुछ हिस्सा स्थानीय तौर पर निवेश किया जा सकता है ताकि इस पूरे क्षेत्र में ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल और स्थिर अर्थव्यवस्था विकसित हो सके?

आखिर में, मैं सलाह दूंगा कि आप अपने सभी छात्रों के लिए पर्यावरण साक्षरता के लक्ष्य निर्धारित करें। इस या किसी भी अन्य संस्थान से एक भी छात्र ऐसा नहीं निकलना चाहिए जिसे इन चीजों की बुनियादी समझ न हो-

  • ऊष्मागतिकी के नियम
  • पारिस्थिकी के बुनियादी नियम
  • किसी तंत्र की वहनक्षमता (carrying capacity)
  • भौतिक, रासायनिक और जैविक तंत्रों के ऊर्जा सम्बन्ध और परिवर्तन (energetics)
  • न्यूनतम लागत और अंतिम-उपयोग (end–use) विश्लेषण
  • किसी स्थान में अच्छे से रहना
  • टेक्नोलॉजी की सीमाएं
  • उचित स्तर पर उत्पादन और विस्तार (appropriate scale)
  • सामंजस्यपूर्ण कृषि और वानिकी
  • स्थिर-स्तर अर्थशास्त्र (steady-state economics), जिसमें उत्पादन के हर कदम पर ऊर्जा और सामान के न्यूनतम उपयोग के जरिए संसाधनों और जनसख्या को एक स्थिर स्तर पर सीमित रखा जाता है
  • पर्यावरण सम्बन्धी नैतिकता

क्या इस संस्थान के स्नातक यह समझते हैं, जैसा अल्डो लियोपोल्ड ने कहा था, कि “वे एक विशाल पारिस्थिकी तंत्र का छोटा सा हिस्सा भर हैं; अगर वे इस तंत्र के साथ काम करेंगे तो वे अपनी मानसिक और भौतिक सम्पदा में असीमित बढ़ोतरी कर पाएंगे, और अगर वे इसके खिलाफ जाएंगे तो यह तंत्र उन्हें कुचल डालेगा”?

लियोपोल्ड ने पूछा था, “अगर शिक्षा हमें ये चीजें नहीं सिखाती, तो फिर शिक्षा किसलिए है?”

अनुवाद- आशुतोष भाकुनी

स्कूल, खिलौने और वह बच्चा : रजनी गोसाँई

बात उन दिनों की है, जब मैं एक प्रतिष्ठित प्ले स्कूल में नर्सरी की अध्यापिका थी। कक्षा में पांच वर्षीय एक नया बच्चा आया था। वह बहुत निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से था। उसके पिता माली का काम करते थे। माँ घरों में काम करती थी।

स्कूल में उच्च मध्यमवर्गीय घरों के बच्चे पढ़ते थे तथा स्कूल की फीस भी बहुत ज्यादा थी। यह फीस उस नए बच्‍चे के परि‍वार के सामर्थ्य से बाहर थी। लिहाजा स्कूल संचालिका ने दाखिला देने से इन्‍कार कर दिया। लेकिन उनके बहुत आग्रह पर दयालुता दिखाते हुए स्कूल संचालिका ने बहुत मामूली फीस पर स्कूल में दाखिला दे दिया।

साथी अध्यापिकाओं ने उस बच्चे के स्कूल में दाखिले के प्रति अपना विरोध जताया। उन सबका मानना था कि इतने निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाला बच्चा यदि स्कूल में प्रवेश पाता है, तो स्कूल की प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ेगा। आखिर एक घंटे सभी अध्यापिकाओं के साथ विचार-विमर्श करने के बाद उस बच्चे को मेरी कक्षा में भेज दि‍या गया।

