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हवा में दौड़ती हैं मैगलेव रेलगाडियां : देवेंद्र मेवाड़ी

maglev train

हाल ही में जापान ने 500 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली रेलगाड़ी का सफल परीक्षण किया है। इसकी तकनीक के बारे में बता रहे हैं देवेंद्र मेवाड़ी-

जापान ने हाल ही में अपनी एक ऐसी नई रेलगाड़ी का सफल परीक्षण किया है जिसकी रफ्तार 500 किलोमीटर प्रति घंटे होगी। इतना ही नहीं, यह रेलगाड़ी लोहे की परंपरागत रेल पटरियों पर नहीं, बल्कि पटरी से ऊपर हवा में अदृश्य चुंबकीय ट्रैक पर दौड़ेगी। फिलहाल वहां पलक झपकते नजरों से ओझल हो जाने वाली ऐसी पांच रेलगाड़ियां बनाई गई हैं जो वर्ष 2027 से लोगों को रिकार्ड रफ्तार के साथ सुहावने सफर का आनंद देंगी।

आम रेलगाड़ियों से अलग ये हवा से बातें करने वाली नई रेलगाड़ियां ‘मैगलेव’ रेलगाड़ियां कहलाती हैं। मैगलेव यानी मैगनेटिक लेविटेशन, जो चुंबकीय बल से हवा में ऊपर उठ कर चुंबकीय ट्रैक पर देखते ही देखते उड़नछू हो जाती हैं। इन तेज रफ्तार रेलगाड़ियों में पटरी पर दौड़ने के लिए न पहिए चाहिए, न एक्सिल, न बियरिंग।

सुनने पर विश्वास नहीं होता लेकिन डाल्फिन जैसी चपटी एयरोडाइनेमिक्स ‘नाक’ वाली ये रेलगाड़ियां हाल के परीक्षण में खरी उतर चुकी हैं। इन तेज रफ्तार गाड़ियों को आम बोलचाल में ‘बुलेट ट्रेन’ भी कहा जाता है। जापान ने वर्ष 1964 में अपनी पहली तेज रफ्तार ‘बुलेट ट्रेन’ चलाई थी जो आज वहां लगभग 318 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से करीब 2240 किलोमीटर लंबी पटरियों पर दौड़ रही हैं।

पांच नवीनतम रेलगाड़ियों से अब रफ्तार की इस सीमा को 500 किलोमीटर तक बढ़ाने में सफलता हासिल कर ली गई है। भविष्य में 16 डिब्बों वाली ऐसी एक-एक मैगलेव रेलगाड़ी 1,000 यात्रियों को सफर पर ले जाएगी। जापान ने इन तेज रफ्तार गाड़ियों के लिए देश भर में मैगलेव रेल नेटवर्क बिछाने की योजना बनाई है। आशा तो यह भी है कि इनकी रफ्तार भारत को भी छुएगी क्योंकि जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ा आबे ने विश्व की इस नवीनतम प्रौद्योगिकी को विकासशील देशों के साथ साझा करने की इच्छा जाहिर की है जिनमें हमारा देश भी शामिल है। हमारे देश में मुंबई-अहमदाबाद के बीच जापान की बुलेट ट्रेन प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की संभावना है।

हैरतअंगेज बात यह है कि अगर पटरियों पर पहियों से यह रेलगाड़ी नहीं चलती तो बिना उन्हें छुए हवा में आखिर कैसे चलती है यह भारी-भरकम उड़न-रेलगाड़ी? और, वह भी सवारियों और साजो-सामान के साथ? न पहियों की खड़खड़ाहट, न पटरी पर चलने की खट्-खटाक-खट् की आवाज। असल में यह विद्युत-चुंबकीय चमत्कार की देन है। यह रेल परिवहन की नवीनतम प्रौद्योगिकी है और ‘मैगलेव परिवहन प्रणाली’ कहलाती है। इसके लिए लोहे की परंपरागत पटरियों के बजाय नई तरह की चुंबकजड़ित पटरियां बिछाई जाती हैं।

