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पढ़ने की आदत को आंदोलन बनाने की जरूर...

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हमारा परिवेश- हमारा विज्ञान : प्रेम...

देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदा...

राजेश उत्साही

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देवेंद्र मेवाड़ी

कुत्ते (केनिस फेमिलिएरिस) की दुम टे...

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कविता

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अनुप्रिया की बाल कवि‍ताएं

बचपन बचपन कच्ची पगडण्डी मानो उड़ती धूल घने अँधेरे जंगल में ये उजास के फूल बादल काला दौड़  लगाये आसमान के पार ताक -झाँक के  देख रहा है...

कहानी

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बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित...

गजल

रमेश तैलंग

रमेश तैलंग की गजलें

02 जून 1946 को टीकमगढ़, मध्‍य प्रदेश में जन्‍में रमेश तैलंग ने प्रचूर मात्रा में बाल साहि‍त्‍य लि‍खने के अलावा कई महत्‍वपूर्ण गजलें भी ह...

परिक्रमा

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‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 को

हल्द्वानी : कथाकार दि‍नेश कर्नाटक की लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 फरवरी...

बच्चों की करामात

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बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित द...

पढ़ने की आदत को आंदोलन बनाने की जरूरत : महेश पुनेठा

 

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हमारे समाज में आप पढ़ने की स्थिति का अनुमान इसी बात से लगा सकते हैं कि आपके आस-पड़ोस और जानने-पहचानने वाले लोगों में से कितने लोग ऐसे हैं, जिनके घर में किताबों का एक  शेल्फ है? ऐसे लोगों के नाम लेने के लिए आपको अपनी याददाश्त पर अतिरिक्त जोर देना पड़ेगा। उसके बाद भी आपको ऐसे लोग अंगुलियों में गिने जाने लायक मिलेंगे। उनमें से भी अधिकांश ऐसे होंगे, जिनके शेल्फ में पुस्तकों के नाम पर आपको केवल पाठ्य पुस्तकें, प्रतियोगिता पुस्तकें या धार्मिक पुस्तकें ही मिलेंगी। ‘शैक्षिक दखल’ ने हिंदी समाज में पढ़ने की स्थिति का आकलन करने के लिए पिछले दिनों एक अध्ययन किया तो पाया कि एक हजार पढ़े-लिखे लोगों में से पचास लोग भी ऐसे नहीं हैं, जिनके भीतर स्वाध्याय की प्रवृत्ति हो। इसका पता इस बात से चलता है कि महानगरों और जिला मुख्यालयों को छोड़ छोटे शहरों में सार्वजनिक पुस्तकालयों का नितांत अभाव है। आधे से भी कम स्कूल हैं, जहां पुस्तकालय या वाचनालय हैं। इनमें से भी लगभग 25 प्रतिशत स्कूल ही हैं, जहां नियमित रूप से पुस्तकों का लेन-देन होता है। ये पुस्तकें भी अधिकांशतः पाठ्यक्रम से या प्रतियोगिता परीक्षाओं से जुडी हुई रहती हैं। ऐसे पुस्तकालय कम हैं, जहां से बच्चे अपनी मन-पसंद किताबें लेकर पढ़ सकें। निजी पुस्तकालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। पढने-लिखने की प्रवृत्ति रखने वालों में से भी केवल पचास प्रतिशत लोगों के घरों में ही निजी पुस्तकालय हैं। स्वाध्याय की प्रवृति रखने वाले अधिकांश लोग अध्ययन, अध्यापन और लेखन के क्षेत्र से ही जुड़े हैं। इससे बाहर के दो प्रतिशत लोग भी नहीं हैं।

जब न पर्याप्त संख्या में सार्वजनिक पुस्तकालय हों, न स्कूलों में पुस्तकालय और न निजी पुस्तकालय, ऐसे में भला पढ़ने की संस्कृति कैसे विकसित हो सकती है? चारों ओर नकारात्मक माहौल है। पढ़ना या तो परीक्षा पास करने या रोजगार प्राप्त करने या फिर समय व्यतीत करने तक सीमित होकर रह गया है। कुछ नया जानने-समझने और उसको बदलने, विश्‍वदृष्‍टि‍ और संवेदनशीलता को विस्तार देने के लिए पढ़ने वालों की संख्या कम ही देखी जाती है। लेखन और अध्यापन जैसे क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों में भी बहुत कम हैं, जो पढ़ने से संबंध रखते हैं। वे भी बिना पढ़े ही काम चला ले जाते हैं। पढ़ने के लिए किसी के पास समय न होने का बहाना है, तो किसी के पास संसाधनों के अभाव का। जबकि एक चेतनाशील समाज अर्थात ऐसा समाज जो सही-गलत का निर्णय सोच-समझ कर ले सके, बनाना है तो पढ़ने का संस्कार डालना जरूरी है। आहार-निद्रा की तरह पढ़ने को जरूरी कर्म बनाना। इसकी शुरुआत बचपन से करने की जरूरत है। बचपन में यदि पढ़ने की आदत लग गयी तो समझिए वह जीवनभर नहीं जाती। इसके लिए घर में माता-पिता को भी पढ़ने को अपनी दिनचर्या में शामिल करना होगा।

पढ़ने की आदत विकसित करने की दिशा में हिंदी समाज में कोई बहुत बड़ा आंदोलन तो नहीं दिखाई देता है, पर छोटे-छोटे कुछ प्रयास अवश्‍य जारी हैं। भले ही ये मरुद्यानों की तरह हैं। लेकिन इन प्रयासों से कुछ राह निकलती सी दिखती है। पता चलता है कि बेहतर समाज बनाने की चाह हो तो शुरुआत कहीं से भी की जा सकती है। उदाहरणस्वरूप मध्यप्रदेश के युवा कवि मोहन कुमार नागर की इस पहल को ही देखा जा सकता है। मोहन पेशे से डॉक्टर हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने-पढ़ाने का शौक है तो उन्होंने अपने अस्पताल की गैलरी को ही वाचनालय में बदल दिया है। उनके पास जो भी पत्र-पत्रिकाएं और किताबें आती हैं, उन्हें वह अपने अस्पताल की गैलरी में रख देते हैं। जहां से वहां आने वाले जो भी चाहें किताबें उठाकर पढ़ सकते हैं। मोहन को इस बात की कसक है कि किताबें जरा कम हैं, लेकिन जब करीब सात-आठ लाख की आबादी वाले शहर में एक भी पुस्तकालय न हो और न साहित्यिक माहौल तब उनकी यह छोटी-सी पहल भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी तरह गुरिया-बौंसी, बांका, बिहार में राजेश झा हैं जिन्होंने अपने पुश्तैनी घर के एक तल को पुस्तकालय में तब्दील कर दिया है। 300 पुस्तकें हैं, 27 बच्चे नियमित और कुल 50 बच्चे अनियमित रूप से उसमें शाम 5 से 8 बजे तक पढ़ाई करते हैं। ऐसे प्रयासों के लिए दृढ-संकल्प और गहरे सरोकारों की आवश्यकता होती है, जैसा हमें उत्तराखंड के सीमांत जिले बागेश्वर के शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत में दिखाई देती है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत रुचि के चलते जिले के अनेक सरकारी स्कूलों में पुस्तकालयों को काफी समृद्ध कर दिया है। इसके लिए उन्होंने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों का सहयोग लिया। अपने क्षेत्र के विधायकों और पंचायत प्रतिनिधियों को विद्यालयों को पुस्तकालय हेतु धनराशि‍ देने के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से जनप्रतिनिधियों ने अनेक विद्यालयों को धनराशि‍ प्रदान की। उनका संकल्प है कि जिले के प्रत्येक सरकारी स्कूल में एक समृद्ध पुस्तकालय हो और नियमित रूप से उसका संचालन हो। वह स्कूल प्रशासन को भी इस बात के लिए प्रेरित करते हैं। नयी-नयी पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं से बच्चों और शिक्षकों को परिचित कराते हैं। स्वयं अच्छा साहित्य उन तक पहुंचाते हैं। यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यदि शिक्षा से जुड़े अधिकारी इस तरह पुस्तकालयों के संचालन के प्रति गंभीर हो जायें तो समाज का परिदृश्य बदलने में देर नहीं लगेगी।

साहित्य को आम पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध लोगों ने अपने-अपने तरीके निकाले हैं। देहरादून में साहित्यकार शशि‍भूषण बडोनी रहते हैं। वह देशभर से निकलने वाली छोटी-बड़ी तमाम पत्रिकाएं अपने पढ़ने के लिए मंगाते हैं और खुद पढ़ने के बाद अपने परिचितों को दे देते हैं। न केवल आसपास के परिचितों को बल्कि दूर-दूर तक डाक द्वारा भेजते हैं। हिमाचल प्रदेश के सुंदरगांव में रहने वाले हिंदी के चर्चित कवि सुरेश सेन निशांत विभिन्न लघु पत्रिकाओं को झोले में डालकर सुधी पाठकों तक पहुंचाने का कार्य वर्षों से करते आ रहे हैं। बांदा में यही कार्य प्रमोद दीक्षित भी कर रहे हैं। शि‍क्षा में नवाचारों को आगे बढ़ाने और पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्होंने शि‍क्षक मित्रों के साथ मिलकर ‘शैक्षिक संवाद मंच’ का गठन किया है। प्रमोद जी देशभर से शि‍क्षा संबंधी साहित्य मंगाकर उसे वितरित करते हैं और उस पर चर्चा आयोजित करवाते हैं। गाजियाबाद के अनुराग ‘लेखक मंच प्रकाशन’ के माध्यम से सस्ती पुस्तकें प्रकाशि‍त कर इस तरह के प्रयासों को अपने तरीके से बल प्रदान कर रहे हैं। उनकी हमेशा कोशि‍श रहती है कि बच्चों के बीच कुछ ऐसी गतिविधियों का आयोजन किया जाय जिससे उनके भीतर पढ़ने-लिखने के प्रति रुचि पैदा हो। व्यक्तिगत स्तर पर और भी इस तरह के प्रयास हो रहे होंगे, जिसकी जानकारी अभी इन पंक्तियों के लेखक को नहीं है।

एकलव्य, रूम टू रीड, ए.पी.एफ. जैसे कुछ गैर सरकारी संस्थाओं की पहल कदमी को छोड़ दें तो इस दिशा में सामूहिक रूप से भी कुछ प्रयास हो रहे हैं, जिनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये किसी सरकारी या बड़ी संस्था से प्राप्त आर्थिक सहायता से न होकर कुछ लोगों या समुदाय के सहयोग से संचालित हैं। इसी तरह के प्रयास हैं जो किसी आंदोलन को जन्म दे सकते हैं। जैसे उत्तराखंड के रुद्रपुर शहर में एक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘क्रिएटिव उत्तराखण्ड’ नाम से सक्रिय है। इस संस्था ने शहर के बीच स्थित एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के बेकार पड़े कमरों को शहर के समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों की मदद से बेहतरीन पुस्तकालय में बदल दिया। अब स्कूल के समय पर इस स्कूल के बच्चे और शाम को शहर के अन्य लोग इसका लाभ उठा रहे हैं। इसी तरह चमोली जनपद के सुदूर चोपता क्षेत्र के युवाओं ने मिलकर कड़ाकोट शिक्षा मंच का गठन कर पुस्तकालय और गतिविधि केन्द्र स्थापित किया है। अब तक जन सहयोग से इस केन्द्र में 1500 से अधिक किताबें, दैनिक हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों के साथ ही कम्प्यूटर और एक प्रिं‍टर है। गांव के युवाओं ने मिलकर पुस्तकालय में कम्प्यूटर और किताबों को रखने के लिये फर्नीचर तैयार किया है। इसके पीछे ग्रामीणों की सोच है कि अगर हमें अपने बच्चों को खुशहाल भविष्य देना है तो हमें अपने गांव को और बेहतर करने के लिए लगातार काम करना होगा।

यह देखने में आया है कि पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए पुस्तकालय का होना ही पर्याप्त नहीं है। लोग पढ़ने के लिए प्रेरित हों और पुस्तकालय से जुड़ें इसके लिए कुछ गतिविधियों का होना भी जरूरी लगता है। इस दृष्‍टि‍ से कुछ प्रयासों का उल्लेख भी यहां करना चाहेंगे। कवि मित्र अजेय से पता चला कि लिखने-पढ़ने की गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हिमाचल के कुल्लू में तकरीबन 10 सालों से एक समूह काम कर रहा है। ग्रुप का नाम है संवाद कुल्लू। पहले नवलेखन कार्यशाला के रूप में शुरू हुए इस ग्रुप ने अब हर उम्र के साहित्य प्रेमियों के दोतरफा संवाद का रूप ग्रहण कर लिया है। लगभग हर सप्ताह सदस्य मिलते हैं। किसी तय लेखक या किताब पर चर्चा होती है। लाइब्रेरी के कान्फ्रेंस हाल में ही सब लोग चर्चा करते हैं। हर तरह की रुचि और विचारधारा वाले लोग इस में सम्मिलित होते हैं। छात्रों और युवाओं को अपनी बात कहने के लिए प्रेरित किया जाता है।

पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग में डॉ. डी. डी. पन्त स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रयास कर रही है। जहां विज्ञान के साथ-साथ साहित्य और अन्य चीजों पर बच्चों के लिए बेहतर वातावरण बनाने की कोशिश की जा रही है। विज्ञान की कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा अनेक साहित्यिक गतिविधियां जैसे दीवार पत्रिका का निर्माण, बच्चों में पढ़ने की रुचियां उत्पन्न करने के लिये उनको पत्रिकाएं देना, बच्चों के बीच बाल फिल्में दिखाना आदि, संचालि‍त होती हैं। इसी तरह का पिथौरागढ़ शहर में युवाओं का एक समूह है- आरंभ स्टडी सर्किल। इस समूह से जुड़े अधिकांश युवा स्थानीय डिग्री कालेज में अध्ययनरत हैं। नयी पीढ़ी में पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने की दिशा में पिछले तीन सालों से महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। ये न केवल स्वयं अध्ययन करते हैं, बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते हैं। हर शाम घूमने के लिए निकलते हैं तो इनके हाथ में कोई न कोई नयी किताब होती है, जिसका न केवल पाठ करते हैं बल्कि किसी स्थान पर बैठ चर्चा भी करते हैं। इतना ही नहीं इनके द्वारा पढ़ने के इच्छुक लोगों को पुस्तकें उपलब्ध करवाने हेतु एक बुक क्लब बनाया गया है। समूह के साथियों के पास उपलब्ध किताबों की सूची बनाकर सार्वजनिक स्थानों पर चिपकाई गयी हैं और उसमें संपर्क नंबर दिए गए हैं। इच्छुक व्यक्ति फोन से संपर्क करते हैं और उन्हें उनके बताए स्थान पर पुस्तक उपलब्ध करवा दी जाती है। दूसरे पुस्तकालयों से पुस्तकें लेकर भी समूह से जुड़े युवा अपने मुहल्ले के बच्चों को पढ़ने को देते हैं। यह अपने तरह का एकदम नया प्रयोग है। इस समूह द्वारा स्थानीय महाविद्यालय में ‘आरंभ’ नाम से एक दीवार पत्रिका का प्रकाशन भी किया जाता है। समय-समय पर गोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं। पिछले दिनों कविता पोस्टर बनाकर महाविद्यालय की दीवारों पर लगाए गए। साहित्य के प्रति नयी पीढ़ी में लगाव पैदा करने का उनका यह प्रयास अनूठा है। इस तरह के प्रयासों को संगठित करने और गति देने की आवश्यकता है। देशभर में हो रहे ऐसे और प्रयासों को भी चिह्नित करने और सामने लाने की जरूरत है। केवल पढ़ने की संस्कृति के अभाव का रोना-रोने से कुछ नहीं होगा। अपने दायरे से बाहर निकल कर कुछ करने की आवश्यकता है। हमारी सरकारें इस दिशा में कुछ ठोस करेंगी, ऐसी आशा करना भोलापन होगा। हमें खुद ही पहलकदमी लेनी होगी।

