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हिंदी अकादमी में सरकारी हस्तक्षेप बंद हो!

नई दि‍ल्ली : हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर ‘भाषादूत सम्मान’ देने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपू...

बच्चों की करामात

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बिनबुलाया मेहमान : एंड्रयू हिंटन

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

बच्चों के साथ बलोबसेंग फुन्स्तोक।

लोबसेंग फुन्स्तोक एक पूर्व तिब्बती साधु हैं। उन्होंने पवित्र दलाई लामा के साथ प्रशिक्षण लिया और वर्षों तक पश्चिमी देशों में बौद्ध धर्म और ध्यान की शिक्षा दी। 2006 में वह साधु का चोला उतारकर भारत में अपने जन्म स्थान अरुणाचल प्रदेश लौट आये। यहां आकर उन्होंने हिमालय की तलहटी में अनाथ और गरीब बच्चों का एक समुदाय खड़ा कर दिया- झाम्त्से गत्सल बाल समाज– तिब्बती शब्द ‘झाम्त्से गत्सल’ का अर्थ है ‘प्रेम और दया का उपवन’। इस बाल समाज पर 2014 में एक फिल्म बनी- ‘ताशी एंड द मोंक’। झाम्त्से गत्सल की शुरुआत मात्र 34 बच्चों के साथ हुई। पिछले करीब एक दशक में यहां के बच्चों की संख्या बढ़कर 85 हो गयी है। 5 आश्रममाताएं और 13 शिक्षक इन बच्चों की देखरेख करते हैं। झाम्त्से गत्सल को उम्मीद है कि वह इतना विस्तार करे कि 200 बच्चे यहां रह सकें। इस साक्षात्कार में फिल्म के निर्देशक एंड्रयू हिंटन लोबसेंग फुन्स्तोक से उनके तकलीफ़देह बचपन और उस प्रेरणा के बारे में बातचीत कर रहे हैं, जिनकी बदौलत वह गरीब बच्चों के लिए एक बेहतर ज़िन्दगी की राह बना पाए हैं।

क्या आप इस सवाल के जवाब से अपनी बात शुरू कर सकते हैं कि आप कौन हैं और इस दुनिया में कैसे आये?

मेरा नाम लोबसेंग फुन्स्तोक है। मैं भारतीय हिमालय के सुदूरवर्ती अरुणाचल प्रदेश में पैदा हुआ। जब मेरी मां गर्भवती हुए तो वह अविवाहित और बहुत छोटी थी। जाहिर है, गांव में यह भारी बदनामी की बात थी। उन्होंने छुप-छुपा के हमारे घर के शौचालय में मुझे जन्म दिया। उन्होंने मुझे सूखी पत्तियों से ढककर उसी तरह छोड़ दिया जैसे- लोग अपने मल को छोड़ते थे। मेरी बुआ और दादा-दादी ने किसी के रोने की आवाज़ सुनी। उन्हें लगा कि‍ शायद कोई बकरी उनके खेत में आ गयी है और उनकी फसल को खा रही है। मेरी बुआ देखने के लिए बाहर आईं और उन्होंने सूखी हुई पत्तियों की नीचे कुछ हिलता हुआ नज़र आया। देखा तो वहां एक शिशु था और वह मैं था। मैं एक तरह से नीला-बैगनी पड़ चुका था- मौत के बिलकुल करीब।

आम तौर पर जब घर में कोई नया बच्चा आता है, परिवार वाले, दोस्त और पड़ोसी खुशियां मनाते हैं। लेकिन मेरा जन्म ऐसी घटना नहीं थी, जिसकी ख़ुशियां मनाई जा सकें। मैं अपने घरवालों के लिए कितना दुःख और बदनामी लेकर आया था। यही वजह थी कि छोटेपन में मुझे हमेशा कहा जाता था- ‘इस दुनिया में बिनबुलाया मेहमान’।

आपका बचपन कैसा था?

लोग सचमुच मुझे पसंद नहीं करते थे। मैं लोगों की खिड़कियां तोड़ता और प्रार्थना पताकाएं फाड़कर आये दिन मुसीबतें खड़ी कर देता था। मुझे अच्छी तरह याद है, किसी ने मुझसे कहा था, “तुम कभी नहीं बदलोगे। तुम सुधरने वाले नहीं हो।” पता नहीं कैसे यह बात मेरे दिमाग में घर कर गयी थी। आज भी मैं उस जगह हो देखता हूं और उन लम्हों को महसूस करता हूं। जाने कितनी बार मुझे लगता था इससे तो मर जाना अच्छा। सौभाग्य से मेरे दादा-दादी थे जो तब भी मुझे बहुत प्यार करते थे, जब मैं प्यार के जरा भी लायक नहीं था। मैं इसे महसूस कर सकता हूं क्योंकि उनकी दयालुता के कारण ही आज मैं जिंदा हूं। किसी तरह उन्होंने मेरे भीतर कुछ महसूस किया, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने तय किया कि मुझे बदलने का एक ही रास्ता है- मुझे मठ में भेज दिया जाये।

मेरे दादा बड़े कठोर इंसान लगते थे, लेकिन उनका हृदय बड़ा कोमल था। वह जताते नहीं थे, लेकिन उनके प्यार को आप महसूस कर सकते थे। मेरे दादा-दादी के पास ज्यादा कुछ था नहीं, लेकिन दक्षिण भारत स्थित मठ के लिए प्रस्थान करने से ठीक एक दिन पहले दादा जी ने अपने पैजामों को काट-पीटकर एक थैला बनाया और इसमें खूब सारा पैसा डालकर बाहर मेरा नाम लिख दिया। उन्होंने कहा, “इसे हमेशा अपने पास रखना और जब तक सचमुच बहुत ज़रूरत न पड़े इन्हें इस्तेमाल मत करना।” बहुत बाद में मैं इस बात को समझ पाया कि उन्हें मुझ से कितना प्यार था और किनता भरोसा मुझे पर करते थे।

इस तरह 7 वर्ष की आयु में आप घर छोड़कर मठवासी हो गए. वहां क्या हुआ?

मठ की दिनचर्या बहुत सख्त थी और अनुशासन बहुत कठोर। एक बच्चे के रूप में मेरे लिए यह कठिन था, लेकिन एक युवा साधु के रूप में मेरा दिमाग हर वक्त व्यस्त रहता था और मेरे पास कुछ और सोचने के लिए समय नहीं था। मुझे वहां की दिनचर्या, नीति, अनुशासन, गतिविधियां और मठ में किये जाने वाले तमाम कार्यों का पालन करना होता था। अच्छा बनाने में थोड़ा वक्त लगा। हर चीज़ के बारे में मेरा नजरिया नकारात्मक था, लेकिन एक बिंदु पर आकर मैंने सकारात्मक ढंग से सोचना शुरू किया। मेरा आत्मविश्वास बढ़ने लगा और मुझे भरोसा होने लगा कि मैं भी एक अच्छा इंसान बन सकता हूं।

मेरे शिक्षक से मिली शिक्षाओं में एक थी- तुम इस ब्रहमांड में एक बहुत विशाल परिवार के बहुत-बहुत छोटे हिस्से हो। खरबों मनुष्यों और अनगिनत जीवधारियों- जीव-जंतुओं, कीड़े-मकोड़ों व पंछियों के बीच एक अदने से इंसान.। इस बात ने मुझे अपनी चुनौतियों व कठिनाइयों के बीच दूसरे जीवों से जुड़ने में बड़ी मदद की। और जब ऐसा होता है तो हमारा फोकस बदल जाता है। शिकायत करने के बजाय आप खुद से सवाल करने लगते हैं, “अपने परिवार, अपने बड़े परिवार को उनकी कठिनाइयों से बाहर निकलने में मैं कैसे मदद करूं।”

आज मैं अपनी कठिनाइयों को छोटे बच्चों के साथ साझा करता हूं, क्योंकि उनमें से अधिकतर उन्हीं चुनौतियों का सामना कर रहे हैं जिनसे कभी मेरा वास्ता पड़ा था। मैं उन्हें यह भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित करता हूं कि नकारात्मक होने की कतई ज़रूरत नहीं है। आज मैं जानता हूं कि मेरा जैसा तकलीफदेह बचपन भी एक तरह का आशीर्वाद है।

और कब आपको महसूस हुआ कि आप अपने अनुभवों को किसी सकारात्मक अंजाम में बदलना चाहते हैं?

मेरा ख़याल है कि बच्चों के समाज की स्थापना के बीज मेरे भीतर बहुत छोटी उम्र से थे।

जब मठ में मेरी परवरिश हो रही थी मेरे शिक्षक हमेशा इस बात की शिक्षा देते थे कि अपनी ज़िन्दगी में कुछ-न-कुछ अर्थपूर्ण ज़रूर करो। वह हमें प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करते थे और उसके बाद अपने और दूसरों के लिए कुछ-न-कुछ उपयोगी काम करने का ज़ज्बा पैदा करते थे।

उन दिनों जब भी मैं घर आता था, देखता था कि यहां सारे बच्चे उसी तरह की समस्या से जूझ रहे हैं- कुछ करने के लिए यह सीधा सन्देश था। तब इस तरह के काम का मुझे कोई तजुर्बा नहीं था, आज जो मैं करता हूं, उसे कर पाने के लिए मेरे पास पर्याप्त शिक्षा नहीं थी। लेकिन अपने अनुभव के आधार पर मैं कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने के बारे में बोलता था।

आज मेरे पास जो कुछ भी है वह औरों की दयालुता की वजह से है। और अब मेरे सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि उस दयालुता की कीमत चुकाऊँ। मैं खुद को याद दिलाता हूं कि मेरा बचपन भले ही कठिन रहा हो, मैं उनमें आस्था और भरोसा कभी नहीं खोऊंगा।

आपके बाल समाज के नाम का क्या महत्व है?

झाम्त्से गत्सल का मतलब है- ‘प्रेम और दयालुता का उपवन’। यहां हम जो कुछ कर रहे हैं, उसे यह नाम पूरी सच्चाई से अभिव्यक्त करता है। इन बच्चों को परिवार, प्रेम और अपनेपन के अहसास की ज़रूरत है।

यही कारण है कि मैंने इसे बाल समाज कहने का निर्णय लिया- यह उनका परिवार है, उनका समाज है और उनकी ज़िन्दगी है। झाम्त्से गत्सल में बच्चे अनाथ नहीं हैं। यहां उनके माता-पिता हैं, उनकी कई मांएं हैं, कई पिता हैं और कई-कई भाई-बहन हैं, जो उनका ख़याल रखते हैं। यहां उन्हें वह सब ख़याल, प्यार और मदद मिलती है, जिसके वे हकदार हैं।

और आपने यह समाज यहां क्यों शुरू किया?

यह इलाका (अरुणाचल प्रदेश का तवांग जिला) आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण से सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में एक है। जब 2006 में हमने शुरुआत की, तब यह जगह इतनी दूर थी कि हम आपसी बातचीत में इसे जुरासिक पार्क का रास्ता कहते थे। एक छोटे से कस्बे से 6-7 किलोमीटर के मोटर के सफ़र के बावजूद ऐसे घने जंगल से गुजरना पड़ता था, जहां दिन के समय भी आप अकेले जाने में घबराएंगे।

इसलिए एक तरह से मैं महसूस करता हूं कि हमारा बाल समाज भी शुरुआत भी एक अनाथ की तरह हुई। यह वास्तव में कोई शानदार जगह नहीं थी, जहां लोग अच्छा काम करना पसंद करते।

यहां के बच्चे कौन है और वे कहां से आते हैं?

हमारे बच्चों में ज्यादातर पहले पीढ़ी के शिक्षार्थी हैं। जब हम गावों में जाते हैं तो परिवार के सबसे तेज-तर्रार बच्चे को नहीं चुनते, बल्कि हम पूछते हैं- कौन सबसे चुनौतीपूर्ण बच्चा है? ऐसा कौन सा बच्चा है जिसे कोई नहीं चाहता?

