विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें...

[caption id="attachment_8440" align="alignleft" width="245"] विवेक भटनागर[/caption] लगभग तीन दशक से साहित्य में सक्रिय विवेक भटनागर हिंदी ग़ज़ल के ...

जरूरत नहीं है दुखहरण मास्टर की: संज...

[caption id="attachment_8429" align="alignleft" width="336"] संजीव ठाकुर[/caption] हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन की एक कविता में सुरती खाते...

थारू समाज- एक समृद्ध विरासत का शोकग...

[caption id="attachment_8415" align="alignleft" width="640"] थारू समाज की महि‍लाओं से बात करते अवैद्यनाथ दुबे।[/caption] कहने को तो अन्य आदिवासी सम...

गुम चोट : रेखा चमोली...

[caption id="attachment_8402" align="alignleft" width="385"] रेखा चमोली[/caption]  नीलिमा हतप्रभ है। उसे समझ नहीं आ रहा, यह सब क्या हो रहा है। सीमा...

कविता

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

[caption id="attachment_8333" align="alignleft" width="191"] चि‍त्र: अनुप्रि‍या[/caption] कि‍ताब काले अक्षर की माला में गूंथा हुआ जवाब हू...

कहानी

गुम चोट : रेखा चमोली

[caption id="attachment_8402" align="alignleft" width="385"] रेखा चमोली[/caption]  नीलिमा हतप्रभ ...

गजल

विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें

[caption id="attachment_8440" align="alignleft" width="245"] विवेक भटनागर[/caption] लगभग तीन दशक से साहित्य में सक्रिय विवेक भटनागर हिंदी...

परिक्रमा

दिल और सोच को छूने वाली हैं गौहर रज़ा की कवितायें : अनामिका

[caption id="attachment_8445" align="alignleft" width="640"] 'खामोशी' का लोकार्पण करतीं शर्मिला टैगोर और अन्‍य अति‍थि‍गण।[/caption] नई दि...

बच्चों की करामात

बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

साहित्यकार संजीव ठाकुर का लेखन प्रौढ़ एवं बाल पाठकों में समान रूप से समादृत है। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे निरंतर प्रकाशित द...

दिल और सोच को छूने वाली हैं गौहर रज़ा की कवितायें : अनामिका

‘खामोशी’ का लोकार्पण करतीं शर्मिला टैगोर और अन्‍य अति‍थि‍गण।

नई दिल्ली : कवि और सुपरिचित फिल्मकार गौहर रज़ा की सद्य प्रकाशित नज़्म पुस्तक ‘खामोशी’ का लोकार्पण 9 सि‍तंबर को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ। इसका लोकार्पण जानी-मानी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने किया। इस अवसर पर हिंदी के प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी ने कहा कि कविता एक तरह की ज़िद है उम्मीद के लिए और हमें कृतज्ञ होना चाहिए की ऐसी कविता हमारे बीच और साथ में है। उन्होंने कहा कि कविता और राजनीति की कुंडली नहीं मिलती, लेकिन गौहर रज़ा अपनी कविता में जीवन के छोटे-बड़े सभी पहलुओं को जगह देते हैं। कवयि‍त्री  अनामिका ने कहा की गौहर रज़ा की कवितायेँ दिल और सोच को छूने वाली है। सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि विदेश में होने वाली घटनाओं पर भी उनकी कड़ी नज़र है।

शर्मीला टैगोर ने पुस्तक का विमोचन करते वक़्त कहा की गौहर बेबाकी के साथ और बिना डरे नज़्में लिखते हैं और अपना सख़्त से सख़्त वि‍रोध भी हमेशा खूबसूरत ज़बान में लिखते हैं। उन्होंने कहा की गौहर की नज़्में हमारे उस ख़्वाब का हिस्सा हैं, जो हमने आज़ादी के वक़्त देखा था। एक ऐसा समाज बनाने का ख़्वाब जहाँ ख्यालों की विविधता हो, जहाँ बोलने की आज़ादी हो, जहां अपनी तरह से जीने का अधिकार हो। ऐसे वक़्त में जब उम्मीद का दामन तंग लगने लगे, तब गौहर की नज्में हम सब की आवाज़ बन कर हमेशा सामने आयी हैं। शायर गौहर रज़ा ने समारोह में अपनी पुस्तक से कुछ चुनिंदा ग़ज़लें और नज़्में सुनाईं।

आयोजन में आलोचक अपूर्वानंद, कथाकार प्रियदर्शन, पत्रकार कुलदीप कुमार, कथाकार प्रेमपाल शर्मा, क़व्वाल ध्रुव संगारी, सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी, हिन्दू कॉलेज की डॉ रचना सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, अध्यापक और लेखक उपस्थित थे।

विवेक भटनागर की तीन ग़ज़लें

विवेक भटनागर

लगभग तीन दशक से साहित्य में सक्रिय विवेक भटनागर हिंदी ग़ज़ल के प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं। उनकी ग़ज़लें मुख्य तौर पर आम आदमी की पीड़ा से सरोकार रखती हैं, वहीं उनके शे’रों में आध्यात्मिक स्वर भी प्रमुखता से सुनाई पड़ता है। हिंदी अकादमी दिल्ली समेत कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित इस ग़ज़लकार की प्रस्तुत हैं तीन ग़ज़लें

1

आजकल हालात कुछ अच्छे नहीं हैं
सच के पैरोकार ही सच्चे नहीं हैं

आंकड़ों के झुनझुनों का क्या करेंगे
मत हमें बहलाओ, हम बच्चे नहीं हैं

इस नई संवेदना का रूप देखें
नाक ऊंची है मगर कंधे नहीं हैं

हम रियाया हैं मेरे जिल्लेइलाही
हम तुम्हारे ताश के पत्ते नहीं हैं

उन पे है अल्लाह की नज़रे इनायत
जो किसी अल्लाह के बंदे नहीं हैं

हैं हमारी सिरफिरी ख़्वाहिश का बोझा
फूल से बच्चों के ये बस्ते नहीं हैं

वो सफ़र भी क्या सफ़र है, जिस सफ़र में
मंज़िलें तो हैं मगर रस्ते नहीं हैं

2

कोई आए तो रोशनी लेकर
बुझती आंखों की ज़िंदगी लेकर

आसमानों पे आंकड़े मत लिख
आ ज़मीनों पे बेहतरी लेकर

अब ख़ुलूसो-वफ़ा की क्या क़ीमत
क्या करेगा ये आदमी लेकर

एक ही दिल था मेरे सीने में
जा रहा है वो अजनबी लेकर

मैं समंदर हूं, पानियों का हुजूम
फिर भी जीता हूं तिश्नगी लेकर

वस्ल के वक़्त अपनी आंखों में
बैठ जाती हो इक नदी लेकर

जी रहा है विवेक भटनागर
शे’र दर शे’र त्रासदी लेकर

3

सुख़न में हाज़िरी है और क्या
मुहब्बत आपकी है और क्या

मगर से मछलियों की दुश्मनी
सरासर ख़ुदक़ुशी है और क्या

इसी पर टांग दे नेकी-बदी
समय की अलगनी है और क्या

धुएं के साथ गहरी दोस्ती!
हवा भी बावली है और क्या

झुकी नज़रों से सबकुछ देखना
अदा-ए-दिलबरी है और क्या

अभी रफ़्तार की बातें न कर
सड़क यह अधबनी है और क्या

ज़ुबां पर बंदिशें रख दो मगर
नज़र भी बोलती है और क्या

सहाफ़त के बदलते दौर में
ख़बर अब सनसनी है और क्या

तवे पर रक़्स है इक बूंद का
हमारी ज़िंदगी है और क्या

उतरकर ख़ुद में ख़ुद को देख लूं
ये ख़्वाहिश आख़िरी है और क्या

जहाँ मिलता है सुनहरे सपनों को अथाह ज्ञान :डॉ. दीनानाथ मौर्य

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों तथा नागरिकों के साझा मंच द्वारा प्रकाशित ‘शैक्षिक दखल’ पत्रिका का दसवां अंक (जुलाई 2017) स्कूलों की अवधारणा को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ते हुए ‘परम्परागत स्कूलों’ से हटकर कुछ कुछ ऐसे स्कूलों की प्रक्रियाओं को सामने लाता है, जो न सिर्फ नवाचारी स्कूल हैं, बल्कि जहाँ पर यह विश्वास भी व्यवहार में लाया जाता है कि ‘‘स्वतंत्रता, विश्वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शिक्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्र, संवाद और विश्वास चाहता है, तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में…।”

सामाजिक विकास की ऐतिहासिक प्रक्रिया को देखें तो यह साफ़ होता है कि सीखने की सामाजिकता और सामाजिकता को सीखने की प्रक्रिया दरअसल सामाजिक विकास की द्वंदात्मक स्थितियों के आपसी सम्वाद से ही आगे बढ़ी है। इसके लिए ही स्कूल जैसी अवधारणा भी विकसित हुई। किसी भी समाज में स्कूलों की जरूरत क्यों होती है ? स्कूल आखिरकार करते क्या हैं? समाज के बीच स्कूल जैसी अवधारणा क्यों आती है ? इन्हीं सवालों का दूसरा किनारा वह है, जहाँ से यह बात की जाती है कि स्कूल समाज के निर्माण में क्या योगदान देते हैं? जिसे हम शिक्षण कहते हैं, वह सभ्यता के विकास क्रम की वह अवस्था होती है, जहाँ से हम अपने ज्ञान के विस्तार को नया आयाम दे रहे होते हैं- न सिर्फ व्यापकता में, बल्कि उसकी गहरायी के तौर पर भी।

रानीबाग़, नैनीताल उत्तराखंड से निकलने वाली इस पत्रिका के संपादक महेश पुनेठा और दिनेश कर्नाटक है। पत्रिका का यह अंक अपने 20 विचारपरक लेखों को समेटे हुए है। इनमें शिक्षा जगत के नामी-गिरामी हस्तियों, शिक्षाविदों और शिक्षक साथियों के अपने अनुभव भी जगह पा सके हैं। ‘स्कूल कुछ हटकर’ यह पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर लिखा गया एक वाक्य है, जिसमें इस अंक की मूल भावना भी समाहित है। यह अंक कुछ नवाचारी स्कूलों की शैक्षिक प्रक्रियों को केंद्र में रखकर सिखाने और सीखने की पूरी प्रणाली को हमारे सामने लाता है। ये नवाचारी स्‍कूल परम्परागत स्कूलों से सही मायने में कुछ हटकर हैं। ‘बच्चे’ शीर्षक से डॉ. माया गोला वर्मा की कविता है, जो पत्रिका के अन्दर के कवर पर बड़े इत्मीनान से पाठक के शैक्षिक परिप्रेक्ष्य को झकझोरती है… ‘बच्चे को करनी है शरारतें/बच्चे को देखनी हैं चिड़ियाएँ/उड़ानी हैं पतंगें/फूलने हैं गुब्बारे/गाना है गीत/चीखना है/चिल्लाना है/हँसना है जी भरकर… परन्तु/बस्ते के भीतर भरे अथाह ज्ञान में/बच्चा डूब गया है/खुश हैं सब/डूबते बच्चे को देखकर/खुश हैं सब/उसके सुनहरे सपने को मरते देखकर….।’ पत्रिका की मूल भावना क्या है ? ‘अनुरोध’ में संपादक लिखते हैं- ‘बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य प्रदान करना एक लोकतान्त्रिक राज्य का पहला दायित्व है। सार्वजानिक शिक्षा का विशाल ढांचा सुविचारित प्रक्रिया के तहत ढहने के कगार पर खड़ा है। इस गफलत के दौर में यह आवश्‍यक हो जाता है कि हम सब शिक्षा से जुड़े हुए तथा शिक्षा को समाज निर्माण का महत्त्वपूर्ण तत्व मानने वाले लोग शिक्षा के लोकतान्त्रिक, उदार, बहुलतावादी, वैज्ञानिक तथा धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने के लिए आगे आएं। यह पत्रिका इसी दिशा में एक प्रयास है…।’

‘स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास’ शीर्षक सम्पादकीय में महेश पुनेठा का जोर इस बात पर है कि ‘शिक्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो।’ संपादक इस बात से बाखबर भी है कि स्‍कूली शिक्षा में इस शब्द के मायनों को बहुत ही सरलीकृत करके उसकी मूल भावना से अलग करने का प्रयास भी क्या जा सकता है। इसीलिए वह यह भी लिखते है कि ‘स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाए। वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वतंत्रता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है…संवादहीन स्वतंत्रता को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शिक्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।’ स्वत्रंत्रता, संवाद और विश्वास को जैसे मूल्यों को विद्यालय की मूल भावना से जोड़ते हुए पत्रिका का यह अंक कुछ ऐसे स्कूलों की बानगी हमारे सामने पेश करता है, जहाँ नवाचार पूरे विद्यालयी परिवेश में फलता-फूलता है- किसी सैधांतिक अवधारणा के रूप में ही नहीं, व्यावहारिक प्रतिफलन में भी।

फेसबुक आज के समय में वर्चुअल दुनिया का एक ऐसा समाज बन गया है, जहाँ हम अपने विचारों के साथ दूसरे से मिलते-जुलते हैं, बतियाते हैं और समय के सवालों से दो–चार होते हैं। पत्रिका का एक पूरा लेख ही ‘फेसबुक परिचर्चा’ का है। इसमें शिक्षा से जुड़े हुए तमाम बिन्दुओं पर संपादक के साथ विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से की गई बातचीत को संकलित किया गया है। सोशल मीडिया का यह सकारात्मक उपयोग तात्कालिक तौर पर सराहनीय और दीर्घकालिक तौर पर अनुकरणीय है। इसे संवाद की संस्कृति को प्रसारित करने में अहम् भूमिका निभाने वाले कारक के रूप में भी देख सकते हैं। संपादक ने इस तरह के प्रयोग से यह सिद्ध कर दिया है कि ‘विचारों का कभी अंत नहीं होता’ जरूरत उसकी अनन्तता की पहचान की है। कक्षा में अनुशासन को केंद्र में रखकर की गई बातचीत को इस लेख के माध्यम से कई आयामों में समझा जा सकता है। इस विषय पर हेमा तिवारी, अनिल अविश्रांत, मुकेश वशिष्ठ, रणजीत कुमार, जगमोहन कठैत, कमलेश जोशी तथा भाष्कर चौधरी के विचार महत्त्वपूर्ण हैं।