पढ़ने की जब बात आती है तो एक सवाल यह भी उठता है कि क्या पढ़ा जाये? पढ़ने के लिए हमारे चारों ओर इतनी सामग्री बिखरी पड़ी है कि यह तय करना जरूरी है। यह देखा जाता है कि हम अपना बहुत सारा समय ऐसा कुछ पढ़ने में गंवा देते हैं जो न हमारे व्यक्तित्व को समृ़द्ध करता है, न सूचना-जानकारी को और न ही विश्‍वदृष्‍टि‍ को व्यापक करता है। बस हम पढ़ते ही जाते हैं। इस तरह बहुत कुछ ऐसा छूट जाता है, जो जरूरी होता है। अतः हमें चयन करने की आवश्‍यकता पड़ती है। उपलब्ध समय और जरूरत के बीच सही तालमेल स्थापित करना पड़ता है। एक शि‍क्षक के रूप में हमें क्या पढ़ना चाहिए, इस पर विस्तार से लिखने की यहां पर गुंजाइश नहीं है, क्योंकि इतना सारा है कि उसे हम एक आलेख में नहीं समेट सकते हैं। लेकिन यहां पिछले दिनों वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर द्वारा प्रकाशि‍त वरिष्‍ठ शि‍क्षाविद् शि‍वरतन थानवी की पुस्तक ‘भारत में सुकरात’ का उल्लेख अवश्‍य करना चाहेंगे। इस पुस्तक में लेखक द्वारा उन तमाम पत्र-पत्रिकाओं, लेखों, निबंधों और पुस्तकों का उल्लेख किया है जो एक शि‍क्षक के लिए उपयोगी हैं। साथ ही उनका पढ़ा जाना क्यों जरूरी है, उन कारणों को भी रेखांकित किया गया है। यह पुस्तक बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के तरीकों के बारे में हमें बहुत कुछ सुझाती है। इस संदर्भ में उनका मानना है कि पाठ्येतर साहित्य का पढ़ना वस्तुतः प्रतिबंध नहीं, प्रोत्साहन का विषय होना चाहिए। जो मन में आए और जब मन में आए पढ़ने की स्वतंत्रता और साधन हम देते रह सकें तो बच्चे हल्की-फुल्की रहस्य-रूमान की सामग्री पढ़ते-पढ़ते चित्रकला, फोटोग्राफी और डाक टिकट संग्रह संबंधी लेख-स्तम्भ की पुस्तकें भी पढ़ने लग सकते हैं। पढ़ने के लिए वातावरण तभी सक्रिय होगा, जब यह मानें कि‍ बिना किसी वर्जना के बच्चे पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें पढ़ने को स्वतंत्र हैं। शि‍वरतन थानवी जगह-जगह अपने जीवन के पढ़ने से जुड़े अनुभव बताते चलते हैं, जिससे पुस्तक रोचक, आत्मीय और विश्‍वसनीय हो गई है। इस पुस्तक में संकलित आलेख- झोले में पुस्तकालय-मास्टर मोतीलाल जी, पोथी का सुख, शि‍क्षक क्या पढ़े-क्यों पढ़ें, आपके बच्चे क्या पढ़ रहे हैं?, पढ़ने की आदतें :पाठ्यक्रमेतर पुस्तकें और बच्चे, किताब कैमरा है कि आंख आदि विशेष उपयोगी हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि यह किताब न केवल उन किताबों की जानकारी देती है, जो हमें पढ़नी चाहिए बल्कि पढ़ने के लिए भी प्रेरित करती है।

‘शैक्षिक दखल’ के इस अंक में हम पढ़ने की संस्कृति की स्थिति और कारणों की एक पड़ताल कर रहे हैं। इसका उद्देष्य उन तरीकों को जानना-समझना है, जो बच्चों में स्वाध्याय की आदत विकसित करते हैं, ताकि एक शि‍क्षक या अभिभावक के रूप में हम भी उन्हें अपना सकें। यह उस दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है। हम चाहते हैं कि यह क्रम आगे बढ़े और पढ़ने की संस्कृति के विकास के लिए एक रचनात्मक आंदोलन उठ खड़ा हो।

(शैक्षि‍क दखल, वर्ष-6, अंक-9, जनवरी 2017 से साभार)

‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 को

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हल्द्वानी : कथाकार दि‍नेश कर्नाटक की लेखक मंच प्रकाशन से प्रकाशि‍त कहानी संग्रह ‘मैकाले का जिन्न तथा अन्य कहानियां’ का लोकार्पण 19 फरवरी को हल्द्वानी में सत्यनारायण धर्मशाला के हॉल में अपराह्न 03 बजे से होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता लक्ष्मण सिंह बि‍ष्ट ‘बटरोही’ जी करेंगे। मुख्य अति‍थि‍ इति‍हासवि‍द शेखर पाठक और वि‍शि‍ष्ट अति‍थि‍ डॉ तारा चन्द्र त्रि‍पाठी व डॉ प्रयाग जोशी होंगे। बीज वक्ता डॉ शशांक शुक्ला होंगे। इनके अलावा कहानी संग्रह पर डॉ प्रभात उप्रेती, जगदीश जोशी, शैलेय, जगमोहन रौतेला, डॉ महेश बवाड़ी, भास्कर उप्रेती, भूपेन सिंह, अनि‍ल कार्की, खेमकरण सोमन और सुधीर कुमार वि‍चार व्यक्त करेंगे।

दिनेश कर्नाटक 21वीं सदी के पहले दशक में हिन्दी कहानी के क्षेत्र में सामने आई पीढ़ी के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं। हिन्दी की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के युवा पीढ़ी विशेषांकों में इनकी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। दिनेश कर्नाटक की कहानियों का फलक काफी विविधतापूर्ण तथा विस्तृत है। ‘पहाड़ में सन्नाटा’ तथा ‘आते रहना’ के बाद यह इनका तीसरा कहानी संग्रह है। वह बिना किसी शोरशराबे के कहानियाँ लिखने में लगे हैं। उनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वह लोगों को चौंकाने या आश्चर्यचकित करने के लिए नहीं लिखते। जीवन उनकी कहानियों में अपने वास्तविक रंगों के साथ सामने आता है। जीवन की विडम्बनाओं तथा अन्तर्विरोधों पर उनकी तीखी नजर रहती है। कहानी उनके लिए बेहतर दुनिया के निर्माण का औजार है। वह चाहते हैं कि कहानी पढक़र मनुष्य और अधिक मानवीय तथा सम्वेदनशील हो!

अपनी रचना यात्रा में यहाँ पर पहुँचकर वह अपनी कथाभूमि पर पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े नजर आते हैं। संग्रह की हर कहानी पाठक को एक नये अनुभव क्षेत्र की यात्रा पर ले जाती है। ये कहानियाँ भाषा, कथ्य तथा शिल्प की दृष्टि से लेखक के विकास के एक और सोपान की खबर देती हैं।

हमारा परिवेश- हमारा विज्ञान : प्रेमपाल शर्मा

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देवेन्द्र मेवाड़ी जाने-माने विज्ञान लेखक हैं। भारतीय परिवेश में बच्‍चों की चेतना और मनोरंजन दोनों को साधते और शिक्षित करने का उनका अपना अनोखा अंदाज है। ‘विज्ञान और हम’ उनकी नई पुस्‍तक है। असल में, हर लेखक पहले स्थानीय होता है, उसके बाद ग्‍लोबल। अंग्रेजी में इसके लिए एक प्रचलित वाक्य है- लोकल इज ग्लोबल। ‘विज्ञान और हम’ में देवेन्द्र मेवाड़ी ने इसलि‍ए सबसे पहले अपने गाँव, बचपन की बातें बच्चों को बताई हैं, स्‍थानीय भाषा की सुगंध और स्वाद के साथ। स्थानीयता का यह स्पर्श एक अलग मिठास पैदा करता है। किताब और लेखन में चस्का ऐसी ही शुरुआत से पैदा होता है। साधारणीकरण का यह ढंग ही पाठकों में असाधारण पैठ बनाता है। विज्ञान जैसे विषय को बच्चों के बीच ले जाने के लिए इससे बेहतर शुरुआत नहीं हो सकती।

पता नहीं यह हमारी शिक्षा पद्धति का दोष हे या उस समाज का जो जीवन को सामान्‍य तर्क से समझने के बजाय उसे पढ़ाई के नाम पर इतना भारी-भरकम उबाऊ बना देता है कि विज्ञान की मोटी-मोटी डिग्रियों वाले भी विज्ञान की सामान्‍य समझ में शून्‍य होते हैं। क्‍या यह कोई अलग से पढ़ने-पढ़ाने, रटने की चीज है? क्‍या रोज आप आकाश में सौरमंडल नहीं देखते? दिन में सूरज उगते ही सारा आकाश चन्‍द्रमा सहित गायब। कितने किस्‍से, रोचक कहानियां गड़ी गई हैं कि‍ताब में। चंदा मामा और इन सितारों के आसपास सदियों से गांवों के किसानों का जीवन और समय का अंदाज इन्‍हीं तारों- हि‍न्नी पैना, सप्तश्री, ध्रुव और उपग्रह चांद के आकार से चलता रहा है। देवेन्द्र मेवाड़ी ने बड़ी सहजता से कोपर्निकस, गैलिलियो, उनकी खोजी दूरबीन आदि‍ के कि‍स्सों के सहारे पूरे सौरमंडल को समझाया है। क्या इस लेख को पढ़ने के बाद बच्चों को कोई चंदामामा की कहानी से गुमराह कर सकता है? शायद नहीं। हां, कविता कहानी में इनकी जगह वैसी ही बनी रहेगी। विज्ञान और गल्प में यही अंतर है।

अगले लेख में मेवाड़ी जी आकाश से जमीन पर उतरते हैं। एक लंबे पत्र के माध्यम से पृथ्वी, पहाड़ और उसकी पूरी संरचना का एक-एक विवरण देते हैं। रोचकता को बनाए रखने के लिए एलियन भी वहां है, पृथ्वीवासियों को सलाह देते हुए कि कल-कारखाने के धुएं से पूरे वातावरण को बचाने की जरूरत है। बातों ही बातों में पत्र के माध्‍यम से कहना और प्रभावी बना देता है। इससे पत्र लिखने की शिक्षा तो बच्‍चों को मिलेगी ही।

आकाश, धरती के बाद मेवाड़ी जी बच्‍चों को समंदर की सैर कराते हैं- ‘समंदर के अंदर है अनोखी दुनिया’ लेख में। कम रहस्‍यमय नहीं है समन्‍दर। हालांकि कई बच्चों ने समुद्र साक्षात नहीं देखा होगा, लेकिन मीडिया की दुनिया ने क्‍या संभव नहीं बना दिया और शेष पूर्ति यह लेख करता है, एक-एक विवरण के साथ। मछुआरों के साहस, डार्विन ओर उनका जहाज बीगल, समुद्र में रहने वाले लाखों जीवों, वनस्‍पतियों की प्रजातियां। स्‍पंज प्रवाल से लेकर केकड़े, मछली जैलीफिश, व्‍हेल, डाल्फिन-समुद्र की इतनी बडी़ दुनिया। पढ़ते-पढ़ते बच्‍चों का कौतूहल आकाश छूने लगेगा। पूरी प्रमाणिक जानकारी भरा लेख।

‘क्यों तपती है इतनी धरती’ लेख तो देश के मौजूदा सूखे के संकट की याद दिला देता है। नंदू, शेफाली, गार्गी विक्रम, देवीदा की बातों से जो शिक्षा मिलेगी, वह भारी भरकम लेखों से नहीं मि‍ल सकती। ऐसे लेखों की सहजता बच्‍चों पर स्‍थायी असर छोड़ती है और यही विज्ञान लेखक देवेन्‍द्र मेवाड़ी का उद्देश्‍य है। हालांकि ऐसे लेखों की लंबाई कुछ कम होती तो और भी अच्‍छा होता। ‘कैसे कैसे मेघ,’ ‘लो आ गया वंसत’ बच्‍चों के लिए ऐसी ही जानकारि‍यों से भरपूर लेख हैं। पंछियों (पक्षियों) से बच्‍चों को विशेष लगाव होता है, गांव के बच्‍चों को और भी ज्‍यादा। आंगन में फुदकती तरह-तरह की चि‍डि़यों को कौन बच्‍चा भूल सकता है? गायब होती गौरया की चिंता, हम सबकी चिंता है। ‘उड़ गयी गौरियां’ (1 मई 2012) और ‘पेड़ों को प्रणाम’ (5 जून 2012) को लेख के बजाय ‘डायरी’ खंड में रखा जाना चाहिए। देवेन्‍द्र मेवाड़ी की एक और पुस्‍तक ‘मेरी विज्ञान डायरी’ बच्‍चों को बहुत सहज ढंग से अपनी दिनचर्या में घटित अनेक वैज्ञानिक बातों, निरीक्षणों और निष्‍कर्षों को लिखने का मौका देती है। अच्छी शिक्षा ऐसी ही प्रक्रियाओं से होकर गुजरती है।

बच्चों के जीवन में सैर सपाटा, यात्रा न हो तो मजा ही क्‍या। ‘फूलों की घाटी में’ और ‘बच्चों का वि‍ज्ञान और कवि का कबूतर’ यात्रा-कथा का आनंद देते हैं। ‘ताबीज’ और ‘पर्यावरण के प्रहरी’ जैसे दो छोटे नाटकों को शामिल करने से पुस्तक की उपयोगिता और बढ़ गई है। पुस्तक में तीन वैज्ञानि‍कों की जीवनी भी दी गई है।