हमारा काम उस बच्चे को स्वीकार करना है जिसकी कोई और देखभाल नहीं कर सकता और कोई करना भी नहीं चाहता। और उस बच्चे को सबसे शानदार इंसान में बदलने में मदद करना।

और यह आप सिर्फ प्यार और दयालुता के सहारे करते हैं?

हमारे बच्चों में लगभग सभी ने अपने-अपने गांव में बड़ा कठिन बचपन गुज़ारा है। लोग कहते हैं, “हे भगवान्, तुम्हें डॉक्टर की ज़रूरत पड़ेगी, तुम्हें मनोवैज्ञानिक बुलाना पड़ेगा, मनोचिकित्सक ही इन बच्चों को ठीक कर सकता है।” लेकिन अपने आठ साल के इतिहास में हमने अपने बच्चों को किसी तरह की दवा नहीं खिलाई।

सबसे पहले मैं समझता हूं यह सब झाम्त्से गत्सल के सादगी भरे जीवन का असर है। हम बच्चे को अपनाते हैं- बिना किसी निर्णय के उसे गले लगाते हैं, अच्छा, बुरा, कैसा भी। इसके बाद हम वास्तव में उसके लिए जगह बनाने की कोशिश करते हैं और उसके साथ सहयोगपूर्ण बर्ताव करते हैं।

इसके बाद सब प्रेम की ताकत है। ख़याल रखने की ताकत या दयालुता की ताकत जो हम हर बच्चे को देते हैं. और यह प्रत्येक बच्चे के लिए मरहम का काम करता है। और मुझे पक्का भरोसा है कि यह उपाय काम करता है। बेशक इसमें समय लगता है, लेकिन अंततः बच्चे बदल जाते हैं।

हमारे बाल समाज में बच्चे जो कुछ भी करते हैं, उसके लिए बराबर के भागीदार होते हैं। इससे उनमें जिम्मेदारी का अहसास पैदा होता है और वे समझ जाते हैं कि कैसे सक्रिय भागीदार बना जाता है।

मेरी समझ से यह स्वाभाविक है कि हमारे बच्चे निष्क्रिय लाभार्थी नहीं हैं- हमारे बच्चे उस बदलाव के सक्रिय एजेंट हैं, जो हम अपने समाज में लाना चाहते हैं। वे एक-दूसरे की मदद करते हैं, एक-दूसरे को सहारा देते हैं और काम को अंजाम तक पहुंचाते हैं- खाना पकाने, सफाई, छोटे बच्चों की देख-रेख, धोना, नहाना- हमारे समाज में होने वाले हर काम में बच्चे सक्रिय रूप से शामिल होते हैं। इस तरह देखें तो समाज होने का अहसास और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद निश्चित रूप से झाम्त्से गत्सल की ख़ास बात है।

क्या आपका समाज अब भी बढ़ रहा है?

मेरे सबसे मुश्किल कामों में एक है कब और कैसे नए बच्चों को स्वीकार किया जाये। अभी हमारे पास 85 बच्चे हैं और 1000 से ज्यादा बच्चों के आवेदन पड़े हुए हैं।

रोज लोग मेरे पास आते हैं और ज्यादा बच्चों को लेने का आग्रह करते हैं। यह बहुत कठिन है, अगर मैं एक परिवार को हां कहता हूँ तो 10 अन्य को ना कहना पड़ता है। फिलहाल हमारे पास किसी भी नए बच्चे को लेने के लिए जगह और संसाधन नहीं हैं।

अंत में, आप किस चीज़ का अभ्यास करते हैं?

मेरा प्रमुख अभ्यास करुणा, स्थिरता, एकाग्रता को ज्यादा-से-ज्यादा बढ़ाने तथा धैर्य व दृढ़ता के मेरे प्रशिक्षण पर आधारित है।

अमीर या गरीब, पूर्व या पश्चिम, शिक्षित या अनपढ़, स्त्री या पुरुष- सभी मनुष्यों में एक बात सामान है- सब अपने जीवन में आनंद और खुशियों की कामना करते हैं।

मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझता हूं कि मुझे अपने जीवन में एक ऐसी चीज़ मिली जिसे करते हुए इतनी ख़ुशी और आनंद की प्राप्ति होती है। यही मैं महसूस करता हूँ। मैं कितना किस्मत वाला हूं। मैं प्रार्थना करता हूं कि मैं इसी तरह के कामों को करने और आगे बढ़ाने के लिए कई जन्म लूं। इस काम को करने में मुझे अपार ख़ुशी और आनंद मिलता है।

अनुवाद : आशुतोष उपाध्याय

कक्षा पहली के बच्चे : भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

भास्कर चौधुरी

एक

आपने सुना कभी
किसी हिटलर को कहते
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ

कक्षा पहली के बच्चे
ऐसा हर रोज़ कहते हैं-
सुंदर है यह धरती
आओ इसे और सुंदर बनाएँ।

दो

कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
हथेलियों के बीच
बच्चे के गाल
महसूस कर रहे हैं
उंगलियों का दबाव
और ठोढ़ी टिकी हुई है
हथेलियों की जड़ों पर
कक्षा पहली के बच्चे ने
थाम रखा है सर
जैसे थामा हो पृथ्वी
हथेलियों के बीच !

तीन

कक्षा पहली के बच्चे
नहीं जानते सौदा
किस चिड़िया का नाम होता है
वे नहीं समझते गिव एंड टेक का अर्थ
कक्षा पहली के बच्चे
हमारे थोड़े से समय के बदले
ढेर सारा प्यार दे देते हैं।

चार

कक्षा पहली के बच्चे
कहीं भी कभी भी
गाने लगते हैं जन गण मन…
जब चाहे
उनका मनकक्षा पहली के बच्चे
सुबह की प्रार्थना सभा में
पैर के अंगूठे से
धरती पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचते हैं
जब और लोग गाते हैं जन गण मन…

पाँच

बहुत दिनों के बाद
अपनी कक्षा से बाहर आए हैं
कक्षा पहली के बच्चे
जैसे अपने नीड़ों से निकलकर मेमनें
चल पड़ते हैं भेड़ों के साथ
उनसे सटकर
कक्षा पहली के बच्चे
अपनी टीचर जी के साथ
तितलियाँ पकड़ने का खेल खेल रहे हैं
बहुत दिनों के बाद
खिली है धूप
तो जैसे शामिल हो गई हो
चुपके से बच्चों की दूधिया खुशी में…
पहली कक्षा के बच्चे जैसे
बादलों के पीछे से
सूरज की तरह निकले
और छा गए
धूप की तरह पूरे मैदान में..

छः

कक्षा पहली के बच्चे
मायूस दिखते हैं जब
टॉयलेट के सामने
निकर आधी ऊपर चढ़ाए
बटन या हूक लगाने का
सफल-असफल प्रयास करते हैं
वे नहीं चाहते
कोई उन्हें देख ले नंगा
पहली कक्षा के बच्चे
अपनी टीचरजी से सटकर खड़े होते हैं
वे टीचरजी के होंठों को देखकर
और छूकर सीखते हैं-
‘आ’ आम का, ‘ए’ से एप्पल
‘औ’ से औरतकक्षा पहली के बच्चे
उनकी टीचरजी के ज़रा देर करते ही
खुद बन जाते हैं टीचर
चॉक पकड़कर श्यामपट पर
बनाते आदमी मकान चिड़िया तितली
छड़ी पकड़कर नन्हें हाथों में
खेलने लगते मैडम-मैडम
कक्षा पहली में
कम अज कम पाँच बच्चे होते
कक्षा के मॉनीटर….कक्षा पहली के बच्चे
केवल अपने टीचर को पहचानते हैं
वे उन्हें ‘टीचरजी’ कहकर पुकारते हैं
टीचरजी के मुंह पर उंगली रखते ही
अपने मुंह पर उंगलियाँ रख लेते हैं
और इशारा होते ही उनका
नाचने लग जाते हैंकक्षा पहली के बच्चे
समझते हैं प्यार की भाषा !!

सात

मेरे सपनों में आते हैं
कक्षा पहली के बच्चे
आते हैं और गुदगुदाने लगते है
पत्नी कहती है
हँसता हूँ मैं नींद में…।

आठ

दौड़ता रहता हूँ मैं
बड़ी कक्षाओं के बच्चों के बीच
कि जैसे एक डर सा लगने लगा है
इन दिनों बड़ी कक्षाओं के बच्चों से
ज़रा सी देर हुई नहीं कि
घटी कोई दुर्घटना
कि जैसे बच्चे बच्चे नहीं रहे
बड़ी कक्षाओं के…

कि जैसे-
बड़ी कक्षाओं के बीच
झूलता रहता हूँ
दोनों हाथों के बल
हवा में लटके होते हैं
दोनों पैर…
कि जैसे-
फुरसत ही नहीं
सांस लेने की भी …

पर मिलते ही
पहली कक्षा के बच्चों को
सांसों को इत्मिनान आ जाता है।

नौ

कक्षा पहली के बच्चे
दौड़ रहे हैं/कूद रहे हैं
मचल रहे हैं
गिर रहे हैं/उठ रहे हैं
उड़ रहे हैं
कक्षा पहली के बच्चे
गा रहे हैं कोई गीत
समूह में नाच रहे हैं
खेल रहे हैं कित-कित
लूट रहे हैं मज़ा
हल्की-हल्की बारिश में भीगने का

कक्षा पहली के बच्चे को भूख लगी है
वे मिड डे मील खा रहे हैं…

कक्षा पहली के बच्चे
तड़प रहे हैं
पेट पकड़-पकड़ कर
उल्टियाँ कर रहे हैं
पास पड़ी हुई
खुली हुई किताबे है
हवा में पन्ने फड़फड़ा रहे हैं…

दस

कक्षा पहली का बच्चा
चलता है सड़क पर ज
सड़क पर नहीं होती उसकी आँखें
वह देखता है
फूल पत्ती तितली आसमान
बादल बिजली बरसात गाय और गोबर
चीटियाँ पिल्ले और कुत्ते और कौवें धूल धुआ
तेज रफ्तार गाड़ियाँ
बाइकों का शोर और
रिक्‍शे की पों पों
भले लगते हैं
कक्षा पहली के बच्चे को
पहली कक्षा का बच्चा
छूता है जब कागज़ की नाव
उंगलियों के पोरों से
तो वह चलने लगती है बेपाँव
पाँव की ठोकर लगते ही
छोटा गोलाकार पत्थर
फुटबाल बन जाता है
क्क्षा पहली का बच्चा नहीं होता

सड़क पर कभी अकेला-उदास!!

ग्यारह

वह बच्चा
कक्षा पहली का
पहुँच नहीं पाया
अपनी कक्षा में
अब तक
दरअसल
खोज रही है
उसकी आँखें
धरती पर कोई नई चीज़
जो काम की हो उसके
मसलन
चकमक पत्थर
लकड़ी का एक
अदद टुकड़ा-
चिकना और बेलनाकार
सुनहली मक पत्ती !!

हिंदी अकादमी में सरकारी हस्तक्षेप बंद हो!