कवियित्री और शिक्षिका रेखा चमोली का आलेख ‘जहाँ बच्चे मनपसंद विषय से अपना दिन शुरू करते हैं’ विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘तोतोचान’ को आधार बनाकर जापान के तोमोए गाकुएन स्कूल की शिक्षण पद्धति को बयाँ करता है। अपने अनुभव को स्कूल की प्रक्रिया से जोडती हुई लेखिका का यह निष्कर्ष है कि- “तोमोए की एक प्रमुख विशेषता थी स्वाभाविकता़। स्कूल चाहता था कि बच्चों के व्यक्तित्व यथासंभव स्वाभाविकता के साथ निखरें।” स्कूल का माहौल और समाज के साथ आपसी रिश्ते की ख़ूबसूरत सहजता ऊपर से शिक्षकों का विद्यार्थियों के साथ साहचर्य का सम्बन्ध ये सब कुछ मिलकर बच्चों को सीखने के जीवंत अनुभव देते थे। यहाँ विशिष्टता का सम्मान भी था और वि‍भिन्नता की कद्र भी थी। तोतोचान स्कूल की शिक्षण प्रक्रिया को समझने के लिए यह आलेख भी अनिवार्यतः पढ़ना चाहिए।

चिंतामणि जोशी का लेख ‘बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना शिक्षा का सार’ उक्रेन, अविभाजित सोवियत संघ के ‘खुशियों का स्कूल’ की कहानी कहता है। स्कूल के संस्थापक वसीली सुखोम्लिंस्खी के विजन को उद्धरित करते हुए लेखक का कहना है कि- ‘स्कूल में चरित्र निर्माण के दौरान इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता था कि ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया में हर बच्चा मानव गरिमा का, गर्व का अनुभव करे। बाल ह्रदय की गहराइयों में पैठना वसीली की शिक्षण विधि का सार था।’ शिक्षा में बाल मनोविज्ञान की व्यावहारिकता के लिए इस आलेख को देखा जाना चाहिए।

तारा चन्द्र त्रिपाठी जिनका शिक्षा के क्षेत्र में लंबा अनुभव रहा है, का साक्षात्कार भी इस अंक की ख़ूबसूरती है। एक शिक्षाकर्मी की हैसियत से वे विभिन्न मुद्दों पर दर्शक की भांति अपनी राय नहीं देते होते हैं, बल्‍कि‍ भागीदार होकर चीजों को जानने और समझने का अनुभव उनके साक्षात्कार में दिखायी पड़ता है। ‘शैक्षिक दखल’ के साथ की गई लंबी बातचीत में वे अपने व्यावहारिक अनुभवों से बाल मनोविज्ञान को सामने रखने का प्रयास भी करते है।
समरहिल स्कूल, लन्दन को आधार बनाकर लिखा गया अंशुल शर्मा का आलेख शिक्षा सिद्धांतों और प्रयोग की जाने वाली विधियों को लेकर हमारे मन में बनी कुछ शंकाओं का समाधान करता है। लेखक ने अपने लेख का शीर्षक ‘मनमर्जी का स्कूल’ देते हुए लिखा है कि- ‘एक स्कूल है जिसमें बालकों को कक्षा में न जाने की आज़ादी है, बालकों को गाली निकालने की आज़ादी है, अपने निर्णय खुद लेने की आजादी है, बालकों को शिक्षकों के नाम लेकर संबोधित करने की आज़ादी है।’

नीलबाग स्कूल की शिक्षण प्रणाली पर राजाराम भादू का साक्षात्कार कई मायनों में अहम् है। डेविड आसबरा के शैक्षिक दर्शन को आधार बनाकर उन्होंने इस विद्यालय की सीखने-सिखाने की पूरी प्रक्रिया को डिटेल में बताया है।

इसी तरह से ऋषि वैली स्कूल चित्तूर, आंध्रप्रदेश पर राजीव जोशी, आनंद निकेतन डेमोक्रेटिक स्‍कूल भोपाल और इमली महुआ, कोंदागावं (बस्तर), छतीसगढ़ पर प्रमोद दीक्षित मलय, साल सबील ग्रीन स्कूल त्रिशूर, केरल पर सुनील, उमंग पाठशाला, गन्नूर(सोनीपत), हरियाणा पर मिनाक्षी गाँधी, रा.आ.प्रा.वि. कपकोट, बागेश्वर, उत्तराखंड पर डॉ. केवलानंद कांडपाल, रा.प्रा.वि. मेतली, पिथौरागढ़ पर दिनेश सिंह रावत, रा.उ.प्रा.वि.पौड़, पिथौरागढ़, उत्तराखंड पर नरेश पुनेठा, प्रा.वि.स्यूणी मल्ली, चमोली पर देवेश जोशी, रा.प्रा.वि. गणेशपुर, उत्तरकाशी, उत्तराखंड पर सुनीता के लेख इन स्कूलों की पूरी प्रक्रिया को हमारे सामने रखते है। शिक्षा जहाँ सीखने का दूसरा नाम ही नहीं है, बल्कि आनंद लेने और देने का जरिया भी है।
सुप्रसिद्ध विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की डायरी का वह अंश भी पत्रिका को इस मायने में वैचारिक गहरायी प्रदान करता है, जिसमें वे राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय, देहरा, देहरादून की शिक्षण प्रक्रिया का आँखों देखा और खुद का अनुभव किया हुआ सच बयाँ करते हैं। इस स्कूल में उन्हें सेवा, समर्पण और शिक्षा का अनूठा संगम दिखाई दिया।

सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का व्याख्यान ‘एक अजीब स्कूल’ गुमनाम स्कूल लापोड़िया जयपुर की कहानी कहता है, जहाँ परिवेश के साथ सीखने की प्रक्रिया सहजता के साथ अपना रूप ग्रहण करती है। वहां कोई बंधन नही है- सीखने में भी और जीने में भी। समाज और स्कूल का कोई बंटवारा नहीं, स्कूल समाज के साथ कुछ इस तरह घुला-मिला है कि‍ कौन किससे सीख रहा है, यह पता लगाना मुश्किल है अर्थात सब एक दूसरे के सानिध्य में आगे बढ़ रहे हैं। पसंद और नापसंद के साथ विषयों की दीवारें बनतीं और बिगड़ती रहती थीं और बच्चे इस गुमनाम स्कूल से शिक्षा की एक नई इबारत लिख रहे थे। सीखने की स्वाभाविकता और जीने की सहजता के आपसी संबध को समझने के लिए यह आलेख महत्त्वपूर्ण है।

‘और अंत में’ तीन स्कूलों 1. ग्राम भारती विद्या मंदिर, रानिचौरी, टेहरी गढ़वाल. 2. दून घाटी शिक्षण संस्थान, बापू ग्राम,ऋषिकेश. 3.जीवन जागृति निकेतन, ऋषिकेश के हवाले से दिनेश कर्नाटक ने गाँधीवादी शिक्षा के मूल्यों की व्यावहारिकता को दिखाया है। इन तीनों स्कूलों की स्थापना गाँधीवादी विचारक योगेश चन्द्र बहुगुणा ने की थी। उनके लिए शिक्षा का पेशा रोजगार का नहीं, सेवा का पेशा था। यह आलेख किसी शिक्षण संस्था के निर्माण के साथ उसमें विकसित होने वाली मूल्य-चिंता की पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए पठनीय है।

‘आदमी बनने के क्रम में’ मिथिलेश कुमार राय की कविता शुरुआती कविता की तरह फिर एक बार हमारे परिपेक्ष्य को दुरुस्त करती जान पड़ती है- पिता मुझे रोज पीटते थे/गरियाते थे/कहते थे कि साले/राधेश्याम का बीटा दीपवा/पढ़-लिखकर बाबू बन गया/और चंद्नमा अफसर/और तू ढोर हांकने चल देता है/हँसियाँ लेकर गेहूं काटने बैठ जाता है/कान खोल कर सुन ले/आदमी बन जा/नहीं तो खाल खीचकर भूसा भर दूंगा/और बांस की फुनगी पर टांग दूंगा…/आदमियों की तरह सारी हरकतें करते पिता/क्या अपने आपको आदमी नहीं समझते थे/आदमी बनने के क्रम में/मैं यह सोचकर उलझ जाता हूँ…।’
कुल मिलाकर ‘शैक्षिक दखल’ का यह अंक काफी महत्त्वपूर्ण है। इसमें लिखे गये लेख रोचक, उपयोगी और संग्रहनीय हैं।

—-

शैक्षिक दख़ल (छमाही)
एक अंक- 40 रुपये
5+1 अंक- 200 रुपये
आजीवन-1500 रुपये
संस्थागत आजीवन सदस्यता-2000 रुपये
विशिष्ट सदस्यता-5000 रुपये
सम्‍पर्क : महेश चंद्र पुनेठा, शि‍व कॉलोनी,
न्‍यू पि‍याना, पो. ऑ डि‍ग्री कॉलेज श्‍जोशी भवन, नि‍कट लीड बैंक, पि‍थौरागढ़-262502, मोबाइल नम्‍बर- 09411707470
ईमेल- punetha.mahesh@gmail.com

जरूरत नहीं है दुखहरण मास्टर की: संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

हिन्दी के प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन की एक कविता में सुरती खाते और बात-बात पर छड़ी भाँजते जिन ‘दुखहरण मास्टर’ का वर्णन किया गया है, वे आमतौर पर भारतीय अध्यापकों के प्रतिनिधि के रूप में देखे जाते रहे हैं। लेकिन अब स्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं। गाँवों के स्कूलों में कहीं-कहीं दुखहरण मास्टर के वंशज भले दिख जाएँ, लेकिन शहरों ने उनकी प्रजाति को विलुप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पब्लिक स्कूलों में तो पुरुषों के अध्यापक बनने के रास्ते लगभग बंद कर दिए गए हैं। अब चुस्त, सुंदर, आकर्षक, ‘मैम’ पब्लिक स्कूलों की शोभा बढ़ाने लगी हैं। ऐसे में दुखहरण मास्टर की प्रजाति का विलुप्त होना अनिवार्य हो गया है। और यह अच्छी खबर है। लेकिन क्या पहनावे और बोलने के ढंग के बदलने से दुखहरण मास्टर की छड़ी भाँजने की मानसिकता बदल गई है? शायद नहीं! आज भी अध्यापकों और अध्यापिकाओं में शारीरिक दंड देने की प्रवृत्ति विद्यमान है। डाँट-डपट की तो बात ही क्या? ऐसे स्कूल या शिक्षक ढूँढ़ने पर ही मिल सकते हैं जो अपने विद्यार्थियों को डाँट-डपट, दंड वगैरह देने से परहेज करते हों। कभी-कभी तो बच्चों को भयानक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना देने की खबरें अखबारों और टी.वी. में आती रहती हैं। ऐसी खबरों को देखने, पढ़ने के बाद दुःख होता है कि हमारे शिक्षक इस स्तर पर भी उतर सकते हैं?

दूसरी तरफ, यह सुखद बात है कि सरकार, स्कूल प्रशासन, माता-पिता बच्चों को शारीरिक दंड देने के सख्त खिलाफ हो गए हैं। शिक्षकों की प्रवृत्ति भले ही नहीं बदली हो, लेकिन वे बच्चों को दंडित करने से पहले सौ बार जरूर सोचने लगे हैं। हालाँकि बच्चों को डाँट-डपट और तरह-तरह से भयभीत करने से वे अब भी बाज नहीं आ रहे हैं। इसके लिए उनके पास अपने तर्क हैं। उनका मानना है कि बच्चे अनुशासन में नहीं रहेंगे तो वे उन्हें पढ़ा कैसे पाएँगे? और उन्हें अनुशासन में रखने के लिए तो डाँट-डपट जरूरी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को बच्चों की बड़ी तादात को सँभालना होता है। वे आखिर उन्हें सँभालें भी तो कैसे? प्राइमरी स्तर पर एक ही शिक्षक पूरी क्लास को पढ़ाता है। पढ़ाने के साथ-साथ उसे यह भी देखना होता है कि बच्चे आपस में मार-पीट न करें। यहाँ तक कि पानी पीते या पेशाब को जाते भी वे अगर मार-पीट करें और किसी को खरोंच भी आ जाए तो संबंधित कक्षा का शिक्षक ही दोषी माना जाता है। ऐसे में, एक सरकारी स्कूल के युवा शिक्षक हेमेन्द्र मोहन की कही बात गौर करने लायक है, ‘‘पहले वाली स्थिति ही अच्छी थी। विद्यार्थी शिक्षकों का लिहाज करते थे, कहा मानते थे। अब तो सीनियर क्लास के लड़के शिक्षकों को ही धमकाते हैं कि आप कुछ कहोगे तो मैं प्रिसिंपल से शिकायत कर दूँगा।’’

जाहिर है, शिक्षकों और विद्यार्थियों के रिश्ते में दरार पैदा हो गई है। यह दरार पब्लिक स्कूलों में थोड़ी कम दिखाई देती है। वहाँ शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच माहौल अधिक दोस्ताना है। लेकिन दुर्भाग्यवश यह दोस्ताना स्वाभाविक नहीं, बल्कि व्यावसायिक दबाव की वजह से अधिक है। आज के माता-पिता यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे महँगे स्कूलों में जाएँ और वहाँ से मुर्गा बनकर या पीठ पर छड़ी के निशान लेकर घर वापस आएँ। वे अपने बच्चों पर एक उँगली तक पड़ते नहीं देखना चाहते। ऐसे में पब्लिक स्कूलों की यह मजबूरी हो जाती है कि वे बच्चों को शारीरिक रूप से प्रताड़ित न होने दें। स्कूल-प्रशासन का अंकुश शिक्षकों पर रहता है, छात्र या माता-पिता की शिकायत पर किसी शिक्षक को निष्कासित करते उन्हें देर भी नहीं लगती। यही वजह है कि पब्लिक स्कूलों के शिक्षक/शिक्षिका विद्यार्थियों से बहुत सहज और फ्रेंडली दिखाई देते हैं। शिक्षकों की तरफ से देखें तो निश्चय ही उनके लिए यह भूमिका बड़ी कठिन हो सकती है। उन्हें अपने तन-मन को रोके रखकर बच्चों को अनुशासित रखना है और पढ़ाना है। शिक्षकों की इस कशमकश के बारे में पब्लिक स्कूल की एक शिक्षिका श्रीमती लीना का कहना है- ‘‘हमें बहुत मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता है। मैं भी इस पक्ष में हूँ कि बच्चों को मारा-पीटा न जाए, डाँटा-डपटा न जाए, लेकिन बिना डाँटे-डपटे बच्चों को सँभालना आसान भी तो नहीं होता? आखिर कभी-कभार घर में हम अपने बच्चों को डाँटते-डपटते हैं या नही?’’