ऐसी पुस्तकों को केवल विज्ञान के खांचों में रखना, उनके असर को सीमित करना है। यह पुस्तक बच्चों को उनके पूरे परिवेश से जोड़ती है और साथ ही शिक्षा और शिक्षण की विविध विधाओं– लेख, डायरी, यात्रा, नाटक, कविता और जीवनी से भी। शि‍क्षा का मूल मंत्र भी तो बच्चों को उनके परिवेश से जोड़कर शिक्षित करना है। पुस्तक में हरे जंगल का कवर तो मंत्रमुग्धकारी है ही।

(बालवाणी, नवम्बर-दि‍सम्बर, 2016 से साभार)

पुस्तक: विज्ञान और हम
लेखक : देवेन्द्र मेवाड़ी
कीमत:140, सजिल्द- 260/- रुपये
प्रकाशक: लेखक मंच प्रकाशन
433 नीति‍खंड-3, इंदि‍रापुरम
गाजियाबाद-20014
Email- anuraglekhak@gmail.com

गीता गैरोला का लेखन सामूहिकता का निजी प्रतिरोध

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दिल्ली : हमारी जड़ें कहाँ हैं? हमारे बच्चों की जड़ें कहाँ हैं? हम बिना जड़ों के कब तक जी पाएंगे? हमारी पहचान क्या है? कहीं हम समाज के उस वंचित समूह की तरह ही तो नहीं हो गए, जिन्हें औरत कहते हैं। जो बिना जड़ों के, बिना खाद-पानी के, किसी भी जलवायु में पनपने का भ्रम पैदा करती हैं। सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कार्यकर्ता और लेखिका गीता गैरोला ने हिन्दू कालेज में उक्त विचार व्यक्त किये। कालेज के महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा ‘रचना और रचनाकार’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में गैरोला ने अपनी चर्चित संस्मरण पुस्तक ‘मल्यो की डार’ से दो प्रसंग भी श्रोताओं को सुनाए। चकोर पक्षी पर लिखे ‘प्यारे चक्खू’ को श्रोताओं से विशेष सराहना मिली तो एक अन्य प्रसंग में पहाड़ की स्त्रियों की आत्मीय छवियाँ भी मन को मोहने वाली थीं। आयोजन में युवा कवि और ‘दखल’ के संपादक अशोक कुमार पांडेय ने पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साहित्य स्मृतियों को जीवित रखने में मदद करता है। उसके सहारे हम जान पाते हैं कि मनुष्यों ने किस तरह संघर्ष कर अपना विकास किया है। उन्होंने सांप्रदायिक कट्टरता और धर्मान्धता को खतरनाक बताते हुए कहा कि रिवर्स गियर में चलकर कोई समाज आगे नहीं बढ़ सकता। उत्तराखंड के जन संघर्षों और स्त्रीवादी आन्दोलनों में गीता गैरोला की भूमिका को रेखांकित करते पांडेय ने कहा कि उनका लेखन रोशनी देने वाला है।

हिन्दी विभाग के अध्यापक डॉ पल्लव ने ‘मल्यो की डार’ पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि  हम सबके जीवन में ऐसे अनेक लोग आते हैं जो मामूली और साधारण हैं, लेकिन इनका लेखा करना हम सब के लिए सम्भव नहीं हो पाता। गीता गैरोला ऐसा करती हैं तो न केवल पहाड़ (और भारत भी) की सामासिक संस्कृति का निजी आख्यान रच देती हैं, अपितु जबड़े फैलाते उपभोक्तावाद के सामने सामूहिकता का निजी प्रतिरोध भी खड़ा करती हैं। साहित्य ऐसे ही तो अपने पाठकों को संस्कारवान बनाता है। उन्‍होंने कहा कि  स्त्री मुक्ति की छटपटाहट इन संस्मरणों में भी है और पितृसत्ता की जकड़न की प्रतीति भी।  फिर भी जो नहीं है, वह है स्त्री मुक्ति की वे तस्वीरें जो हिन्दी की स्त्री विमर्शवादी लेखिकाओं द्वारा बहुधा प्रयुक्त की गई हैं। यौन स्वतंत्रता और देह कामना भी जीवन से जुड़ी सचाइयां हैं लेकिन इन सचाइयों से गीता जी आक्रान्त नहीं हैं। आयोजन में बी ए प्रतिष्ठा संस्कृत के विद्यार्थी सत्यार्थ ग्रोवर ने पुस्तक पर समीक्षा प्रस्तुत की। इस आयोजन के दूसरे भाग में महिला विकास प्रकोष्ठ द्वारा प्रकाशित पत्रिका ‘सुबह’ के प्रवेशांक का लोकार्पण अतिथियों ने किया।

प्रकोष्ठ की परामर्शदाता डॉ रचना सिंह ने पत्रिका के बारे में जानकारी दी तथा बताया कि स्त्री विषय पर केंद्रित प्रवेशांक में मूर्धन्य कला चिंतक कपिला वात्स्यायन से साक्षात्कार तथा कवयित्री अनामिका की कवितायेँ विशेष सामग्री के रूप में प्रकाशित की गई हैं। समारोह का संयोजन प्रकोष्ठ की आकांक्षा ने किया तथा अध्यक्षा सिमरन ने गैरोला को शाल ओढाकर अभिनन्दन किया।

फोटो एवं रिपोर्ट – मोनिका शर्मा

बच्चों को पसंद आया कि‍ताबों का साथ

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ग़ाज़ियाबाद : इंदिरापुरम के रिहायशी इलाके ज्ञानखंड- 3 में 26 जनवरी को बच्चों के लिए घुमंतू पुस्तक मेले का आयोजन किया गया। इसमें एकलव्य, एनबीटी, सीबीटी, विज्ञान-प्रसार आदि विभिन्न प्रकाशनों की किताबों के लगभग दो सौ से ज्यादा ‘टाइटल’ प्रदर्शित किये गये।

घुमंतू पुस्तक मेले की संयोजक कोमल मनोहरे ने बताया, ‘इस तरह के आयोजन हम लगभग डेढ़ सालों से अलग-अलग स्कूलों, बस्तियों, ‘हाउसिंग सोसाइटी’ में कर रहे हैं। इस अभियान का मकसद किताबों से दूर हो रहे बच्चों को किताबों से दोस्ती कराना है और अच्छी किताबों को उन तक पहुँचाना है। जो भी हमारे इस अभियान को जानते हैं, वे हमें अपनी सोसाइटी या स्कूल में बुलाते हैं’।

बकौल कोमल अब यहाँ ही देख लीजिये रश्मि जी ने हमारे अभियान के बारे में सुना और हमें यहाँ बच्चों के बीच यह आयोजन करने का मौका मिला। इस कार्यक्रम की आयोजक रश्मि भरद्वाज पेशे से शिक्षिका हैं। वह कहती हैं, ‘किताबें बच्चों के परवरिश में सबसे ज्यादा सहायक हैं और इस टेलीवाइज्ड युग में किताबें कहाँ पढ़ी जाती हैं। हम तो इन बच्चों को किताबों की आदत डाल रहे है और बहुत हद तक सफल भी हुए हैं।’

इस कार्यक्रम में बच्चों को कहानी सुनायी गई। बच्‍चों ने अपने मन के विषयों के चित्र बनाये। उनके बनाए चि‍त्रों को कार्यस्‍थल पर प्रदर्शित कि‍या गया। उन्हें एक लघु फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’ भी दिखाई गई, जिसे रिदम जानवे ने निर्देशित किया है।

बारिश और कड़ी ठंड के बावज़ूद मेले में ज्ञान खंड-3 व आसपड़ोस के लोगों का आना-जाना लगा रहा।

बच्चों ने उत्सुकता और दिलचस्पी से इस आयोजन में भाग लिया जिसके संयोजन में माही और स्नेहा की महत्वपूर्ण भागीदारी रही।

बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

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साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित दिखाई देते हैं। बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी उन्होंने विपुल साहित्य की रचना की है। उनकी प्रतिभा का प्रस्फुटन लेखन के साथ-साथ शास्त्रीय संगीत में भी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी संजीव ठाकुर अध्यापन-क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं। बच्चों के लिए लिखे साहित्य में उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब देखा जा सकता है।

‘कबूतरी आंटी’ संजीव ठाकुर का अलग-अलग ज़मीन पर लिखी बाल कहानियों का संग्रह है। कथानक या विषयवस्तु कहानी की आत्मा है। बालकहानी में शिल्प उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता और न शास्त्रीय दृष्टि से कहानी के तत्‍व महत्त्वपूर्ण हैं। संग्रह में विविध विषयों से सजी 15 कहानियां हैं, जो बच्चों को अलग-अलग दुनिया में प्रवेश कराके उनका मनोरंजन भी करती हैं और चुपके-चुपके कुछ संदेश भी संप्रेषित कर जाती हैं। यह संदेश कहानी की आत्मा में इस तरह अनुस्यूत है कि दिखाई नहीं देता किंतु प्रभावित करता है।

संग्रह में विभिन्न शीर्षकों की कहानियां हैं- ‘दो दोस्तों की कहानी’, ‘हमें नहीं जाना’, ‘मिट्ठू’, ‘रूठनदास’, ‘घिर गया बंटा’, ‘डरपोक’, ‘रामदेव काका’, ‘राखी नहीं बाँधूंगी’, ‘जालिम सिंह’, ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’, ‘सुबू भी खेलेगी होली’, ‘संगीत की धुन’, ‘जादूगर’, ‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’, ‘कबूतरी आंटी’ आदि। संग्रह की पहली कहानी ‘दो दोस्तों की कहानी’ है- बिल्ली और कुत्ते की दोस्ती की कहानी। बिल्ली और कुत्ते की दुश्मनी की कहानी तो बड़ी पुरानी है, पर प्रस्तुत कहानी में इनकी दोस्ती की नवीन गाथा है। कुत्ते के नाली में गिरने पर बिल्ली उसे निकालने में उसकी मदद करती है। तब से कृतज्ञ कुत्ता उसका दोस्त बन जाता है। दोनों मिलकर मुसीबतें झेलकर घरों/बाज़ार से कुछ खाने का सामान उड़ा लाते हैं किंतु लोगों की मार के डर से वे दुःखी होकर भविष्य का कार्यक्रम बनाते हुए खेतों में जाकर रहने का फैसला करते हैं, जहां उन्हें चूहे मिलेंगे और नदी किनारे ताज़ी मछलियां भी।

‘हमें नहीं जाना’ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी गई दूसरी कहानी है। बिन्नी और टीनू छुट्टियों में अपने पापा के साथ दादाजी के गांव आते हैं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर अपने दादाजी का गांव और उनका खुला और बड़ा सा मकान रास आ जाता है। आम, कटहल, अमरूद के वृक्षों को देखकर तो दोनों बहन-भाई उछल पड़ते हैं। आम की झुकी हुई डाली पर बैठकर झूला झूलते। जब नदी में नहाते तो स्कूल के स्वीमिंग पूल को भूल जाते। पहाड़ी पर चढ़कर प्रकृति का नज़ारा देखते। इस तरह आनंदपूर्वक छुट्टियां कब बीत जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। शहर लौटने का उनका मन ही नहीं होता और वे कहते हैं- ‘हमें नहीं जाना’। तब दादाजी पढ़ाई की जीवन में अनिवार्यता बतलाते हुए अगली छुट्टियों में फिर आ जाने का आश्वासन देते हैं किंतु जाने वाले दिन वे मचान पर चढ़कर छिप जाते हैं। यह कहानी बच्चों की सहज प्रकृति को दर्शाती हैं। पढ़ाई का बंधन, अध्यापकों और घर में माता के अनुशासन में ‘यह करो यह न करो’ के उपदेश भरे वाक्यों से बच्चे ऊब जाते हैं।

‘मिट्ठू’ उन्मुक्त आकाश में उड़ते हुए एक तोते की कहानी है जो एक दिन श्रुति की बॉलकनी की रैलिंग में आकर बैठ जाता है। श्रुति मां के कहने पर उसे हरी मिर्च खिलाती है। तोता ऐसे ही रोज़ आने लगता है। श्रुति उसे हरी मिर्च और भिगोए हुए चने खिलाती है। कटोरे में पानी भी रखती है। मिट्ठू रोज़ आता। उछलता, कूदता, मिर्च खाता, श्रुति के कंधे पर चढ़ बैठता, कभी उसकी हथेली पर। लेकिन पकड़ने पर कभी हाथ नहीं आता। एक दिन श्रुति उसका इंतज़ार करती रहती है, पर वह नहीं आता और ऐसे ही अगले दिन, फिर अगले से अगले दिन भी नहीं आता। श्रुति परेशान होकर मां से पूछती है तो मां उसे बताती है कि कोई बहेलिया उसे पकड़कर ले गया होगा और पिंजरे में बंद करके बेच दिया होगा। श्रुति बहुत दुःखी होती है और रात को सोते समय सोचती है कि अगर कहीं से सचमुच उसके हाथ बंदूक आ जाती तो वह बहेलिए को गोली मार देती। श्रुति की यह सोच आज की पीढ़ी की सोच है जो टी.वी. संस्कृति से हिंसात्मक प्रवृत्ति की हो गई हैं। लेखक ने इस ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित किया है क्योंकि श्रुति साफ कहती है- ‘‘मैं उसे उसी तरह गोली मार देती जिस तरह सीरियल में या फिल्मों में कोई बदमाश को मारता है।…..’’