नयी चमचमाती यूनिफार्म, स्कूल बैग, किताब-कॉपी जब बच्चे को स्कूल से मिली, तो उसकी आँखें प्रसन्नता से चमक उठीं। आमतौर पर छोटे बच्चे शुरुआती दिनों में स्कूल आने पर रोते है, लेकिन वह बच्चा बहुत खुश था। नयी किताब, कॉपी, पेंसिल और इन सबसे बढ़कर स्कूल में खेलने के लिए रखे गए तरह-तरह के खिलौने- गुड्डे-गुड़िया, टेडीबेयर, ब्लॉक्स आदि को देखकर वह अपने को एक अलग दुनिया में पाता। उसके हावभाव उसकी इस प्रसन्नता को प्रकट करते। मेरी कक्षा में लकड़ी की गोल मेज थी। उसके चारों ओर लकड़ी की छोटी कुर्सियां लगाई गई थीं। सारे बच्चे इन्हीं कुर्सियों में बैठकर चित्रों में कलरिंग, विभिन्न फलों, सब्जियों के चित्रों की कटिंग, पेस्टिंग आदि कॉपियों में करते थे। वह बच्चा इन क्रियाकलापों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता। मेरे हाथों में रंग-बिरंगे चित्रों की किताबें देखकर जोर से चिल्लाकर कहता, ‘‘मैम, अब हम कलरिंग करेंगे।’’

कुछ अध्यापिकाओं ने मुझे यह सुझाव भी दिया कि इस बच्चे को अन्य बच्चों से अलग बैठाया करो, क्योंकि इसकी भाषा, बोलचाल अन्य बच्चों की भाषा की तुलना में खड़ी बोली में है। उनका यह सुझाव मैंने सिरे से ख़ारिज कर दिया। वह बच्चा सभी बच्चों के साथ बैठता तथा सभी बच्चे मिलजुल कर खेलते।

उस बच्चे को स्कूल आते हुए कुछ ही दिन हुए थे। स्कूल की छुट्टी होने पर आया ने जब उसका बस्ता उठाया तो उसे वह बहुत भारी लगा। बस्ता खोलकर देखा तो उसके अंदर स्कूल के खिलौने रखे थे। उसने शोर मचा दि‍या कि‍ बच्चे ने खिलौने चोरी कर बस्ते में रख लिए हैं। स्कूल हेड ने बच्चे को डांटा। अन्य अध्यापिकाओं ने भी अपना मत रखा कि‍  निम्न वर्गीय बच्चों को स्कूल में रखोगे तो ऐसे ही होगा। दाखिला दिया ही क्यों? एक अध्यापिका बोल पड़ी, ‘‘देखा है- कभी कोई और बच्चा स्कूल की कोई चीज या खिलौना इस तरह बैग में छुपाकर घर ले गया हो? इसलिए पहले ही चेताया था कि‍ इस बच्चे को स्कूल में एडमिशन मत दो।”

बच्चे को स्कूल संचालिका के कमरे में ले जाया गया। स्कूल संचालिका ने बच्चे की माँ को फ़ोन कर स्कूल आने को कहा तथा बच्चे को अपने कमरे में बैठा दिया। मुझे यह सब अटपटा लग रहा था। मैंने स्कूल संचालिका से कहा कि‍ हमें बच्चे को स्कूल से नहीं निकालना चाहिए। एक बार उससे पूछना चाहिए। वह बच्चा मेरी ही कक्षा का था। इसलि‍ए मैं उसे अपने साथ कक्षा में ले आयी। बाकी बच्चे घर जा चुके थे। मैंने बच्चे को अपने पास बैठाया। वह सहमा हुआ था। मैंने बहुत प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आपने मैम से बि‍ना पूछे खिलौने क्यों लिए?” वह चुप रहा। दो-तीन बार पूछने पर उसने जवाब दिया, “मैम, मेरी छोटी बहन है। हमारे घर में एक भी खिलौना नहीं है। मैं उसे दिखाना चाहता था। मैं कल ये खिलौने वापस ले आता।’’ यह कहते हुए उसके आँखों में आंसू थे।

धूल फांको, मगर : रोज मिलिगन

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर क्या इससे बेहतर नहीं कि
एक ख़ूबसूरत तस्वीर उकेरो या फिर कोई चिट्ठी लिखो,
लज़ीज़ खाना बनाओ या एक पौधा रोपो;
लालसाओं और ज़रूरतों के बीच फासले पर सोचो.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर ज्यादा वक़्त नहीं है तुम्हारे पास
कितनी नदियां तैरनी हैंऔर कितने पहाड़ चढ़ने हैं;
संगीत में डूबना है और किताबों में खो जाना है;
दोस्तियां निभानी हैं और जीना भी है भरपूर.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
लेकिन बाहर धरती इंतज़ार कर रही है
सूरज तुम्हारी आँखों में उतरना चाहता है
और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है
बर्फ के फाहों की झुरझुरी और बारिश की फुहारें
तुम्हारे कानों में फुसफुसाना चाहते हैं,
यह दिन फिर लौटकर नहीं आएगा.