श्रीमती लीना भी अपनी जगह सही हैं, लेकिन बच्चों के कोण से देखें तो उन्हें न तो घर में डाँट-डपट पसंद है, न ही स्कूल में। न तो डाँटने-डपटने वाले माता-पिता उन्हें पसंद है, न ही शिक्षक। हाँ, वे डाँट-डपट के इतने आदी हो गए हैं कि वे थोड़ी बहुत डाँट सहन को भी तैयार रहते हैं। एक पब्लिक स्कूल की छठी कक्षा की छात्रा तृषा का कहना है, ‘‘मेरी कक्षा में सभी टीचर्स बहुत अच्छी हैं। हँसमुख और फ्रेंडली। पर कभी-कभी हमें डाँटती भी हैं। कभी-कभी जब उनका मूड ज्यादा खराब रहता है तो वे हमें ज्यादा डाँटती हैं। मेरे ख्याल से उन्हें डाँटना तो चाहिए, लेकिन कम!’’

सवाल है कि बच्चों को डाँटा-डपटा क्यों जाए? इसलिए कि वे बड़ों की बात नहीं मानते? शिक्षकों की नहीं सुनते?…बच्चों के जीवन और शिक्षण पर चिंतन और अपने चिंतन का क्रियान्वयन करने वाले दुनिया भर के शिक्षा शास्त्रियों ने इस बात का विरोध किया है। बच्चों से अपनी बात मनवाने के लिए जोर-जबरदस्ती करते माता-पिता और शिक्षक उनकी आलोचना के विषय रहे हैं। टॉल्सटॉय, ए.एस.नील, जॉन होल्ट, मकारांको, रवीन्द्रनाथ, गिजुभाई जैसे शिक्षा शास्त्री बच्चों की आजादी के पक्षधर रहे हैं। बच्चों को भयमुक्त वातावरण में पालने और पढ़ाने के पक्षधर रहे हैं। एस.एस. नील जैसे शिक्षक तो अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी देते थे कि विद्यार्थी उन्हें उनके नाम से पुकार सकते थे। गिजुभाई ने भी अपने विद्यार्थियों को इतनी आजादी दी थी कि ‘गिजुभाई पगला गए हैं’ कह सकते थे। विद्यार्थियों पर हर वक्त अंकुश रखने वाले शिक्षक इस आजादी की कल्पना तो नहीं ही कर सकते हैं। नील और गिजुभाई जैसे लोग उन्हें बेवकूफ भी लग सकते हैं। जबकि नील और गिजुभाई जैसे शिक्षक इसलिए बच्चों को आजादी देने के पक्ष में थे कि इससे वे आजाद और कुंठा रहित नागरिक के रूप में विकसित होंगे। नील और गिजुभाई के इस दर्शन को समझने और अपनाने वाले शिक्षकों की आज कितनी आवश्यकता है? शिक्षकों के द्वारा दी गई आजादी का उपभोग करते हुए भी शिक्षकों के प्रति आदर और सम्मान का भाव रखना विद्यार्थियों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

आज के हिसाब से देखें तो यह सच है कि हमारे यहाँ एकलव्य या आरुणि जैसे शिष्य नहीं रहे। सच तो यह भी है कि हमारे गुरु अब ब्रह्मा नहीं रहे? शिक्षा को व्यवसाय में बदल देने वाले गुरु राम और युधिष्ठिर जैसे शिष्य तैयार भी कैसे कर सकते हैं? इस मूल्यहीन समय में सद्गुरुओं की जितनी जरूरत है, उतनी ही उनकी कमी दिखाई देती है। सद्गुरु भाषण से नहीं, बल्कि अपने आचरण से अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे, दंड से नहीं, प्रेम, प्रोत्साहन से काम लिया करते थे। तभी उनकी दी हुई शिक्षा चिर स्थायी हुआ करती थी।

थारू समाज- एक समृद्ध विरासत का शोकगीत : अवैद्यनाथ दुबे

थारू समाज की महि‍लाओं से बात करते अवैद्यनाथ दुबे।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह उत्तर प्रदेश के तराई में बसा थारू आदिवासी समाज भी सांस्कृतिक-लोकपरम्पराओं के मामले में समृद्ध रहा है। आज भी यहाँ स्थानीय पर्व-त्योहारों के मौकों पर लोकधुनों पर थिरकते थारू स्त्री-पुरुषों का समूह दिख जाएगा। विडम्बना है कि दुधवा टाइगर रिज़र्व पहुँचने वाले देसी-विदेशी सैलानी, सत्ता में बैठे हुक्मरान और पैसेवाले थारू आदिवासियों के शोकगीतों में भी मनोरंजन खोजते हैं। यही वजह है कि‍ आज भी यह आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाएं हाशिये पर हैं। वरि‍ष्‍ठ पत्रकार अवैद्यनाथ दुबे की रि‍पोर्ट-

एक तरफ उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय उद्यान दुधवा अपने प्राकृतिक सौंदर्य और वैविध्यपूर्ण वन्य जीवन के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, तो वहीं नेपाल से सटे तराई के इन जंगलों के बीच इंसानों की वह दुनिया भी है, जिसे यह ‘सभ्य’ समाज थारू आदिवासियों के नाम से जानता है। ‘सबका साथ, सबका विकास’ जैसे नारों के बीच थारू आदिवासियों का यह समाज आज भी हाशिये पर है और इसी समाज की आधी आबादी यानी महिलाएं तो हाशिये से भी गायब हैं।

कहने को तो अन्य आदिवासी समाज की तरह थारू आदिवासी समाज भी महिला प्रधान है, लेकिन हकीकत में यहाँ भी सत्ता पुरुषों के हाथों में रहती है। वैसे तो लोकतंत्र की पहली और सबसे अहम इकाई ग्राम पंचायतों में इनकी पैठ तो दूर, पहुंच भी नहीं है। खुदा न खास्ता कोई महिला ग्राम प्रधान बन भी जाती है तो हमारे तथाकथित सभ्य समाज की तरह यहाँ भी उसकी हैसियत रबर स्टाम्प तक ही सीमित रह जाती है। चलती ‘प्रधानपति’ की ही है।

खेती का काम हो या जंगल से जलावन की लकड़ी ढोकर लाना हो, ज्यादातर महिलाओं को ही हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। यहां तक कि मछली के शिकार के लिए जाल बुनने का काम भी महिलाओं को करना पड़ता है। फिर मर्द क्या करते है? नेपाल सीमा से लगे लखीमपुर जिले के रामनगर गाँव की अचम्भी देवी कहती हैं, ‘उन्हें शराब (कच्ची) बनाने और पीने से फुर्सत मिले तो न।’ कोई 50 साल की अचम्भी को सबसे ज्यादा शिकायत वन विभाग महकमे से है। वह कहती हैं, ‘जंगल से हम जिंदा हैं, लेकिन जलावन के लिए सूखी लकड़ियां लाने पर भी विभाग वाले परेशान करते हैं। कभी हमारी कुल्हाड़ियाँ छीन लेते हैं, कभी हमसे बदसलूकी करते हैं।’

40 साल की भज्जो दो-तीन साल पुराना वाकया बताती हैं, ‘बनकटी के जंगल में जलावन लकड़ी लेने गई महिलाओं पर पुलिस और वन विभाग के लोगों ने हमला कर दिया था, जिसमें सूडा गांव की एक औरत बुरी तरह से घायल हो गई। दोषियों पर कार्रवाई के बजाय पुलिस ने उलटा जख्मी महिला और उसके पति को लूट व जंगल काटने की धाराएं लगाकर जेल भेज दिया।’ यह बात और है कि थारू महिलाओं के बड़े पैमाने पर हुए आंदोलन के बाद आरोपी दुधवा वार्डन और एक कोतवाल पर एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कायम हुआ।

एक तरफ थारू समाज के लोग वक़्त के साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं, तो वहीं कई ऐसे मसले हैं, जहां ये चाहकर भी अपने पुराने तौर-तरीके आजमाने पर मजबूर हैं। इनके लिए प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भी उन योजनाओं में शुमार है, जो इन तक पहुंचनी तो दूर, जिनका नाम तक इन्होंने नहीं सुना। थारू समाज के लोग आज भी मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाते हैं। ईंधन के रूप में ये लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, जो थारू महिलाएं जंगल से लकड़ियां इकट्ठा करती हैं। फिर उनके गट्ठर बनाकर अपने सिर पर लादकर घर लाती हैं। एक गट्ठर का वज़न 50 से 60 किलो होता है।

थारू जीवन को करीब से जानने और इस आदिवासी समुदाय खासतौर से महिलाओं की दुश्वारियों को समझने के लिए इन पंक्तियों के लेखक ने दर्जन से ज्यादा गाँवों का दौरा किया, जिनमें नेपाल से सटे चंदन चौकी, रामगढ़, मसानखंभ, पुरैना, चमरौली, सौनहा, सोनारीपुर, बनकटी आदि शामिल हैं। कुछ मायनों में यहाँ बदलाव की बयार का असर होता दिखा। मसलन, लगभग सभी गांवों में प्राथमिक विद्यालय देखने को मिले। कुछ उच्च प्राथमिक विद्यालय भी दिखे। इनमें से कई गांव बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सड़क से भी जुड़ चुके हैं। लेकिन स्थानीय आदिवासी देश की मुख्यधारा से जुड़ सकें, उन्हें उनका अधिकार मिल सके, इस दिशा में कारगर पहल होती नहीं दिखती। कायदे से वन्य सम्पदा पर वन्यजीवों के बाद इनका हक बनता है, जिसके लिए यह थारू समुदाय जब-तब आंदोलन करता आया है, लेकिन ताल-तलैयों में शिकार तो दूर, जंगल की सूखी लकड़ियां बीनने पर भी धर लिया जाता है।

रामगढ़ गांव के बिस्सू को आरक्षण के बारे में ज्यादा नहीं पता। हां, उन्हें बखूबी याद है कि करीब दो साल पहले उनके पड़ोसी गांव चमरौली में एक युवक के फ़ौज में बतौर सिपाही भर्ती होने पर आस-पास के गाँवों के लोगों को दावत मिली थी। यह पूछने पर कि उनकी जानकारी में यहाँ कितने लोग सरकारी नौकरी में होंगे, बिस्सू ने आसानी से दो नाम गिना दिए- एक फ़ौज में सिपाही और दूसरा जिला प्रशासन में चपरासी। लड़कियां तो बस जंगल से लकड़ियां बीनने के लिए है, शादी के बाद भी।

थारू आदिवासियों के लिए बाढ़ भी बड़ी समस्या है। इस इलाके में कुल तीन प्रमुख नदियाँ हैं- शारदा, सुहेली और मुहाना। बरसात में जब नेपाल से भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है, तो पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है। फसलें चौपट हो जाती हैं। इनकी मुश्किलें और तब बाद जाती हैं, जब शासन-प्रशासन से कोई मदद या रियायत नहीं मिलती। पुरैना के राजाराम कहते हैं, ‘बाढ़ आती है, धान और सब्जियों की फसलें चौपट हो जाती हैं। ये लगभग हर बरसात की बात है।’ सरकारें शायद इसे नियति मान चुकी हैं, तभी तो इस दिशा में कुछ ठोस नहीं किया जाता।

परंपरा की खातिर

एक तरफ थारू जनजाति के लोगों में समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की ललक बढ़ी है, वहीँ दूसरी तरफ इस समाज में सैकड़ों साल से चली आ रही तमाम चीजें आज भी परंपरा के तौर पर जीवित हैं। थारू जनजाति की महिलाएं एक खास किस्म की घास से डलिया और चटाई जैसी कई चीजें तैयार करती हैं। डलिया का इस्तेमाल ये रोटियां या खाने-पीने की बाकी चीजें रखने में करते हैं। इनकी बनाई गई चीजें काफी खूबसूरत होती हैं, लेकिन यह इनके धंधे में शामिल नहीं हो पाया है। हाथ से बुनी गई ऐसी तमाम चीजों का इस्तेमाल ये अपनी दिनचर्या में करते हैं। इनके पास एक और अनोखी चीज होती है लौका। लौका का इस्तेमाल ये मछली पकड़ने में करते हैं। पकी हुई लौकी को अंदर से खोखला करके उसे सुखाया जाता है। थारू जनजाति की औरतें मछली पकड़ते वक्त लौका को अपनी कमर से बंधती हैं और मछली पकड़ कर उसमें रखती जाती हैं।