‘नेहा को इम्तहान से डर नहीं लगता’ बच्चों को सीधे-सीधे नसीहत देने वाली कहानी है कि जैसे नेहा नियमित रूप से पढ़ती है वैसे ही सभी बच्चे पढ़ें तो उन्हें तनाव नहीं होगा। ‘रूठन दास’ बाल मानसिकता से जुड़ी है। बच्चे बात-बात पर रूठ जाते हैं। कभी मनपसंद नाश्ता न मिला या मनपसंद खिलौना या कोई और प्रिय वस्तु न मिलने पर वे न केवल बात करना बंद करते हैं, वरन् खाना तक नहीं खाते। बाल-प्रकृति को दर्शाती इस कहानी में रूठनदास का चरित्र भी इसी प्रकार का है। घर में तो सब उसके नाज़-नखरे उठाते हैं और उसकी ज़िद पूरी कर देते किंतु मित्र तो मित्र ठहरे। वह उसे ‘रूठनदास’ कहकर चिढ़ाने लगे। यह आदत उसकी बनी रही। कुछ दिन गांव से दूर शहर के बड़े स्कूल में जब पढ़ने जाता है तो वह वहां भी रूठने लगा किंतु वहां उसे कोई नहीं मनाता। वह रूठना भूल गया। घर आया तो उसके इस परिवर्तित स्वभाव से सबको सुखद आश्चर्य हुआ। वह खुद भी अब बहुत प्रसन्न था।

बच्चों के स्वभाव से जुड़ी एक दूसरी शरारती बच्चे की कहानी है ‘घिर गया बंटा’। बंटा कभी किसी बच्चे को नाली में गिरा देता तो कभी किसी की साइकिल। किसी को बकरी पर चढ़ाकर उसे दौड़ाना आदि उसके प्रिय शौक थे। एक बार उसने ‘हीरा’ के माथे पर नमक लगा कर पत्थर से घिसकर गूमड़ बना दिया। बेचारा दर्द से तड़पने लगा। पप्पू के हाथ बांधकर उसकी पैंट खोल दी। अब तो सब बच्चों ने उसको भी मज़ा चखाने की ठानी। सभी बच्चों ने अपनी-अपनी कमर में बेल्ट या बिजली की तार का कोड़ा बनाकर बांधा और बगीचे में बंटा को छोड़ दिया। बंटा भागने लगा। सब बच्चे उसके पीछे-पीछे भागने लगे। वह भागते-भागते एक कच्चे कुएं में गिर जाता है। किंतु यहां बच्चे ‘बंटा’ के स्वभाव और उसकी मित्रों के साथ की गई ज्यादतियों को भूलकर उन्हीं तारों को बांधकर एक लम्बी रस्सी बनाकर कुएं में डाल देते है, जिससे बंटा बाहर आ जाता है। बंटा शर्मिंदा सा खड़ा था। वह समझ चुका था कि मित्र तो मित्र होते हैं- वे चाहते तो उसे कुएं में गिरा रहने देते और अपना बदला ले सकते थे, किंतु बच्चों ने ऐसा नहीं किया। उसने सबसे माफ़ी मांगी और सबका दोस्त बन गया।

‘रामदेव काका’ कहानी बच्चों के कोमल संवेदनशील स्वभाव और उनकी सहृदयता को दर्शाती है। बच्चे देबू का अपने घरेलू नौकर रामदेव के प्रति स्नेह, उसके अर्धनग्न बेटे को देबू का अपनी कमीज़ उतारकर देना बच्चों में निष्छल स्वभाव और उनकी सहृदयता का सुन्दर उदाहरण है। ‘राखी नहीं बाँधूंगी’ भाई-बहन के प्रेम की कहानी है जहां रूठना-मनाना, लड़ना-झगड़ना और फिर सब भूलकर दुगुने प्रेम से एक हो जाना दिखाया गया है। ‘जालिम सिंह’ कहानी चपरासी जालिम सिंह के कठोर स्वभाव के हृदय-परिवर्तन की कहानी है। ‘चुन्नू-मुन्नू का स्कूल’ में उन बच्चों की प्रकृति बतलाई है जिन्हें स्कूल फालतू लगता है और जो रोज़ नया बहाना गढ़-गढ़ कर स्कूल से छुट्टी करते हैं किंतु एक दिन पिता के द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। यह कहानी यहीं खत्म हो जाती है किंतु यदि लेखक बच्चों को किसी घटना के माध्यम से स्कूल से भागने का दुष्परिणाम या कोई नुकसान दिखाते तो कहानी एक अच्छा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ती और बच्चों के लिए भी प्रेरक बन जाती। यहां बच्चों को अभी भी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि उन्होंने कोई गलती की है। भोले माता-पिता के विश्वास को छला है या अपनी पढ़ाई का कोई नुकसान किया है।

‘सुबू भी खेलेगी होली’ में बच्चों की डर की भावना को पिता अपनी समझ-बूझ से दूर करते हैं तो ‘संगीत की धुन’ में समीर की संगीत के प्रति धुन उसे एक दिन सचमुच बहुत बड़ा गायक बना देती है। निःसंदेह यह कहानी बच्चों को धुन का पक्का होना सिखाएगी और लक्ष्य की ओर बढ़ाएगी। ‘जादूगर’ संवेदना और सहृदयता की कहानी है जो निश्चय ही बच्चों में भावात्मक संस्कारों को पुष्ट करेगी।

संग्रह की अंतिम शीर्षक कहानी ‘कबूतरी आंटी’ बाल मानसिकता की कहानी है। बच्चों में पशु-पक्षियों के साथ ‘मानवीकरण’ की कहानी है। सुबू कबूतरी आंटी के बच्चे में अपने को देखती है और छत पर उसके लिए वे सारी वस्तुएं फैंकती जाती हैं जो उसके लिए आवश्यक हो सकती हैं- मसलन, कंघी, पानी पीने का बरतन, चावल-दाल के दाने सब। वह उसको रोज़ बढ़ता देख बड़ी खुश होती है। वह कबूतरी आंटी से खूब बतियाती है और यह कहकर अपनी पेंसिल बॉक्स भी गिरा देती है कि वह स्कूल जाएगा और उसे ज़रूरत पड़ेगी। कबूतरी का बच्चा उड़ना सीख जाता है। वह कुछ देर उड़कर जाता है और फिर छज्जे पर आकर बैठता है। सुबू सोचती है- वह स्कूल जाता है और फिर लौट आता है। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता जगाती यह कहानी बच्चों में प्रकृति के प्रति उत्सुकता का भाव जगाती है।

इन कहानियों से लेखक ने बाल मनोभावों को अभिव्यक्ति दी है। बालकों की रुचि, प्रवृत्ति को केन्द्र में रखते हुए सीधी-सरल एवं बालोपयोगी भाषा में लिखी ये कहानियां बच्चों को पसंद आएंगी। मानवीय संवेदनाएं बच्चों के हृदय तक पहुँचेगी चाहे मानव के प्रति हों चाहे मूक पशु-पक्षी के प्रति हों। हर कहानी बचपन की अलग-अलग छवि को मोहक ढंग से प्रस्तुत करती है। बाल हृदय से जुड़ी सादगी से कही ये कहानियाँ बच्चों को अपनी कहानियाँ लगेंगी।

पुस्तक:  कबूतरी आंटी
कहानीकार: संजीव ठाकुर
प्रकाशक:  प्रखर प्रकाशन, 1/11486ए, सुभाष पार्क एक्सटेंशन,
नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032

संस्करण: प्रथम संस्करण, 2014
मूल्य   :   150 रुपये मात्र

बाल साहित्य : चुनौतियाँ और संभावनाएँ : राजेश उत्साही 

राजेश उत्साही

राजेश उत्साही

साहित्य क्या है ? पुराना कथन है कि साहित्य समाज का दपर्ण है। जैसा समाज में होता है, साहित्य में वही प्रतिबिम्बबित होता है। सही मायने में साहित्य का रिश्ता हमारे जीवन से है। हमारे जीवन में, हमारे आसपास जो घटता है, उसे देखकर या उसे भोगकर हम दुखी या सुखी होते हैं। खुश होते हैं या उदास होते हैं। गुस्‍सा होते हैं या क्रोधित होते हैं। हँसते हैं, खिलखिलाते हैं, रोते हैं, चीखते हैं। और जब कभी इस सबका आख्‍यान हम कहीं लिखा हुआ पढ़ते हैं तो हमें वैसा ही महसूस होता है जैसा उसे देखते या भोगते हुए महसूस करते हैं।
जिस कविता, कहानी,नाटक, उपन्‍यास आदि को पढ़ते हुए हम ऐसा महसूस करते हैं कि उसने हमें अतीव आनंद दिया या कि हम उसमें डूब गए, दरअसल उसने हमें पाठक के रूप में वह स्‍वतंत्रता प्रदान की जो हमें मनुष्‍य होने के नाते हासिल होनी चाहिए। साहित्‍य वास्‍तव में हमें उन जंजीरों से मुक्‍त करता है, जिनमें हम अमूमन जकड़े होते हैं।
शिक्षाविद् कृष्‍ण कुमार के शब्‍दों में, ‘साहित्‍य एक अपेक्षित अर्थ को जानने का जरिया है– उसके जरिए कुछ रूपाकारों को, कुछ रूपकों को प्रचारित करने का माध्‍यम है।’

मेरा अपना मानना है कि बाल साहित्‍य जैसा अलग से कुछ नहीं होता है। हो सकता है कि मेरा यह कथन आपको चौंकाए, यह भी संभव है कि आप मुझ से सहमत न हों। बरसों से यह अवधारणा चली आ रही है और तमाम विद्वान इसे मानते भी हैं। पर मुझे लगता है कि इस पर एक अलग नजरिए से विचार किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में एक वाक्‍या 2011 का है। भोपाल में मशहूर बाल विज्ञान पत्रिका चकमक के 300वें अंक के विमोचन समारोह का आयोजन था। इस अवसर पर वहाँ ‘बाल साहित्‍य की चुनौतियाँ’ शीर्षक से एक विमर्श रखा गया था। इसमें कई अन्‍य लोगों के अलावा जाने-माने फिल्‍मकार गुलज़ार साहब और कवि, लेखक प्रयाग शुक्‍ल जी भी मौजूद थे। चकमक की संस्‍थापक सम्‍पादकीय टीम का सदस्‍य होने के नाते मैं भी इस विमर्श में शामिल था। वहाँ मैंने यही बात कही। प्रयाग जी ने इसका प्रतिवाद किया। बहस आगे बढ़कर बाल साहित्‍य की गुणवत्‍ता पर पहुँची। गुलज़ार साहब ने इसका समाधान एक बहुत सुंदर कथन से किया। उन्‍होंने कहा कि, ‘अच्‍छा बाल साहित्‍य वह है जिसका आनंद बच्‍चे से लेकर बड़े तक ले सकें।’ अब आप सोचिए कि ऐसे साहित्‍य को आप किस श्रेणी में रखेंगे।

चलिए अब हम थोड़ी देर के लिए यह मान भी लें कि बाल साहित्‍य जैसा अलग से कुछ होता है, तो वह अच्‍छा क्‍या होगा ? गुलज़ार साहब की बात मानें तो निश्चित ही वह जिसमें बच्‍चों से लेकर बड़े तक अपने को देख सकें। पर दिक्‍कत यहीं से आरम्‍भ होती है। हम ज्‍यों-ज्‍यों बड़े होते हैं या बड़े होने लगते हैं, जीवन को देखने का हमारा स्‍वतंत्र बालसुलभ नजरिया गायब होने लगता है। हम जीवन को स्‍वतंत्रता से देखने की बजाय प्रचलित मान्‍यताओं, नियमों और प्रतिबंधों के साथ देखने लगते हैं। तथाकथित नैतिकता और उसके आदर्श हमारे सामने आ खड़े होते हैं। ऐसे में जब हम किसी भी रचना को यह मानकर रचते हैं कि वह बच्‍चों के लिए है, तब तो हमारे सामने तमाम और बंदिशें और शर्तें भी आन खड़ी होती हैं। जैसे रचना किस उम्र के बच्‍चे के लिए लिखी जा रही है, भाषा क्‍या होगी, परिवेश क्‍या होगा। जो हम कहने जा रहे हैं, उसे समझ पाने के लिए जरूरी अवधारणाएँ बच्‍चे में विकसित हो गई होंगी या नहीं आदि आदि। जाहिर है ऐसा नियंत्रित लेखन जो रचेगा, वह कितना प्रभावी होगा कहना मुश्किल है।

मुश्किल यह भी है कि जब बच्‍चों के लिए कहकर लिखा जा रहा होता है तो ज्‍यादातर लेखक अपने अंदर के अतीत के ‘बच्‍चे’ को याद करके, ध्‍यान रखकर लिख रहे होते हैं। बिरले ही होते हैं, जो अपने आसपास के समकालीन बच्‍चे को देखकर, सुनकर, समझकर, उसके स्‍तर पर उतरकर उसे अभिव्‍यक्‍त या संबोधित कर रहे होते हैं। मैं अपनी बात को और अधिक स्‍पष्‍ट करने के लिए अगर यह कहूँ कि प्रेमचंद ने ‘ईदगाह’ कहानी बाल साहित्‍य कहकर तो नहीं लिखी थी। लेकिन ‘ईदगाह’ एक ऐसी कहानी है जो आज की तारीख में बच्‍चों के बीच खूब पढ़ी जाती है। या मैं यह याद करूँ कि प्रेमचंद की ही ‘पंच परमेश्‍वर’ तो मैंने पाँचवी कक्षा की पाठ्यपुस्‍तक में पढ़ी थी। यानी केवल ग्‍यारह साल की उम्र में। तो क्‍या आप उसे बाल साहित्‍य की श्रेणी में रख देंगे। इसमें आप चंद्रधर शर्मा गुलेरी की मशहूर कहानी ‘उसने कहा था..’ को भी जोड़ लें जो मैंने दसवीं या ग्‍यारहवीं में पढ़ी थी, तो क्‍या वह किशोर साहित्‍य कहलाएगी। कुल मिलाकर मैं यह कहने की कोशिश कर रहा हूँ कि साहित्‍य केवल साहित्‍य होता है, उसे श्रेणियों में बाँटने से हम साहित्‍य का भला कम, नुकसान ज्‍यादा कर रहे होते हैं। इसलिए एक विचारवान, गंभीर और सर्तक लेखक का यह दायित्‍व है कि पहले वह केवल लिखे। ठीक है कि आज के बाजार की मांग है कि वह पाठक को ध्‍यान में रखे, पर उसे अपने ऊपर हावी न होने दे। तो एक तरह से पहली चुनौती यही है। और यह एक शाश्‍वत चुनौती है। इसका मुकाबला हर दौर में हर पीढ़ी को करना होगा। बाल साहित्‍यकार का टैग भी मुझे पसंद नहीं। उसको लेकर भी वही आपत्ति है जो बाल साहित्‍य कहने में है। साहित्‍यकार, साहित्‍यकार होता है, वह बाल, किशोर या फिर वयस्‍क साहित्‍यकार नहीं होता।
बाल साहित्‍य का सरोकार जिन तीन लोगों से है या जिसे अंग्रेजी में कहते हैं जो उसके ‘स्‍टेकहोल्‍डर’ हैं, उनमें लेखक के अलावा पाठक या उसका उपयोग करने वाले के तौर पर बच्‍चा, बच्‍चे के अभिभावक या वे लोग जो इस साहित्‍य को बच्‍चे को उपलब्‍ध कराते हैं।
आइए, इन पर एक-एक करके बातचीत करते हैं।

बच्‍चे हमारे साहित्‍य के पाठक हैं। पर बच्‍चों के बारे में या किसी भी बच्‍चे के बारे में हम वास्‍तव में कितना जानते हैं, इस पर हमें विचार करना चाहिए। पहली बात पाठक होने के लिए बच्‍चे का साक्षर होना आवश्‍यक है। बच्‍चों को साक्षर करने के लिए यानी उन्‍हें शिक्षा देने के लिए जिस स्‍तर पर प्रयास हो रहे हैं, वे सब हमारे सामने हैं। यहाँ थोड़ा-सा विषयांतर होगा, लेकिन हमें हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को इस संदर्भ में टटोलना होगा, उसका परीक्षण और आकलन करना होगा। वास्‍तव में वह बच्‍चों को किस तरह से शिक्षित करती है। बल्कि कई मायनों में यह कहना ज्‍यादा बेहतर होगा कि वह बच्‍चे को शिक्षित होने से एक हद तक रोकती है।