Hindi Academy

नई दि‍ल्ली : हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर ‘भाषादूत सम्मान’ देने का पूरा आयोजन जिस तरह एक प्रहसन में बदल गया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। चिंताजनक रूप से हिन्दी में सम्मानों का सम्मान लगातार घटता गया है और उस सिलसिले में जुड़ने वाली सबसे ताज़ा कड़ी हिन्दी अकादमी का यह आयोजन है।

हिन्दी अकादमी ने कुछ दिन पहले ब्लॉगिंग एवं अन्य माध्यमों से जुड़े नौ लेखकों के नामों का चयन किया और उन्हें ईमेल से सूचना दी गई कि 14 सितम्बर को दिल्ली के हिंदी भवन में उन्हें सम्मानित किया जाएगा। उसके दो-तीन दिन बाद ही गुज़रे सोमवार को उनमें से तीन लेखकों– अरुणदेव (समालोचन), संतोष चतुर्वेदी (पहली बार) और अशोक कुमार पाण्डेय (असुविधा), को ईमेल से सूचित किया गया कि उन्हें ‘त्रुटिवश’ इस सम्मान का निमंत्रण मिल गया था, वे पिछले पत्र को ‘मानवीय भूल’ मानकर उसकी अनदेखी करें। बताया जा रहा है कि सम्मानित होने वाले लेखकों की सूची को अंतिम समय में मंत्रालय के स्तर बदला गया। सम्मान देने के निर्णय को संचालन समिति में विचार-विमर्श के लिए न रखने और जो भी चयन हुआ था, उसमें संस्कृति मंत्री द्वारा मनमाने बदलाव किये जाने के विरोध में अकादमी की संचालन समिति से श्री ओम थानवी ने इस्तीफा भी दिया है।

हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्तशासी संस्था है। ‘दिल्ली में हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए बनी इस संस्था की जो संचालन समिति हिंदी अकादमी के अध्यक्ष (मुख्यमंत्री, दिल्ली सरकार) द्वारा दो साल की अवधि के लिए गठित की जाती है, वह अगर स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम न हो तो ऐसी संस्थाओं का कोई मतलब नहीं है। मसला सिर्फ़ पुरस्कारों और सम्मानों का नहीं। किसी भी तरह की गतिविधि के मामले में स्वायत्तता और पारदर्शिता ऐसी संस्थाओं के उपयोगी एवं उत्पादक बन पाने/बने रहने की बुनियादी शर्त है। वह न होने की स्थिति में वे जिनके ‘परिवर्धन और प्रचार-प्रसार’ के लिए गठित की गयी हैं, उनका अहित करने वाले तंत्र में तब्दील हो जाती हैं। इसलिए हम इस तरह के सरकारी हस्तक्षेप की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं। हम आम आदमी पार्टी की सरकार से यह मांग करते हैं कि जिन साहित्यकारों को उसने अकादमी का संचालन करने के लिए चुना है, उन्हें अपने विवेक से काम करने दे और अकादमी की स्वायत्तता का सम्मान करे। साथ ही, जनवादी लेखक संघ हिंदी अकादमी के लेखक पदाधिकारियों से भी यह उम्मीद करता है कि वे इस संस्था की स्वायत्तता की रक्षा को अपना ज़रूरी दायित्व मानेंगे और अनपेक्षित सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार करेंगे। वे हिंदी में लिखने वाले लेखक-समाज के प्रतिनिधि के रूप में अपनी ज़िम्मेदार भूमिका को समझें, ऐसी उनसे उम्मीद की जाती है।

(मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव) और संजीव कुमार (उप-महासचिव) की ओर से 16.09.2016 को जारी बयान)

बच्चो ने बनाए मॉडल और लगाया बाल विज्ञान मेला

मॉडल बनाते बच्चे

मॉडल बनाते बच्चे

अल्मोड़ा : अलायन्स फॉर साइंस प्रोग्राम के तहत रामगंगा वेली पब्लिक स्कूल मासी अल्मोड़ा में 7-10 सितम्बर 2016 तक मॉडल मेकिंग वर्कशॉप तथा बाल विज्ञान मेले का आयोजन किया गया। इस मेले में 30 मॉडल को लिया गया। मॉडल मेकिंग के लिए 8वीं व 9वीं कक्षा के 36 छात्रों को मेले के लिए चुना गया था।

मॉडल मेकिंग

7 व 8 सितम्बर  को बाल विज्ञान मेले के लिए चयनित मॉडल बनाए गए। इसके लिए 36 छात्रों को 8 समूह में बांटा गया। सभी ग्रुप ने 3-3 मॉडल्स बनाए। जब भी कोई मॉडल बनता तो उसकी कार्यप्रणाली व मॉडल से पुष्ट होने वाले नियम पर भी चर्चा की जाती थी। दो दिनों में सभी मॉडल्स बना लिए गए। मॉडल मेकिंग के दौरान बच्चे बहुत तल्लीन थे। बच्चों से हुई बातचीत से पता लगा कि उन्होंने ऐसे मॉडल पहली बार बनाए। बच्चे मॉडल की सुन्दरता पर विशेष ध्यान दे रहे थे।

मॉडल्स पर चर्चा

9 सितम्बर को स्थानीय अवकाश की वजह से स्कूल बंद था। इसलिए सभी 36 छात्रों को कुछ समय के लिए बुलाया गया था ताकि मॉडल्स के ऊपर चर्चा की जा सके। यह दिन चर्चा के लिए रखा था। सभी 8 ग्रुप्स को दो बड़े ग्रुप में बांटा गया और अपने-अपने मॉडल्स पर चर्चा के लिए आधा घंटे के समय दिया गया। क्योंकि मॉडल मेकिंग के दौरान भी मॉडल्स पर चर्चा हुई थी,  इसलिए बच्चे अपने मॉडल के लिए घर से तैयारी करके आए थे। ग्रुप चर्चा के दौरान बच्चों को स्वयं यह तय करना था कि उन्हें कौन-सा मॉडल प्रस्तुत करना है। बच्चों ने अपनी रुचि के आधार पर अपने मॉडल चुने। जिस मॉडल में बच्चों को समझने में कठिनाई हो रही थी, उस पर उन्हें मदद की गई। इस दिन बच्चों को अपने मॉडल पर आधारित चार्ट भी बनाने थे। यह काम घर के लिए दिया गया।

बाल विज्ञान मेला

10 सितम्बर को बाल विज्ञान मेले का आयोजन हुआ। इसमें कम्युनिटी इन्वोल्मेंट के लिए स्कूल की आर्ट शिक्षिका द्वारा पोस्टर थे, जिन्हें कस्बे में 4-5 जगहों पर चिपकाया गया था। अभिभावकों को भी सूचित किया गया था। पास के दो राजकीय विद्यालयों के शिक्षक और छात्रों को भी विज्ञान मेला देखने के लिए निमंत्रण भेजा गया था। लगभग 150 से ज्यादा अभिभावक, 30 शिक्षकों तथा 250 छात्रों ने मेले का आनंद लिया। सभी ने इस तरह के प्रयास की सराहना की।

मासी जैसे छोटे से कस्बे में यह पहला आयोजन था, जिसमें बच्चों द्वारा बनाए गए मॉडल्स की प्रदर्शनी लगी थी और बच्चे बिना किसी झिझक के अपने मॉडल के बारे में बता रहे थे। स्कूल के व्यवस्थापक संतोष मासीवाल ने बच्चों को उत्साहित करने के लिए पुरस्कार भी रखे थे। इसके लिए कुछ मापदंडों पर बच्चों को परखा गया। जैसे- मॉडल की कार्यप्रणाली, प्रस्तुतीकरण, बच्चे का आत्मविश्वास, मॉडल की सुन्दरता आदि।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

अपने बनाए मॉडल के बारे में बताते बच्चे ।

प्रस्तुति‍: आशीष कंडपाल

हिंदी  नहीं, हिंदी  दिवस : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

बाकी भाषाओं का तो वे जाने, हिन्‍दी के लेखकों के साथ तो मुझे लगता है कि‍ ऐसी स्थिति आ ही गई होगी, जो मेरे साथ है। कहानियों की कोई कमी नहीं है। जल में तैरती, भागती मछलियों की तरह। अनगिनत।

लिखने का इरादा करता हूं। संतोष से भर उठता हूं। कलम फड़फडा़ती  है, लेकिन फिर वही ख्‍याल। किसके लिए?  कौन पढ़ेगा?  कोई पढ़ भी रहा है? महानगर  के किसी भी बच्‍चे,  नौजवान से पूछ लीजिए। ‘बस पढ़ लेता हूं। पांचवी तक एक विषय था। अब तो लिख भी नहीं सकता। सच कह रहा हूं, अंकल! कई साल से नहीं लिखा हिन्‍दी में। स्‍कूल में तो मैम फाइन कर देती थी। कान उमेठ देती थी, बोलने पर। घर पर मम्‍मी-पापा भी नहीं चाहते थे कि‍ मैं हिंदी में लि‍खूं। मैंने एक बार हिन्‍दी में कविता लिखी। पापा ने बहुत डांटा। वैसे मेरे बाबाजी ने भी कविताएं लिखी हैं, पर अब वे मेरे साथ अंग्रेजी सीखते हैं। पीटी की मीटिंग में बाबाजी जाते हैं, न  कभी-कभी। मुझ से भी अंग्रेजी पूछ लेते थे। मुझे बहुत अच्‍छा लगता था। जब मैंने अंग्रेजी में कविता लिखी तो मुझे सबने प्‍यार किया। नानाजी तो इतनी दूर से गिफ्ट लेकर आए थे। हां बोल लेता हूं। डांस भी करता हूं, हिन्‍दी गानों पर।’

सोचते-सोचते कलम एक तरफ लुढ़क गई है। कितने ही चेहरे घूम रहे हैं हिन्‍दी साहित्‍यकारों के। अब तो दिल्‍ली में हर पखवाड़े निगमबोध जाना पड़ता हैं। फिर उनकी शोक सभाएं। बस हो गई, साहित्‍य सेवा। कथाकार क्षितिज शर्मा उपन्‍यास छपने के इंतजार में ही चल बसे। कितनी मेहनत लगती है, ऐसी रचना में? पर कौन मानता है। प्रकाशकों के आगे लंबी लाइनें लगी हैं, छपवाने वालों की। कथाकार-कलाकार प्रभु जोशी कह रहे थे कि‍ प्रकाशक फोन ही नहीं उठाते। बोले न बोले सौ में निन्‍यानवे का यही रोना। पढ़ने वाले कम, लिखने वाले ज्‍यादा। रॉयल्टी शब्‍द तो  हिंदी से  गायब ही  हो  जाएगा। पंजाबी भाषा के  सन्दर्भ  में तीन दशक पहले  खुशवंत सिंह ने  कहा  था  कि वहां किसी को  रॉयल्टी नहीं मिली।

अभी  साहित्‍य अकादमी में पता चला कि अमृतलाल नागर की जन्‍मशती मनाई जाएगी। बड़ा अच्‍छा लगा। आखिर सौ वर्ष में तो कोई नाम लेगा एक बार। इतना भी हो जाए, तो कम नहीं। अभी 9 अगस्‍त को मनोहर श्‍याम जोशी को उनकी पत्‍नी ने अपने बेटों के पैसों से याद किया। सचमुच!  चाय-पकोड़े पर  कुछ लोग तो अभी जुट ही जाते हैं। भविष्य  में  शायद यह  भी  मुश्‍कि‍ल  होगा। हज़ार आमंत्रण  पर पचास श्रोताओं  का औसत  है और वे भी  बड़े–बूढ़े। औसत  आयु 70  साल,  जिनमे  पिचानवे प्रतिशत  शुगर  के मरीज़। पकोड़े  खाएं तो  मुश्किन, न खाएं तो भी। वे उन दिनों को  याद  करते हैं, जब सूखी  चाय  पर भी नौजवानों  की  भीड़  जुटी  रहती थी। लगता है कि‍ हिंदी  को भी शुगर की बीमारी लग गई।  बहुत बड़ी-बड़ी बातें  हुईं, लेकिन हिंदी  लेखन पर  नहीं।  कैसा कृतघ्‍न है हिन्‍दी समाज?  जिस साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान. धर्मयुग की नाव में सवार हिन्‍दी घर-घर तक पहुंची, उन साहित्‍यकारों, संपादकों को नई पीढ़ी जानती तक नहीं।