पुस्तकालय, जो बंद रहता है…

लखीमपुर खीरी की एक तत्कालीन जिलाधिकारी ने कोई दो-ढाई साल पहले थारू आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए थारू महोत्सव, आदिवासी गांवों को गोद लेने जैसी कुछ पहल की थी। उन्होंने पलिया कलां से अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर चंदन चौकी को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित पुरैना गांव में पुस्तकालय की नीव रखी थी। इसके लिए छोटी ही सही, बिल्डिंग खड़ी हो गई, लेकिन बनने के डेढ़ साल बाद भी कुछ उत्साही स्थानीय आदिवासी युवा इसके खुलने का इंतजार कर रहे हैं। 12वीं पास पुष्पा कहती हैं, ‘आसपास ‘बड़ा’ स्कूल नहीं होने से हम आगे की पढाई तो नहीं कर सकते, लेकिन जब यहाँ लाइब्रेरी बनी तो लगा हमें यहाँ कुछ पढने को मिलेगा. लेकिन बनने के बाद से यह कभी खुली ही नहीं।’

 

थारू समाज का गौरवशाली अतीत

थारू जनजाति उत्तराखंड के खटीमा और सितारगंज, लखीमपुर समेत उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके और नेपाल के दक्षिणी हिस्से के तराई क्षेत्र में रहती है। थारू जनजाति के इतिहास पर इतिहासकारों के बीच काफी मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि थारू मुस्लिम आक्रमणकारियों से जान बचाकर भागीं राजपूत महिलाओं और उनके सेवकों के वंशज हैं, जो उस दौरान पहाड़ के दुर्गम इलाकों में बस गए थे। ऐसा उल्लेख मिलता है कि इनके समाज में महिलाएं खुद को श्रेष्ठ मानती हैं और कुछ इतिहासकार यहां तक कहते हैं कि महिलाएं अपने पति के साथ भोजन तक नहीं करती थीं। हालांकि अब काफी बदलाव आ चुका है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ये राजस्थान के थार इलाके से आए हैं और महाराणा प्रताप के वंशज हैं। थारू अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में आते हैं। समाज में पिछड़े वर्ग में आने की वजह से 1961 में इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया था।

थारू आदिवासियों के ज्यादातर परिवार खेती पर निर्भर हैं। 60-70 के दशक तक इनके पास काफी जमीनें थीं, लेकिन अब ज्यादातर दूसरे के खेतों में काम करते हैं। इस समाज के ज्यादातर परिवारों ने कभी अपनी जरूरत तो कभी भूमाफियाओं के जाल में फंसकर अपनी जमीनें बेच दीं। कुछ लोग अभी भी अपनी जमीनों पर खेती करते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग अब दूसरों के खेतों में मजदूरी करते हैं। यही इनकी आजीविका का मुख्य जरिया है। पारंपरिक रूप से ये धान और चावल की खेती किया करते थे, लेकिन खेती में लागत के हिसाब से फायदा नहीं हो पाता। लिहाजा, इन्होंने सब्जियों की खेती भी शुरू कर दी है। इसके अलावा ये पशुपालन, शिकार और मछली पकड़ने जैसे काम भी करते हैं।
थारू जनजाति के लोगों में अब अपनी ज़मीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में वे अब सरकार से मदद की आस लगाए बैठे हैं। जनजातियों की जमीन पर कब्जे को रोकने संबंधी कानून के मुताबिक उनकी जमीन गैर जनजाति के लोग नहीं खरीद सकते, लेकिन पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर इनकी जमीनों पर गैर-आदिवासियों का कब्ज़ा है। अपनी ज़मीनों को गैर जनजातियों को बेच चुके थारू जनजाति के लोग अब चाहते हैं कि सरकार इस कानून का सख्ती से पालन कराए।

शिक्षा की डिजिटल पहल

डि‍जि‍टल यात्रा के बारे में बताते प्रथम के सह-संस्थापक डॉ. माधव चह्वाण।

नई दिल्ली :  शिक्षा क्षेत्र में भारत के सबसे बड़े गैर-सरकारी संगठनों में शुमार- प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन ने 29 अगस्त 2017 को शिक्षा सम्बंधी अपनी डिजिटल पहल का औपचारिक उद्घाटन किया। प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के चेयरमैन अजय पीरामल ने ‘प्रडिजि’ नाम से शुरू की जा रही इस पहल को नई दिल्ली स्थित विश्व युवा केंद्र में जारी किया।

उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए प्रथम की सीईओ डॉ. रुक्मिणी बनर्जी ने कहा कि प्रथम ने पिछले लगभग 20 वर्षों के अपने कार्यकाल में बगैर डिजिटल संसाधनों ही काम किया है। लेकिन नई टेक्नोलॉजी की असीमित पहुंच और घटती कीमतों को देखते हुए अब समय आ गया है कि हम इसकी संभावनों को तलाशने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि स्कूली संसाधनों में वित्तीय निवेश बढ़ा देने भर से बच्चों की शैक्षिक उपलब्धियों में सुधार नहीं होता। प्रथम की सालाना असर (एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट) रिपोर्ट पिछले 12 वर्षों से इस तथ्य की पुष्टि कर रही है। इसलिए बेहतर शिक्षा के लिए प्रथम अब टेक्नोलॉजी के विभिन्न माध्यमों का परीक्षण करना चाहता है। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा और विकास में इन माध्यमों की क्षमताओं का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाएगा।

इस मौके पर फाउंडेशन के चेयरमैन अजय पीरामल ने प्रडिजि ऐप भी जारी किया जो फिलहाल 11 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए इसमें 20 अलग-अलग शैक्षिक गेम डाले गए हैं, जो हिंदी व अंग्रेजी के अलावा पंजाबी, असमी, बांग्ला, उड़िया, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मराठी और गुजराती में उपलब्ध हैं। संभवतः यह पहला मौका है, जब किसी भारतीय गैर-सरकारी संगठन ने इतनी सारी भारतीय भाषाओं में एक साथ शिक्षा सम्बंधी संसाधनों को तैयार किया है। प्रथम इन संसाधनों को समूचे देश में नि:शुल्क बांटना चाहता है। वह चाहता है कि विभिन्न स्तरों पर सरकारें, संस्थाएं, शिक्षण संस्थान, स्वयंसेवी संस्थाएं, समुदाय व परिवार प्रथम के डिजिटल कंटेंट का लाभ उठाएं। आज प्रडिजि प्ले-स्टोर पर उपलब्ध है। इसी तरह यह एक-स्टेप के प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध होगा।

प्रथम की नई डिजिटल पहल के तीन आयाम हैं। पहला, डिजिटल गेम्स व गतिविधियों सहित बच्चों के सीखने के लिए नए शैक्षिक संसाधनों का सृजन। दूसरा, बच्चों के लिए वीडिओ का निर्माण और तीसरा, डिजिटल पहल के वास्तविक प्रभावों का मूल्यांकन। इस लक्ष्य के लिए 21 राज्यों में करीब 12,000 टेबलेट बांटे गए हैं, जो आगामी 12 महीनों के दौरान लगभग 7,000 गांवों व शहरी बस्तियों में इस्तेमाल किए जाएंगे। स्कूलों में चलाए जा रहे डिजिटल शिक्षा के अन्य प्रयोगों के विपरीत प्रथम की पहल घरों व बस्तियों में संपन्न होगी और माताएँ टेबलेट की संरक्षक बनाई जाएंग। जब बच्चे सीखना चाहेंगे, तब माताएँ ही  उन्हें टेबलेट देंगी। इस पहल के अंतर्गत समूह आधारित शिक्षा व स्व-शिक्षण के अलावा बच्चों के सीखने की प्रक्रिया में परिवार, ख़ास तौर पर मां, भाई-बहनों व परिवार के अन्य सदस्यों की भागीदार जैसी बातों को बढ़ावा दिया जाएगा।

इस मौके पर प्रथम के सह-संस्थापक डॉ. माधव चह्वाण ने कहा कि यह हमारी डिजिटल यात्रा की शुरुआत भर है; निसंदेह आगामी महीनों में कई सफलताओं व असफलताओं से भी सामना होगा। लेकिन यह जानना बहुत ज़रूरी है कि किस किस्म का डिजिटल कंटेंट बच्चों में सीखने की तल्लीनता पैदा करता है। एक बार बच्चे तल्लीन हो जाते हैं तो वे सीखने की उत्सुकता और उत्साह से भर जाते हैं। अगर वे उत्साहित नहीं हैं तो उनमें सीखने की प्रेरणा भी नहीं होगी। एक बार वे प्रेरित हो गए तो वे कई बाधाएं पार कर सकते हैं और जो चाहें सीख सकते हैं। प्रडिजि के पीछे मुख्य विचार यही है। डॉ. चह्वाण ने बताया कि प्रथम की डिजिटल पहल का दूसरा प्रमुख पहलू सभी भारतीय भाषाओं में पाठ्य सामग्री तैयार करने के लिए साझेदारियां विकसित करना भी है ताकि सभी बच्चों को नए-नए खेल और शैक्षिक गतिविधियों की निर्बाध आपूर्ति जारी रहे।

प्रडिजि के उद्घाटन पर सभी आगंतुकों व मेहमानों को नए ऐप को देखने व इसमें डाले गए गेम्स व गतिविधियों को डिजिटल उपकरणों पर परखने का मौका भी दिया गया। फिलहाल प्रथम की डिजिटल पहल को गूगल और सर्व मंगल परिवार ट्रस्ट का सहयोग प्राप्त है। इसके अलावा रिगली कंपनी फाउंडेशन ने भी इस प्रयास में मदद की है।

कार्यक्रम के दौरान ऐप देखते आगंतुक।

गुम चोट : रेखा चमोली

रेखा चमोली

 नीलिमा हतप्रभ है। उसे समझ नहीं आ रहा, यह सब क्या हो रहा है। सीमा के पिताजी, मनोज की दादी, पडो़स के दिनेश चाचा और बाकि सारे लोग क्यों उसकी माँ पर इतना गुस्सा हो रहे हैं।

उसकी माँ तो चुपचाप अपना काम कर रही थी। वह भी बडी मैडम से पूछकर। सारे बच्चे मैडम के साथ कक्षा में काम कर रहे थे। अचानक बाहर शोर होने पर जब मैडम बाहर देखने आयीं तो वे सब भी पीछे-पीछे बाहर आ गये। बाहर आकर देखा, उनके गाँव के खूब सारे लोग बडी़ जोर-जोर की आवाज में बातें कर रहे हैं। उनकी बातों में अपनी माँ का नाम सुनकर वह पहले चौंकी, फिर घबरा गयी। शोर सुनकर उसकी माँ भी रसोईघर से बाहर आ गयी। सबने माँ को घेर लिया। वे सब माँ से बहुत नाराज थे। नीलिमा ने माँ की ओर देखा। माँ के चेहरे पर डर देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गये। पिछले कई दिनों से जो अन्जाना डर उसे महसूस हो रहा था, उसके चलते उसे आज कुछ बुरा होने की आशंका होने लगी। वह दरवाजे का कोना थामकर चुपचाप एकटक माँ को देखने लगी। बडी़ मैडम ने लोगों से आराम से बैठकर बात करने को कहा, पर वे फिर भी शोर मचाते रहे।

‘‘मैडम जी, मेरे नातियों ने दो दिन से स्कूल में खाना नहीं खाया।’’ मनोज की दादी ने बडी़ मैडम से कहा।

‘‘क्यों ? क्यों नहीं खाया उन्होंने खाना?’’ बडी़ मैडम ने पूछा।

‘‘आपने जो नयी भोजनमाता लगायी है, उस कारण।’’

‘‘नयी भोजनमाता ने क्या खाना अच्छा नहीं बनाया या साफ-सफाई से नहीं बनाया।’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी, तुम तो सब समझती हो। यहाँ ये बच्चे इसके हाथ का बना खाना खाएँगे और घर आकर हमारे साथ खाना खाएँगे तो हमारा धर्मभ्रष्ट होगा कि नहीं। हम तो इन बच्चों का जूठा भी खाते हैं।’’ गोलू के दादाजी आगे आकर बोले, ‘‘हम जानते हैं, तुमने तो अपनी ड्यूटी निभानी ही थी, पर इन लोगों को तो विवेक होना चाहिये कि नहीं?’’