इस संदर्भ में कृष्‍णकुमार कहते हैं कि, ‘बाल साहित्‍य की व्‍याप्ति के रास्‍ते में सबसे बड़ी रुकावट हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था का यह चरित्र है कि वह पाठ्यपुस्‍तक केन्द्रित है और पाठ्यपुस्‍तक के इर्द-गिर्द ही सारी शिक्षा व्‍यवस्‍था घूमती है। अध्‍यापक का सारा प्रयास उसके आसपास ही होता है, उसको लेकर ही रहता है। और शिक्षा व्‍यवस्‍था की जो धुरी है वह तो बिलकुल ही पाठ्यपुस्‍तक से चिपकी हुई चलती है। पाठ्यपुस्‍तक स्‍वयं परीक्षा व्‍यवस्‍था से पैदा होने वाले भावों से आवेशित हो उठती है। जो डर परीक्षा के बारे में सोचकर बच्‍चों को लगता है, वही डर शिक्षकों को पाठ्यपुस्‍तकों को देखकर लगने लगता है। क्‍योंकि उनको मालूम होता है कि यह वह चीज है जो मुझे उस समूह से, मेजोरिटी से बात करवाएगी। और वही चीज है जो पढ़ने का मन नहीं होता लेकिन फिर भी मुझे पढ़नी ही पड़ेगी। पाठ्यपुस्‍तक ऐसा प्रतीक बन गई है कि जिसके सामने दुनिया भर में फैला हुआ अनुभव-जगत, बच्‍चे का ज्ञान,   बच्‍चे को मिलने वाली अपने जीवन की खुराक, उन सबका कोई मायना नहीं रहा। इसके जरिए ही हर चीज का परीक्षण होगा। इसके जरिए ही स्‍कूल चलेंगे, इसकी धुरी पर चलेंगे। और अगर आप सरकार की इन कोशिशों को देखें तो बहुत बड़ी कोशिश यही रहती है कि पाठ्यपुस्‍तक समय पर पहुँच जाए और उसकी पढ़ाई शुरू हो जाए।’
यहाँ यह बात रेखांकित करने की भी आवश्‍यकता है कि पिछले कुछ वर्षों में बच्‍चों को पाठ्यपुस्‍तकों के आतंक से मुक्‍त करने की तो नहीं, पर पाठ्यपुस्‍तकों को ऐसी बनाने की कोशिश जरूर हुई है जो बच्‍चों को कम आतंकित करें। हालाँकि मौजूदा दौर में यह प्रयास कहाँ तक जाएगा, कह नहीं सकते।

तो मूल बात यह है कि हमारा जो पाठक है, वह पाठ्यपुस्‍तक के आतंक से भरा हुआ होता है। इस बात को ठीक से और संवेदनशीलता के साथ समझने की जरूरत है। यहाँ उसके सामने चुनौती होती है कि कुछ और पढ़ना यानी पाठ्यपुस्‍तक से या फिर अपनी स्‍कूली शिक्षा से विमुख होना। लेकिन अगर पाठ्यपुस्‍तकों से इतर साहित्‍य उसे ऐसा कुछ दे रहा हो, जो उसे अपनी नीरस शिक्षा को और रोचक बनाने में भी काम आए तो फिर उसकी रुचि उसमें बढ़ेगी। लेकिन जाहिर है कि उसकी रुचि ऐसा कुछ पढ़ने में कतई नहीं होगी,जो उसे उन्‍हीं तमाम बंदिशों,  उपदेशों, तथाकथित नैतिक मूल्‍यों की और घिसी-पिटी अवधारणाओं की ओर ले जाए, जो वह घर से लेकर स्‍कूल तक में लगातार सुनता और पढ़ता ही रहता है।
मैं यहाँ एक बार फिर कृष्‍णकुमार जी को याद करना चाहूँगा। वे कहते हैं कि, ‘हम सब लोग बाल साहित्‍य के शौकीन हैं, सोचते रहते हैं कि यह क्षेत्र क्‍यों लगातार दिक्‍कत पैदा करता है। मामला सिर्फ 0बाल साहित्‍य का नहीं है, कई और चीजों का भी है। कलाओं का मामला है। स्‍कूल में कलाओं की भी व्‍याप्ति नहीं हो सकी है। पुस्‍तकालय की व्‍याप्ति नहीं हो सकी है। हम बनाते जरूर हैं, इसमें पैसा भी खर्च होता है, लेकिन वह चीज दिखती नहीं है।’
मुझे लगता है इस दिशा में और जगह भी काम हुआ होगा, लेकिन पिछले दो-एक वर्ष से उत्‍तराखंड के स्‍कूलों में इस दिशा में उल्‍लेखनीय प्रयास हुए हैं, जिनके परिणाम भी बेहतर रहे हैं। शिक्षक और कवि Mahesh Punetha और उनके साथियों की पहल से स्‍कूलों में ‘दीवार पत्रिका’ का एक आंदोलन ही खड़ा हो गया है। मेरा मानना है कि इस पहल ने साहित्‍य और बच्‍चों के बीच की जड़ता को तोड़ने का काम किया है। चकमक बाल विज्ञान पत्रिका में सत्रह बरस तक संपादकीय जिम्‍मेदारी निभाने से प्राप्‍त अनुभव से मैं यह कह सकता हूँ कि बच्‍चे अपने हमउम्र साथियों का लिखा हुआ पढ़ना कहीं अधिक पसंद करते हैं। यह पसंद उनमें न केवल पढ़ने की, बल्कि अच्‍छा पाठक बनने की आदत को विकसित करती है। वह उनमें अपने को अभिव्‍यक्‍त करने के लिए भी प्रेरित करती है। दीवार पत्रिका शायद उन्‍हें यह मौका दे रही है। जहाँ वे खुद लिखते हैं, पढ़ते हैं, चर्चा करते हैं, समीक्षा करते हैं। वास्‍तव में यह प्रक्रिया उनमें एक पाठक के साथ एक लेखक के संस्‍कार भी रोप रही है। बच्‍चे की समझ के बारे में कई और बातें कही जा सकती हैं।

पर मैं यहाँ केवल वह कहूँगा, जो प्‍लेटो ने लगभग दो हजार साल पहले कहा था कि, ‘बच्‍चा दरअसल बड़ों के बीच एक विदेशी की तरह होता है। जैसे किसी विदेशी से जिसकी भाषा आपको न आती हो जब आप बात करते हैं तो आपको मालूम होता है कि मेरी कई बातें वो ठीक समझेगा, कई नहीं समझेगा या गलत समझ जाएगा। और जब वह बोलता है, अपनी भाषा में बोलता है और हमको उसकी भाषा नहीं आती तो हम उसकी पूरी बात नहीं समझ पाते। कुछ समझते हैं, कुछ नहीं समझते हैं, और इस तरीके से जो आदान-प्रदान होता है वह आधा-अधूरा होता है।’ हमें बच्‍चे को भी इस तथ्‍य को ध्‍यान में रखकर देखना और समझना चाहिए।
अब हम दूसरे स्‍टेकहोल्‍डर की बात करें। वे हैं साहित्‍य के वाहक यानी बच्‍चों के अभिभावक या फिर स्‍कूल। थोड़ी देर पहले हमने पाठ्यपुस्‍तकों की चर्चा के बहाने अपरोक्ष रूप से स्‍कूल की बात कर ही ली है। स्‍कूल की अपनी सीमाएँ और मजबूरियाँ हैं। उन पर और भी चर्चा हो सकती है।

अब यहाँ अभिभावक की बात करें। सीधे-सीधे साहित्‍य यानी किताबों तक बच्‍चों की पहुँच न के बराबर होती है। यानी एक तरह से किताब या साहित्‍य का चुनाव अभिभावक या फिर स्‍कूल के शिक्षक कर रहे होते हैं। मेरा अब तक अपना अनुभव यह कहता है कि अमूमन अभिभावक वह चुनते हैं जो उन्‍हें अच्‍छा लगता है, न कि बच्‍चे को। अभिभावक वह चुनते हैं जो उनके अपने संस्‍कार, मूल्‍य और विश्‍वासों को बल देता है, उनकी कसौटी पर खरा उतरता है। आमतौर पर ऐसा साहित्‍य जो बच्‍चों को कुछ नया करने, नया सोचने, सवाल उठाने या लीक से हटकर सोचने के लिए प्रेरित करे, मौका दे उसे अभिभावक पसंद नहीं करते। उन्‍हें लगता है उनके बच्‍चे उसे पढ़कर बिगड़ जाएँगे। बाल साहित्‍य की महत्‍ता, उसकी जरूरत और प्रासंगिकता पर अभिभावकों के बीच काम करने, उनकी संवदेनशीलता बढ़ाए जाने की जरूरत है। जैसे हम कहते हैं कि बच्‍चे की पहली पाठशाला घर है, तो उसी तर्ज पर बच्‍चे का दूसरा घर पाठशाला है। इस नाते में यहाँ शिक्षकों को भी इसमें शामिल करना चाहूँगा। अंतत: वे भी अभिभावक ही हैं।

उधर स्‍कूल में भी पुस्‍तकालय के माध्‍यम से जो बच्‍चों तक पहुँचता है, वह भी एक खास ढर्रे का साहित्‍य होता है। ऐसा नहीं है कि इस दिशा में कुछ काम नहीं हुआ है। पिछले सालों में एनसीईआरटी में ही कृष्‍णकुमार जी के निर्देशन में अच्‍छे बाल साहित्‍य के लिए एक सेल गठित किया गया था। जिसने बहुत मेहनत के बाद अच्‍छी किताबों की एक सूची जारी की थी। विभिन्‍न राज्‍यों में स्‍कूलों में उसके अनुरूप उन किताबों की खरीद भी हुई, वे पुस्‍तकालयों में पहुँची भी। तमाम स्‍कूलों में उनका उपयोग हो भी रहा है, हो भी रहा होगा। लेकिन जितना हुआ है, वह नाकाफी है। उस पर ध्‍यान देने की जरूरत है। इसे भी हमें एक चुनौती के रूप में सामने रख सकते हैं। जो सकारात्‍मक अनुभव हमें विभिन्‍न जगहों से प्राप्‍त होते हैं, सफलता की कहानियाँ सुनाई देती हैं, उन्‍हें केवल प्रसारित करने की नहीं, बल्कि व्‍यावहारिक रूप में दुहराने की आवश्‍यकता है।

आइए, अब तीसरे स्‍टेकहोल्‍डर यानी लेखक की बात करें। एक बार फिर चकमक के अपने अनुभव से ही यह कहना चाहूँगा कि ऐसे लोगों की संख्‍या अच्‍छी खासी है जो यह मानते हैं कि बच्‍चों के लिए लिखना तो उनके लिए बाएँ हाथ का खेल है। फेसबुक जैसे माध्‍यम ने इस संख्‍या में केवल बाल साहित्‍य ही नहीं, अन्‍य क्षेत्रों में भी ऐसे लिक्‍खाड़ों की संख्‍या में इजाफा किया है। वास्‍तव में ऐसा है नहीं। जैसा कि मैंने आरंभ में कहा, अगर उसे दोहराऊँ कि गुलज़ार साब के शब्‍दों में अच्‍छा बाल साहित्‍य वह है जिसे पढ़ते हुए बच्‍चे से लेकर वयस्‍क तक आनंद महसूस करें। तो ऐसा साहित्‍य लिखने के लिए केवल बाएँ या दाएँ हाथ से काम नहीं चलेगा। अपने कान, अपनी आँखें, अपना दिमाग, अपनी समझ, अपनी सोच और अपना हृदय भी खुला रखना पड़ेगा।

इस संदर्भ में बाल साहित्‍य पर ऐसे आयोजन में पहली भागीदारी की एक याद मेरे मस्तिष्‍क में अब तक बसी हुई है। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है यह 1987 की बात है। जाने-माने लेखक और पत्रकार मस्‍तराम कपूर जी ने ‘अखिल भारतीय जुवेनाइल लिटरेचर फोरम’ के बैनर तले बाल साहित्‍य पर चर्चा का एक आयोजन दिल्‍ली में किया था। मैं चकमक की ओर से इसमें भाग लेने पहुँचा था। तब चकमक आरम्‍भ हुए मात्र दो साल ही हुए थे। आयोजन में निरंकार देव सेवक, डॉ. श्री प्रसाद और डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे जैसे दिग्‍गज मौजूद थे। देवसरे जी उन दिनों पराग का संपादन कर रहे थे। देवसरे जी ने अपने संबोधन में एक महत्‍वपूर्ण बात कही। उन्‍होंने कहा कि बच्‍चों को गौतम-गॉंधी बनने का उपदेश, सदा सच बोलो, मेरा देश महान, देश की राह में प्राणों की दो आहुति, मैं मातृभूमि पर कुर्बान जैसे जुमलों ही नहीं, उसकी अवधारणा से बाहर निकलने की भी जरूरत है। बहुत हुआ। एक समय था जब सच में हमको इन सब जुमलों और इस अवधारणा की जरूरत थी। लेकिन अब उससे कहीं आगे बढ़ना है।’
खैर, मेरे लिए तो उनकी यह बात लाइटहाउस के समान थी, जिसका पालन मैंने चकमक में किया। पर लगभग तीस-पैंतीस साल बीत जाने के बाद भी ऐसा लगता है कि अपने लेखन में इस तरह के जुमलों और अवधारणाओं का उपयोग करने वालों की संख्‍या में कमी नहीं आई है। या कहूँ कि इन्‍हें दरकिनार करके बेहतर सकारात्‍मक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण साहित्‍य रचने वालों की संख्‍या में पर्याप्‍त इजाफा नहीं हुआ है। मेरा मत है कि इसमें केवल इस तरह का लेखन करने वालों की ही कमजोरी नहीं है, उसे छापने वाले भी बराबरी के जिम्‍मेदार हैं। तमाम लघु बाल पत्रिकाएँ निकल रही हैं, अखबारों में रचनाओं को जगह दी जा रही है। लेकिन क्‍या उनमें व्‍यक्‍त किए जा रहे विचारों, मूल्‍यों और अवधारणाओं पर पर्याप्‍त विमर्श किया जा रहा है। यह मेरे लिए एक सवाल है। क्षमा करें, पर बच्‍चों के लिए लिखी गई ऐसी दस कविताओं में से मुझे कोई एक या दो ही उपयोगी लगती हैं। यही हाल कथा साहित्‍य का है। तो चुनौती लेखक की अपनी क्षमतावृद्धि की भी है। केवल लिखना ही नहीं, उसे पढ़ना भी होगा। और पढ़ने से आशय केवल बाल साहित्‍य से नहीं है, हर तरह के साहित्‍य से है।