ऐसा नहीं कि सारा दोष राजसत्‍ता का ही है। राजसत्‍ता, राजनीतिक पार्टियों के साये में पले-बढ़े संघठनों ने भी कम नुकसान नहीं किया। कौन रोकता है, इन्हें कि ये संगठन, विश्‍वविद्यालय, स्‍कूल में धर्मवीर भारती, दिनकर, अमृतलाल नागर, जगदीश चन्द्र, पाश…. को याद नहीं कर सकते। हिन्‍दी भाषा की ताकत इन लेखकों में है। जनता इसे जानती है। लेकिन ये केवल उसी लेखक को याद करेंगे, जो इनके पार्टी  में रहा हो। परसाई जी ने इन्‍हीं लेखकों के लिए कहा था- “हैं तो ये शेर, लेकिन राजनीति के  सियारों की बारात में बेंड बजाते हैं।“

पार्टी का लेखक जनता का लेखक कभी नहीं बन सकता। इसलिए हिन्‍दी लेखक जनता से दूर होता गया।

दिमाग में दौड़ती कहानी फिर गायब हो गई है- पानी में तेजी से दौड़ती मछलियों की तरह। जब इतने बड़े-बड़े साहित्‍यकार गायब हो गए, उनकी किताबें गायब हो गईं, तो तुम्‍हें कहानी गायब हो जाने का अफसोस क्‍यों? चश्‍मे का नम्‍बर तो नहीं बढ़ा? कमर तो नहीं झुकी? वक्‍त से पहले बुढ़ा तो नहीं गए? पांडुलिपि तो दर-दर की ठोकर नहीं खा रही?  प्राण तो आराम से निकलेंगे।  वरना कहानी,  उपन्‍यास पूरा करने के चक्‍कर में इसी हिन्‍दी प्रदेश में घूमते रहते और यमराज का भैंसा भी इंतजार में भूखा मर जाता। लिखना है, तो किसी और भाषा में लिखें- जहां बच्‍चे इन किताबों को पढ़े। पुरस्‍कारों से कोई भाषा नहीं बचती। लेखक और समाज भी नहीं।

पता नहीं कभी किस गफलत में वे रोज कागज काले करते थे। रात में सोने न सोने के बीच सिरहाने कागज पर अंधेरे में ही कुछ-कुछ नोट करते। लगता था, छपते ही दुनिया बदल जाएगी। दशकों तक इस भ्रम में जीते रहे। बदलता था तो बस घंटे दो घंटे या दिनभर का मूड।  लेकिन सूरज छिपने के साथ ही छूमंतरवाकई कितना खोखला था, सब कुछ। लेकिन जीने के लिए कुछ भ्रम भी तो चाहिए। सोशल मीडिया उसी भ्रम की अगली कड़ी साबित हुआ। किताबों, अखबारों से मोहभंग हुआ तो उसी सोशल मीडिया की तरफ उम्‍मीद से देखने लगे जिसकी सूरत से भी चिढ़ लगती थी। लेकिन यह क्‍या? लाइक तो करते हैं, पढ़ता एकाध ही है। अपने बच्‍चे तक नहीं देखते- कहने के बावजूद। ‘आप अंग्रेजी में लिखा करो पापा ! हिन्‍दी अब नहीं चलेगी।’ दीवारों पर चप्‍पे -चप्‍पे पर जब ऐसे इश्तिहार चिपके हों, तो कोई क्‍यों हिन्‍दी में लिखे।

लेकिन सितंबर में तो हम चलाएंगे ही। सितम्बर बुलावा देता फिर  रहा  है- हिंदी दिवस पर  आने और  गाने बजने  के लिए। जय हिंदी ! जय  हिन्दी दिवस!

बच्चों के लिए कविताएँ : संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

संज्ञा उपाध्याय

उफ़ कबूतर! ये कबूतर !

उफ़ कबूतर! ये कबूतर!
गूँ गूँ गूँ गूँ गुटर गुटर कर
कितना शोर मचाते हैं!

सुबह-सुबह मेरी खिड़की पर
फड़ फड़ फड़ फड़ पंख फटककर
जबरन मुझे जगाते हैं!

बिना इजाज़त घर में घुसकर
शान से हर कमरे में फिरकर
हम पर रौब जमाते हैं!

आँख सदा रखते झाड़ू पर
चाहे कितनी रखो छिपाकर
सींकें ले उड़ जाते हैं!

फेंको तिनके झाड़-बुहारकर
पर जो भायी, उसी जगह पर
फिर-फिर उन्हें सजाते हैं!

डांटूं जब मैं हाथ झटककर
डरने का थोड़ा नाटक कर
गोल आँख मटकाते हैं!

आसमान में चक्कर भरकर
उड़े जहाँ से, वहीं बैठकर
गर्दन ख़ूब फुलाते हैं!

मकड़ी जाला बुनती है

मकड़ी जाला बुनती है
नहीं किसी की सुनती है
पूरे घर को देखभाल कर
कोने-अँतरे चुनती है
दम साधे जाले में बैठी
गुर शिकार के गुनती है
जाले पर झाड़ू फिरने पर
रोती है सिर धुनती है
किसे सुनाये दुखड़ा जाकर
दुनिया ऊँचा सुनती है.

बादल का वह नटखट बच्चा

बादल का वह नटखट बच्चा
हाथ छुड़ाकर अपनी माँ से
आगे-आगे दौड़ गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!
घूम रहा है जाने कब से
तरह-तरह के रूप बदलके
भालू, हाथी, कछुआ बनके
मेरी खिड़की तक आया तो
मछली बनकर तैर गया है
बादल का वह नटखट बच्चा!

कैसे बतलाऊँ…

अक्सर पूछा करते हैं सब
चलते में इस तरह अचानक
यूँ तुम ठिठक क्यूँ रह जाती हो
खड़ी हुई तो खड़ी रह गई
कभी देखती कहीं एकटक रह जाती हो
कैसे यह समझाऊँ सबको
रस्ते में जब पेड़ कोई
या कोई बादल, कोई कौवा
बतियाने लगता है मुझसे
ठिठकी हुई नहीं होती हूँ, बह जाती हूँ…

सूरज का माथा गरमाया

सूरज का माथा गरमाया
चढ़ा है उसका पारा
होकर आगबबूला उसने
सब पर ताप उतारा
आसमान कोरे कागज़-सा
बिन पंछी बिन बदरा
पड़ा तार पर सूख रहा ज्यों
साफ़ धुला इक चदरा
हवा दुबक के जा बैठी है
छाया में कहीं छुपकर
कहीं बुखार ना हो जाये
इस तेज़ घाम में तपकर
पंछी मुँह लटकाये बैठे
कहाँ से पायें पानी
बच्चे उनके दाना माँगें
सुनते नहीं कहानी
तब धरती इक बड़े ताल में
पानी लायी भरकर
नंगे पाँव धूप में जल गये
भागी घर के अंदर
खिड़की से झाँका जो आयी
छप छप की आवाज़
ताल में सूरज नहा रहा था
छोड़ के सारे काज!

बाल मंदिर के पुजारी गिजुभाई : संजीव ठाकुर

15.11.1885-23.06.1939

15.11.1885-23.06.1939

बच्चों के लालन-पालन, विकास और शिक्षा की चिंता करने वाले लोग पूरी दुनिया में हुए हैं। प्रायः सभी ने शिक्षा आदि के प्रचलित तरीकों का विरोध किया है और बच्चों की आजादी की वकालत की है। अपने देश में जिन लोगों ने इस दिशा में चिंतन-मनन किया है, उनमें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी, विवेकानंद, अरविन्द घोष, मदन मोहन मालवीय, डॉ. राधाकृष्णन, विनोबा भावे, जाकिर हुसैन, डॉ. अम्बेडकर आदि का नाम ससम्मान लिया जाता है। इस क्षेत्र के नामों में से एक नाम जो इनसे कम महत्त्व का नहीं है, अक्सर लोगों की जुबाँ पर आने से रह जाता है। अक्सर भुला दिया जाने वाला वह नाम है, गुजरात के शिक्षा शास्त्री गिजुभाई का। सच्चाई तो यह है कि काफी अरसे तक लोगों को इस नाम का पता ही नहीं था। शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रयोग करने और गुजराती में दो सौ से अधिक पुस्तकें लिखने के बावजूद गिजुभाई को गुजरात से बाहर जानने वाले कम ही लोग थे। यह तथ्य तब और भी दुर्भाग्यपूर्ण लगने लगता है, जब हमें यह जानने को मिलता है कि गिजुभाई की महत्त्वपूर्ण कृतियों में से एक ‘दिवास्वप्न’ का हिन्दी अनुवाद 1932 में ही हो चुका था।

गिजुभाई के काम को देखकर कोई भी दाँतों तले उँगली दबा सकता है। एक अकेला शख्स! न कोई सरकारी सहायता। न कोई अनुदान! बस अपनी लगन और बच्चों के प्रति लगाव के बल पर वह काम कर डाला, जो किसी सरकारी सहायता प्राप्त संस्था के लिए भी संभव नहीं है। बच्चों के बीच काम करने के साथ-साथ लेखन के लिए समय निकालना और किसी लेखक से अधिक लिख जाना, इसके अलावा माता-पिता और शिक्षकों के लिए पत्रिका निकालना गिजुभाई जैसे समर्पित और परिश्रमी व्यक्ति के लिए ही संभव था। शुरू में गिजुभाई ने भी कहाँ सोचा था कि उन्हें शिक्षा की दिशा में जाना है? उन्होंने तो वकालत की पढ़ाई की थी और वकालत का पेशा अपनाया था। लेकिन उनकी दिशा बदल गई। उनकी दिशा बदलने का काम किया एक पुस्तक ने जो उन्हें एक मित्र ने पढ़ने को दी थी। ‘मोंटेसरी मदर’  नाम की इस पुस्तक के बारे में स्वयं गिजुभाई ने लिखा है- ‘अगर मुझको किसी ने पहले ही सावधान कर दिया होता कि ‘मोंटेसरी मदर’ नामक पुस्तक पढने से मेरी जीवन-धारा ही बदल जाएगी, जीवन एक नए प्रकाश से जगमगा उठेगा और मुझको एक नई क्रांतिकारी दृष्टि प्राप्त हो जाएगी, तो मेरे जैसा एक वकील इस पुस्तक को अपने हाथ में थामता या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है।’ (‘बाल शिक्षण: जैसा मैं समझ पाया’, पृ. 17)

और गिजुभाई केस की वकालत छोड़ बच्चों की वकालत करने लगे, बच्चों के बहुत बड़े वकील बन गए! उन्होंने न केवल बच्चों की आजादी की वकालत की, बल्कि बच्चों को सिखाने-पढ़ाने की परंपरागत पद्धतियों पर भी प्रहार किया और शिक्षा का एक ऐसा मॉडल विकसित कर समाज के सामने रखा कि जिसे अपनाकर समाज बच्चों को एक स्वस्थ वातावरण तो उपलब्ध करा ही सकता है, प्रताडना और मानसिक दबाव से निजात भी दिला सकता है।

गिजुभाई बच्चों से प्रेम करते थे। वे चाहते थे कि माता-पिता और शिक्षक भी सही मायनों में बच्चों से प्रेम करें। माता-पिता और शिक्षक बालकों के लिए भयहीन माहौल बनाएँ। बिना डाँट-डपट के, बिना मार-पिटाई के उनकी परवरिश करें। उन्हें शिक्षित करें। घर और विद्यालयों को बालकों के सृजनात्मक विकास में बाधक जानकर गिजुभाई बहुत चिंतित होते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘घर और विद्यालय ऐसे स्थल हैं, जहाँ बालकों की सृजनशीलता का सहज स्वाभाविक रीति से विकास होता है और यही वे स्थल हैं, जहाँ उनके सृजन को रोकने, विकृत करने अथवा निर्मूल करने का काम होता है।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, पृ.18)