इस बात को समझने के लिए पहले चुंबक और चुंबकीय क्षेत्र का रहस्य समझ लीजिए। चुंबक का पता करीब 2500 वर्ष पहले लग चुका था। इसके गुण सबसे पहले लोडेस्टोन नामक पत्थर में पाए गए। शुरु में इसी पत्थर से कुतुबनुमा बनाई गई। फिर पता लगा, चुंबक के गुण उन्हीं धातुओं में आ पाते हैं जिनमें लोहा या लोहे का अंश होता है। स्टील में लोहा और थोड़ा कार्बन होता है इसलिए यह शक्तिशाली चुंबक बन सकता है। चुंबकत्व एक अदृश्य प्राकृतिक बल है।

धातु का कोई टुकड़ा चुंबक क्यों बन जाता है? इसलिए कि उस धातु में मौजूद अणुओं के समूह यानी उनके ‘डोमेन’ यहां-वहां किसी भी दिशा का रूख कर सकते हैं। लेकिन, चुंबक बन जाने पर धातु के उस टुकड़े में अणुओं के वे समूह एक ही दिशा में व्यवस्थित हो जाते हैं।

चुंबक के चारों और अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र होता है। हर चुंबक की शक्ति उसके सिरों पर सबसे अधिक होती है। ये सिरे ध्रुव कहलाते हैं- उत्तरी ध्रुव (N) और दक्षिणी ध्रुव (S)। चुंबक के सिरों के ये नाम पृथ्वी के ध्रुवों के अनुसार रखे गए हैं। चुंबक के विपरीत ध्रुव यानी उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव एक-दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं जबकि समान ध्रुव यानी उत्तरी-उत्तरी या दक्षिणी-दक्षिणी ध्रुव एक-दूसरे से दूर भागते हैं।

और हां, चुंबकत्व और विद्युत या बिजली का नजदीकी रिश्ता है। ये दोनों एक ही बल (फोर्स) के दो रूप हैं। यह बल विद्युत-चुंबकत्व और विज्ञान की भाषा में इलैक्ट्रोमैगेनेटिज्म कहलाता है। जब किसी सुचालक चीज जैसे- तांबे के तार में बिजली का करंट दौड़ता है तो उस तार के चारों ओर अदृश्य चुंबकीय क्षेत्र बन जाता है। इस तरह जो चुंबक बनाए जाते हैं, वे इलैक्टोमैगनेट यानी विद्युत-चुंबक कहलाते हैं। किसी लंबे सीधे तार के बजाय कुंडली के रूप में मुड़ा तार अधिक शक्तिशाली चुंबकत्व पैदा करता है। जब लोहे की छड़ के चारों ओर प्लास्टिक चढ़े तार की कुंडली लपेट कर उसके दोनों सिरों को बैटरी से जोड़ दिया जाता है तो स्विच आन करते ही तार की कुंडली में बिजली दौड़ने लगती है और कुंडली के भीतर की लोहे की छड़ शक्तिशाली चुंबक बन जाती है। स्विच आफ करते ही छड़ का चुंबकत्व समाप्त हो जाता है।

बस, चुंबकीय शक्ति से चलने वाली ‘मैगलेव’ रेलगाड़ियों का यही रहस्य है। मैगलेव रेलगाड़ी पटरी पर लगे इलैक्ट्रोमैगनेटों के तीव्र चुंबकीय बल के कारण हवा में कुछ सेंटीमीटर ऊपर उठ जाती हैं और चुंबकों के कारण ही हवा में सरपट भागती हैं। होता यह है कि पटरी और रेलगाड़ी पर लगे इलैक्ट्रोमैगनेटों के कारण ‘आकर्षण’ और ‘विकर्षण’ बल पैदा होते हैं जिसके कारण रेलगाड़ी हवा में तेजी से सरकती जाती है। इलैक्ट्रोमैगनेट क्षण भर के लिए चुंबकीय क्षेत्र को पलट देते हैं तो तेज विकर्षण बल पैदा होता है जिससे रेलगाड़ी हवा में टिकी रहती है। इलैक्ट्रोमैगनेट एक बार फिर चुंबकीय क्षेत्र को बदल देते हैं और रेलगाड़ी आगे सरक जाती है। हर पल कई बार यही क्रिया लगातार दुहराए जाने पर रेलगाड़ी तेज गति से भागती जाती है।