मैं दो और बातें संक्षेप में रखना चाहूँगा।
पहली बात, मेरा मानना है कि लेखक की अपनी एक राजनीतिक समझ भी होनी चाहिए, तभी वह अपने लेखन के साथ न्‍याय कर सकता है। असल में हम जिन मुद्दों पर लेखन में कमी देखते हैं, दरअसल वह अपरिपक्‍व या अधकचरी राजनीतिक समझ के कारण ही उपजती है। यहाँ राजनीतिक समझ का मतलब ‘पार्टी राजनीति’ नहीं है। लेखक को जाति, जेंडर, समानता, धर्म,  संप्रदाय, राष्‍ट्र, गरीब होने का अर्थ, आर्थिक गैरबराबरी आदि अवधारणाओं पर अपनी एक सुचिंतित समझ बनाने की जरूरत है।

दूसरी बात, साहित्‍य की तमाम छोटी-बड़ी पत्रिकाएँ निकलती हैं, उनमें से कई आला दर्जे की हैं, लेकिन उनमें भी बाल साहित्‍य को लेकर कोई चर्चा नहीं होती। कोई लेख नहीं छपते। बच्‍चों की किताबों की कोई समीक्षा नहीं होती। कायदे से जो लोग बच्‍चों के लिए नहीं लिख रहे हैं, उन्‍हें कम से कम बच्‍चों के लिए लिखे जा रहे समकालीन साहित्‍य पर अपनी टिप्‍पणी तो करनी ही चाहिए। क्‍योंकि उनकी पत्रिकाओं के लिए भी कल के पाठक आज के बच्‍चे ही होंगे। अगर उन्‍हें अच्‍छा साहित्‍य पढ़ने को नहीं मिलेगा, तो वे कल इन पत्रिकाओं तक भी नहीं पहुँचेगे। दूसरी तरफ अगर हमें हमारे बाल साहित्‍य को अधिक सार्थक और ऊर्जावान बनाना है तो इस दिशा में प्रयास करने होंगे, साहित्यिक पत्रिकाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। वहाँ बाल साहित्‍य पर विमर्श बढ़ाना होगा।

कुत्ते (केनिस फेमिलिएरिस) की दुम टेढ़ी क्यों : देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

आपने देवेंद्र मेवाड़ी जी की वि‍ज्ञान वि‍षयों पर लेख, कहानी, संस्‍मरण, कवि‍ता, यात्रावृत्तांत आदि‍ वि‍धाओं पर लि‍खी रचनाएं तो बहुत पढ़ी होंगी। अब पढ़ि‍ए उनका लि‍खा बेहद रोचक व्यंग्य-   

पिछली बार ट्रेन से सफर करते हुए मेरे सहयात्री किसी स्टेशन पर सुबह के धुंधलके में उस समय उतर गए थे, जब मैं नींद के सुखद झौंकों में झूल रहा था। उन्होंने मुझे झंझोड़ा था और उनींदी आंखों से मैंने देखा, वे अपने दोनों हाथों में मेरी दाईं हथेली दबाए कह रहे थे- इतने बढ़िया साथ के लिए धन्यवाद। फिर वे उतर गए, मगर बाद में आंख खुली तो पाया रात भर अपने महत्वपूर्ण अनुसंधान कार्यों के बारे में बताते हुए उस मेधावी वैज्ञानिक ने शोध पत्रों की जो फाइल मुझे दिखाई थी, वह उसे सीट पर ही भूल गए हैं। लेकिन, अब क्या हो सकता था? नाम-पते के लिए सारी फाइल टटोल डाली लेकिन लगता है, शोध पत्र लिखने-लिखवाने में वे इतना व्यस्त रहे होंगे कि नाम-पता लिखना भूल गए अथवा वरिष्ठता क्रम में बाद में लिखने का निश्चय किया होगा कि क्या पता शोधपत्र प्रकाशनार्थ भेजते समय तक कौन नाम जोड़ना-छोड़ना पड़े। और, जो नाम जल्दी में उन्होंने मुझे बताया था वह कुछ इतना नया और अपरिचित-सा था कि मेरे मस्तिष्क से ही निकल गया है।

लेकिन, उस मेधावी और कुछ कर गुजरने की उद्दाम इच्छा वाले वैज्ञानिक की महत्वपूर्ण उपलब्धियों का दस्तावेज यह फाइल तो है। उसी में से एक शोधपत्र प्रस्तुत कर रहा हूं। संयोगवश यदि मेरे सहयात्री उन वैज्ञानिक महोदय की दृष्टि इस शोधपत्र पर पड़े तो उनसे मेरा विनम्र अनुरोध है कि अविलंब पत्र-व्यवहार करें तथा इस महत्वपूर्ण शोधपत्र पर अपने हक की घोषणा करें ताकि इस खोज का श्रेय कोई अन्य व्यक्ति बिना मेहनत किए ही न लूट ले। इसी आशय के साथ उनकी फाइल से निकालकर फिलहाल यह एक शोध प्रबंध प्रकाशित किया जा रहा है। इससे उनकी मेधा और वैज्ञानिक अनुसंधान के अथक प्रयास का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। – लेखक

 भूमिका

कुत्ता अर्थात् केनिस फेमिलिएरिस रीढ़धारी, स्तनपोषी पशु है। आम बोलचाल में इसे ‘कुक्कुर’ या ‘श्वान’ भी कहा जाता है। यह मांसाहारी कुल और ‘कैनिडी’ परिवार का सदस्य है। अब तक प्रकाशित साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि दुनिया में इस पशु की लगभग 37 जातियां पाई जाती हैं, लेकिन श्वान प्रजनकों द्वारा व्यापक संकरण करके इनकी अनेक नस्लें तैयार करने में सफलता प्राप्त की गई है (फेयरचाइल्ड, 1921, स्मिथ, 1933)। यही कारण है कि आज नन्हें मोंगरेल और चाऊ से लेकर खूंखार ग्रेहाउंड और टैरियर तक सैकड़ों प्रकार के श्वान हमारे आसपास दिखाई देते हैं।

इनके आकार और रूप-रंग में भारी विभिन्नता पाई जाती है। आकार में कोई छोटा (एडवर्ड, 1913) तो कोई बहुत बड़ा (नेल्सन, 1915) होता है। एंडर्सन (1917) के अनुसार कई कुत्ते झबरीले होते हैं लेकिन इमर्सन इत्यादि (1914,17,21) ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि उनके द्वारा जांचे गए 155 में से 137 कुत्तों के शरीर पर 5 से.मी. से बड़े बाल नहीं थे। इससे साफ पता चलता है कि अधिकांश कुत्तों के शरीर पर छोटे-छोटे बाल होते हैं। लेकिन, स्मिथ (1705) का कहना है कि इनके शरीर पर लंबे बाल होते हैं। इनकी आंखें, कान और घ्राणशक्ति बहुत तेज होती है (मिलर, 1918) और ये गंध के आधार पर आखेट करते हैं (पावेल, 1941)। इनकी टांगें लंबी, पतली और पूंछ प्रायः झबरीली होती है (वाकर, 1891)। चोपड़ा (1946), प्रियर्सन (1975) तथा विक्टर (1976) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में 150 में से 104 कुत्तों की पूंछें झबरीली नहीं पाई गईं जिससे यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि अधिकांश कुत्तों की पूंछ पर बाल छोटे होते हैं।

उपलब्ध साहित्य के गहन अध्ययन और अनेक प्राणिशास्त्रियों के साथ निजी पत्र व्यवहार (अप्रकाशित) से पता चला है कि कुत्ता चाहे किसी देश, जाति, नस्ल या रंग-रूप का हो, पूंछ उसकी टेढ़ी ही होती है। यह सार्वभौम सत्य है। लेकिन, लेखकों को आश्चर्य है कि इस दिशा में अब तक नगण्य कार्य किया गया है। आज तक वैज्ञानिकों का ध्यान इस महत्वपूर्ण समस्या की ओर आकर्षित न हो सका कि कुत्ते की दुम (पूंछ) टेढ़ी ही क्यों होती है। इस धारणा पर कि ‘कुत्ते की दुम बारह वर्ष तक नली में रखने के बाद भी टेढ़ी ही रहती है’ अब तक कोई वैज्ञानिक परीक्षण नहीं किया गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी सत्यता प्रमाणित करने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया। सामान्यजन से जुड़े इस प्रश्न के समाधान के लिए लेखकों ने पहली बार प्रयास किया है और अपने परीक्षण के परिणाम इस शोधपत्र में प्रस्तुत किए हैं। इस 12 वर्षीय विशिष्ट अनुसंधान योजना के लिए लेखकों को राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद से कुल 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जिससे आवश्यक उपकरणों और विभिन्न साधनों के अतिरिक्त एक वरिष्ठ तथा एक कनिष्ठ अनुसंधान अधिकारी, दो वरिष्ठ तथा तीन कनिष्ठ तकनीकी सहायकों, एक प्रयोगशाला सहायक, एक पत्रवाहक, एक ड्राइवर तथा चार एनिमल अटेंडेंटों की व्यवस्था की गई।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अनेक वैज्ञानिकों का मत है कि आदमी ने कम से कम 10 हजार वर्ष पहले केनिस फेमिलिएरिस को पालना शुरू किया था। कहा जाता है, कभी मानव भेड़िए के बच्चे पकड़ कर अपनी गुफा में लाया था जो उसके साथ हिल-मिल गए और शिकार के साथी बन गए। बाद में यह प्राणी लगातार स्वामिभक्त बनता गया। (खूंखार भेड़ियों से खून का रिश्ता होने के बावजूद इसमें इतनी स्वामिभक्ति किस ‘जीन’ के कारण और कब आई, यह श्वान प्रजनकों के लिए पृथक शोध का महत्वपूर्ण विषय है।) लेकिन, अब तक इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है कि क्या कुत्तों के मूल जनकों की पूंछें भी टेढ़ी थीं अथवा नहीं। गुफाचित्रों में अब तक हिरन, रेंडियर और सांडों की ही अनुकृतियां देखी गई हैं। कुछ देशों में कुत्तों की जो प्राचीन मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं, उनसे भी इस बारे में कुछ पता नहीं चलता क्योंकि पूंछ बहुत छोटी बनाई गई है।

प्राचीन साहित्य का अवलोकन करने पर लेखकों को इस तथ्य का पता लगा है कि धर्मग्रंथ ‘महाभारता’ में एक ऐसे कुत्ते का उल्लेख किया गया है जो ‘युधिष्ठिर’ नामक व्यक्ति के साथ हिमालय की चोटियों में चढ़ा था और उसके बिना ‘युधिष्ठिर’ ने स्वर्ग जाने से इंकार कर दिया था (ब्राउन, 1814, हम्फ्री, 1880), लेकिन उसकी पूंछ के स्वरूप के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसी प्रकार एक और रिलीजियस बुक ‘रामचरितमानस’ में तुलसीदास ने नवयुवकों, इंद्र और कुत्तों में एक समानता बताई है। लेकिन, इंद्र और नवयुवकों में किसी की भी दुम नहीं होती है (ब्राउन, 1809, प्रूथी 1813),, जिसे वे हिला सकें या जो टेढ़ी हो। इसलिए लेखक इस मत से सहमत नहीं हैं। उधर प्राचीन रोम में रीबिगल देवता को प्रसन्न करने के लिए कुत्ते की बलि दी जाती थी, ऐसा पता लगा है (डेविडसन, 1923)।

चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में इस प्राणी पर किए गए अनगिनत प्रयोगों का उल्लेख मिलता है। 60 वर्षीय ब्राउन-सेक्वार्ड (1889) ने इसके महत्व का उल्लेख किया। उसने इसके वृषणों के सत की सुई लगाकर पुनर्योवन पाने की घोषणा की थी। प्रो. नोनिन, मिंकोवस्की और मेरिंग (1889) ने इसकी पाचनक्रिया पर प्रयोग किए, मगर बरामदे में एक प्रयोगाधीन श्वान के मूत्र पर भिनभिनाती मक्खियां देखकर उसमें चीनी का पता लगा डाला। मगर केनिस फेमिलिएरिस पर सर्वाधिक प्रयोग रूसी शरीर-क्रिया विज्ञानी इवान पैत्रोविच पावलोव (1872-1888) ने किए। पावलोव (1888) ने अपने प्रारंभिक परीक्षण इसकी पाचन प्रणाली पर केंद्रित किए। उसने कुत्ते की आंत से एक नली जोड़ दी और उसके सामने मांस दिखा कर पाचनतंत्र में पैदा होने और नली के जरिए बूंद-बूंद टपकते पाचक रसों का पता लगाया। उसने यह भी सिद्ध किया कि खाने की घंटी बजने या खाना परोसने वाले की मात्र पदचाप से भी कुत्ते के पेट में पाचक रस पैदा होने लगते हैं। (पावलोव, 1902)।

इस विशिष्ट प्रयोग में न केवल कुत्ते वरन मानव की पाचन क्रिया पर तो प्रकाश पड़ा, लेकिन पूंछ पर प्रकाश डालने में ये वैज्ञानिक भी असमर्थ रहे। यह बात अलग है कि पाचन पर किए गए प्रयोगों के लिए पावलोव को सन् 1904 का नोबेल पुरस्कार दिया गया। रूस में ही एक कुत्ते पर दो सिर जोड़ने के सफल प्रयोग भी किए गए। कनाड़ा में बैंटिंग तथा बैस्ट (1920) ने केनिस फेमिलिएरिस की पेंक्रिएज नामक ग्रंथि पर कार्य करके इंसुलिन की खोज की, जिससे डायबिटीज के मूल कारण का रहस्योद्घाटन हो सका। इस खोज के लिए उन्हें सन् 1923 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके बावजूद पूंछ के वक्र होने के कारण अंधकार में ही पड़े रहे।

इसके बाद अंतरिक्ष संबंधी प्रयोगों में इस प्राणी का उपयोग किया गया। अनेक कुत्तों पर भारहीनता, गुरुत्वाकर्षण आदि के प्रभावों का गहन अध्ययन किया गया। लाइका नामक एक कुतिया को स्पुतनिक-2 नामक उपग्रह में 3 नवंबर 1957 को प्रथम बार अंतरिक्ष में भेजा गया। लेखकों को आश्चर्य है कि केनिस फेमिलिएरिस पर इतना अनुसंधान होने के बावजूद इसकी पूंछ का प्रश्न फिर भी अछूता ही रहा।

उपलब्ध साहित्य के गहन अध्ययन से केवल एक संदर्भ का पता चलता है, जिसमें इस प्राणी की पूंछ पर ध्यान देने का प्रयास किया गया है। ज़ार के जमाने में रूस के चेलम नामक स्थान में (जो हमारे देश के शिकारपुर की तरह विख्यात है) लेयाक बिन लेकीश नामक एक दार्शनिक थे। उनसे यह पूछने पर कि कुत्ता अपनी दुम क्यों हिलाता है, जवाब मिला- क्योंकि उसका शरीर दुम की तुलना में अधिक ताकतवर है। अगर ऐसा नहीं होता तो जरूर दुम कुत्ते को हिलाती।