‘‘ये आप किस जमाने की बात कर रहे हैं?’’ नीरा मैडम बोलीं।

‘‘हम इसी जमाने की बात कर रहे हैं, मैडम जी। आप अभी के अभी नीलिमा की माँ को स्कूल से बाहर करो वरना ठीक नहीं होगा।’’ सीमा के पिताजी ने गुस्से से कहा।

‘‘हमने तो इसके घरवाले को पहले ही समझाने की कोशिश की थी, पर वो माना ही नहीं।’’पीछे से एक आवाज आयी।

बडी़ मैडम बार-बार आराम से बैठकर बात करने को कह रही थीं, पर लोग उनकी बात सुनने को राजी ही नहीं हो रहे थे। इतने में कुछ लोगों ने रसोई में जाकर खाना गिरा दिया और बाकि सामान भी इधर -उधर फेंक दिया। मनोज की दादी ने नीलिमा की माँ को रसोई के पास से खींचकर बाहर निकाला और जोर से धक्का दिया, जिससे वह नीचे गिर पडी़। नीलिमा दौड़कर माँ के पास गयी, तो मनोज की दादी ने ‘पीछे हट छोकडी़’ कहकर उसे दूर धकेल दिया।

नीलिमा रोने लगी। उसका छोटा भाई भी उसके पास आकर रोने लगा। मैडम और बाकि सारे लोगों की बातें सुनकर नीलिमा को ध्यान आया कि पिछले दो दिनों से उसकी माँ दूसरी भोजनमाता के साथ मिलकर स्कूल का खाना बना रही थी और पिछले दो दिनों से ही कुछ बच्चे स्कूल में खाना नहीं खा रहे थे। उन्हें मैडम ने डाँटा, जबरदस्ती खाना खाने बिठाया, लेकिन उन्होंने भूख नहीं है या मन नहीं कर रहा, कहकर खाना खाने से मना कर दिया। इस पर मैडम ने कहा कि कुछ दिनों में सब फिर से खाना खाने लगेंगे।

इन्होंने तो सारा खाना गिरा दिया। अब कहाँ से खाएँगे बच्चे खाना, नीलिमा सोचने लगी। अभी दो दिन पहले तक तो सब ठीक चल रहा था। उसकी माँ उसे और उसके छोटे भाई को सुबह जगाती, उनका हाथ मुँह धुलाती, स्कूल के लिए तैयार करती और दोनों भाई-बहन चल पड़ते स्कूल की तरफ। जिस दिन माँ को जंगल या खेतों में काम करने जल्दी जाना होता, उस दिन उसके पिता या दादी उन्हें तैयार करते। कभी-कभी जब सब लोग जल्दी काम पर चले जाते तो पडो़स की दादी या बुआ उन्हें आवाज देकर जगाते। उस दिन नीलिमा खुद को ज्यादा जिम्मेदार महसूस करती। वह छोटे भाई को जगाती, उसका नित्यक्रम करवाकर, हाथ-मुँह धुलवाकर तैयार करती। माँ की रखी रोटी और गुड टोकरी में से निकालकर खुद भी खाती, भाई को भी खिलाती। अगर स्कूल के लिए देर हो रही होती तो गुड को रोटी के अन्दर रखकर भाई के हाथ में दे देती, जिसे वह रास्ते में खाते-खाते जाता। कभी-कभी उसका भाई उठने में बहुत नखरे दिखाता, तब उसका मन करता कि उसे दो थप्पड लगा दे, पर थप्पड लगाने से वह रोने लगता और बहुत देर में चुप होता। इसलिए वह उसे कोई-न-कोई बहाना बनाकर उठाती। रास्ते में उन्हें और भी बच्चे मिलते। सारे बच्चे गपियाते, बतियाते, धकियाते, मस्ती करते स्कूल की तरफ चल पड़ते। स्कूल पहुँचकर स्कूल की सफाई करते, प्रार्थना करते, कविता-कहानी कहते-सुनते, कक्षा में काम करते। मध्यान्तर होने पर सारे बच्चे आँगन में लाइन बनाकर बैठते। भोजनमाता राहुल की माँ सबको बारी-बारी से दाल-भात परोसती। सारे बच्चे खाना खाते, अपनी-अपनी थाली धोते और खेलते। शुरू-शुरू में कुछ बच्चे अपनी थाली उठाकर बाकि बच्चों से दूर जाकर बैठते थे। कुछ बच्चे रसोई में ही खाना खाते थे। नीरा मैडम ने सारे बच्चों को एक साथ बिठाकर भोजनमाता को खाना परोसने को कहा, तबसे सारे बच्चे एक साथ बैठकर ही खाना खाते हैं। उसने कई बार नीरा मैडम को यह कहते हुए सुना कि ‘यह सब स्कूल में नही चलेगा। दुनिया कहाँ की कहाँ पहुँच गई और हम इन्हीं सब बातों में उलझे पडे़ हैं।’

कुछ दिनों पहले स्कूल में सारे अभिभावकों की एक बैठक हुई थी, जिसमें नीलिमा के पिताजी भी आए थे। उन्होंने घर आकर बताया कि स्कूल में एक और भोजनमाता की नियुक्‍त‍ि होने वाली है और नियमानुसार वह भोजनमाता अनुसूचित जाति की व बीपीएल कार्ड वाली ही होनी चाहिए। उन्होंने कल ही नीलिमा की माँ की अर्जी देने की बात घर में कही।

‘‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया। कैसे बनाएगी तेरी बुवारी(बहू) स्कूल में खाना। उसका बनाया खाना बामनों और ठाकुरों के बच्चे कैसे खाएँगे?’’ दादा जी ने कहा।

‘‘खाएँगे कैसे नहीं। मेरी बुवारी को क्या खाना बनाना नहीं आता? वैसे भी उसे कौन सा अकेले खाना बनाना है। जोशी भाभी जी तो हैं ही वहाँ।’’

‘‘फालतू बात मत कर बेटा, शादी-ब्याह में तो तेरी बुवारी जाती नहीं खाना खाने कि वहाँ उसे सबसे बाद में खाना खाना पड़ता है। वो भी कोई दूसरा किनारे पर लाकर दे, तब। दाल-भात, हलवा-पूरी सब एक साथ मिलकर ‘कल्च्वाडी’ बन जाता है। अभी भी तेरी माँ ही जाती है, शादी-ब्याह में खाना लेने। तेरी बुवारी तो कहती है कि वैसे खाने से तो भूखा रहना ही ठीक है।’’

‘‘पिताजी, घर गाँव की बात और है, स्कूल में ऐसा कुछ नहीं होगा। सरकार चाहती है कि स्कूल में छोटा-बडा़, जात-पात का भेदभाव न रहे। बच्चों के मन में किसी तरह की हीनभावना न रहे, जिससे कि आने वाले समय में हमारे समाज से ये कुप्रथाएँ हमेशा के लिए खत्म हो जाएँ। इसलिए सरकार ने यह नियम निकाला है कि भोजनमाता अनुसूचित जाति की भी होनी चाहिए।’’

‘‘सरकार के चाहने से कुछ नहीं होता, बेटा। सरकार के चाहने से मदनू का बाप प्रधान बन गया तो बता, गाँव के कितने लोगों ने खाना खा लिया, उसके घर पर। अरे चार लोग उसके साथ बाहर कहीं चाय भी पीते हैं, तो अपना गिलास पहले ही अलग कर लेते हैं। बेटा क्यों पड़ रहा है इस चक्कर में, क्‍यों बैर ले रहा है सबसे, नी खाने देगा दो रोटी चैन से इस गाँव में।’’

‘‘पिताजी, क्या तुम यह चाहते हो कि जो दुर्व्‍यवहार  तुम्हारे-मेरे साथ हुआ, वो हमारे बच्चों के साथ भी हो। तुम भूल सकते हो, पर मैं वो दुत्कारना, हमारे साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करना, हमें अपना जडखरीद गुलाम समझना, वो सब नहीं भूल सकता। हम सब सहन करते रहे तो क्या हमारे बच्चे भी करेंगे, नहीं बिल्कुल नहीं। मैं मर जाऊॅगा, पर अर्जी वापस नहीं लूँगा।’’

‘‘लेकिन बेटा।’’

‘‘पिताजी! तुम चुप रहो, मैंने जो सोच लिया वो सोच लिया। किसी-न-किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी। देख लेंगे, जो होगा।’’

उसके पिता, दादाजी, दादी, चाचा, माँ सब देर तक जाने क्या-क्या बातें करते रहे। नीलिमा दादी की गोद में लेटे-लेटे सुनती रही। उसे भी ध्यान आया, पिछली बार जब वह दीपिका की बुआ की शादी में गयी थी, तो गुलाबजामुन देने वाले रविन्दर ने कैसे उसे डाँटा था और बाद में आने को कहा था। लेकिन जब सूरज और निशा ने गुलाबजामुन माँगें थे तो उन्हें कुछ भी नहीं कहा और गुलाबजामुन दे दिए थे। स्कूल में भी जब भोजनमाता बच्चों से पानी मॅगवाती तो उसे मना कर देती और डाँट देती। और उस दिन, जब पकड़न पकडा़ई खेलते-खेलते वह गरिमा के पीछे दौड़ते हुए उसकी रसोई तक पहुँच गयी थी, तो उसकी दादी ने उसको गाली देते हुए कैसे बाहर भेजा था। वह समझ नहीं पाती कि ऐसा उसी के साथ क्यों होता है, स्कूल में तो वह सारे बच्चों के साथ खेलती, पर घर आकर वे ही बच्चे अपने भाई-बहनों के साथ खेलने लगते और उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते। जब उनकी तरफ वाले नल पर पानी बन्द हो जाता तो वह बडे़ धारे पर पानी भरने जाती। वहाँ या तो उसकी बारी सबसे बाद में आती या फिर कोई महिला किनारे पर ही अपने बर्तन से उसका बर्तन भरकर उसे जाने को कहती। जबकि उसका मन पानी की मोटी धारा के नीचे भीगने, पानी पीने का हो रहा होता। कभी-कभी जब धारे पर कोई न होता, वह देर तक पानी से खेलती, हाथ-मुँह धोती, धारे के नरसिंह वाले मुँह पर प्यार से हाथ फेरती, इधर-उधर देखकर पता लगाना चाहती कि धारे के अंदर इतना पानी आता कहाँ से है। ऐसे में अगर ऊपर मोहल्ले से कोई पानी भरने आ जाता तो वह जल्दी से पानी भरकर लौट आती। पीछे से उसे सुनाई पड़ता, ‘‘सारा धारा गन्दा कर दिया।’’ वह जानती थी कि‍ वह आदमी पहले धारा खूब धोएगा फिर पानी भरेगा। वह सोचती- मैंने धारा कैसे गन्दा कर दिया। जब धारे के नीचे कपडे़ धोते हैं, नहाते हैं, बर्तन धोते हैं, तब तो धारा गन्दा नहीं होता! उसकी माँ तो कपडे़ धोने गधेरे पर ले जाती है। माँ कपडे़ धोती है और वह अपने भाई के साथ उन्हें पत्थरों पर सुखाने डालती है। बडा़ मजा आता है। गर्मियों में उनकी माँ उन्हें वहाँ नहला भी देती है।

कभी-कभी वह अपने भाई को लेकर ऊपर वाले मुहल्ले में खेलने जाती तो उसे वहाँ कोई-न-कोई ऐसा जरूर मिल जाता, जो बिना बात उनको वहाँ से डाँट कर भगा देता। वह घर आकर अपने पिता से उसकी शिकायत करती तो वह हँसकर उसकी बात टाल देते, पर वह देखती कि हँसने के बावजूद उसके पिता के चेहरे पर अजीब सा भाव आ जाता। उसके पिता दसवीं फेल थे और खच्चर चलाते हैं। उनकी बडी़ इच्छा है कि वह और उसका भाई खूब पढ़ें-लिखें और बडा़ आदमी बनें। वह कक्षा तीन में पढ़ती है और उसका भाई एक में। वह खूब मन लगाकर पढ़ती है। उसकी दोनों मैडम उससे बहुत प्यार करती हैं। जब भी स्कूल में कोई आता है, तो उसका नाम लेकर कुछ-न-कुछ बात जरूर करती हैं। उसे यह सब बडा़ अच्छा लगता है। उसे नीरा मैडम बहुत अच्छी लगती है। वह सारे बच्चों से प्यार से बात करती हैं। उनके साथ खेलती हैं और कभी-कभी उन्हें स्कूल के आसपास घूमाने भी लेकर जाती हैं। उसने सोचा है कि‍ वह भी बडी़ होकर मैडम बनेगी।

दूसरे दिन उसके पिता स्कूल में अर्जी दे आए। उसके बाद उनके घर में अक्सर उसके दादाजी और पिता में बहस होने लगी। उसके दादाजी बार-बार उसके पिता से अर्जी वापस लेने के लिए कहते, पर उसके पिता ने तो जैसे इस मामले में दादाजी की बात न मानने की कसम ही खा रखी थी। नीलिमा को अपने घर में छिडी़ इस बहस से इतना ही लेना-देना था कि खाना खाते समय अनचाहे ही उसे यह सब सुनना पड़ता था। एक बार उसने अपनी माँ से पूछा भी कि दादाजी उसको भोजनमाता क्यों नहीं बनना देना चाहते तो माँ ने ‘तेरे मतलब की बात नहीं है’ कहकर डपट दिया था। इसी तरह की बहस स्कूल में बडी़ मैडम और नीरा मैडम के बीच भी होती रहती। नीलिमा का ध्यान अपने आप इस बहस की तरफ चला जाता क्योंकि बहस के बीच में उसकी माँ को लेकर भी बातें होतीं। बडी़ मैडम नहीं चाहती थीं कि उसकी माँ भोजनमाता बने। इस पर नीरा मैडम कहती, ‘‘नियमानुसार जो ठीक है, वो ही होना चाहिए। हम जैसे पढे़-लिखे लोग सामाजिक कुरीतियों से नहीं लडे़ंगे, तो कौन लडे़गा।’’ बीच-बीच में और लोग भी स्कूल में आकर भोजनमाता बनने की बात करते। जब स्कूल में साहब आए तो बडी़ मैडम ने उनसे कहा, ‘‘आपने मुझे किस मुसीबत में डाल दिया। मैं किस-किस को समझाऊँ।’’

‘‘मैडम, हम क्या करें। नौकरी करनी है तो सरकारी आदेशों का पालन करना ही होगा। वैसे भी आपके स्कूल में अनुसूचित जाति के बच्चे बहुत ज्यादा हैं।’’ साहब ने कहा था।