बच्चों के विकास में सबसे बड़ा बाधक गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट, दंड वगैरह है। गिजुभाई के मुताबिक मार-पीट या दंड देकर किसी बच्चे को पढ़ाया-लिखाया नहीं जा सकता। ‘अगर ऐसा करने से बालकों की बुद्धि बढ़ सकती हो तो किसी भी बेवकूफ को मारपीट कर बुद्धिमान बना सकते हैं।’ (प्राथमिक शाला में शिक्षक, पृ. 55)

गिजुभाई तो बच्चों को स्वतंत्र वातावरण में रखना और शिक्षित करना चाहते थे। दंड, पुरस्कार, लोभ, लालच से दूर रखकर सच्ची स्वतंत्रता देना चाहते थे। निश्चय ही गिजुभाई के इस स्वतंत्रता-सिद्धांत से स्वतंत्र नागरिक को तैयार किया जा सकता है। लेकिन इस स्वतंत्रता को स्वच्छंदता की हद तक ले जाने के पक्ष में गिजुभाई नहीं थे। वे यह तो चाहते थे कि बच्चे अपने शरीर से, मन से, आत्मा से स्वतंत्र हों, लेकिन समाज के नियम-कायदे को तोड़कर, सामाजिक परिवेश की उपेक्षा कर गाली-गलौच, मार-पीट करने जैसी आजादी हासिल करना चाहें तो उन्हें ऐसी आजादी न देने के पक्ष में भी गिजुभाई थे। हाँ, बच्चों को स्वनिर्णय लेने और स्वावलंबन की ओर बढ़ाने में गिजुभाई हमेशा आगे रहते थे। उनका तो यह मानना था कि जो बच्चे बड़ों से हर काम पूछकर करते हैं, उन्हें दरअसल रोकने की जरूरत है।

बच्चों को स्वावलंबी बनाने और उनमें आत्मविश्वास जगाने के लिए गिजुभाई ने यह जरूरी समझा था कि बच्चे छोटे-मोटे काम खुद करें। नहाना, खाना, कपड़े धोना, बर्तन साफ करना, झाड़ू लगाना, कंघी करना, ऐसे ही काम थे। अपनी शाला में तो गिजुभाई बच्चों से ये काम करवाते ही थे, माता-पिता को भी प्रेरित करते थे कि वे उन्हें ऐसे काम करने से न रोकें।

गिजुभाई बच्चों को पल-पल पिलाए जाते उपदेशों से भी बहुत आहत होते थे। उनका मानना था कि ऐसे उपदेशों से बच्चों का विकास कतई नहीं होता।

गिजुभाई का चिंतन और लेखन बहुआयामी था। एक ओर उन्होंने माँ-बाप को बच्चों के प्रति कर्त्तव्यों का ज्ञान कराने के लिए किताबें लिखीं तो दूसरी ओर शिक्षकों को ‘शिक्षित’ करने के लिए। बच्चों को भाषा-व्याकरण कैसे सिखाएँ? गणित को आसान तरीके से कैसे बतलाएँ? बच्चों को कथा-कहानी क्यों कहें? शिक्षा में चित्रकला, संगीत, कारीगरी को महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दें? इन सब पर गिजुभाई ने विस्तार से अपनी कलम चलाई है। इन सब के अलावा उन्होंने बच्चों के लिए ढेर सारी कहानियाँ भी लिखी हैं। इन कहानियों के जरिये उन्होंने बच्चों को अलग-अलग तरह की बातें सिखाने का काम किया ही था, कक्षा में बच्चों का मन लगाने का काम भी किया था। खेल-कूद, संगीत, घुमक्कड़ी आदि को अपने विद्यालय में शामिल कर गिजुभाई ने एक ऐसा स्नेहिल वातावरण तैयार किया था कि बच्चे अपने घर ही नहीं जाना चाहते थे। क्या आज ऐसे किसी स्कूल की कल्पना की जा सकती है, जहाँ से बच्चे घर ही नहीं जाना चाहें? ऐसा तो तभी संभव हो सकता है न, जब बच्चों को रोका-टोका न जाए, जबरन ‘ज्ञानी’ न बनाया जाए, उनको अपने मन का काम करने की छूट दी जाए, पढ़ाने की पद्धति अनौपचारिक हो, शिक्षक हाथ में बेंत लेकर चलने के बदले प्यार की छड़ी से काम लें?

अपनी पुस्तक ‘प्राथमिक शाला में शिक्षक’ में गिजुभाई ने विस्तार से लिखा है कि उनके विद्यालय में क्या होना जरूरी है और क्या होना जरूरी नहीं है? इसे पढ़कर पता चलता है कि गिजुभाई कितने मुक्त विद्यालय की चाह रखते थे?

गिजुभाई ने बच्चों का सम्मान किया था, उन्हें प्रेम किया था। इसीलिए उनका ‘बाल मंदिर’ वास्तव में बच्चों की पूजा का स्थान बन सका था और वे शिक्षक न रहकर बच्चों के लिए ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके थे। शिक्षाविद् मधुरी देसाई ने गिजुभाई के व्यक्तित्व के उस पहलू पर गौर करते हुए ठीक ही लिखा है- ‘गिजुभाई ने माँ जैसी सूक्ष्म दृष्टि और ममता भरी नजरों से बालकों को देखा था और उनके व्यक्तित्व को सजगतापूर्वक विकसित करने का प्रयत्न किया था। सघन मूँछों वाला प्रभावशाली स्वरूप होते हुए भी गिजुभाई बालकों के समीप आ सके और उनका विश्वास पा सके, तभी वे ‘मूँछों वाली माँ’ बन सके।’ (प्राथमिक शाला में चिट्ठी वाचन, भूमिका)

परंपरागत विद्यालयों में गिजुभाई को बहुत सी बुराइयाँ नजर आती थीं। सजा देना तो एक बुराई थी ही, बालकों को गलत ढंग से पढ़ाना, रटाना, पुरस्कार या लालच देकर कोई काम कराना भी उनकी दृष्टि में बड़ी बुराई थी। इसी तरह गृहकार्य का बोझ देने वाले स्कूल भी उन्हें तनिक न सुहाते थे। गृहकार्य में लगे बच्चों को देखकर गिजुभाई काँप-काँप जाते थे। गृहकार्य बच्चों के लिए उन्हें एक ‘त्रास’ नजर आता था। इतने घंटे पाठशाला में बिताकर आने के बाद गृहकार्य से जूझते बच्चों को देखकर उन्हें दुख होता था। गृहकार्य को वे बच्चों के लिए नुकसानदेह ही मानते थे।

गिजुभाई को बालकों के मनोविज्ञान की गहरी पकड़ थी। वे शिक्षकों से भी बाल-मनोविज्ञान की समझ की अपेक्षा रखते थे। वे चाहते थे कि शिक्षक हर बात पर बच्चों को रोकें-टोकें नहीं। न ही बच्चों को ‘बेहूदा, आलसी, लापरवाह, ठग, निकम्मा’ आदि कहें। बच्चों पर इन शब्दों से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव से वे अच्छी तरह वाकिफ थे। इसलिए वे चाहते थे कि शिक्षक बच्चों के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करें।

शिक्षा के एक अनिवार्य अंग- परीक्षा को गिजुभाई गैर जरूरी समझते थे। विद्यालयों में ली जाने वाली परीक्षाओं को वे एक ओर मिथ्याभिमान और दूसरी ओर निराशा का जनक मानते थे। परीक्षा में अच्छे अंक लाने वाले बच्चों में अभिमान का भाव और बुरे अंक लाने वालों में निराशा का भाव देखकर उन्हें निराशा होती थी। विद्यालयों के साथ-साथ घरों में भी तरह-तरह की परीक्षाओं से गुजरते बच्चों को देखकर गिजुभाई को अच्छा नहीं लगता था। दूसरों के हिसाब से ही अपनी जिंदगी जीने का आदी होता आदमी उन्हें अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने लिखा है- ‘परीक्षा शाला में ही नहीं चलती, हमारे घरों में भी तरह-तरह की स्पष्ट-अस्पष्ट परीक्षाएँ चलती हैं। यही कारण है कि आज का मनुष्य अपने भीतर का नहीं रहा, बाहर का बन गया। स्वयं अपने लिए जीने की बजाय बाहर के लिए जीता है। …बाह्य पैमाने पर स्वयं को मापता है और इसी में संतोष एवं सार्थकता का अनुभव करता है। संक्षेप में, वह अपने भीतर से मरकर यानी अपनी आत्मा से मरकर बाहर से यानी शरीर से जीता है।’ (शिक्षक हों तो, पृ. 117)

जाहिर है, मरी हुई आत्मा का मनुष्य मरी हुई जिंदगी ही जिएगा,  मरे हुए समाज का निर्माण ही करेगा। हताशा, कुंठा, अवसाद जैसी मानसिक व्याधियाँ उसे चारों ओर से जकड़ लेंगी।

गिजुभाई बुद्धि की जगह हृदय को महत्त्व देते थे। वे चाहते थे कि बच्चों की बुद्धि से पहले उनके हृदय का विकास हो। ‘क्योंकि अगर मनुष्य का हृदय विकसित हो गया तो उसकी बुद्धि उसे सन्मार्ग पर ले जाएगी।’ इसके लिए वे शिक्षा में संगीत, कला, नाटक, कारीगरी आदि को शामिल करना जरूरी समझते थे। उनका मानना था कि ‘संगीत व चित्रकला का ज्ञान प्राप्त करने वाला बालक स्पर्धा, द्वेष, क्लेष-तकरार या मारपीट नहीं करेंगे, अपितु वे सौंदर्य के सात्त्विक उपासक बनेंगे। सौंदर्य की सात्त्विक उपासना ने दुनिया में कभी किसी का अहित नहीं किया।’ (प्राथमिक शाला में कला-कारीगरी की शिक्षा, भाग-1, प्रस्तावना)

गिजुभाई के चिंतन पक्ष और व्यावहारिक पक्ष को जानने-समझने के बाद हमें यह लगता है कि गिजुभाई ने विदेश के कई शिक्षाशास्त्रियों के साहित्य का अध्ययन-विश्लेषण किया था। और मधुमक्खी की तरह अनेक जगहों से मधु का संचयन कर अपने जीवन में उतारा था। मारिया मोंटेसरी तो उनकी आदर्श ही थीं। इनके अलावा ए.एस. नील, पेस्तालॉजी और प्रोबले के विचारों को भी उन्होंने आत्मसात किया था। लेकिन उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों का अंधानुकरण नहीं किया था। उन्होंने स्वविवेक, स्वानुभव और स्वप्रयोग से भी बहुत कुछ अर्जित किया था। सबसे बड़ी बात कि उन्होंने पाश्चात्य विद्वानों के विचारों को भारतीय परिवेश के हिसाब से ही धारण किया था।

गिजुभाई गुजरात के भावनगर में उस समय अपने शिक्षा-संबंधी प्रयोग कर रहे थे, जिस समय देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। गिजुभाई का काम प्रत्यक्ष रूप से न सही, परोक्ष रूप में ही इस लड़ाई में योगदान तो दे ही रहा था। आजाद बच्चों को तैयार कर प्रकारांतर से वे आजाद देश और आजाद दुनिया ही तो तैयार कर रहे थे। और फिर समय-समय पर वे सीधी तरह आजादी की लड़ाई में शरीक भी तो होते थे। 1930 ईस्वी में बारडोली-सत्याग्रह में शामिल किसानों के बीच वे अपने बच्चों के साथ गए थे। किसानों के छोटे-छोटे बच्चों को एकत्र कर वे उन्हें नहलाते-धुलाते थे, खेलाते थे, गीत-कहानी सुनाते थे, लिखना-पढ़ना सिखाते थे। क्या यह आजादी के आंदोलन में उनका योगदान नहीं था? उन्होंने बच्चों की वानरी सेना बनाकर गाँव-गाँव जाने, प्रभातफेरी निकालने, शराब के ठेकों और विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग करने का काम भी खूब किया था। तभी तो उनकी मृत्यु पर गाँधी जी ने लिखा था- ‘गिजुभाई के बारे में कुछ लिखने वाला मैं कौन हूँ? उनके कार्यों ने तो मुझे सदैव मुग्ध किया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि उनका कार्य आगे बढ़ चलेगा।’ (‘विश्व के शिक्षाशास्त्री’, पृ. 321)