लेकिन, दुम टेढ़ी होने की समस्या यहां भी अछूती रह गई। इसीलिए लेखकों को आम आदमी की जिज्ञासा के विशेष संदर्भ में इस सार्वभौम समस्या पर विश्व में पहली बार अनुसंधान करने का श्रेय प्राप्त है।

सामग्री एवं विधि

इस अध्ययन के लिए निम्नलिखित सामग्री का उपयोग किया गयाः

कुत्ते के पिल्ले 40 (देशी 15, अलसेशियन 5, स्पेनियल 5, टैरियर 5, ग्रेटडेन 5, बुलडाग 5 ), लोहे की जंजीरें 40, प्लेटें 40, जलपात्र 40, चिलमचियां 40, बांस की नलियां 15, तांबे की नलियां 5, स्टील की नलियां 10, वर्नियर कैलिपर्स 5, एक किलो तक के विभिन्न बांट, पैमाने 10, एप्रन 10, रिकार्ड बुक, लेखन सामग्री आदि। इसके अतिरिक्त 40 पैराम्बुलेटर भी खरीदे गए। उनका उपयोग पिल्लों के लिए किया गया क्योंकि पिल्ले बड़े होने तक नलियों को संभालने में असमर्थ थे। अतः पैराम्बुलेटरों में उचित व्यवस्था की गई। कुत्तों को मौसम के कुप्रभावों से बचाने के लिए एक वातानुकूलित प्रयोगशाला का निर्माण किया गया। व्यय में यथासंभव कमी करने के लिए प्रयोगशाला के ही कुछ कमरों का वैज्ञानिकों एवं अन्य कर्मचारियों के बैठने हेतु उपयोग कर लिया गया, जिससे पृथक कार्यालय का भारी खर्चा बचाया जा सके।

प्रयोग के आरंभ में ही पिल्लों को 6 समूहों में बांट दिया गया जो इस प्रकार हैं-

10 पिल्लों की दुम में बांस की नली,

10 पिल्लों की दुम में स्टील की नली,

5 पिल्लों की दुम में तांबे की नली

5 पिल्लों की दुम में आवश्यक वजन लटकाया

5 पिल्लों का पुच्छ विच्छेदन, तथा

5 पिल्ले तुलना के लिए सामान्य रूप से बढ़ने दिए गए।

पिल्लों की पूंछ में नलियां पहना दी गईं। उन्हें पैराम्‍बुलैटरों में घुमाया गया और आवश्यकता पड़ने पर नलियों को हाथ से सहारा देकर कमरों में घूमने-फिरने की सुविधा भी प्रदान की गई। पूंछविहीन अवस्था का अध्ययन करने के लिए 5 पिल्लों की पूंछें काट दी गईं। नली के बजाय पूंछ सीधी करने के लिए आवश्यक भार के मीट्रिक बांट लटकाए गए। पांच पिल्ले बिल्कुल सामान्य रूप से बढ़ने दिए गए। सभी पिल्लों को दिन में दो बार दूध, चपाती व मांस और तीन बार पानी दिया जाता रहा। उनके स्वास्थ की नियमित रूप से जांच की जाती रही और प्रतिदिन शरीर का तापमान, रक्तदाब, नाड़ी हृदय की धड़कनों तथा सांस लेने की गति और त्वचा की संवेदनशीलता के आंकड़ें रिकार्ड किए जाते रहे। एक बार मांस और दो बार दूध में किसी खराबी के कारण कुत्ते बीमार पड़ गए थे, जिन्हें उचित देखभाल से ठीक कर लिया गया। लेकिन, आश्चर्य इस बात का है कि कुत्तों के साथ ही प्रयोगशाला के सभी कर्मचारी भी बीमार पड़ गए थे। इस संबंध में बाद में काफी सावधानी बरती गई।

परिणाम

12 वर्ष की अवधि पूरी होने तक केवल 11 कुत्ते जीवित रहे। 29 में से 10 कुत्ते पेचिस, 5 कुत्ते रेबीज और 14 कुत्ते अज्ञात कारणों से मर गए (हो सकता है यह कुत्तों का कोई अज्ञात मगर महत्वपूर्ण रोग हो, इस पर गहन अनुसंधान की आवश्यकता है)। 11 जीवित कुत्तों में से 2 बांस की नली वाले, 2 स्टील की नली वाले, 2 तांबे की नली वाले, 1 वजन वाला, 2 दुमकटे और 2 सामान्य रूप से बढ़े हुए कुत्ते थे।

12 वर्षों की अवधि में इनका रक्तचाप, हृदय की धड़कनें, सांस और नाड़ी की गति कभी सामान्य और कुछ अवसरों जैसे छेड़ने, मांस देखने या एक-दूसरे पर झपटने में असामान्य रही। पुच्छ- विच्छेदन के समय दिल की धड़कनें बहुत तेज हो गईं।

ठीक 12 वर्ष बाद 6 कुत्तों की पूछें नलियों में से बाहर निकालने पर कुत्तों के आकार के अनुसार उनकी मोटाई और लंबाई में पर्याप्त वृद्धि पाई गई और नली के बाहर निकलते ही पूंछें सामान्य रूप से टेढ़ी हो गईं। इसके साथ ही प्रयोगाधीन कुत्तों का व्यवहार भी सामान्य पाया गया क्योंकि शोधकर्त्ताओं को देखते ही वे सामान्य रूप से अपनी दुमें हिलाने लगे।

निष्कर्ष

उक्त 12 वर्षीय प्रयोग के परिणामों का विश्लेषण करने से सिद्ध होता है कि केनिस फेमिलियेरिस अर्थात् कुत्ते की पूंछ को 12 वर्ष तक नली में रखने पर भी (भले ही नली बांस की हो अथवा धातु की) वह टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है।

आभार

इस महत्वपूर्ण  अनुसंधान योजना को स्वीकृत कर आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए लेखक राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद के प्रति अत्यंत आभार प्रकट करते हैं। इस दीर्घकालीन प्रयोग के मार्गदर्शन तथा साहस बढ़ाने के लिए तथा विभिन्न देशों के कुत्तों का अध्ययन करने के लिए विदेश यात्रा की स्वीकृति देने हेतु हम अपने राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान के निदेशक महोदय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। विभागीय तथा अनुभागीय स्तर पर कार्य की सुविधा प्रदान करने के लिए हम विभागाध्यक्ष तथा अनुभागाध्यक्ष महोदय के आभारी हैं। हमारे विभागीय सहयोगियों के बहुमूल्य सहयोग के बिना यह कार्य हो ही नहीं सकता था। और, इस अनुसंधान आलेख की पांडुलिपि को फेयर तथा टाइप करने में अपनी गृहणियों से मिले अमूल्य सहयोग (घर के सभी कार्यों के अतिरिक्त!) के लिए हम व्यक्तिगत स्तर पर आभार प्रकट करते हैं।

भाषा नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी : बिष्ट

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

कवयित्री देवकी मेहरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार से सम्मानित करते हुए।

अल्मोड़ा : ‘कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ और ‘पहरू’ पत्रिका ने संयुक्त रूप से 12, 13, व 14 नवम्बर को आठवाँ ‘राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मलेन’ जिला पंचायत सभागार, अल्मोड़ा में आयोजि‍त कि‍या। इसमें दिल्ली, लखनऊ, संभल, सहारनपुर, चंदौसी, फरीदाबाद, देहरादून और कुमाऊँ मंडल के सभी जिलों से आए हुए लगभग 160 कुमाउनी के साहित्यकारों और कुमाउनी भाषा प्रेमियों ने भागीदारी की।

सम्मेलन में कहानी, कविता, गीत, लेख, हास्य, रिपोर्ताज, शब्दचित्र आदि विधाओं की कुल 10 पुस्तकों का लोकार्पण किया गया।

इस बार देवकी महरा को शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार, खुशाल सिंह खनी को बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार, त्रिभुवन गिरि को शेर सिंह मेहता स्मृति कुमाउनी उपन्यास लेखन पुरस्कार तथा त्रिभुवन गिरि, श्याम सिंह कुटौला व पवनेश ठकुराठी को प्रेमा पंत स्मृति कुमाउनी खण्ड काव्य लेखन पुरस्कार प्रदान किया गया। कुमाउनी भाषा में हर विधा में साहित्य तैयार करने के लिए कुमाउनी भाषा प्रेमियों द्वारा दी गई आर्थिक मदद से चलाई जा रही लेखन पुरस्कार योजनाओं के अन्तर्गत इस वर्ष 21 रचनाकारों की कृतियों को पुरस्कृत किया गया।

सम्मेलन में हर वर्ष कुछ बुजुर्ग रचनाकारों को ‘कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान’, कुछ भाषा प्रेमियों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा कुछ संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से भी सम्मानित किया जाता है। इस वर्ष भी नौ लोगों को कुमाउनी साहित्य सेवी सम्मान, पांच लोगों को ‘कुमाउनी भाषा सेवी सम्मान’ तथा चार संस्कृतिकर्मियों को ‘कुमाउनी संस्कृति सेवी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

ज्ञातव्‍य है कि‍ 13, 14, व 15 नवम्बर 2009 को अल्मोड़ा के कुन्दनलाल साह स्मारक प्रेक्षागार में पहला तीन दिवसीय ‘कुमाउनी भाषा सम्मेलन’ आयोजित किया गया था। तब से अब तक हुए सम्मेलनों में नि‍म्‍न प्रस्ताव पारित किए गए हैं- 1. कुमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए

  1. उत्तराखण्ड में स्कूली पाठ्यक्रम में कुमाउनी भाषा को एक विषय के रूप में शामिल किया जाए
  2. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड में ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ गठित की जाए
  3. अल्मोड़ा नगर के सांस्कृतिक, साहित्यिक राजधानी स्वरूप को देखते हुए ‘कुमाउनी भाषा अकादमी’ का मुख्यालय अल्मोड़ा में बनाया जाए
  4. उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कुमाउनी भाषा के आदि कवि गुमानी पंत जी की याद में कुमाउनी भाषा रचनाकारों के लिए समग्र योगदान पर एक लाख रुपये के सालाना पुरस्कार की घोषणा की जाए
  5. उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद वर्ष 2009 से आज तक के सालाना पुरस्कारों की एकमुश्त घोषणा की जाए
  6. कुमाउनी भाषा के विकास के लिए उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पांच करोड़ धनराशि का एक कोष बनाया जाए। इसमें से रचनाकारों को पुरस्कृत-सम्मानित करने की योजना बनाई जाए
  7. कुमाउनी भाषा के रचनाकारों को किताब छपवाने के लिए अनुदान दिया जाए
  8. कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा द्वारा कसारदेवी में प्रस्तावित ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ के सभागार, पुस्तकालय आदि निर्माण हेतु शासन स्तर से अनुदान दिया जाए
  9. कुमाउनी भाषा के तीन बुजुर्ग और नामी कवियों शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, चारुचन्द्र पाण्डे व वंशीधर पाठक ‘जिज्ञासु’ को उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा सम्मान योजना में इसी बार ‘गुमानी पंत सम्मान’ या उससे भी बड़े सम्मान से सम्मानित किया जाए
  10. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा कुमाउनी रचनाकारों को दिए जाने वाले सम्मानों में कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण रचनाकारों गौरीदत्त पाण्डे ‘गौर्दा’, शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ व बालम सिंह जनौटी के नाम पर सम्मान का नाम रखा जाए
  11. अगले वर्ष सन् 2012 से समिति द्वारा कुमाउनी भाषा के महत्वपूर्ण कहानीकार स्व. बहादुर बोरा ‘श्रीबंधु’ कुमाउनी कहानी पुरस्कार दिया जाएगा
  12. उत्तराखण्ड सरकार के उपक्रम ‘ उत्तराखण्ड हिन्दी अकादमी’ व ‘उत्तराखण्ड भाषा संस्थान’ में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, निदेशक मंडल (कार्यकारिणी) में साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  13. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा हर साल कुमाउनी साहित्यकारों को पुरस्कार/सम्मान और किताब छापने के लिए आर्थिक मदद दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। पुरस्कार/सम्मान तथा पुस्तक प्रकाशन सहायता के लिए अलग-अलग चयन समितियों का गठन किया जाए और इन चयन समितियों में कुमाउनी भाषा के साहित्यकारों को शामिल किया जाए
  14. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में वर्तमान में मात्र दस-पंद्रह हजार रुपये स्वीकृत किए जा रहे हैं, जो कि बहुत कम हैं। इतनी कम धनराशि में पुस्तक प्रकाशन संभव नहीं हैं। अतः पुस्तक प्रकाशन सहायता के रूप में कम से कम पच्चीस हजार रुपये की धनराशि का प्रावधान किया जाए।

सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में आधार व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जाने-माने इतिहासकार ताराचन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि कुमाउनी भाषा तभी बच सकती है, जब यहाँ के बच्चे, युवा और आम जन इसका प्रयोग निरन्तर दैनिक बोलचाल में करेंगे। यदि इसे हमारी नई पीढ़ी उपयोग में नहीं लाती है तो फिर इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज करने की माँग की भी कोई सार्थकता नहीं रह जाएगी। अतः अपनी भाषा व संस्कृति को बचाने के लिए हमें सरकारों की ओर देखते रहने के बजाए स्वयं अधिक से अधिक प्रयत्न करने चाहिए। हमें सालभर विद्यार्थियों के बीच जाकर जगह-जगह अनेक ऐसे कार्यक्रम करने चाहिए, जिससे उनमें कुमाउनी भाषा के प्रति रुचि जाग्रत हो। फिर बच्चों को साल में एक बार होने वाले इस तरह के बड़े सम्मेलन में अवश्य बुलाया जाना चाहिए। भविष्य में हमारे सम्मेलनों में नई पीढ़ी की अधिकाधिक उपस्थिति बेहद जरूरी है।

डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट का कहना था कि भाषा का सवाल बहुत महत्वपूर्ण सवाल है, क्योंकि हमारी भाषा ही नहीं रहेगी तो हमारी पहचान भी लुप्त हो जाएगी। आज जब उत्तराखण्ड राज्य बने सोलह साल बीत चुके हैं, तो यह अत्यंत शोचनीय स्थिति है कि हम आज भी अपने ही राज्य में अपनी पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। पिछले इन सोलह सालों में हमारी कोई पहचान ही नहीं बन पाई है। उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई इसलिए लड़ी गई थी कि हमारा अस्तित्व बचा रहे और हमारी पहचान बनी रहे। कुछ विधायक, सांसद व मंत्री बना दिए जाने मात्र से हमारी पहचान नहीं बन सकती। हमारी पहचान तभी बनेगी, जब यहाँ के निवासियों की जिन्दगी और यहाँ की प्रकृति बची रहेगी तथा सामान्य जन को आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साधान उपलब्ध होंगे। आज जब हमारे जीवन की सारी चीजों को राजनीति ही तय कर रही है तो ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट करने और आम जनता की घोर उपेक्षा करने वाली राजनीति पर सवाल उठाने के साथ-साथ जनहित की राजनीति को स्थापित करना भी बहुत जरूरी है।