नीलि‍मा को पता था कि‍ वह और उसका भाई भी अनुसूचित जाति के बच्चे हैं क्योंकि उन्हें छात्रवृत्ति मिलती है। एक बार गरिमा ने पंचगारे खेलते हुए जल्दी आउट होने पर उसे गाली भी दी थी, ‘‘तुम्हें तो छात्रवृत्ति भी मिलती है। फिर भी तुम गरीब हो! भिखमंगे कहीं के!’’ उसकी क्या गलती, अगर गरिमा को छात्रवृत्ति नहीं मिलती तो। वो भी बन जाए अनुसूचित जाति की। उसके पिताजी तो कागज बना कर लाए थे। मैडम को दिया था। ये अनुसूचित जाति क्या होता है, हम क्यों हैं अनुसूचित जाति के, सारे बच्चे अनुसूचित जाति के क्यों नहीं हैं, फिर सबको छात्रवृत्ति मिलती, गरिमा भी मुझसे नाराज नहीं होती। वह जाने क्या-क्या सोचती। जब माँ से कुछ पूछती तो माँ कहती, बडी़ होकर समझ जाएगी। उसे अपने बडे़ होने का इन्तजार होता।

कुछ भी हो नीलिमा और उसका भाई दोनों बहुत खुश थे। अब उनकी माँ भी रोज उनके स्कूल आएगी। जब वह स्कूल में उनको खाना देगी तो क्या के शर्माएँगे। दोनों भाई-बहन जाने क्या-क्या सोचते। नीलिमा सोचती- अगर उनको स्कूल में कोई बच्चा तंग करेगा तो वह उसकी शिकायत अपनी माँ से कर देगी। राहुल कितनी तडी मारता है, अपनी माँ की और उसकी माँ सब बच्चों को डाँटती रहती है। जैसे कि हमारी मैडम होगी हुँअ।

नीलिमा की माँ उठो! लो पानी पी लो। नीरा मैडम की आवाज से उसका ध्यान टूटा। नीरा मैडम उसकी माँ को उठाती हैं। उसकी माँ के नाक से खून निकल रहा है, जिसको वह अपने धोती के पल्लू से साफ करने की कोशिश कर रही है। रसोई घर के बाहर दाल-भात गिरा पडा़ है। बच्चों की थालियाँ इधर-उधर बिखरी हैं। नीलिमा अपनी माँ के पास जाना चाहती है, पर जा नहीं पा रही। उसका भाई उससे चिपक कर खडा़ रो रहा है। अचानक नीलिमा ने अपने भाई का हाथ पकडा़, अपना व उसका बस्ता उठाया और दौड़ पडी़ अपने घर की ओर। वह जल्द से जल्द अपने पिता के पास पहुँच जाना चाहती थी।

आजादी की जमीन पर फलते-फूलते दो स्कूल : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

‘स्कूल’ का नाम लेते ही हम सबके दिल-दिमाग में स्कूल की एक परम्परागत छवि उभरती है जिसमें एक भवन है, शि‍क्षक और शि‍क्षिकाएं हैं, घण्टी है, एक पूर्व निर्धारित कार्य योजना यानी समय सारिणी है, समय सारिणी से संचालित कुछ नीरस जड़ कक्षाएं हैं, और कक्षाओं में हैं डरे सहमे बच्चे। बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं, उनके मन में स्कूल आने की न तो ललक है और न ही उत्साह। उनके फीके चेहरे और स्वप्नहीन सूखी आंखों में उदासी और भय पसरा है। बच्चे जो समाज का भविष्य हैं, लेकिन जिनमें सीखने का आनन्द मर चुका है। क्या नहीं लगता है कि वे बच्चे जिनके कंधों पर परिवार और समाज की एक बड़ी जिम्मेवारी आने वाली है, वे मजबूत, कुशल और अन्दर से कुछ सीख पाने के आनन्द के भाव से भरे-भरे हों।

लेकिन नैराश्‍य की इस स्कूली मरुभूमि में कुछ स्कूल मरूद्यान की भांति जीवन की आस जगाने वाले भी हैं। जहां बचपन कलरव करता है। जहां बच्चों में प्रवाहमान ऊर्जा कुछ नया रचने को आतुर है, जहां कबाड़ में भी कला एवं सृजन के नव आयाम दिखाई पड़ते हैं। जहां कल्पना को विकसित करने को विस्तृत फलक उपलब्ध है और आजादी भी। तो आइए मिलते है दो ऐसे ही स्कूलों से जहां न कोई घण्टी है न कोई समय सारिणी। और हां, कक्षाएं भी नहीं हैं। पहले स्कूल का नाम है- ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल‘ भोपाल। प्रश्‍न उठता है कि आखिर यह कैसा स्कूल है और इसके पीछे क्या उद्देश्‍य रहे होंगे और परम्परागत स्कूलों से यह किन मायनों में अलग हैं।

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल भोपाल।

स्कूल के अकादमिक समन्वयक, अनिल सिंह जानकारी देते हैं, ‘‘शैक्षिक क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था ‘एकलव्य’ में काम करने वाले तीन व्यक्ति प्रमोद मैथिल, राजेष खिंदरी और टुलटुल बिश्‍वास एक ऐसे स्कूल का सपना देख रहे थे, जहां शि‍क्षक और छात्र एक धरातल पर खड़े होकर एक साथ सीखने-सिखाने की यात्रा आरम्भ करें, न कोई आगे न कोई पीछे, सब साथ-साथ बढ़ें, कदम-दर-कदम। जहां प्रत्येक बच्चे को अपनी बात रखने की पूरी आजादी हो और सवाल उठाने का अधिकार भी। जहां हाथ में हुनर हो और मन में कुछ नया सीख पाने का आत्मविश्‍वास भी। तो तीनों ने मार्च 2012 में 6 बच्चों के साथ ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल’ की शुरुआत की।’’

किराये के भवन में संचालित आनन्द निकेतन स्कूल के एक पूरे दिन की गतिविधियां बच्चों को न केवल रिझाती हैं, बल्कि स्वतः सृजन की ओर उन्मुख भी करती हैं। सुबह का पहला सत्र आरम्भ होता हैं दौड़ भाग और कुछ एक्सरसाईज करने से। लेकिन वहां न तो कोई सीटी होती है न कोई निर्देश, और न पहले से तय कोई टीचर। बस बच्चे अपने मन से जो समझते हैं, उसे करते रहते हैं और एक-दूसरे को देखकर एक क्रम बना लेते हैं। सुबह नौ से पौने दस के बीच स्कूल का छोटा मैदान रंगबिरंगी तितलियों से सज जाता है, क्योंकि बच्चों की कोई यूनीफार्म तय नहीं है और विभिन्न रंगबिरंगी पोषाकों में बच्चे तितलियां और फूल ही तो हैं। सूरज की बढ़ती चमक के साथ ही शुरू होता है ‘मार्निंग गैदरिंग’ के रूप में दिन का संगीतमय, रोचक और मस्ती भरा दूसरा सत्र। इसे हम प्रार्थना सत्र भी कह सकते हैं पर यह परम्परागत स्कूली प्रार्थना सत्र से बिल्कुल अलग और ताजगी भरा है। यहां सब बच्चे मिलकर हर्ष-उल्लास और हास-परिहास के साथ विविध भावों एवं रस से ओतप्रोत गीत गाते हैं। ये गीत हिन्दी सहित विविध भारतीय भाषाओं-बोलियों यथा पहाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, भोजपुरी, बांग्ला, झारखण्डी, तमिल और अंग्रेजी में हैं, जिन्हे बच्चों ने शि‍क्षकों के साथ मिलकर खुद चुना है। इनसे बच्चे न केवल विविध भाषाओं के सौन्दर्य से परिचित होते हैं, साथ ही अपने अनुभव को भी समृद्ध कर रहे होते हैं। इन गीतों में जीवन के विविध पक्षों के चटकीले रंग समाहित हैं। प्रकृति से अनुराग एवं सह अस्तित्व है। नदी, पर्वत, धरती, जंगल, पक्षियों से संवाद है। मित्रता है, सबके लिए न्याय है और समानता व समरसता के उदात्त भाव भी। गीतों की सुरीली तान, लय, ताल, स्वरों का आरोह-अवरोह और ढपली एवं ढोलक की थाप। बस मन बंध सा जाता है और एक ऐसे विश्‍व की कल्पना में खो जाता है जहां आनन्द है बस अनिर्वचनीय आनन्द।

आनन्द निकतन डेमोक्रेटिक स्कूल का अगला सत्र ‘पोडियम’ कहलाता है, बच्चों की अपनी बातचीत करने और पिछले दिन के कामों की समीक्षा का सत्र। यह स्कूल की अद्भुत और महत्वपूर्ण गतिविधि है। पिछले दिन स्कूल में क्या कुछ घटित हुआ, कौन सी कहानी-कविता सुनी, कहां गये, क्या चित्रकारी की और उसमें कौन से रंग भरे। कैसा लगा, कौन-सी गतिविधि मजेदार थी और कौन-सी बोरिंग। घर और स्कूल दोनों जगह के अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति यहां देखी जा सकती है। यहां बच्चे लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन का सुमधुर परिवेश बनाते एवं जीते हुए दिखाई देते हैं। अपनी बात कहने और दूसरों की बातें धैर्य से सुनने एवं महत्व देने का पाठ अनायास सीख जाते हैं। स्कूल में बच्चों की कक्षाएं नहीं हैं, बल्कि उम्र वर्ग के समूह हैं। 3 से 4 वर्ष, 4 से 5 वर्ष, 6 से 8 वर्ष, 8 से 10 वर्ष, और 10 से 12 वर्ष के बच्चों के अलग-अलग पांच समूह है, जिन्हें क्रमश: बटरफ्लाई, बडर्स, स्क्वैरल, पीकॉक और डीयर नाम से जाना जाता है। यह नाम बच्चों ने अपने लिए खुद चुने हैं। बच्चे अपने समूहों में ही पोडियम की गतिविधि करते हैं, जिसमें उनके साथ एक फैसिलिटेटर होता है। फैसिलिटेटर बच्चों की अभिव्यक्ति को पोडियम रजिस्टर में अक्षरश: उनके कहे अनुसार ही दर्ज करता जाता है। बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति का यह मंच स्कूल की ताकत और पहचान है। बच्चों में इससे न केवल अपनी बात रखने का तरीका आया है, बल्कि कहने में निर्भीकता, स्पष्टता और तार्किकता भी बढ़ी है। फैसलिटेटर को भी पिछले दिन की कक्षाओं में की गई गतिविधियों का आभास मिलता है। इस गतिविधि‍ में नित नए प्रयोग होते रहे हैं। शुक्रवार के दिन बड़े बच्चों के लिए स्कूल द्वारा दिए गए या खुद से चुने विषय पर तैयारी करके बोलने की शुरुआत हुई है, इसे बच्चों ने ही आकार दिया है। इसके अतिरिक्त लिखने-पढ़ने की दक्षता वाले बच्चे पिछले दिन का विवरण अपने पोडियम रजिस्टर में लिख कर लाते और पढ़कर सुनाते हैं। पोडियम के लिए बच्चों में उत्सुकता, गंभीरता और उतावलापन बताता है कि यह उनके लिए कितना खास और रुचिपूर्ण सत्र होता है।

पोडियम सत्र के बाद बच्चे नाश्‍ता करने हेतु कुछ देर का अवकाश लेते हैं। फिर प्रारम्भ होता है ‘डे प्लानिंग’ यानी अपने समूहों में दिनभर की योजना बनाने का सत्र। बच्चों की शत-प्रतिशत भागीदारी, आपसी संवाद, नोक-झोक एवं सामान्य तरीके से व्यक्ति और संसाधन की उपलब्धता, सबकी सहमति और सुविधा, व्यावहारिकता, निरंतरता, जरूरत और उपयोगिता के आधार पर बच्चे दिनभर की गतिविधियों की योजना और क्रम तय करते हैं। इससे बच्चों में जहां खुद निर्णय लेने और उसमें अपनी जिम्मेदारी महसूस करने का भाव आता है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी रुचि, पसंद और जरूरत को भी जगह दे रहे होते हैं। यहां किए गए निर्णयों में अहम नहीं टकराते, बल्कि सामूहिक निर्णय करने एवं उदारमन से स्वीकारने का संस्कार जन्मता है।

अब बच्चे अपनी तय कार्य योजना के अनुसार विभिन्न अकादमिक कक्षों में जाते हैं, जहां पहले से ही फैसलिटेटर अपनी तैयारी के साथ मौजूद होते हैं। इन अकादमिक कक्षों में विषय की प्रकृति के अनुकूल रिसोर्स मैटेरियल, बच्चों के काम का डिस्प्ले मैटेरियल और दूसरी सहायक शि‍क्षण की सामग्री होती है, जो बच्चों को विषय से सहजता से जोड़ती है। ये कक्ष भी अनूठे हैं, लैंग्वेज एण्ड इन्क्वैरी रूम,  आर्ट एण्ड एस्थेटिक रूम, सेंस ऑफ हिस्ट्री एण्ड सोसाइटी रूम, चाइल्ड साईंटिस्ट रूम और रूम फार न्यूमरेसी एण्ड लाजिक। औपचारिक स्कूली ढांचे में बच्चों की रूढ़ कक्षाएं होती हैं, जिनमें बच्चे सुबह से शाम तक एक ही कक्ष में बैठे रहते हैं और शि‍क्षक आते-जाते रहते हैं। इसके उलट आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल में फैसिलिटेटर अकादमिक कक्ष में होते हैं और बच्चे अपनी योजना के अनुसार उस क्रम से अकादमिक कक्षों में जाते हैं। इससे जहां एक तरफ तो फैसिलिटेटर को अपने कक्ष में तैयारी करने का अवसर मिलता है और वह अपने कक्षों को लगातार बेहतर बना रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों को एक अकादमिक कक्ष से निकलकर दूसरे अकादमिक कक्ष में जाने का अवसर मिलता है। वह उन्हें एक विषय की प्रकृति के प्रभाव से निकलकर दूसरे में जाने की सुगमता देता है। कक्ष बदलने से नए अकादमिक कक्ष का वातावरण उस विषय के साथ जीवंत जुड़ाव बनाने में मददगार होता है।