मैगलेव परिवहन प्रणाली दो प्रकार की होती है- इलैक्ट्रो मैगनेटिक सस्पेंशन यानी ई.एम.एस. और इलैक्ट्रो डाइनेमिक सस्पेंशन यानी ई.डी.एस.।

ई.एम.एस. प्रणाली में रेलगाड़ी पटरी से ऊपर हवा में रहती है और उसके नीचे लगे विद्युतचुंबक यानी इलैक्ट्रो मैगनेट नीचे पटरी की ओर झांकते हैं। इस प्रणाली में फीडबैक लूप का उपयोग करके विद्युत-चुंबकों से बने चुंबकीय क्षेत्र को घटाया या बढ़ाया जा सकता है। इसलिए इसमें स्थायी रूप से काफी चुंबक लगे रहते हैं। इस प्रणाली की रेलगाड़ियां 500 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से तो दौड़ ही सकती हैं, अगर निर्वात यानी हवा रहित सुरंग हो तो 6400 किलोमीटर प्रति घंटा तक की गति से भी भाग सकती हैं। हवा से बातें करती इन रेलगाड़ियों को केवल हवा की ही रुकावट का सामना करना पड़ता है। इस प्रणाली में अंग्रेजी के ‘सी’ (c) आकार की आर्म पर नीचे की ओर चुंबक लगा रहता है। आर्म का ऊपरी सिरा रेलगाड़ी से जुड़ा रहता है। रेल पटरी इन दोनों सिरों के बीच में होती है। पटरी व चुंबकों की दूरी घटाने-बढ़ाने से चुंबकीय बल पैदा होता है। यही बल रेलगाड़ी को हवा में उठाए रखता है और उसे धकेल कर आगे बढ़ाता है।

ई.डी.एस. प्रणाली में रेल की पटरी और रेलगाड़ी दोनों ही सुपरकंडक्टिंग चुंबकों से चुंबकीय क्षेत्र बनाते हैं। इन दोनों चुंबकीय क्षेत्रों के रिपल्सिव यानी प्रतिकर्षी बल के कारण रेलगाड़ी हवा में उठ जाती है। चुंबकीय बल से ही रेलगाड़ी भी चलती है। परीक्षण में इस प्रणाली से मैगलेव रेलगाड़ी 581 किलोमीटर प्रति घंटा की रिकार्ड गति से दौड़ चुकी है। यह गाड़ी भार भी अधिक ढो सकती है।

रही बात इस नई प्रौद्योगिकी के फायदे की, तो बिना पहियों की तेज रफ्तार मैगलेव रेलगाड़ी से यात्रा के समय में काफी बचत होती है। रेलगाड़ी पटरी से ऊपर हवा में सरपट भागती है इसलिए न पटरियों की टूट-फूट की आशंका रहती है और न आए दिन की मेंटिनेंस का झंझट। न ब्रेक फेल होने का खतरा, न पटरियों के ऊपर तार खींचने की जरूरत। मौसम भी मैगलेव रेलगाड़ी की राह में रूकावट नहीं बनता क्योंकि यह रेलगाड़ी आंधी, तूफान, वर्षा, हिमपात और कड़ाके की सर्दी में भी उसी तेजी से दौड़ सकती है। रेलगाड़ी और पटरी एक-दूसरे को छूती ही नहीं है, इसलिए पटरियों के रगड़ खाने की भी कोई आशंका नहीं। मैगलेव रेलगाड़ियों के लिए एक बार विशेष पटरी बिछा देने पर उसकी मेंटिनेंस कम होने के कारण वे लंबे अरसे तक ठीक-ठाक चलती रहती हैं। इन गाड़ियों का कुल संचालन व्यय भी परंपरागत रेलगाड़ियों की तुलना में कम होता है।