धूल ही फांकनी है तो ज़रूर फांको
मगर एक दिन बेमुरव्वत बुढ़ापा घेर लेगा
और जब तुम विदा होगे (वो तो ज़रूर होगे)
तुम खुद धूल के बड़े ढेर में बदल जाओगे. 

(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

दो बाल कवि‍ताएं : कंचन पाठक

कंचन पाठक

कानून, प्राणिविज्ञान और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से स्नातकोत्तर कंचन पाठक की रचनाएं सभी प्रमुख पत्र-पत्रि‍काओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं।

प्‍यारा भोलाभाला बचपन

उम्र यही है जब हम सबको
देखरेख और प्यार चाहिए,
निश्छल निर्मल भोले मन को
सबका स्नेह दुलार चाहिए,
दुनिया की विकृति से अछूता
प्यारा भोला-भाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।
बचपन तो कच्ची मिट्टी है
हर साँचे में ढल सकता है
तपकर जब कुंदन होगा तब
काँटों पर भी चल सकता है
शुभ मंगलमय संस्कार भी,
इन्हें चाहिए नेह प्यार भी
कल उन्नति पथ पर गतिमय हो
ऐसे दर्शन सद्विचार भी
मिल जाए यह सब तब बन जाए
अमृतमधु प्याला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

नन्हें नव-पादप को जैसे
उचित खाद-पानी मिल जाए,
बने सुपुष्ट तरु तब उस पर
कितने विहग ठिकाने पाए,
पर्ण सघन छाया में रुक कर
कितने पथिक सुकूँ हैं पाते,
फल फूलों से लदकर तरुवर
पर उपकार की कथा सुनाते,
कल का कीर्ति स्तंभ बनेगा
राष्ट्र भविष्य उजाला बचपन।
निपट अबोध पुष्प-सा पावन
होता बड़ा निराला बचपन।।

शुभ चैतन्‍य सि‍तारे बच्‍चे

बड़े खिलंदड़ बड़े साहसी होते हैं ये प्यारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे

नहीं कभी थकते ऊर्जा की बहती इनमें ऐसी धारा
घर संसार इन्हीं से रोशन, रोशन इनसे ही जग सारा
इनकी नन्हीं बदमाशी में होती कितनी मासूमी है
गीली मिट्टी का सा दिल है संस्कारों की नम भूमि है
हर बच्चे के अन्दर होती है कोई न कोई क्षमता
वैमनश्य से दूर रहें बस चाहें थोड़ी माँ की ममता
ख़ुशी-ख़ुशी हर बात मानते शुभ चैतन्य सितारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

इनके मन में प्रश्न हजारों दिवा रैन चलते रहते हैं
एक साथ पलकों में सौ-सौ मधुर स्वप्न पलते रहते हैं
क्यों कोयल कु-कु करती है बुलबुल दिन भर किसे बुलाती
रात-रात भर चाँद की बूढी़ माई किसको लिखती पाती
अपनी उजली हँसी से भर देते मन में उजियारे बच्चे
छल बल से अनजान अपरिचित दुनियाभर के सारे बच्चे।।

सरल-सहज भाषा में विज्ञान – ‘विज्ञान और हम’ : सुन्दर नौटियाल

‘विज्ञान और हम’ विज्ञान गल्प के सिद्धहस्त जाने-माने वैज्ञानिक-लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी जी की ‘लेखक मंच प्रकाशन’ से प्रकाशित विज्ञान पुस्तक है। विज्ञान की पुस्तकों और लेखों में सरल-सहज हिंदी के प्रयोग से विज्ञान की जटिलता के हौवे को दूर करते मेवाड़ी जी का पाठक समाज को ये एक बेहतरीन तोहफा है। यह किताब बच्चों तक विज्ञान के सन्दर्भों को पहुँचाने की सरस और रोचक कोशिश है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि यह किताब केवल बच्चों के लिए ही बनी है। न जाने कितने ही प्रसंगों को कल्पना, तथ्यों, संस्मरणों, नाटकों, कवितांशों आदि के माध्यम से सामान्य विज्ञान और तत्कालीन पर्यावरणीय चुनौतियों से रूबरू करवाती यह किताब पाठक में मानवीय मूल्यों, तर्कपूर्ण चिंतन, सामाजिक दायित्वों, जीवों के प्रति दया, जैव विविधता की समझ आदि विकसित करती है। साथ ही यह नए पाठकों को और अधिक पढ़ने की प्रेरणा के साथ-साथ अपने संस्मरणों को लिखित रूप देने के लिए भी प्रोत्साहन देती है।