तत्पश्‍चात आधे घंटे के लंच ब्रेक में सभी बच्चे और शि‍क्षक एक साथ बैठकर अपने-अपने टिफिन साझा करते हैं और इस तरह संगत व साथ खाने का मजा लेते हैं। सब्जियों, अचारों, रोटी, पूडी, पराठों का आदान-प्रदान इस सत्र को खास बनाता है। लंच के बाद बच्चे अपनी तय की हुई योजना के अनुसार अकादमिक कक्षों में जाते हैं और अंतिम सत्र में खेलकूद होता है। इसमें शि‍क्षक भी बच्चों के साथ खेलते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों बच्चों के साथ कबड्डी खेलते हुए अनिल जी के बायें हाथ में चोट लगी थी। पर पूरी तन्मयता एवं जिजीविषा के साथ खेलना जारी था, क्योंकि चोटें खेलों का एक हिस्सा ही तो हैं।

स्कूल प्रायः 9 बजे प्रारम्भ होता है और 3 बजे छुट्टी हो जाती है। जरूरत के अनुसार बच्चे 5 बजे तक भी स्कूल में रह सकते हैं और अभिभावक उन्हें सुविधानुसार स्कूल से ले जाते हैं। साढ़े 3 से साढे़ 4 बजे तक फैसिलिटेटर अपनी शेयरिंग मीटिंग में एक-एक बच्चे की भागीदारी और उसकी लर्निंग पर बारीकी से बातें करते हैं। इस मीटिंग में हर फैसिलिटेटर को हर कक्षा के बारे में और हर बच्चे के बारे में जानकारी हो रही होती है। फैसलिटेटर एक दूसरे को फीडबैक और सुझाव भी देते हैं। शनिवार का दिन बड़े बच्चों के लिए स्वतंत्र रूप से अपना काम करने का होता है। इसमें वे अपने असाईनमेंट्स, प्रोजेक्ट्स, एक्सपेरीमेंट्स या फिर स्पेशल क्लास करते हैं। कोशि‍श होती है कि बच्चों को इसमें फैसिलिटेटर की कम से कम जरूरत पड़े। शनि‍वार का दिन फैसिलिटेटर्स के लिए भी अगले सप्ताह की प्लानिंग, सत्रों और गतिविधियों के लिए शि‍क्षण सामग्री निर्माण करने और बच्चों के पोर्टफोलियो (स्टूडेण्ट्स फाईल) अपडेट करने का दिन होता है। हर क्षण ऊर्जा और रचनात्मकता से भरा हुआ दिन सभी को बेहतर करने को उत्साहित और प्रेरित करता है।

आनन्द निकेतन स्कूल के बारे में बताते हुए अनिल सिंह कहते हैं, ‘‘जीवन का लक्ष्य है आनन्द प्राप्त करना, लेकिन परम्परागत शि‍क्षा में खुशी के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए एक ऐसी जगह बनाने की जरूरत थी जहां बच्चे खुश रह सकें। टीचर्स और अभिभावक भी आनन्द ले सकें। स्कूल बच्चों के लिए उनके घर का विस्तार हो। और सबसे बढ़कर अपने लिए खुद तय करने के मौके हो। उसी सोच का परिणाम है- आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल। कक्षा आठवीं तक की मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में आज 65 बच्चे अध्ययनरत हैं जो विविध सामाजिक स्तर एवं आय वर्ग से आते हैं। दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यवसायी, कर्मचारी एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के बच्चे एक समावेशी और बालमैत्री पूर्ण परिवेश में 5 शि‍क्षकों के साथ विविध गतिविधियों के माध्यम से हर पल सीखते-सिखाते हैं। यहां पाठ्यपुस्तकों का बंधन, अनुशासन की जकड़न, बोझिल नीरस कक्षाएं, बस्ते का बोझ और परीक्षाओं का भय नहीं है, बल्कि एक प्रकार का खुलापन है, आजादी है, हक है और मौके हैं। कुछ सत्रों में प्रायः अभिभावक भी शामिल होते हैं। सतत् और व्यापक मूल्यांकन पद्धति है। हर बच्चे की प्रोफाईल है जिसमें स्कूल में बच्चे की सत्रों में सहभागिता, अन्य बच्चों एवं शि‍क्षकों से व्यवहार एवं उसके रुझान, अभिव्यक्ति, अभिभावकों व सहपाठियों के विचार आदि के समग्र प्रदर्शन के आधार पर सामूहिक निर्णय होता है। यहां बच्चे को उसकी रुचि और समझ अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है। सच कहूं तो यहां हम सब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और सीखने-सिखाने की कोई जल्दबाजी भी नहीं है।’’

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल की अधिगम की इस रसवती धारा में बच्चे और शि‍क्षक अवगाहन कर नित नवीन तौर तरीके विकसित करते रहेंगे। मुझे विश्‍वास है- स्कूल का परिवेश बच्चों के मधुर हास्य और कोमल सृजन से सदैव जीवन्त बना रहेगा। प्रेम, न्याय एवं समतायुक्त एक अहिंसक लोकतांत्रिक समाज रचना की ओर उनके अनथके कदम बढ़ते रहेंगे।

इधर लगभग दो दशकों से शि‍क्षा विषेशकर प्राथमिक शि‍क्षा क्षेत्र की चुनौतियों एवं सतह पर उभरे सवालों से जूझते हुए समाधान की दिशा में सार्थक कदम बढ़े हैं। इस पहलकदमी को शि‍क्षा की बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ये प्रयास जहां सरकारी स्तर पर राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 तथा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शि‍क्षा अधिकार अधिनियम 2009 के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिसमें स्कूलों में ढांचागत बदलाव करते हुए किसी बच्चे की शि‍‍क्षा प्राप्ति के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करने की एक कोशि‍श की गई हैं, वहीं विस्तृत शैक्षिक फलक पर निजी प्रयासों से भी शि‍क्षा के गुणात्मक सुधार हेतु कुछ उल्लेखनीय नवीन प्रयास हुए है। आपको ऐसे ही एक स्कूल से परचित कराने जा रहा हूं जिसने प्राथमिक शि‍क्षा की परम्परागत छवि, शि‍क्षण एवं मूल्यांकन पद्धति तथा धारणा को न केवल तोड़ा है, बल्कि एक विकल्प भी प्रस्तुत किया है। हालांकि उसके नाम से कहीं दूर-दूर तक भी आभास नहीं होता कि यह किसी स्कूल का नाम है। आप नाम जानना चाहेंगे ? तो लीजिए नाम हाजिर है- ‘इमली महुआ’। पड़ गए न आप अचरज में कि यह कैसा नाम है, क्या कभी ऐसा भी नाम होता है किसी स्कूल का। पर यह सच है और इमली महुआ स्कूल ने अपने प्रदर्शन से एक राह बनायी है जिस पर चलकर विद्यालयों की एक कैदखाने की बन गई छवि से मुक्ति पाकर बालमैत्रीपूर्ण लोकतांत्रिक परिवेश रचा जा सकता है।

इमली महुआ स्कूल के बारे में जानकारी देते हुए संस्थापक प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘इमली महुआ स्कूल छत्तीसगढ़ राज्यान्तर्गत बस्तर के जंगल के बीच कोंडागांव जिला के मुरिया एवं गोंड़ जनजाति बहुल गांव बालेंगापारा में स्थित है। पास में तीन गांव है- कोकोड़ी, कोदागांव और जगड़हिन पारा। ये सभी गांव स्कूल से 3 से 4 किमी की दूरी पर हैं। यह स्कूल नर्सरी से कक्षा 8 तक संचालित हैं। वर्तमान सत्र में 40 बच्चे अध्ययनरत हैं, जो 3 से 15 आयु वर्ग के हैं। वर्तमान में स्कूल का अपना भवन है, पर स्कूल की शुरुआत ‘घोटुल’ में 2 बच्चों, जिसमें एक लड़की थी, और 3 शि‍क्षकों के साथ अगस्त 2007 में हुई थी। यहां कोई परीक्षा नहीं होती है। स्कूल को वित्तीय मदद ‘आकांक्षा पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, चैन्नै’  द्वारा दी जाती है, जोकि एक सत्र में अधिकतम 60 बच्चों के लिए निश्‍चि‍त है। स्कूल के तीन चौथाई बच्चे मुरिया एवं गोंड़ जनजाति के हैं। शेष बच्चे अनुसूचित और पिछड़ी जातियों यथा कलार, गांडा एवं पनका जाति समूहों से सम्बंधित हैं। 90 प्रतिषत बच्चे पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं।’’

इसके पहले कि मैं इमली महुआ स्कूल के बारे में विस्तार से बात करूं, मुझे लगता है कि हम उस आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को समझने का प्रयास करें जिनके बीच ‘स्कूल’ काम कर रहा है। इससे जहां हम एक ओर आदिवासी जीवन के रीति-रिवाज, ज्ञान, परम्परा एवं विश्‍वास की एक झलक देख सकेंगे, साथ ही स्कूल की राह आ रही कठिनाइयों, चुनौतियों एवं शि‍क्षकों के समर्पण को भी जान-समझ सकेंगे। आजादी के 68 साल बाद भी बालेंगापारा का चतुर्दिक वनवासी जीवन विकास से दूर एवं आधुनिकता से अछूता है। वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीते हैं। अपनी आजीविका एवं भोजन के लिए वे खेती और शि‍कार पर आश्रित हैं। मछली पकड़ना, छोटे जानवरों खरगोश, सुअर आदि का शि‍कार करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। पशुपालन भी करते हैं, पर दूध के लिए नहीं, बल्कि गोश्‍त के लिए। क्योंकि आदिवासी समाज दूध पर बछड़े का ही हक मानता हैं, मनुष्‍य का नहीं। आदिवासी समाज अपने बच्चों के साथ इज्जत से बर्ताव करता है। माता-पिता बच्चों के स्वाभिमान की रक्षा करते हैं। छोटे बच्चों से काम नहीं करवाया जाता हालांकि बच्चे अपने बड़ों को काम करते हुए देखकर काम करने का तरीका सीख जाते हैं और बड़े होने पर उनकी मदद करते हैं। आदिवासी समाज में स्पर्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। परस्पर सहयोग भावना इन्हें मजबूत बनाए हुए हैं। उनकी भावना को सम्मान देते हुए स्कूल में भी कोई प्रतिस्पर्धा आयोजित नहीं की जाती। आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर स्कूल बन्द कर दिया जाता है क्योंकि वे स्कूल को खुशि‍यों का घर मानते हैं और ऐसे मौके पर स्कूल खोलना उनके प्रति असंवेदना का ही प्रदर्शन होगा। आदिवासी समाज, विशेषरूप से मुरिया और गोंड जानजातियों में अपने बच्चों को परम्परागत ज्ञान,  नृत्य,  संगीत एवं कला सीखने-सिखाने की संस्था ‘घोटुल’ होती है, जिसमें एक बड़े कुटीर में सभी युवक-युवतियां शाम से सुबह तक निवास करते हैं। इसमें अपना जीवन साथी चुनने की भी छूट होती है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। यहां वे पारिवारिक और सांसारिक समझ विकसित करते हैं। हालांकि यह चलन शहरी संस्कृति के दबाव एवं बाहरी लोगों के दखल से अब बहुत कम हो गया है।

इमली महुआ स्कूल।

विद्यालय का आरम्भिक नाम रखा गया था ‘इमली महुआ नई तालीम सेण्टर फार लर्निंग’। पर यह बच्चों के लिए याद कर पाने और बोलने के लिए बहुत लम्बा था, तो बच्चो ने आपसी निर्णय से एक नया नाम चुना- ‘इमली महुआ स्कूल’। स्कूल बारहों महीने सोमवार से शनिवार प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक लगता है। हरेक बच्चे का नाम किसी न किसी कक्षा में अंकित होता है, पर बच्चे सामूहिक रूप से पढ़ते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले तक स्कूल में कक्षाओं की बजाय आयु आधारित बच्चो के चार समूह थे जो सपरी (3-5 वर्ष), सेमर (7-12 वर्ष), सीताफल (8-10 वर्ष) और सूरजमुखी (11-15 वर्ष) नाम से पहचाने जाते थे। यहां पढ़ाये जाने वाले विषयों में अंग्रेजी, गणित, हिन्दी, विज्ञान, पर्यावरण शि‍क्षण/सामाजिक बदलाव, योग, संगीत, मिट्टी का काम, चित्रकला, कढ़ाई-बुनाई जैसे विषय शामिल हैं। स्कूल के शि‍क्षण की माध्यम भाषा हिन्दी के और हल्बी हैं। क्लास बच्चों की मांग पर होती है। बोर होने पर बच्चे मना कर देते हैं। बच्चे रोजाना कई अलग-अलग तरह की गतिविधियां करते हैं और पढ़ाई भी उन्हीं का एक हिस्सा है। लूडो, कैरम, सांप-सीढ़ी, शतरंज, क्रिकेट के साथ ही लकड़ी के गुटकों और मांटेसरी की शैक्षिक सामग्री से भी अनेक आकृतियां बनाते-बिगाड़ते हुए बच्चे खेलते रहते हैं। दरअसल, यह खेलना भी एक प्रकार का सीखना है। कुछ बच्चे दिनभर खेलते हैं। स्कूल में न तो घण्टी बजती है, न स्कूल का गेट बंद होता है। बच्चे कभी भी आ सकेते हैं और जब चाहें घर जा सकते हैं। समय का आकलन सूरज को देखकर कर लेते हैं। बड़े बच्चे घर का काम करके आते हैं। यहां कक्षाएं और टाइम टेबिल का बंधन नहीं हैं। खुला सत्र भी होता है जिसमें बच्चे कोई भी प्रश्‍न पूछ सकते हैं। हर बच्चा अलग-अलग चीजें करता है। एक ही समय में कुछ बच्चे सिलाई-कढ़ाई और मिट्टी का काम करते हैं तो कुछ तबला-हारमोनियम पर अभ्यास कर रहे होते हैं। हम प्रत्येक दिन छोटी चैकियों पर बहुत सारी किताबें और लर्निंग मैटेरियल इस तरह से बिछा देते हैं कि बच्चे आसानी से उन्हें देख सकें और तब वे अपनी रुचि एवं सुविधा अनुसार सामग्री चुन लेते हैं और शि‍क्षक के साथ काम करते हैं। फिर दो घण्टे बाद मिलते हैं तब हाजिरी ली जाती है और बातचीत करते हैं। दोपहर का समय सामूहिक भोजन का समय होता है। बच्चे भोजन अपने घरों से लाते हैं, पर हरेक दिन कुछ बच्चे टिफिन नहीं ला पाते, तब स्कूल से उतनी थालियां ली जाती हैं और सभी बच्चे एवं शि‍क्षक अपने टिफिन में से भोजन का थोड़ा हिस्सा थालियों में क्रमश: रखते जाते हैं। इस प्रकार टिफिन साझा करते हुए बच्चे भोजन का आनन्द लेते हैं। सप्ताह में एक बार पूरे स्कूल का एक साथ लाईब्रेरी क्लास होती है जहां बच्चे पुस्तकों को पढ़ने के साथ-साथ उनका रखरखाव, रजिस्ट्ररों में पुस्तकें दर्ज करने एवं उनको एक पहचान संख्या देने, पुस्तकें निर्गत करने एवं जिल्दसाजी करने जैसे काम सीखते हैं। गत सत्र में पास के सरकारी स्कूल के बच्चे भी शामिल हो जाते थे, लेकिन अब उनका आना बन्द हो गया है।