मैगलेव रेलगाड़ियां माइक्रोवेव टावरों से जुड़ी रहती हैं जिसके कारण उनका केन्द्रीय नियंत्रण केन्द्र के साथ हर समय दुतरफा संपर्क बना रहता है। मैगलेव गाड़ियों के लिए न सिगनल की जरूरत होती है, न सीटी और झंडी की क्योंकि बिजली की गति से भागने वाली इन रेलगाड़ियों को सिगनल देना किसी भी मनुष्य के लिए संभव नहीं है। ये उड़नपरियां तो बस कम्प्यूटर के इशारों पर चलती हैं। बहरहाल, हम तो यही मनाएंगे कि हवा से बातें करने वाली मैगलेव रेलगाड़ियों की यह नई प्रौद्योगिकी हमारे देश में भी आए और देखरेख की कम लागत पर हमें भी बेहतर सफर की सुविधा प्रदान करे।

तुम याद आए और तुम्हारे साथ जमाने याद आए :सुधीर सुमन

मेहदी हसन

मेहदी हसन

13 जून 2012 को उस्ताद मेहदी हसन का निधन हुआ था, पर पिछले एक साल में कभी नहीं लगा कि वे हमारे बीच नहीं हैं। वैसे भी पिछले कई वर्षों से वे गा नहीं रहे थे, इसके बावजूद वे हमारे स्मृतियों के किसी तलघर में नहीं चले गए थे, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में वे गहरे रचे-बसे हुए थे और आगे भी रहेंगे। आज बाजार आए दिन नई नई आवाजें उछालता रहता है, नए नए आकर्षणों को बड़ी धूम से प्रचारित करता है, लेकिन वे आवाजें बहुत देर तक हमारे दिलो दिमाग या जीवन में टिक नहीं पातीं, मेहदी हसन की आवाज मानो इस प्रवृत्ति को चुनौती देती है, वह मानो कहती है कि मैं कोई उपभोक्तावादी लहर से पैदा उत्पाद नहीं हूं, मैं तो मनुष्य के जीवन और संस्कृति के गहरे अनुभवों और उसकी सृजनात्मक शक्ति की अभिव्यक्ति हूं। कुछ जो शाश्वत भावनाएं हैं, जिनसे तमाम कलाएं जन्मी और विकसित हुई, उसकी अभिव्यक्ति की जो परंपरा है उसी की बेमिसाल देन हूं। मुझमें अपनी मिट्टी, अपने जल, अपनी जबान और अपने जैसे हजारो-लाखों लोगों का हाल-ए-दिल दर्ज है। इसीलिए तो बहुत सीधे और सहज तरीके की गजल ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो, मुझे तुम कभी भी भूला न सकोगे’ को जब हम मेहदी हसन की आवाज में सुनते हैं, तो वह सिर्फ किसी प्रेमी की उपेक्षा की पीड़ा और इस दावेदारी की गजल नहीं रह जाती कि उपेक्षा के बावजूद प्रेमी की वफा में इतनी ताकत है कि उसे भुलाया नहीं जा सकता, बल्कि उसमें वफा के बावजूद उपेक्षित और वंचित किए जाने की जाने कितनी दास्तानें जुड़ जाती हैं।
भारत-पाकिस्तान के रिश्ते के संदर्भ में अहमद फराज की गजल ‘रंजिश ही सही’ जरूर ज्यादा लोकप्रिय रही, शायर अहमद फराज से भी इसे सुनाने की अक्सर फरमाइशें की जाती थीं और वह भी कबूल करते थे कि यह तो मेहदी हसन की गजल हो गई है। लेकिन ‘मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो’ को सुनते हुए अक्सर मुझे लगता है, मानो इसमें उन करोड़ों लोगों के विषाद का इजहार हो रहा है, जिन्होंने इस देश और इसकी संस्कृति को रचने में साझी भूमिका निभाई, मगर इतिहास के एक खास मोड़ पर अपने मादर-ए-वतन के प्रति ही गैर वफादार करार दिए गए। खुद मेहदी हसन की जिंदगी को विभाजन की इस त्रासदी के बगैर समझा नहीं जा सकता। राजस्थान के अपने गांव और पूूरे भारत के प्रति उनके जबर्दस्त लगाव की कुछ घटनाओं की चर्चा लोग करते रहे हैं। कई बार लगता ही नहीं कि उनके द्वारा गायी गई गजल में (भले वह किसी फिल्म के लिए क्यों न गाई गई हो) महज कोई नायक किसी नायिका के प्रति संबोधित है। इसी गजल की अगली पंक्तियां हैं- न जाने मुझे क्यों यकीन हो चला है, मेरे प्यार को तुम मिटा न पाओगे/ मेरी याद होगी, जिधर जाओगे तुम, कभी नग्मा बनके कभी बनके आंसू। मेहदी हसन को सुनते हुए कभी नहीं लगता कि भारत और पाकिस्तान दो भिन्न मुल्क हैं, बल्कि ऐसा महसूस होता है कि हम बिल्कुल अभिन्न हैं।