उन्होंने उपस्थित साहित्यकारों का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि केवल ढेरों रचनाएँ लिखने और प्रकाशित करते चले जाने से कोई विशेष बात नहीं बनती है। असली सवाल रचनाओं की दृष्टिसम्पन्नता और उत्कृष्टता का है। यदि हमारे द्वारा लिखी जा रही रचनाओं में बहुसंख्यक जनता के जीवन से जुड़े यथार्थ की सच्ची अभिव्यक्ति न हो पाए तो लोग ऐसे साहित्य को पढ़ेंगे भी नहीं। अतः आज ऐसा साहित्य लिखे जाने की आवश्यकता है जो वर्तमान जीवन की प्रमुख समस्याओं और उनके समाधान की सही समझ विकसित करने के साथ ही पाठक में एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए सक्रिय होने की प्रेरणा भी जगा सके।

पी.सी. तिवारी ने कहा कि समाज को दिशा तो अन्ततः राजनीति ही देती है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद कितनी जमीन हमसे छिन गई, हमें इसके बारे में भी बात करनी पड़ेगी। अपनी कृषि भूमि, अपनी जमीन बचाने की बात मुख्य है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकारों द्वारा उद्योगपतियों व पूँजीपतियों को जिस तरह यहाँ की जमीन को कौड़ी के भाव दे दिए जाने का सिलसिला जारी है, क्या इससे हमारा सरोकार नहीं होना चाहिए। अपनी बोली-भाषा बचाने के लिए अपना परिवेश बचाना चाहिए, अपनी जमीन बचानी चाहिए, क्योंकि हमारा परिवेश बचेगा तो हमारी भाषा भी बचेगी। अतः भाषा के संकट पर सोचते हुए इसके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अन्तर्सम्बन्ध पर भी अवश्य विचार किया जाना चाहिए। जब तक हम गाँवों को अधिकार नहीं देंगे, विकेन्द्रित व्यवस्था नहीं बनाएंगे, तक तक मुकम्मल तौर पर भाषा के संकट को भी हल नहीं किया जा सकता।

सम्‍मेलन में यह भी एक महत्वपूर्ण बात रही कि सरकारों द्वारा कुमाउनी भाषा के विकास और इसके रचनाकारों की माँगों के संदर्भ में अपेक्षित सहयोग न किए जाने से नाराज होकर, ताराचन्द्र त्रिपाठी जी के सुझाव पर, सम्मेलन में उपस्थित लोगों ने समिति द्वारा कसारदेवी में निर्मित किए जा रहे ‘कुमाउनी भाषा संस्थान’ हेतु लगभग दो लाख रुप जमा किए जाने की घोषणा की।

ज्ञातव्य है कि‍  ‘जब भाषा बचेगी, आगे बढ़ेगी तभी हमारी संस्कृति भी बचेगी, वह भी आगे बढ़ेगी’ इसी सोच के तहत संस्कृति को बचाने के लिए भाषा को बचाना जरूरी समझते हुए सन् 2004 में ‘कुमाऊंनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति’ कसारदेवी, अल्मोड़ा के नाम से संस्था का गठन कराया गया था। फिर भाषा के विकास के लिए उसे बोलना, उसमें लिखना-पढ़ना जरूरी समझते हुए लिखने-पढ़ने का माहौल बनाने के लिए तथा कुमाउनी भाषा में साहित्य की हर विधा में लेखन को बढ़ावा देने के लिए नवम्बर, 2008 से कुमाउनी मासिक पत्रिका ‘पहरू’ का प्रकाशन शुरू किया गया। तब से यह पत्रिका लगातार नियमित रूप से निकल रही है और अक्टूबर 2016 तक इसके 96 अंक प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें 600 कुमाउनी रचनाकारों की रचनाएँ प्रकाशि‍त हो चुकी हैं और वर्तमान में लगभग 800 रचनाकार कुमाउनी में लिख रहे हैं।

संस्था द्वारा कहानी, कविता, बाल कविता, जनगीत, लोकगीत, जीवनी, यात्रावृत्तांत, उपन्यास, नाटक, देवगाथा आदि विधाओं की 29 कुमाउनी पुस्तकें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।

पहले राष्ट्र, फिर विश्व : प्रेमपाल शर्मा

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विश्व हिन्दी दिवस, विश्व हिन्दी सम्मेलन, विश्व गुरु जैसे शब्द बार-बार सुनते हुए मन में बेचैनी भी पैदा करने लगे हैं कि आखिर कब तक हम दुनिया को ऐसे प्रमाण पत्र दिखाने और उनसे शाबासी लेने के लिए समारोह, सेमिनार आयोजित करते रहेंगे? किसी वक्त 1975 में जब विश्व हिन्दी सम्मेलन का भाव पहली बार जगा था तो हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं के लिए दरवाजे खुलने की दस्तक हो रही थी। संविधान, संसद की आवाज सुनते हुए और दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाड़ु आदि राज्‍यों के डर और हिन्‍दी लादने के खिलाफ आक्रोश को भांप कर कुछ-कुछ बीच का रास्ता अख्तियार किया गया था। जैसे पहले इन पन्द्रह-बीस वर्षों में हिन्दी में अनुदित साहित्य उपलब्ध कराया जाएगा, प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण के कदम उठाये जाएंगे जिससे कि हिन्दी अंग्रेजी का स्थन राष्ट्रीय स्तर पर धीरे-धीरे ले सके। शब्दावली आयोग, अनुवाद ब्यूरो, राज्यों में हिन्दी ग्रंथ अकादमियां, संसदीय समिति सभी अपने-अपने स्‍तर पर सक्रिय थे। महत्‍वपूर्ण बात यह भी आजादी दिलाने वाली और उन आदर्शों में डूबी, दबी पीढ़ी राममनोहर लोहिया, टंडन, जयप्रकाश नारायण, आयंगर, सेठ गोविन्द दास जैसों की राष्ट्रीय स्वीकृति और हिन्दी के प्रति एक संतुलित दृष्टि भी धीरे-धीरे सरकार और जनमानस को हिन्दी की तरफ मोड़ रही थी। इसका प्रमाण है कि‍ पहले शिक्षा आयोग (1964-66) की सिफारिशों में और फिर संघ लोक सेवा आयोग की सर्वोच्‍च परीक्षा में वर्ष 1970 से निबंध में अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्‍दी में भी लिखने की छूट देना। संसद की बहसों में भी अपनी भाषा के प्रति उत्‍साह और समन्‍वय देखा जा सकता है। स्‍वाभाविक ही था कि इस उत्‍साह को विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन के रूप में विश्‍व पटल तक ले जाया जाए।

लेकिन हिन्‍दी को आगे बढ़ाने की कहानी का विश्‍लेषण कई किन्‍तु-परन्‍तु के साथ रुक-रुक कर चलता है। विश्व सम्मेलन तो धडा़धड़ नियत अंतराल पर धूमधाम से हो रहे हैं, लेकिन क्या हिन्दी देश के प्रशासन, शासन, शिक्षा, न्यायालय में भी उसी गति से बढ़ रही है? या बिल्कुल उल्टा हो रहा है कि विश्व भाषा बनाने, संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकृत भाषा की मांग और दुहाई तो बार-बार भाड़े के नारों की तरह दी जाती है, लेकिन अपने देश की न्याय व्यवस्था से लेकर शिक्षा, प्रशासन में हिन्‍दी प्रयोग की बातें सिर्फ हिन्‍दी अधिकारियों के हवाले छोड़कर हम मुक्ति पा लेते हैं। पहली बार जनता सरकार में विदेश मंत्री बने अटल बिहारी बाजपेयी का संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ में हिन्‍दी में दिया ओजपूर्ण भाषण कुछ वर्षों तक तो लोगों को अनुप्रमाणित करता रहा, लेकिन अपनी संस्‍थाओं में ‘हिन्‍दी के प्राण’ स्थाई तौर वह भाषण भी भर नहीं पाया। हकीकत तो यह है कि 1990 आते-आते सत्‍ता अंग्रेजी की देहरी पर घुटने टेकने के लिए पहुंच चुकी थी। उसके बाद आये उदारीकरण और वैश्‍वीकरण के सपने ने तो हिन्‍दी समेत भारतीय भाषाओं पर ऐसा पाटा मारा कि हिन्‍दी विश्‍व में तो तथाकथित दावे करती घूम रही है, सम्‍मेलनों में भी हिन्‍दी के नाम पर खाने-पकाने वाले सपूत गर्व से फूले फिरते हैं, लेकिन अपने देश के साहित्‍य, मानविकी, शिक्षा, चिंतन पुस्‍तकालय में एकदम सूखा पड़ चुका है। सन् 1980 तक विद्वानों की मूल हिन्‍दी में लिखी दर्जनों मशहूर किताबें- इतिहास, राजनीति शास्‍त्र, मनोविज्ञान की मिल जाएंगी, उसके बाद श्‍यामाचरण दुबे, कृष्‍ण कुमार जैसे एकाध विद्वान को छोड़कर शायद ही मिले। वर्ष 1979 में डॉ. दौलत सिंह कोठारी समिति की सिफारिशों को लागू करते हुए संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में अपनी भाषाओं के माध्‍यम की छूट देना भी भारतीय भाषाओं के स्‍वर्ण काल की तरफ बढ़ता पहला कदम था, लेकिन पता नहीं फिर क्या दुरभि संधियां हुई कि केवल अंग्रजी सबको पीछे छोड़ती हुई आगे आ रही है।

कुछ उदाहरण पर्याप्‍त होंगे। हाल ही में घर पर एक कामगार का अनुभव। शाम को उसने कुछ जल्‍दी जाना चाहा। क्‍यों? मुझे लौटने पर अपने बच्‍चे को लेना है, दिल्‍ली के एक टयूशन केन्‍द्र से। उसने खुश होकर बताया कि पूर्वी दिल्‍ली के एक नामी स्‍कूल में उसके बच्‍चे का आर्थिक कमजोर बच्‍चे (EWS) के आरक्षण में दाखिला हो गया है। लेकिन उसकी शिक्षिका कहती है कि इसकी अंग्रेजी कमजोर है। अत: इसको अंग्रेजी का टयूशन दिलाओ। पहली कक्षा से ही अंग्रेजी का यह आतंक धीरे-धीरे पूरे देश को ही अपनी गिरफ्त में ले रहा है। दिल्‍ली का मुखर्जीनगर इलाका गवाह है कि कर्मचारी चयन आयोग, संघ लोक सेवा आयोग से लेकर बैंक, लॉ, यूनिवर्सिटी में सफलता के लिए अंग्रेजी कितनी महत्‍वपूर्ण है। अपनी भाषा आये या न आये यदि अंग्रेजी आती है तो नौकरी पक्‍की। फिर हिन्‍दी की किताब क्‍यों पढ़ें?

भला हो मोदी सरकार का कि पुरानी कांग्रेस सरकार के निर्णय को उलटते हुए सिविल सेवा परीक्षा के जिस प्रथम चरण (सीसैट) में वर्ष 2011 में अंग्रेजी घुसा दी गई थी, उसे निकाल दिया गया है। यहां यह उल्‍लेख करना जरूरी है कि जनता सरकार के दौरान वर्ष 1979 से लेकर 2010 तक कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुपालन में सीसैट की प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी नहीं थी, लेकिन यूपीए की अंग्रेजीदां सरकार ने बिना संसद को विश्‍वास में लिए बिना किसी महत्‍वपूर्ण विमर्श के अंग्रेजी को सीसैट की आड़ में लाद दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि हिन्‍दी भाषी राज्‍यों समेत समस्‍त भारतीय भाषाओं के जिन सफल उम्‍मीदवारों की संख्‍या 15 से 20 प्रतिशत होती थी, घटकर पांच प्रतिशत से भी कम हो गई। प्रधानमंत्री के हस्‍तक्षेप, न्‍यायालय की सक्रियता और बिहार, उत्‍तर प्रदेश के उम्‍मीदवारों के आंदोलन से भारतीय भाषाओं की जीत हुई और फिर से सफल उम्‍मीदवारों का प्रतिशत बढ़ रहा है।

लेकिन विश्‍व दिवस को सामने रखते हुए क्‍या इसे जीत माना जा सकता है? हरगिज नहीं। इतनी चौकियां तो हमारे पास सत्‍तर के दशक यानी 1979 तक ही आ गयी थीं। कोठारी समिति ने तो यह भी कहा था कि सभी सिविल सेवाओं में भारतीय भाषाओं को माध्‍यम बनाया जाए। फिर क्‍या हुआ? क्‍या भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, आर्थिक सेवा, सम्मिलित चिकित्‍सा सेवा आदि दर्जनों केन्‍द्रीय सेवाओं में हिन्‍दी आज तक प्रवेश कर पायी? क्‍यों हमारे हिन्‍दी के दिग्‍गज, लेखक, प्राध्‍यापक, पत्रकार, राजनेता केवल विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन की ही वाट जोहते हैं? वक्‍त आ गया है कि हम नौकरि‍यों और शिक्षा में स्‍कूलों से लेकर विश्‍वविद्यालय तक अपनी भाषा के प्रवेश के लिए पूरे जोर से संघर्ष छेड़ दें। उम्‍मीद भरा आकाश मौजूदा सरकार है, जिसका प्रधानमंत्री केरल से कश्‍मीर तक केवल हिन्‍दी में ही अपनी बात सहजता से कहता है- बिल्‍कुल गांधी, लोहिया कि परंपरा में कि भाषा के बिना लोकतंत्र गूंगा है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी का मानस हिन्‍दी या अपनी भारतीय भाषाओं से बहुत दूर था। इसका प्रमाण हाल ही में शिक्षाविद कृष्‍ण कुमार के आलोचना में छपे उस लेख से भी मिलता है, जब नेहरूजी निराला, महादेवी वर्मा के लेखन साहित्‍य को जानने से भी इंकार करते हैं। यहां विस्‍तार में जाने की आवश्‍यकता नहीं है न छिद्रान्वेशन और अतीत राग  की, लेकिन भारतीय भाषाओं के डूबने की पीठिका देश पर हावी उस सत्‍ता और उसके परजीवी लेखकों, बुद्धिजीवियों के उस दौर में मौजूद है, जिसके चलते हिन्‍दी पट्टी का अंतिम जन खस्‍ता हाल जिंदगी जीने को मजबूर है। न उसकी लिखी किताबें कोई पढ़ता, खरीदता न उसे समाज में उसकी कोई हैसियत। विचारणीय प्रश्‍न है कि पहले हिन्‍दी को राष्‍ट्र में स्‍थापित करें, फिर विश्‍व में। पुराना जुमला याद आता है- लोकल इज़ ग्‍लोबल यानी जो स्‍थानीय है वही वैश्विक है। विश्‍व से पहली देश में हिंदी को लाना होगा।