शुक्रवार के दिन स्कूल आधे दिन का होता है और शुरुआत सामूहिक गान से होती है। उसके बाद स्कूल की सफाई, रखरखाव, मरम्मत और सामान की गिनती का वक्त होता है जिसमें बाल्टी, मग, लोटा, झाड़ू आदि की गिनती होती है। कच्चे फर्श की गोबर से लिपाई की जाती है। साढ़े दस बजे तक ये काम निबटाने के बाद सामूहिक नाश्‍ते का समय होता है और तब चने, मौसमी फल, खजूर, आदि मिल बांटकर खाते हैं। वैसे कुछ साल पहले तक शुक्रवार की दोपहर के बाद का समय हाट जाने का होता था और सूरजमुखी समूह के बच्चे अपने बनाये हुए मिट्टी के काम- खिलौने, घड़े आदि बाजार बेचने जाते थे और स्कूल के लिए सप्ताह भर का राशन एवं हरी सब्जियां लाते थे, पर अब इसमें बदलाव किया गया है और लगातार बदलाव करते रहना ही इमली महुआ की खूबी है। लेकिन ये बदलाव बच्चों का सामूहिक निर्णय है जो संवाद आधारित होता है। स्कूल में बच्चे अपनी दिनचर्या खुद तय करते हैं। पढ़ने के लिए कोई भी किसी बच्चे को मजबूर नहीं कर सकता। प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘यहां हरेक को छूट और स्वतंत्रता है। आजादी के कारण हम फलते-फूलते हैं और उसके अभाव में मुरझाते हैं।’’

शनिवार का दिन बाहर घूमने का दिन होता है। छोटे बच्चे दो समूहों में जंगल या किसी पहाड़ी पर पिकनिक मनाने जाते हैं। बड़े बच्चे साईकिल से आसपास के गांवों, महत्वपूर्ण इमारतों, सांस्कृतिक स्थानों की यात्रा पर जाते हैं। यह यात्रा 20 से 50 किमी तक की हो सकती है। स्वाभाविक है कि वापसी पर वे अपने अनुभव लिखते हैं और अन्य बच्चों के साथ साझा करते हैं। रविवार का दिन आराम और आगामी कार्य योजना बनाने का होता है। एपीसीटी  की ओर से प्रत्येक बच्चे को छात्रवृत्ति दी जाती है, जो बच्चे और उसकी मां के संयुक्‍त खाते में जमा की जाती है।

स्कूल की अब तक की शैक्षिक-सामाजिक यात्रा पर खुशी जताते हुए प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘आदिवासी बच्चों को ऐसी शि‍क्षा दी जाए, जिससे उनकी विशि‍ष्‍ट सभ्यता बरकरार रहे और नई समस्याओं एवं चुनौतियों से निबटने की कुशलता पैदा हो। तीन-चार साल तक शि‍क्षण पद्धति शि‍क्षक केन्द्रित थी और बच्चों के हित का निर्णय शि‍क्षकों के हाथ में था। लेकिन स्कूल ने देखा कि आदिवासी जीवन में हरेक व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता है तो स्कूल ने भी बदलाव किया। अब यहां किसी मुद्दे पर सबकी राय ली जाती है और एक सामूहिक निर्णय लिया जाता है। हरेक का एक वोट निश्‍चि‍त होता है। समय-समय पर निर्णयों की समीक्षा भी होती है। साल में एक बार बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं ताकि बच्चे शहरी जीवन की वास्तविकता को नजदीक से समझ सकें। अमीर से अमीर व्यक्ति के घर ले जाते हैं और गरीब व्यक्ति के घर भी। पिछलें दिनों कुछ रेड लाईट एरिया और रैनबैक्सी के मालिक के बंगले पर ले गए थे। फुटपाथ पर जिंदगी जीते लोगों से भी भेंट होती है ताकि बच्चों का अनुभव विस्तृत हो सके और बडे़ होने पर बच्चे अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को कहीं अधिक गंभीरता के साथ निर्वाह कर सकें। हम यहां हमेशा के लिए नहीं आए हैं। वर्ष 2030 तक हम यहां रहेंगे, पर हमें विश्‍वास है, तब तक स्कूल संचालन के लिए पर्याप्त लोग तैयार हो चुके होंगे।’’

‘इमली महुआ स्कूल’ के परिवेश में लोक का संस्कार है और जीवन का लययुक्त प्रवाह भी। यहां श्रम के प्रति सम्मान है तो जिजीविषा का आह्वान भी। यहां बच्चों को उनके बालपन के निश्‍छल व्यवहार के साथ जीने की स्वीकृति है न कि पग-पग पर बड़ों का हस्तक्षेप और आपत्ति। यहां पल-पल रचनात्मक उत्साह और उल्लास है और कुछ नया गढ़ पाने का विश्‍वास भी। यहां के प्रयोग को हम प्राथमिक शि‍क्षा के क्षेत्र में एक सार्थक पहल के रूप में देख सकते हैं।

लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

कमल जोशी- एक यायावर का अचानक चले जाना : ज़हूर आलम  

कमल जोशी

हमेशा चलते रहना ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। उसने कभी विराम नहीं लिया और 3 जुलाई को बिना किसी को बताए वह सबसे लम्बी अनजान और एक अनंत यात्रा पर निकल गया। बचपन में ही लग गई एक्यूट  अस्थमा की भयंकर बीमारी से लड़ते हुए उसने पहाड़ का चप्पा-चप्पा छान मारा था, चाहे वो रूपकुण्ड और नन्दा राजजात की कठिन यात्रा हो या लद्दाख और छोटा कैलाश की अनंत ऊँचाइयों को पार करना। कम आक्सीजन के कारण जहां बड़े‎-बड़े‎ चौड़े सीने वाले महारथियों की भी साँस फूल जाती थी, वहां दृढ निश्चयी जिद्दी दमे का मरीज कमल उन ऊँचाइयों और दुर्गम पहाड़ों को हँसते–हँसते पार कर लेता था,  क्योंकि प्रकृति और पर्वत की ऊँचाइयों से उसे अगाध प्रेम था और इनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति गहरी चिन्ता थी।

उत्तराखण्ड के पहाड़-गाँव-लोगों की स्थिति को जानने समझने के लिए 1974 , 1984 , 1994 , 2004  व 2014 में डा० शेखर पाठक के नेतृत्व में पहाड़ संस्था की ओर से आयोजित ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ की लम्बी यात्राओं का वह अगुवा साथी रहा। उत्तराखण्ड के सभी राजनीतिक, समाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों/अभियानों में उसने बढ़-चढ़‎ कर अपनी महत्वपूर्ण‎ हिस्सेदारी निभाई।
कमल जोशी अपनी धुन का पक्का और बहुत जिद्दी इंसान था। बचपन में ही उसे एक्यूट अस्थमा का जानलेवा रोग लग गया था।  दुनिया भर के इलाजों के बावजूद डाक्टरों ने जवाब दे दिया था कि वह बहुत दिन नहीं बचेगा, पर उसने जिद पकड़‎ ली कि वह जियेगा ! …और बिमारी से लड़ते हुए उसने 63 साल की एक भरपूर जिंदगी बिना किसी रोक-टोक के आजादी के साथ बिल्कुल अपनी तरह से जी ! वह कहीं रुका नहीं। बस चलता रहा। वह कहता भी था, “चलना ही मेरी खुराक है और जिन्दगी भी। जिस दिन रुक गया, समझ लो…।’’

वह सबसे बेलौस तरीके से और खुलकर मिलता था। आप-जनाब वाली ‍औपचारि‍कता उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थी। इसीलिए नये-अंजान लोगों से भी वह पलभर में ही घुल-मिल जाता था और उनका दोस्त बन जाता था। इसीलिए उस पारदर्शी दोस्त के मित्रों/जानकारों की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि गिनना मुश्किल होगा। बेबाकी का यह आलम था कि वह किसी के दबाव में कभी नही आता था- चाहे वह कोई भी तुर्रमखाँ हो। उसे खुले दिमाग‎ के लोग ही पसंद थे। बकौल हरजीत-
जो तबीयत हरी नही करते
उनसे हम दोस्ती नही करते

केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद रिसर्च करने के लिए वह कुमाऊँ‎ विश्वविद्यालय नैनीताल आया था। तीन साल गहन शोध करने के बाद जब थीसिस लिखी‎ जा रही थी, अन्तिम चेप्टर मे किसी बात पर गाईड से उसके विचार नही मिले और उसने एक झटके में रिसर्च को तिलांजलि दे दी और फोटोग्राफी, पत्रकारिता, कविता, चित्रकला, सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों और यायावरी में अपना जीवन झोंक दिया। फिर कभी पीछे मुड़कर  नहीं देखा।
बेबाक पत्रकारिता, लेखन और फोटोग्राफी में उसकी नजर का और सोच का कोई जवाब नहीं था। कमल एक बहुत ही उच्चकोटि का लाजवाब फोटोग्राफर था। यह उसकी नजर का कमाल था कि उसके अधिकांश फ्रेम और कम्पोजीशन पेंटिंग जैसे लगते थे।  दिल्ली में एक बार वह मुझे मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के स्टूडियो में ले गया था। कमल और रघुराय के बड़े‎ बेतकल्लुफ ताल्लुकात थे। कमल और उसकी फोटोग्राफी के प्रति रघु राय का सम्मान देख मैं दंग था।

अस्सी के दशक में नैनीताल आने के बाद युगमंच, पहाड़, नैनीताल समाचार और उत्तरा पत्रिका से उसने अपना गहरा नाता जोड़ लिया था। जसम और युगमंच परिवार का वह स्थायी‎ सदस्य बन गया था। नाटकों, नुक्कड नाटक समारोह, कवि सम्मेलन‎, होली महोत्सव, फिल्म फेस्टिवल आदि में नैनीताल से बाहर चले जाने के बावजूद वह हमेशा अपनी उपस्थिति और भागीदारी निभाता रहा। डा. शेखर पाठक के सम्पादन में ‘ पहाड़’ और डा. उमा भट्ट के सम्पादन में निकलने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका ‘ उत्तरा’ में उसका सहयोग अतुलनीय था।

देहरादून से संजय कोठियाल के सम्पादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘युगवाणी’ में उसकी भूमि‍का बहुत महत्वपूर्ण थी। मुख्य पन्ने पर उसके द्वारा खींची एक बोलती हुई तस्वीर और उसी पर कमल का आलेख युगवाणी को नई ऊँचाइयां प्रदान कर रहे थे। अब उसके जाने के बाद युगवाणी का मुख्य पन्ना सूना हो जाएगा- जिसका पाठक महीने भर इंतजार करते थे, जिसमें पहाड़ की किसी जुझारू महिला, ढाबे वाले या किसी मासूम पहाड़ी‎ बालक-बालिका की तस्वीर और उसी से जुड़ी पहाड़ के पहाड़ से जीवन, कठोर परिश्रम और जीवन्तता बाल सुलभता पर एक विचारोत्तेजक स्टोरी होती थी। वह अपनी यात्राओं के पड़ा‎वों से उन सच्ची स्टोरियों को उठाकर कागज पर बेहतरीन लेखन शैली में उतार देता था।
वह अपने समाज के लिए प्रेम से सराबोर बहुआयामी प्रतिभा थी। जिन्दगी का अनूठा चितेरा और बेहतरीन इंसान था। उसकी बेबाक हँसीं हमेशा कानों में गूंजती रहेगी।

पिछले साल वह मेरे व मुन्नी के साथ हमारा गाइड बन कर उत्तरकाशी से हरसिल और गंगोत्री तक गया था। इस साल यमनोत्री की यात्रा का प्रोग्राम था, पर कमल वादा तोड़‎कर किसी और यात्रा पर चला गया !