अकारण नहीं है कि भारत में मुस्लिम विरोध और पाकिस्तान विरोध के जरिए अंधराष्ट्रवादी व सांप्रदायिक उन्माद भड़काए जाने की जो राजनीति रही है, उसका प्रतिकार करने वालों को जाने-अनजाने मेहदी हसन की आवाज बेहद सुकून प्रदान करती रही है। वे हमारे लिए हमारी साझी संस्कृति के बहुत बड़े प्रतिनिधि थे। मैंने खुद नब्बे के दशक की शुरुआत में जो पहला कैसेट खरीदा था, वह मेहदी हसन का था, जिसमें शोला था जल बुझा हूं, रंजिश ही सही, जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं आदि मशहूर गजलें थीं। बीस साल की उम्र मंे पहली बार देश की राजधानी दिल्ली एक रेडियो प्रोग्राम के सिलसिले में आया था और यहां से लौटते वक्त वह कैसेट और चांदनी चैक से एक सस्ता सा वाकमैन खरीद कर ले गया। वाकमैन तो जल्द ही खराब हो गया, पर वह कैसेट आज भी मेरे एक जिगरी दोस्त के पास सुरक्षित है।
हमारी पीढ़ी को फैज, फराज, मीर और दाग जैसे शायरों से जोड़ने वाले मेहदी हसन ही थे। उन्होंने इन शायरों की जिन गजलों का चुनाव किया, उसे सुनते हुए हम न केवल साहित्य की बेमिसाल परंपरा से जुड़े, बल्कि आधुनिक और प्रगतिशील भावबोध भी हमारे भीतर घुलता गया। अक्सर यह बात जो मन में चलती रहती है कि हिदी उर्दू की पढ़ाई अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ होनी चाहिए, तो इसके पीछे भी मेहदी हसन जैसे गायकों की भी बड़ी भूमिका है, जिन्होंने अपनी गायकी के सहारे हमें इन महान शायरों की रचनाओं की खासियत से रूबरू कराया।
मेहदी हसन के गुजर जाने के बाद उनके द्वारा गायी गई अपने पसंद की गजलों को याद करने लगा, तो तुरत दो दर्जन से अधिक गजलें जुबान पर आ गईं। मुझे महसूस हुआ कि दूसरे किसी गायक द्वारा गाई गईं पसंदीदा गजलों से यह संख्या अधिक है। बल्कि मीर, फैज, गालिब और अहमद फराज को छोड़ दें तो कई गजलों के शायरों का नाम भी जेहन में कम ही रहता है। यकीन से भरी और हौले से अपने भरोसेे में लेने वाली मेहदी हसन की आवाज का जादू ही सर्वोपरि होता है, जो उन शायरों की रचनाओं में मौजूद भावनाओं और अर्थों की बारीकियों को अत्यंत कुशलता से खोलते हुए, हमारे भाव-जगत से बेहद आत्मीय संवाद करता है। कई बार तो उनके द्वारा गायी गई किसी पसंदीदा गजल के शायर का नाम जब पता चलता है, तो हम एक अजीब सी खुशी से भर उठते हैं। ऐसा ही मेरे साथ ‘रोशन जमाले यार से है अंजुमन तमाम’ गजल सुनते हुए हुआ। मैं उन्हीं के अंदाज में इसे दोस्तों के बीच गाता भी रहा हू, लेकिन शायर का नाम ही पता नहीं था। अभी कुछ महीने पहले खुद मेहदी हसन के एक प्रोग्राम की रिकार्डिंग सुनते हुए मुझे पता चला कि इसके रचनाकार हसरत मोहानी हैं, वही चुपके चुपके रात दिन वाले हसरत मोहानी, आजादी के  आंदोलन की इंकलाबी शख्सियत हसरत मोहानी। इसी तरह इंकलाबी शायर हबीब जालिब की मशहूर गजल ‘दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुख सहते हैं’ को अपनी आवाज के जरिए मकबूल बनाने और बहुतों के दिल की आवाज का बयान बना देने का श्रेय भी मेहदी हसन को ही जाता है। मीर की गजल ‘पत्ता पत्ता बुटा बुटा हाल