19 विभिन्न शीर्षकों से प्रस्तुत सन्दर्भ बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सजे हुए हैं। ‘सुनो मेरी बात’ शीर्षक से जहाँ लेखक ने अपने जीवन के अंशों को बच्चों के साथ साझा किया है, अपने आंचलिक शब्दों के प्रयोग से मात्रभाषा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त किया है, वह किसी भी नव पाठक को अपनी मातृभाषा पर गर्व करने और इसे प्रसारित करने के लिए योगदान देने के लिए प्रेरित करता है। किताब के पन्ने दर पन्ने आगे बढ़ता पाठक देवीदा के साथ कभी ‘अनोखे सौरमंडल’ के तथ्यों से विस्मित होता है तो कभी एलियन के साथ कल्पना के यान पर सवार हो ‘प्यारी और निराली धरती’ की समझ विकसित करने आकाश में उड़ने लगता है। देवीदा की आँखों से उनकी लेखनी के शब्द समुंदर में ‘समन्दर के अन्दर की अनोखी दुनिया’ देख आता है, तो कभी ‘लो आ गया वसंत’ पाठ में शब्दों के गुलदस्तों में सजे फूलों, कलियों और नयी अंगडाई लेती धरती की महक को महसूस करता है। वसंत के खुशनुमा अहसास से पाठक अचानक ही गर्म होती धरती की उष्मता से पसीने में नहाने लगता है, जब वह रूबरू होता है ‘क्यों तपती है धरती’ से | बादलों के बनने-बरसने की घटनाओं से परिचय करने के लिए पाठक ‘कैसे-कैसे मेघ’ पढ़ता है और अचानक ही ‘आये पंछी दूर देश से’ पढ़कर प्रवासी पक्षियों के साथ सायबेरिया से भारत तक की यात्रा पर उड़ चलता है। घर के आंगन में गौरैया के घोंसले में नवान्गंतुक बाल पक्षी की पहली उड़ान ‘उड़ गयी गौरैया’ तो किसी भी उम्र के पाठक को सरल, सहज भाषा में अपने अनुभवों को संजोने की अद्भुत प्रेरणा दे जाती है। देवीदा के साथ ‘पेड़ों को प्रणाम’ करते गार्गी, शेफाली, गौरव, माधवी जैसे बच्चे चिप्स खाते-खाते बच्चों के साथ पाठक भी ‘आलू की कहानी’ सुनने लगता है, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट खाते-खिलाते बच्चे फ्रैंक स्मिथ द्वारा खोजी गयी ‘फूलों की घाटी में’ कब पहुँच जाते हैं, उनके साथ-साथ पाठक को भी पता नहीं चलता। आगे के पाठों में ‘बच्चों का विज्ञान और कवि के कबूतर’ उड़ाते बच्चे, ‘आ गये रोबोट’ पाठ से मानव जीवन में मशीनी मानवों की धमक को महसूस करते हैं। ‘ताबीज़’ पहने एक बेरोजगार युवक कहानी के माध्यम से समाज में फैले ‘चमत्कार या विज्ञान’ के अन्धविश्वास पर तो कटाक्ष करता ही है, साथ ही में मजबूरी को अन्धविश्वास से जोड़कर भी दिखाता है। एक नाटक में बच्चों को ‘पर्यावरण के प्रहरी’ बनाकर ‘वृक्ष बचाओ-वृक्ष लगाओ’ की प्रेरणा देते लेखक जाते-जाते बच्चों को ‘आर्यभट्ट’ और ‘मेघनाथ साहा’ जैसे भारतीय विभूतियों से परिचित करवाते हैं और ‘माइकल फैराडे’ की जीवनी के एक प्रेरक प्रसंग ‘अनजान से बना महान’ से बच्चों को आत्मविश्वास से सरोबार कर जाते हैं |

विशेष– सुन्‍दर नौटि‍याल पेशे से शि‍क्षक हैं। उन्‍होंने मवोड़ी जी की यह किताब अपनी एक छात्रा नवमी को पढ़ने को दी। उसके अन्दर इस किताब से उमड़े-उपजे भावों की झलक देखने लायक है–