शिक्षा और बच्चों के समुचित विकास की दिशा में गिजुभाई का योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान के रूप में रेखांकित किया जाना चाहिए। गिजुभाई के विचारों को शिक्षकों तक पहुँचाने हेतु इन्हें शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनकी ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक तो सभी शिक्षकों और माता-पिता को निश्चित रूप से पढ़नी चाहिए। गिजुभाई जैसे शिक्षाशास्त्रियों के विचारों को अपनाकर शिक्षा-पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की कोशिश की जानी चाहिए।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व के महान् शिक्षाशास्त्रियों की पंक्ति में ससम्मान रखे जाने योग्य गिजुभाई को बहुत लंबी उम्र नहीं मिली थी। मात्र 53 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। उनका जन्म 15 नवंबर 1885 को भावनगर रियासत के चित्तल गाँव में हुआ था और मृत्यु बम्बई में 23 जून 1939 को। उनका पूरा नाम गिरजाशंकर बधेका था। पिता भगवान जी बधेका वकील थे। 12 वर्ष की उम्र में गिजुभाई का विवाह हरिबेन के साथ हो गया था। दुर्भाग्यवश हरिबेन की मृत्यु हो गई। हरिबेन की मृत्यु के बाद 1906 में जड़ीबेन के साथ उनका द्वितीय विवाह हुआ। 1907 में वे पूर्वी अफ्रीका की यात्रा पर गए थे और 1909 में भारत लौट आए थे। 1910 में बंबई में उन्होंने कानून की पढ़ाई शुरू की थी और 1913 में हाई कोर्ट में प्लीडर हो गए थे। 1915 में वे शैक्षणिक संस्था ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ के कानूनी सलाहकार बने थे। 1916 से वे दक्षिणामूर्ति में अध्यापन का कार्य करने लगे थे। 1920 में उन्होंने ढाई से पाँच वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए भावनगर की तख्तेश्वर टेकरी पर ‘बाल मंदिर’ की स्थापना की थी, जिसका उद्घाटन कस्तूरबा गाँधी ने किया था। इस ‘बाल मंदिर’ में बच्चों को वास्तव में मंदिर के देवता की तरह रखा जाता था। 1936 में गिजुभाई ‘श्री दक्षिणामूर्ति भवन’ से मुक्त हो गए थे। इसी वर्ष कराची में आयोजित बाल मेले में अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिरकत की थी। 1938 में राजकोट में उन्होंने एक ‘अध्यापन मंदिर’ की स्थापना की थी। यह उनका अंतिम महत्त्वपूर्ण कार्य कहा जा सकता है।

गिजुभाई ने गुजराती में करीब 225 पुस्तकें लिखी हैं। ‘दिवास्वप्न’, ‘माता-पिता से’, ‘शिक्षक हों तो’, ‘मोंटेसरी पद्धति’, ‘प्राथमिक शाला में शिक्षा-पद्धतियाँ,’ ‘प्राथमिक शाला में भाषा शिक्षा’, ‘चलते-फिरते’ आदि इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। ‘चोर मचाए शोर’, ‘चूहा सात मूँछों वाला’, ‘मुनिया रानी’, ‘नकल बिन अकल’, ‘खड़बड़-खड़बड़’, ‘मेंढक और गिलहरी’, आदि गिजुभाई की पुस्तकें हिन्दी के पाठकों के लिए भी उपलब्ध हैं। इन कथाओं के जरिये उन्होंने बच्चों को ही नहीं, माता-पिता और शिक्षकों को भी शिक्षित करने का काम किया है।

गिजुभाई की मृत्यु के इतने वर्षों बाद भी बच्चों के माता-पिता और शिक्षक ‘शिक्षित’ हो पाए हैं या नहीं, यह सवाल आज भी उतना ही मौजूँ है। और शायद इसीलिए गिजुभाई की ये पंक्तियाँ भी आज उतनी ही मौजूँ हैं-

‘जब तक बालक घरों में मार खाते हैं
और विद्यालयों में गालियाँ खाते हैं
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों के लिए पाठशालाएँ, वाचनालय,
बाग-बगीचे और क्रीड़ांगण न बनें
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?
जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता
तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?’

एक और दिवास्वप्न : कैलाश मंडलोई 

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‘शैक्षिक दख़ल’ की समीक्षा-

शिक्षा जगत में हलचल मचाने वाली, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का चिंतन-मनन करती पत्रिका ‘शैक्षिक दखल’, शिक्षा जगत के अंगों में लग रहे जंग को शिक्षकों के साझा प्रयास से खुरचने का प्रयास कर रही है। यह एक अनूठी पहल है। जुलाई 2016 का यह अंक ‘प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं बच्चे’ विषय पर केन्द्रित है। इसका प्रत्येक आलेख बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का एक प्रारूप प्रस्तुत कर रहा है। अपने बच्चों के प्रति चिंतित अभिभावकों एवं शिक्षकों के लिए यह अंक मार्गदर्शिका है। प्रारंभ के दो आलेख इस अंक की प्रस्तावना हैं। पहला आलेख ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दे’ महेश पुनेठा का है, जो इस और संकेत करते हैं कि अधिकांश पालक एवं शिक्षक अपनी झूठी सत्ता को बनाए रखने के लिए बच्चों के प्रश्नों से बचते हैं। ज्यादा प्रश्न करने वाले बच्चों को नापसंद करते हैं। इस आलेख द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है कि ‘बच्चों के प्रश्नों को मरने न दें’ क्योंकि प्रश्न ही तो हैं, जो हमें खोज-आविष्कार-सृजन की और ले जाते हैं। प्रश्न ही बच्चे में कल्पनाशीलता और रचनात्मकता का विकास करते हैं। इस विषय की प्रस्तावना को आगे बढ़ाता हुआ दूसरा आलेख है- प्रश्न न करने का मनोविज्ञान जो फेसबुक परिचर्चा पर आधारित है। इस फेसबुक परिचर्चा में लग-भग 60-65 शिक्षकों, चिंतक व लेखकों ने प्रश्न न करने के मनोविज्ञान पर अपने-अपने विचार निम्न बिंदुओं पर दिए हैं-

  1. आप बच्चे को प्रश्न पूछने के लिए क्यों प्रोत्साहित करना चाहेंगे?
  2. बच्चे प्रश्न करने से क्यों डरते हैं?
  3. यह भी एक तथ्य है कि बच्चे प्रश्न के गलत होने के डर से भी प्रश्न नहीं करते हैं,बहुत सारे बच्चों ने अपने उत्तर में यह बात कही। क्या आपको लगता है कि प्रश्न भी गलत हो सकता है? बच्चे के पास यह बात कहां से आई होगी?
  4. बच्चों में‘प्रश्न करने के प्रति झिझक’ की जड़ें क्या हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी देखी जा सकती हैं? 5. क्या आपको लगता है कि भाषा में अधिकार न होना भी बच्चे को प्रश्न करने से रोकता है?
  5. क्या प्रश्न करना सिखाया जा सकता है और कैसे?
  6. बच्चों को प्रश्न करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है?

डॉक्‍टर अनिता जोशी का आलेख ‘प्राथमिक शिक्षण एक चुनौती’, प्राथमिक स्तर के बच्चों एवं प्राथमिक कक्षा के शिक्षकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। प्राथमिक स्तर पर बालक सृजन की प्रवृत्तियाँ रखता है। जिज्ञासा के कारण पूछताछ की प्रवृत्ति अधिक होती है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षक का कार्य संवेगात्मक विकास द्वारा बच्चों को सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने योग्य बनाना है। अत: प्राथमिक स्तर पर अध्यापन करने वाला शिक्षक ही शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ है।

डॉक्‍टर इसपाक अली का आलेख जनजातीय समाज, उसकी शिक्षा और समस्या की बात करता है।  ‘बचपन, कल्पनाशीलता और शिक्षा’ आलेख में आनन्द गुप्ता प्रश्न उठाते हैं कि बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मक सोच को कैसे बचाया जाए। इस बारे में सबसे बड़ी भूमिका विद्यालय और शिक्षकों को भी निभानी होगी। उनका कहना है कि शिक्षकों की सोच में भी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता होनी चाहि‍ए तभी वे अपने बच्चों में इन गुणों का विकास कर सकेंगे। कालूराम शार्मा अपने आलेख में कहते हैं कि ‘जब जवाब पता है तो सवाल क्यों?’ कथित शिक्षा व्यवस्था चाहती है कि उसकी कक्षा के बच्चे हूबहू वहीं जवाब दें, जो अपेक्षा की जाती है। और वह अपेक्षा पाठ्य पुस्तक की सीमा से बंधी होती है। यानी सवाल भी मेरे और जवाब भी मेरे। यह कैसे हो सकता है। यहाँ वे प्रोफेसर यशपाल की बात रखते हैं। प्रोफेसर यशपाल कहते हैं कि स्कूल के सवालों और असल जिंदगी के सवालों में फर्क क्यों? वैसे इस निराशाजनक स्थिति के बावजूद ऐसे शिक्षक मिल ही जाएंगे, जो मौलिक सवाल उठाते हैं या बच्चों को सवाल करने को प्रेरित करते रहते हैं। देवेश जोशी का आलेख ‘उत्तर से मत डरिए, प्रश्‍न न पूछने से डरिए’, जब छात्र द्वारा पाठ्यक्रम को छोड़कर कोई प्रश्न पूछा जाता है, तो शिक्षक की क्या प्रतिक्रिया होती है और एक छात्र के मन पर इसका क्या प्रभाव हुआ, शिक्षकों को संदेश देता आलेख है। जब बच्चों को बार-बार चुप कराया जाता है, उन्हें आधे-अधूरे जवाब दिए जाते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चों मन में प्रश्न के प्रति एक नकारात्मक ग्रंथि बन जाती है, जिससे वे प्रश्न करने से हिचकिचाते हैं। क्या करें कि प्रश्न के प्रति बच्चों की हिचकिचाहट दूर हो, इसे प्रस्तुत करता आलेख ‘प्रश्न करने से हिचकिचाते बच्चे’।

चिंतामणि जोशीजी कि कहानी ‘और दिलबर नठ गया’, एक ड्राप-आउट बालक की कहानी है। यह दिल को छूने और मन को झकझोर देने वाली कहानी है, जो अभिभावकों एवं शिक्षकों को अपने दायित्वबोध का संदेश दे रही है कि प्रताड़ना कभी भी प्रेरणा नहीं बन सकती और न ही प्रेरणा के बिना कोई बच्चा किसी प्रकार की सफलता प्राप्त कर सकता है। इसलिए यह सत्य है कि‍ बच्चे प्रताड़ित होकर आगे नहीं बढ़ते और इसी बात को आपने सही तरीके रखा है।