हमारा जाने है’ को जब मेहदी हसन की आवाज में पहली बार सुना, तो लगा कि इससे बेहतर कोई और नहीं गा सकता। और अपने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की गजल- ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी’ हो या फिर मीर की ‘देख तो दिल कि जां से उठता है/ये धुंआ सा कहां से उठता है’ और दाग की ‘गजब किया तेरे वादे पे एतबार किया’, ऐसा लगता है कि ये गजलें मेहदी हसन की आवाज के लिए ही बनी थीं। जहां तक गुलों में रंग भरे और शोला था जल बुझा हूं सरीखी फैज और फराज की कई गजलों की मकबूलियत की बात है, तो इसमें मेहदी हसन की आवाज की भी बहुत बड़ी भूमिका है। यद्यपि गालिब की गजल दिले नांदा तुझे हुआ क्या है मेहदी हसन की आवाज में मुझे व्यक्गित तौर पर उतनी प्रभावशाली नहीं लगती, लेकिन यह एक अपवाद है। परवीन शाकिर की गजल कूबकू फैल गई मेहदी हसन की आवाज में गाई गई ऐसी गजल है, जिसे अब भी खूब पसंद किया जाता है। मिलन की खुशी- (यूं जिंदगी की राह में टकरा गया कोई, दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं) और बिछड़ने का गहरा दर्द- (अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले, हमें कोई गम नहीं था गमे आशिकी से पहले) जिस गहराई से इस आवाज में अभिव्यक्त होता है, वह इसे श्रोताओं का बेहद आत्मीय बनाता है। एक गजल है- इलाही आंसू भरी जिंदगी किसी को न दे/ खुशी के बाद गमे-बेकसी किसी को न दे। अपने एक प्रिय कामरेड के संग्रह में से मैंने इसे पहली बार सुना था और लंबे समय तक समझता रहा कि यह गालिब की गजल होगी। लेकिन हाल में पता चला कि इसे मशरूर अनवर ने लिखा था और पाकिस्तानी फिल्म ‘हमे जीने दो’ के लिए मेहदी हसन ने इसे गाया था। मैं अक्सर यह भी सोचता रहा हूं कि मेरे साथी जो अपने साथियों के निजी दुखो को जाहिर करने को बहुत अहमियत नहीं देते थे और खुद भी अपने दुखों की झलक आज भी किसी को नहीं लगने देते, उनके संग्रह में यह गजल क्यों है? क्या यह इसे सुनते हुए कोई कथार्सिस होता है,  जैसे जो हमारे दुख अभिव्यक्त नहीं हो पाते, जो हमारे अंदर घर किए रहते हैं, इस गजल को सुनते हुए मानो हम उनसे मुक्त होते हैं। जिस अंदाज मे मेहदी हसन गाते हैं- उजाड़ के मेरी दुनिया को रख दिया तूने, मेेरे जहान के मालिक ये क्या किया तूने, वह दुख और शिकायत की इंतहा लगती है। अब इलाही या जहान के किसी मालिक की अवधारणा में भले ही किसी का यकीन न हो, पर दुनिया उजड़ने के दुख का श्रोताओं के अपने दुख से बिल्कुल तादात्म्य हो जाता है। उजड़ने और बिछड़ने का गम मेहदी हसन की आवाज में बड़ी असरदार तरीके से सामने आता है। और यह गम मानो वफा पैमाना भी है। फराज की गजल में जब वे गाते हैं- ढूंढ उजड़े हुए लोगों में वफा के मोती/ ये खजाने तुझे मुमकिन है खराबों में मिले, तो इसे साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।
वह आवाज आज भी गूंज रही है- जिदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मैं तो मरकर भी मेरी जान तूझे चाहूंगा। यह कोई भाववाद नहीं या किसी अपार्थिव सत्ता में कोई यकीन नहीं, बल्कि तमाम दुश्वारियों के बीच अपने होने का यकीन है। एक जिंदगी जिस जमीन और मिट्टी से विस्थापित हुई, जिसके बीच सरहदों की दीवारें खींच गईं, उसकी बाड़ाबंदियों को तोड़ती हुई, मरके भी उसी की खुश्बू में शामिल होने की यकीन है मेहदी साहब की आवाज।