किताब में लिखे गये एक संस्मरण ‘उड़ गयी गौरैया’ को पढ़कर वह कहती है –“सर! हमने भी कई बार चिड़ियों को घोंसले में बच्चों को दाना देते और उन्हें उड़ाते हुए देखा है। आपने लिख दिया और हम लिखते नहीं हैं, परन्तु यह पाठ पढ़कर मुझे विश्वास हो गया है कि हम भी ऐसा ही अच्छा लिख सकते हैं |”

वैज्ञानिक, विज्ञान कथा लेखक को सम्बोधित करते हुए वह लिखती है– “सर! आपकी लिखी हुई किताब बहुत ही सरल भाषा में लिखी हुई है और इसमें कोई भी पाठ ऐसा नहीं था, जिसे मैं समझी न हूँ। आपने अपने बचपन की बातें लिखीं जो मुझे बहुत अच्छी लगीं। अनोखा सौरमंडल, फूलों की घाटी, ताबीज़, रोबोट और मेघनाथ साहा, ये सब कहानियां बहुत ही अच्छी लगीं।”

“हमारे सर भी आपके जैसे ही हैं। उन्होंने एक कविता लि‍खी जो मुझे बड़ी अच्छी लगी। उन्होंने मेरी एक कविता भी अपने पास रखी हुई है। शायद उनका सपना हमें आपके जैसा वैज्ञानिक बनाने का है।”

वह देवीदा से गुजारिश करती है– “आपसे बस यह कहना है कि सर ! यदि कभी मौका मिले तो हमारे विद्यालय में जरूर आना। हम आपसे सवाल करना चाहते हैं, आपसे कुछ सीखना चाहते हैं। शायद! हमने आज तक वैज्ञानिक नहीं देखे हैं, किन्तु हमारे सर हमारे लिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अच्छे वैज्ञानिक हैं। हमारे सर हमसे कहानियां पढ़वाते हैं, गाना गाने को कहते हैं, हमें नयी चीज़ें दिखाते हैं और सबसे बड़ी बात– हमे लिखने पर जोर देते हैं।”

इस पुस्तक से प्रभावित होकर उसने इस लेख में तीन कवितायें भी लिखीं– ‘बच्चों का अपना सपना है’, ‘ये दुनियां किसकी?’ और ‘वैज्ञानिक सोच’।

वैज्ञानिक सोच’

सर तक लदे विज्ञान से,
फिर भी कहे भगवान है।
जीवित हैं विज्ञान से,
फिर भी कहें भगवान है।
विज्ञान तो हर तरफ बस चुका,
भगवान कहाँ है आपका?
कोई दर्शन करवा दे भगवान के,
हम घुटने टेकें, माफ़ी मांग के।
बस सोच का फरक पड़ चुका
अन्धविश्वास बहुत ही बढ़ चुका।
वैज्ञानिक सोच अपनाकर बनें
वैज्ञानिक नए विचार के।
दुनियां चाहे कुछ भी कहे,
हम वैज्ञानिक नये संसार के।

नवमी, कक्षा 9
रा.इं.का. कोटधार गमरी, उत्तरकाशी

पलायन की मजबूरी और छटपटाहट का चि‍त्रण- ‘नेचुरल रिंगटोन’  

चित्तौडगढ़ : ‘सम्भावना’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहानीकार कर्नल मुकुल जोशी ने अपनी कहानी ‘नेचुरल रिंगटोन’ का पाठ किया।

विजन स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में 14 नवंबर को आयोजि‍त कार्यक्रम में कर्नल जोशी ने प्रभावपूर्ण ढंग से कहानी सुनाई। कहानी में पहाडी़ गांव के वातावरण, खानपान, आस्थाओं, मानवीय पारिवारिक सम्बन्धों से लेकर गीत और परम्पराओं को पिरोया गया है। कुमाऊंनी भाषा के आंचलिक शब्दों ने कहानी को मर्मस्पर्शी बना दिया। आधुनिक जीवन में पढा़ई या आजीविका के कारण गांव छोड़कर मजबूरी में शहर में बस जाने पर होने वाली छटपटाहट भी कहानी में बारिकी से चित्रित हुई है।