‘बचपन के दिन’ स्तम्भ के तहत ‘गुड-सेकेंड लड़का’ आलेख में लेखक पद्मनाभ मिश्र ने अपने बचपन से लेकर नौकरी लगने तक के जीवन का एक ऐसा स्पष्ट चित्र प्रस्तुत किया है, जिसमें हर बार उनकी इच्छा के विपरीत हुआ। इसे पढ़ने पर लगता है कि कई बार हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ है और हम देखते है कि‍ कहीं-न-कहीं आम बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। मिश्रजी ने अपने जीवन चरित्र के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि‍ बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार विषय पढ़ने की व्यवस्था की जानी चहिए। लेख बड़ा है, लेकिन बहुत कुछ देने वाला है। ‘आते हुए लोग’ स्तम्भ में, ‘मैं मासाप नहीं, तानाशाह बन गया’ आलेख में लेखक तारा सिंह चुफाल शाला में भयमुक्त वातावरण की बात करते हैं। बचपन में उन्होंने जो शिक्षकों की तानाशाह झेली, उसका सतही चित्रांकन किया है, जिसे आज भी कई मासूम बच्चे झेल रहे हैं। जब उन्हें गरीबी और बेरोजगारी ने बेमन से शिक्षक बनाया, वे भी तानाशाह बन गए। जब कई वर्षों बाद उन्होंने पाया की बच्चों को सिखाने की नहीं, उनसे सीखने की आवश्यकता है। और फिर कैसे उन्होंने बच्चों को प्यार किया, अपना बनाया। वे चाहते हैं कि‍ प्रत्येक शिक्षक बच्चों से प्यार करे, दुलार करे फिर पढ़ने-पढ़ाने की बात हो। ‘डायरी के पन्ने’ स्तम्भ में रेखा चमोली का आलेख ‘बच्चों की रचनात्मकता का एक मंच- बाल शोध मेला’, जो बच्चों को सीखने- सिखाने की प्रक्रिया में एक नवाचार लिए है। क्या है बाल शोध मेला इसका वर्णन विस्तार से किया गया है। बहुत ही रोचक व गतिविधि आधारित जानकारी है। अलग-अलग विषय लेकर इसे शाला में वर्ष में एक या दो बार करवाना चहि‍ए।

‘अनुभव अपने-अपने स्तम्भ’ में उत्तम मिश्रा का आलेख ‘मैं अपने छात्रों के घर जाऊंगा’, एक शाला त्यागी बच्चे को शाला में वापस लाने से उसकी नौकरी लगने तक की सच्ची कहानी। पत्रि‍का का प्रत्येक आलेख समाज, अभिभावक एवं शिक्षकों से यही प्रश्न पूछ रहा है कि प्रश्न पूछने से क्यों डरते हैं, बच्चे? कौन से कारक हैं, जो बच्चे को प्रश्न पूछने से रोकते हैं? लेकिन एक स्कूल ऐसा भी है, जहां बच्चे स्वयं प्रश्न पत्र तैयार करते हैं। यह एक नया प्रयोग कर रहा है- अजबपुर प्राथमिक विध्यालय।

अंत में दिनेश कर्नाटक लिखते हैं कि बच्चे प्रश्न नहीं करते क्यों कि हम उनसे संवाद स्थापित नहीं करना चाहते। क्योंकि हम उनके साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते। क्योंकि हम अपने रोजमर्रा के सुविधाजनक ढर्रे को तोड़ना नहीं चाहते। क्योंकि हम परिश्रम नहीं करना चाहते। बच्चे प्रश्न नहीं करते क्योंकि हम भी प्रश्न नहीं करते। हम प्रश्न करते तो बच्चे भी प्रश्न करते।

माँ : हरि‍श्चंद पाण्डे

चर्चित कवि‍ हरि‍श्चंद्र पाण्डे की कवि‍ता ‘माँ’ पर कवि‍ता पोस्टर। इसकी परि‍कल्पना और संरचना आशुतोष उपाध्यायजी ने की है-

mother.माँ

और दिलबर नठ गया : चिन्तामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

चिंतामणि जोशी

अचानक उसका हाथ पेंट की पिछली जेब में गया। फिर अन्य सभी जेबें देखीं। जैकिट की भीतरी जेब को टटोलते ही दो वर्ष की बेरोजगारी झेलने के बाद सरकारी स्कूल में मास्टर बनने की सारी खुशी एक ही क्षण में फुर्र हो गई। चौबीस साल का युवक दोनों हाथों से सिर पकड़ कर रास्ते के किनारे पड़े पत्थर पर बैठ गया। लतड़-पथड़-पस्त। तीन सौ किलोमीटर बस से एवं बारह और छः, अठारह किलोमीटर पैदल यात्रा की थकान अचानक एकमुश्‍त उसके सिर पर सवार हो गई और उसके पूरे शरीर को शि‍थिल कर दिया। उसने जल्दी-जल्दी अपनी सभी जेबें टटोलीं। जैकिट उतारकर स्वेटर को झटका। पीठ से पिट्ठू उतार कर अंदर देखा। उसका बटुआ कहीं नहीं था। स्मृति को टटोला। कल की रात उसने विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के घर पर गुजारी थी। स्थानीय चतुर्थ श्रेणी कर्मी, लेकिन आतिथ्य में नम्बर एक। आदमी गरीब, लेकिन दिल का अमीर। सुबह चार बजे विदा होते समय उसने चारपाई की बगल में रखे बक्से पर से अपनी घड़ी पहनी थी और बटुआ उठाकर पूरे होशो-हवास में अपनी जैकिट की अंदर की जेब के हवाले किया था। फिर वह दौड़ पड़ा था बारह किलोमीटर का पैदल पथ दो घंटे में तय कर छः बजे की बस पकड़ने के उद्देश्‍य से। आधी दूरी तय भी कर चुका था लेकिन…..

उसने घड़ी देखी। पांच बजने में पांच मिनट बाकी थे। बिना पैसे के दो दिन की तीन सौ किलोमीटर लम्बी यात्रा असम्भव थी। नया इलाका। न जान न पहचान। पौ फटने लगी थी। दूर उत्तर-पूरब की चोटियां रक्ताभ होने लगीं थीं। उतरते पथरीले रास्ते की छाया अब दूर तक दिख रही थी। निर्जन अकेला रास्ता। वापस चलना होगा। उसने पिट्ठू लटकाया। इसी रास्ते के किनारे कहीं पड़ा मिलेगा, उसका बटुआ। न हो तो महिपाल या सती मास्साब ही जाने तक की व्यवस्था उधारी में कर देंगे। वह दो कदम चढ़ा, लेकिन थके पैर उसे चार कदम पीछे खींच लाये। फिर से बैठ गया, सिर पकड़कर।

कल नियुक्ति की औपचारिकता पूरी करने के बाद सती मास्साब ने उसे लम्बा-चौड़ा भाषण पिला दिया था- ‘‘भाई जी! हम तो पांच साल से पड़े हैं, इस बीहड़ में। दूध-पानी, साग-भाजी कुछ नहीं मिलेगा। न बिजली, न सड़क, न अखबार। तीसरी दुनिया है। क्या करोगे, यहां नौकरी करके। वह भी एड-हॉक। इस बार तो लोग मात्र पांच सौ रुपए खर्च करके मनमाफिक जगह पर नियुक्ति पाए हैं। कल सामान लेने जा रहे हो, तो नैनीताल होते हुए चले जाओ। क्या पता अभी भी घर के नजदीक किसी जगह का जुगाड़ हो जाए। वरना इस गलती पर कई बरस पछताओगे।’’

वह पछता ही तो रहा था। काश! मास्साब का भाषण न हुआ होता तो वह सुबह यों हड़बड़ी में न भागता। पहले बीमार मां की तीमारदारी में ध्यान ही नहीं रहा कि नियुक्तियां भी हो रही हैं। नियुक्ति मिली तो घर से तीन सौ किलोमीटर दूर वह भी एट द इलेवन्थ आवर। सोच रहा था, उसके साथ ही यह सब क्यों होता है। तभी उस शांत पथ पर एक किशोर बालक की आवाज गूंजी- ‘‘ ऊपर से पत्थर आ रहे हैं, भागो। ’’

पन्द्रह-सोलह वर्ष का वह किशोर उसका हाथ पकड़ कर खींचे लिये जा रहा था। अगले मोड़ पर जब दोनों रुके, तब तक पत्थरों का एक रेला गड़गड़ाते, धूल उड़ाते हुए ऊपर से आकर पहाड़ी की तलहटी में बहती नंदाकिनी नदी में समा गया था।

‘‘ साब, मैं अभी न आता तो आज आप बचते नहीं। आप इस इलाके के तो नहीं हो। यहां पर तो लगातार पत्थर गिरते रहते हैं। ऊपर देखकर नीचे भागना पड़ता है। आप हैं कि सिर देकर बैठे हैं।’’ उसकी आंखों में भोलापन, घबराहट, संदेह, जिज्ञासा जाने क्या-क्या था।

पत्थरों का अचानक आया रेला तो धड़धड़ाता हुआ नदी में समा गया था, लेकिन वह अब भी अपने अंदर की धड़धड़ को संयत करने का प्रयास ही कर रहा था। बाप रे बाप। बड़ी अनहोनी शायद टल गई थी।

‘‘धन्यवाद बेटे।’’ उसने कहा, ‘‘ तुम तो देवदूत बनकर आए। मैं कल ही ऊपर गांव के हाई स्कूल में आया था। नया मास्टर बनकर। अपने घर वापस जा रहा हूं, सामान लाने…।’’

बच्चे के चेहरे पर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता के भाव आए। अंदर शायद कहीं सम्मान के किसी टुकड़े ने हिचकोला खाया।

‘‘ प्रणाम गूरजी…मैं दिलबर…गांव के स्कूल में नौ में पढ़ता हूं…मैं भी बाजार जा रहा…चलो… साथ चलते हैं…।’’ बच्चे ने मास्साब का पिट्ठू उठा लिया।

‘‘ मगर मैं तो वापस जा रहा हूं…स्कूल को।’’

‘‘ क्यों? ’’

‘‘ दरअसल, मेरा बटुआ हड़बड़ी में कहीं गिर गया है, रास्ते में। ’’

दिलबर के चेहरे पर कई भाव एक साथ आने-जाने लगे। वह कभी अजनबी मास्टर की तरफ देखता, कभी जमीन को घूरने लगता। फिर उसने जेब से एक काले रंग का बटुआ निकाला और मास्टर की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, ‘‘यह है? ’’

‘‘ अरे, हां। तुम्हें कहां मिला?’’ मास्साब ने उसके हाथ से बटुआ झपट लिया और सीने से ऐसे लगाया मानो निकलते हुए प्राण वापस चेप रहे हों।

‘‘ धन्यवाद दिलबर, मैंने तो तुम्हें एक भी पाठ नहीं पढ़ाया अभी,  लेकि‍न तुमने पहले ही मुझे गुरु दक्षिणा दे दी।’’ कहते हुए मास्साब ने बटुआ संभाल कर अपनी जेब के हवाले कर दिया।

‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये हैं। फिर कहोगे…।’’ अजीब से भाव आए थे, दिलबर के चेहरे पर।

‘‘अरे, नहीं यार। ’’ मास्साब ने बटुआ उसके सामने खोलते हुए सौ-पचास के नोटों पर यों ही हाथ फेरते हुए कहा।

‘‘ ठीक है। चलो चलते हैं।’’ बटुआ मिलते ही मास्साब के शि‍थिल शरीर में पुनः ऊर्जा का संचरण हो चुका था। उन्होंने दिलबर के हाथों से अपना पिट्ठू ले लिया।