कहानी पाठ के बाद महेंद्र खेरारू के प्रश्‍न के जवाब में कहानीकार ने बताया कि आधुनिक सोशल मीडिया के कारण बडी़ संख्या में रचनाएं इन पर आ रही हैं, पर जल्दबाजी के चलते इनमें सार्थकता की कमी है। हालांकि नये रचनाकारों को इससे प्रोत्साहन मिल रहा है। इन रचनाओं में से वे ही बचेंगी, जो शाश्‍वत होंगी। एम.एल. डाकोत ने पश्‍चि‍मी संस्कृति ओैर भारतीय संस्कृति में बेहतर कौन का सवाल उठाया। जोशी ने बताया कि भारतीय संस्कृति विश्‍व में प्राचीन और श्रेष्ठतम मानी जाती है, पर हमें सभी से उपयोगी तत्वों को ग्रहण करना चाहिए। कवि नन्दकिशोर निर्झर ने कहानी पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि रचना में रचनाकार बोलता है। कहानी पर योगेश शर्मा ने भी अपने विचार प्रकट किये। कार्यक्रम का संचालन कर रहे लक्ष्मण व्यास के प्रश्‍नों के जवाब में कर्नल जोशी ने बताया कि सेना में काम करना नौकरी मात्र नहीं है, यह देश की सेवा और जीवन जीने की शैली और कला है।

प्रारम्भ में कहानीकार का परिचय देते हुए डॉ. कनक जैन ने बताया कि मुकूल जोशी का कहानी संग्रह ‘मैं यहां कुशल से हूं’  प्रकाशि‍त हो चुका हैं। उनकी कहानियां हंस, ज्ञानोदय, कथादेश जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। वे चित्तौड़गढ़ के सैनिक स्कूल सहित ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी चेन्नई एवं पंचमढ़ी आदि स्थानों पर कार्य कर चुके हैं। कार्यक्रम में स्थानीय कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष अखिलेश चाष्टा, चित्रकार मुकेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार नटवर त्रिपाठी, विकास अग्रवाल, गोपाल जाट,  पूजा जोशी आदि‍ साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। विजन कॉलेज की निदेशक डॉ. साधना मण्डलोई ने कहानीकार जोशी का स्वागत कि‍या। संभावना के अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रस्‍तुति‍ : डॉ. कनक जैन

बच्चों को कहानियाँ क्यों सुनाएँ : संजीव ठाकुर

कि‍स्‍से-कहानि‍यों के माध्‍यम से बच्‍चों को वि‍ज्ञान की बातें बताते देवेंद्र मेवाड़ी।

एक समय ऐसा था, जब सभी व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए नियमित पृष्ठ हुआ करते थे और उनमें कविताएं, कहानियां नियमित रूप से छपा करती थीं,  लेकिन जब बाजार के राक्षसी कदम पत्र-पत्रिकाओं की ओर बढ़ने लगे, तब उन कदमों ने सबसे पहले साहित्य के पन्नों को रौंदा और उसके बाद बच्चों के पन्नों को। बाजार के कदमताल के कुछ वर्षों बाद समीक्षा के रूप में साहित्य की थोड़ी-बहुत वापसी हुई भी लेकिन बच्चों के पृष्ठ न जाने किस गुफा में कैद कर दिए गए? कुछ अखबारों में बच्चों के पेज शुरू भी हुए तो उनका हाल यह रहा कि विज्ञापनों से बचे-खुचे किसी कोने में कोई बाल-कविता लग गई या हँसी की फुलझड़ियां छोड़ दी गईं। कुछ पारंपरिक अखबारों ने बच्चों के लिए कोई कोना जारी रखा भी तो वहां दृष्टिविहीन कथा-कविताओं की भरमार दिखाई पड़ती रही। कुछ मंझोले अखबारों ने बच्चों के लिए धूम-धाम से पृष्ठ भी निकाले तो वहां कहानियों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां था- रास्ता ढूंढ़़ो पहेलियां बूझो, गलतियां खोजो, वर्ग-पहली, पर्यावरण, क्विज कम्प्यूटर, खाना-पीना, सुडोकी निन्टेंडो, एस.एम.एस.! बच्चों के मनोरंजन करने और उन्हें सिखाने के अथाह सामान! नहीं थी तो बस कविता, कहानी। क्योंकि आधुनिक ‘बाल-गुरुओं’ को लगता है कि कविताएं एवं कहानियां महज अखबारों के पृष्ठ घेरने का काम करती हैं, बच्चों को तमाम तरह के ज्ञान से वंचित करने वाली होती हैं। दरअसल ऐसे संपादकों, उपसंपादकों को इस बात का पता ही नहीं होता कि कविताओं और कहानियों की बाल-शिक्षण में क्या भूमिका होती है? क्या वे यह भी नहीं जानते कि सीधे-सीधे उपदेश देने की बजाय बच्चों को कहानियां के जरिए कुछ सिखाना ज्यादा आसान होता है? क्या बच्चों का पृष्ठ देखने वाले उप-संपादकों को बच्चों के बारे में कोई जानकारी होती है? क्या उन्होंने बाल-शिक्षण से जुड़े टॉलस्टाय, वसीली सुखोम्लीन्स्की, ए.एस.नील., जॉन होल्ट, महात्मा गांधी, गिजुभाई, रवीन्द्रनाथ आदि के विचार पढ़ रखे हैं? क्या उन्हें इस बात का अनुभव है कि 21वीं सदी की गतिमय जिन्दगी में भी बच्चों को कहानियां सुनना-पढ़ना कितना अच्छा लगता है? राजा, रानी, परी, राक्षस, बौने, पशु-पक्षी आदि के माध्यम से कही गई कहानियां किस तरह बच्चों को कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं और उन्हें कल्पनाशील बनाती हैं, इस बात की जानकारी उन्हें है? नहीं, वे तो बच्चों को कल्पना की दुनिया से बाहर लाकर कम्प्यूटर की दुनिया में लाना चाहते हैं। परियों की दुनिया से बाहर लाकर सुडोकी खिलवाना चाहते हैं, पशु-पक्षियों से बातें करने की बजाय मोबाइल से जोड़ना चाहते हैं।

पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों ने क्या गिजुभाई की लिखी किताब ‘दिवा स्वप्‍न’ पढ़ रखी है? ‘दिवा स्पप्‍न’ के शिक्षक लक्ष्मीशंकर की शिक्षा से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं? पढ़ाने के बदले कक्षा में कहानियां सुनाने वाले लक्ष्मीशंकर क्या पागल थे? कहानियों के द्वारा ‘भाषा पर काबू’, ‘वार्ता-कथन’ ‘रुचि का विकास’, ‘स्मृति-विकास’, ‘अभिनय’ आदि की शिक्षा देने वाले लक्ष्मीशंकर पागल कैसे हो सकते हैं?

कितनों को पता है कि विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार लेव तोलस्तोय किसानों  के  लिए स्कूल चलाते थे और शिक्षा के लिए पारंपरिक तरीके नहीं अपनाते थे? बच्चों के लिए उन्होंने ‘लेव तोलस्तोय का ककहरा’ और ‘काउंट तोलस्तोय का नया ककहरा’ जैसी किताबें लिखी थीं, जिनमें छोटी-छोटी कहानियों के जरिए बड़ी-बड़ी बातें सिखलाने की क्षमता थी। समुद्र से पानी कहां जाता है? हाथी मनुष्य का गुलाम कैसे बना? शेखी बघारना क्यों गलत है? पढ़-लिखकर अपनी मातृभाषा भूल जाना कितना गलत है? सोने वाला चीजों को कैसे खो देता है? इस तरह की अनेक गंभीर बातों को सिखलाने के लिए तोलस्तोय ने जो माध्यम चुना, वह कहानियों का ही माध्यम था।

रूस के ही शिक्षाविद् वसीली सुखोम्लीन्स्की मानते थे कि ‘कथा कहानियां, खेल, कल्पना- यह बाल चिंतन का, उदात्त भावनाओं और आकांक्षाओं का जीवनदायी स्रोत है।’ वसीली का तो यह भी मानना था कि ‘‘कथा कहानियों में भलाई और बुराई, सच्चाई और झूठ, ईमानदारी और बेईमानी के जो नैतिक विचार निहित होते हैं, उन्हें इंसान केवल तभी आत्मसात करता है, जबकि ये कथा-कहानियां बचपन में पढ़ी गई हों।’’