दिलबर के साथ गपशप में बची हुई छः किलोमीटर की पैदल यात्रा कब पूरी हुई मास्साब को पता ही नहीं चला। उन्होंने दिलबर से इलाके और विद्यालय के बारे में तमाम जानकारी भी प्राप्त की। चहकती और बहकती कई बातों से कई बार मास्साब को लगा कि दिलबर कक्षा नौ में पढ़ने वाला सामान्य बच्चा नहीं है। दिलबर ने बताया था कि उनके स्कूल में कई साल से गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के अध्यापक आए ही नहीं। चार गुरुजी में से तीन ही एक बार में स्कूल में रहते हैं। दूर का स्कूल हुआ। एक गुरुजी घर जाते हैं, बारी-बारी से। मास्साब ने वादा किया कि अगले सोमवार से वह उन्हें अंग्रेजी के साथ गणित और विज्ञान भी पढ़ाएंगे। दिलबर की तो हिन्दी और सामान्य अध्ययन में भी मदद करेंगे। मास्साब दिलबर की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुए। अब इस अति पिछड़े इलाके में सेवा करने का भाव उनके मन में मजबूती लेने लगा। स्थान परिवर्तन का प्रयास उन्हें व्यर्थ लगने लगा। उनके मन में कुछ योजनाएं आकार लेने लगीं। स्टेशन पहुंच कर बस में बैठते हुए पचास रुपये का एक नोट बटुए से निकाल कर दिलबर की तरफ बढ़ाते हुए मास्साब ने कहा, ‘‘बेटे! मैं और क्या दे सकता हूं तुम्‍हें, फिर भी…। ’’

‘‘नहीं, गूरजी नहीं।’ ’कहते हुए दिलबर सामने की गली में भागता चला गया।

नौकरी सरकारी थी, लेकिन पक्की नहीं। एक महीने का नोटिस या एक महीने का वेतन देकर कभी भी सेवा समाप्ति की शर्त थी, नियुक्ति पत्र में। लेकिन पहले विद्यार्थी से यह मुलाकात और संवाद कोई सामान्य बात नहीं थी। अंतिम बार जब दिलबर से नजरें मिली थीं, तो मास्साब को उसकी आंखों में अनेक डूबते-उतराते प्रश्‍न दिखे थे। एक उपेक्षा का भाव भी था, जो उन्हें पच नहीं पा रहा था। चालक ने एक लम्बा हॉर्न बजाया और बस छोटे से स्टेशन को छोड़कर घूं…घूं करती हुई पहाड़ी पर चढ़ने लगी। नन्हा दिलबर सहयात्री बनकर बैठ गया था मास्साब के मन-मस्ति‍ष्‍क में। उसकी बातें रास्तेभर उन्हें रह-रहकर याद आती रहीं।

अगले सोमवार को रोजमर्रा की आवश्यकता का हल्का-फुल्का सामान लेकर मास्साब अपने विद्यालय पहुंचे। प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में उनकी आंखें दिलबर को ही तलाश रहीं थीं, लेकिन वह नहीं दिखा। मास्साब ने परिचय संबोधन में बच्चों से कहा कि वह बच्चों के साथ बच्चा बनकर ही रहेंगे और उनकी प्रत्येक समस्या का समाधान करने का प्रयास करेंगे। अंग्रेजी के साथ गणित-विज्ञान भी उन्हें पढ़ाएंगे। बच्चों को उनसे डरने की जरूरत नहीं। उन्हें अपना दोस्त समझें। अपने मन की बातें कहें। जितने अधिक चाहें, प्रश्‍न पूछें। किसी तरह की डर या झिझक महसूस न करें। अच्छे बच्चे जिज्ञासु होते हैं और प्रश्‍न पूछते हैं। जो बच्चे पूछते हैं, वही सीखते हैं। सीखने की शुरुआत ही प्रश्‍न से होती है। ऐसा नहीं कि शि‍क्षक के पास हर प्रश्‍न का उत्तर हमेशा उपलब्ध होता है। ऐसे बहुत सारे प्रश्‍न होते हैं, जिनके उत्तर शि‍क्षकों को भी पता नहीं होते हैं। लेकिन आप-हम मिलकर उन प्रश्‍नों के उत्तर तलाश करने की कोशि‍श करेंगे। उत्तरों की तलाश करते हुए ही तो हम बहुत कुछ सीखते जाते हैं और यही ज्ञान है। ज्ञान पहले से तैयार कोई माल नहीं है, बल्कि इसी तरह उसका सृजन होता है। प्रश्‍न ही हैं, जो  ज्ञान सृजन की खिड़की को खोलते हैं। इसलिए प्रश्‍नों का हमेशा स्वागत रहेगा। मास्साब की बातें सुन बच्चों के चेहरों में एक अलग सी चमक छा गई। शि‍क्षकों के बीच खुसर-पुसर शुरू होने लगी थी।

मास्साब को कक्षा नौ की कक्षाध्यापकी सौंपी गई थी। पहले वादन में उन्होंने कक्षा में जाकर उपस्थिति ली।

‘‘ महिधर प्रसाद ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ खुशाल सिंह ’’

‘‘ येस सर ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’

‘‘ …………………. ’’

‘‘ दिलबर सिंह ’’ मास्साब ने जोर से दोहराया।

‘‘ नठ गया।’’ पीछे के बेंच से दबी-सी आवाज आई।

‘‘ नठ गया मतलब? ’’ मास्साब ने पीछे बैठे बच्चे से पूछा।

महिधर ने खामोशी से सिर झुका लिया। अन्य बच्चे भी खामोश हो गए। मास्साब ने हाजिरी पूरी की और पहले दिन का पहला कक्षा शि‍क्षण प्रारम्भ किया। पहला दिन बच्चों के साथ जान-पहचान में ही बीत गया। यद्यपि दिलबर कई बार मास्साब के मानस पटल पर आता-जाता रहा, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ पूछा नहीं।

यह बात लोगों को पता चल चुकी थी कि नये मास्साब हैं तो अंग्रेजी के, लेकिन गणित-विज्ञान भी पढ़ाएंगे। महिधर के पिता गिरधर तिवारी अभिभावक संघ के अध्यक्ष थे और पूर्व सैनिक भी। उन्होंने बेटे की पढ़ाई की गरज से तुरत-फुरत अपने मकान में मास्साब के रहने की व्यवस्था कर दी। बच्चे स्कूल से एक टेबल और दो कुर्सी भी ले आए। आज पहला ही दिन था। तखत पर अपना बिस्तर फैलाकर मास्साब ने महिधर के घर पर ही भोजन किया। इस बीच जान-पहचान की छुटमुट बातें भी होती रहीं। महिधर के पिता ने बताया कि महिधर कक्षा एक से आठ तक लगातार कक्षा में दूसरे स्थान पर रहता आया है। अब मास्साब के साथ रह कर पढ़ाई करेगा तो पहला आया करेगा।

भोजन के बाद मास्साब कुर्सी लेकर आंगन में बैठ गए। पूर्णिमा की रात थी। चांद अपने पूरे शबाब पर था। गांव का स्कूल बसासत के अंतिम छोर पर था और स्कूल से ही लगा महिधर का मकान। ऊपर की ओर बांज का हरा-भरा जंगल और नीचे की ओर नदी घाटी तक फैले हुए छोटे-छोटे तोक। पत्थर की स्लेटों से ढकी घरों की छतें चांदनी में छोट-छोटे शीशे के चौकस टुकड़ों की तरह चमक रही थीं। मास्साब के मानस पटल पर रह-रह कर दिलबर की यादें और बातें टकरा रही थीं। तभी महिधर आकर सामने बैठ गया। सिर झुकाकर। मास्साब बतियाने लगे, ‘‘कहो महिधर! तो तुम दूसरे ही रहते हो कक्षा में। पहला कौन रहता है, भाई? ’’

‘‘ जी दिलबर। गूरजी! दिलबर चोर नहीं था।’’

‘‘ मैंने कब कहा? ’’ मास्साब चौंक पड़े।

‘‘ गुलाब सिंह सेठ ने शि‍कायत की कि दिलबर ने उसकी दुकान से दो सौ रुपये निकाल लिए। ’’

‘‘ अच्छा!’’

‘‘ सती मास्साब ने प्रार्थना में दिलबर की बहुत बेइज्जती की और बहुत मारा उसे। फिर सभी बच्चे भी दिल्वा रचो! दिल्वा रचो! कह कर हर समय उसे चिढ़ाने लगे। गुलाब सिंह सेठ सरपंच भी हैं। पंचायत ने बेचारे दिलबर के पिता पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगा दिया। उन्होंने बकरी बेचकर जुर्माना भरा और उस दिन दिलबर को खूब मारा।’’

‘‘ फिर क्या हुआ?’’ मास्साब के चेहरे में दुःख और आश्‍चर्य के मिश्रित भाव थे।

‘‘ उस दिन फीस डे था। दिलबर सुबह अंधेरे में ही मेरे घर आया। वह मेरा अच्छा दोस्त था। उसने खिड़की के पास आकर मुझे जगाया। एक कापी और पेन मांगकर वह अंधेरे में ही कुछ लिखने लगा। उसने अपने पिताजी के लिए चिट्ठी लिखी और पचास रुपये मुझे पकड़ाए और दिलबर नठ गया। गूरजी! डर के कारण मैंने चिट्ठी और रुपये छुपा दिए। किसी को नहीं बताया।’’

महिधर रुआंसा हो गया और चिट्ठी और रुपये मास्साब के हाथ में पकड़ाकर चला गया। मास्साब चन्द्रमा के मध्यम प्रकाश में चिट्ठी पढ़ने लगे-‘‘पिता जी! मुझे माफ कर देना। घर छोड़कर जाने के लिए मजबूर हुआ हूं। गुलाब सेठ अपने को बहुत बड़ा अंग्रेज समझता है। मैंने उसकी दुकान से एक कापी खरीदी थी। कापी अंदर से फटी निकली। मैं कापी लौटाने गया तो उसने  कहा, ‘‘ यू ब्लडी लेबर्स’ सन।’’ पिता जी यह अंग्रेजी में गाली होती है। मैंने भी उससे कह दिया, ‘‘ यू ब्लडी, युअर फादर ब्लडी।’’ उसने मुझे एक झापड़ मार दिया। मैं चुपचाप चला आया। मुझे दुःख है कि मेरी बात न आपने सुनी, न पंचायत ने। स्कूल में मास्साब ने भी नहीं। ऐसे गांव में रहकर, ऐसे स्कूल में फीस देकर पढ़ने से मैं क्या सीखूंगा। इसलिए फीस के पैसे भी वापस भेज रहा हूं। आपका दो महीने का तमाखू का खर्चा तो होगा। मुझे ढ़ूंढने मत आना। मैं बहुत दूर जा रहा हूं। आपका अभागा बेटा- दिलबर।

मास्साब चिट्ठी पढ़कर सन्न रह गए। लोग अपने-अपने घरों में दुबक चुके थे। गांव में शांति थी। गांव की सीमा से पहाड़ी की चोटी तक पसरा जंगल खामोश था। सीढ़ीदार खेत लमलेट थे। सिर्फ पहाड़ों से उतरकर ढलान पर बहती नंदाकिनी का शोर रात के सन्नाटे में कानों से टकरा रहा था। अचानक आसमान में चमकते चांद को एक काले बादल के टुकड़े ने आकर ढक लिया और पूरी घाटी स्याह हो गई। मास्साब अपने कमरे में जाकर तखत पर पसर गए। ज्यों ही नींद पास आती दिलबर की आवाज कान खींच देती, ‘‘ देख लो साब, ग्यार सौ तीस रुपये थे। फिर कहोगे…।’’

सुबह प्रार्थना स्थल पर खुद के द्वारा कही बातें बार-बार प्रश्‍न के रूप में उनके सामने खड़ी हो जा रही थीं। वह कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे।

( चिंतामणि जोशी राजकीय इंटर कालेज टोटानोला, पिथौरागढ़ में अंग्रेजी के प्रवक्‍ता हैं। कविता और कहानी लिखते हैं। एक कविता संग्रह प्रकाशि‍त हो चुका है। वह दीवार पत्रिका अभियान को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।)