यानी कहानियां सुन-पढ़कर बच्चे जीवन के कई मूल्यों को अनायास सीखते-चलते हैं। ‘सदा सच बोलना चाहिए’, ‘ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है’, ‘बड़ों का सदा आदर करना चाहिए’, ‘दूसरों की मदद करनी चाहिए’ आदि मूल्य रटाकर हम बच्चों को सही रास्ते पर नहीं ला सकते, लेकिन जब कोई बच्चा किसी कहानी में सुनता है कि किसी परेशान चींटी की सहायता उसके मित्रों ने किस तरह की तो उसके मन में मदद करने का भाव खुद पैदा हो जाता है।  इसी तरह बच्चा अगर सुनता है कि दुष्ट कौए का अंत कैसे हुआ तो वह खुद सीख जाता है कि दुष्टता बुरी चीज़ है। इस समय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् कृष्ण कुमार की सुनें तो, ‘‘बहुत गंभीर विपदाओं के कल्पनाशील और न्यायसंगत हल इन कहानियों की संरचना में गुंथे होते हैं। मनुष्य की सामाजिकता और प्रकृति की चुनौती इन कहानियों की अंतर्धारा होती है।’’

यह ठीक है कि समय बदल गया है और आज के बच्चे कम्प्यूटर, मोबाइल, हवाईजहाज के युग में जी रहे हैं। इस लिहाज से उन्हें नई से नई बातें बताई जानी चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम बच्चों को बैलगाड़ी, चापाकल या पोस्टकार्ड के बारे में नहीं बताएं? मॉल या मल्टीप्लेक्स के जमाने में हाट, मेले और मैदान में दिखाए जाने वाले सिनेमा के बारे में न बताएं? उसी तरह क्विज, सुडोकी और एस.एम.एस. के जमाने में कविताओं और कहानियों की बात न करें? कृष्ण कुमार के शब्दों में सच तो यह है कि ‘‘परिवार और समाज की नई परिस्थितियों में बच्चों को कहानी सुनाने की उतनी ही जरूरत है जितनी पहले थी।’’ बल्कि आज कहानियों की कुछ अधिक ही आवश्यकता है। अपने बच्चों को टी.वी. से अलग रखने के लिए भी कहानियों की आवश्यकता है। रंग-बिरंगी कहानियों की किताबें बच्चे को थोड़ी देर के लिए टी.वी. से अलग कर कहानियों की दुनियों में तो ले ही जा सकती हैं?

कुछ विज्ञान संपादक जो कृपापूर्वक बाल कहानी किसी कोने में छाप देते हैं,  नई तरह की कहानियों की मांग करते हैं। यानी ऐसी कहानियां जिनसे बच्चों को कम्प्यूटर, मोबाइल, ई-मेल, नेट आदि की शिक्षा दी जा सके। ‘राजा-रानी’ परियों वाली कहानियां से उन्हें सख्त़ परहेज होता है। उन्हें क्या रूसी शिक्षाविद् और बाल-साहित्यकार कोर्नेइ चुकोव्सकी के बारे में पता है, जो परीकथाओं और लोककथाओं के कटृर समर्थक थे? जिन्होंने कोर्नेइ का नाम नहीं भी सुना है, वे अपने घर में ही एक प्रयोग करके देख लें। अपने बच्चे को कोई परीकथा या लोककथा सुनाएं, फिर कोई आधुनिक कहानी और बच्चे से पूछें कि उन्हें कौन सी कहानी अच्छी लगी? यही नहीं, इस तरह का एक सर्वे ही कर लें तो सच्चाई का पता चल जाएगा।

वैसे दोष चंद संपादकों या उपसंपादकों का ही नहीं है। हमारा समाज जिस रफ्तार में आगे बढ़ रहा है, उस रफ्तार में बच्चों को सिखाने और हर जगह अव्वल बनाने की होड़ सी चल पड़ी है। यही वजह है कि बच्चों को गणित में पारंगत बनाने के लिए उन्हें ‘एबैकस’ की कक्षाओं में भेजा जा रहा है। कहानियों या कविताओं के द्वारा कुछ सिखाने का न तो माता-पिता के पास समय है, न धैर्य। फिर अखबार वालों के पास धैर्य कहां से आएगा? वहाँ तो और भी तेजी से धरती घूम रही है।

समय अभी भी है। अभिनेता-अभिनेत्रियों की रंग-बिरंगी तस्वीरों, उनके रोज-रोज बदलते प्रेमी-प्रेमियों और आने-जाने वाली फिल्मों से अटे रहने वाले अखबारों में थोड़ा ‘स्पेस’ निकाला जा सकता है और बच्चों के लिए नई-पुरानी हर तरह की कहानियों और कविताओं को छापा जा सकता है। अपने लिए ‘स्पेस’ देखकर तब बच्चे भी अखबारों से जुड़ सकते हैं।