आपराधिक प्रवृत्तियाँ गलत परवरिश का परिणाम: महेश पुनेठा

shekshik dakhal

शैक्षिक सरोकारों को समर्पित शिक्षकों की साझी पत्रिका ‘शैक्षिक दखल‘ (जून 2013) का सम्पादकीय-

समाज में बढ़ती जा रही आपराधिक प्रवृत्तियों-छल-छद्म, क्रूरता, बेईमानी, चोरी, हत्या, बलात्कार आदि पर सभी अपनी चिंता व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। अब तो यह हमारी रोजमर्रा की बातचीत में शामिल हो गया है। इस बात पर बल दिया जाता है कि कठोर से कठोर कानून बनाकर ही इन पर अंकुश लगाया जा सकता है। कानून का भय ही इनको रोक सकता है। पर अनुभव बताता है कि दुनिया में मृत्युदंड जैसे कानून भी आपराधिक गतिविधियों को रोक पाने में असमर्थ सिद्ध हुए हैं। भय से किसी व्यक्ति को एक अच्छा इंसान नहीं बनाया जा सकता है। यह दूसरी बात है कि उसे कुछ देर के लिए रोक भले ही लें। अवसर मिलते ही वह अपराध कर डालेगा। जैसे ही कानून का तोड़ मिलेगा उसका भय जाता रहेगा। हिटलर जैसी प्रवृत्ति रखने वाले लोगों को क्या कोई काननू अपराध करने से रोक सकता है- कोई भी कानून अपराधों को तो कम कर सकता है पर आपराधिक मानसिकता को समाप्त नहीं कर सकता।

दरअसल किसी भी समस्या को दूर करने के लिए उसके कारणों को जानना जरूरी होता है। हमें आपराधिक मानसिकता के कारणों को भी जानना होगा। इनकी जड़ कहाँ है, हम इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि आपराधिक प्रवृत्तियों वाले लोग मानसिक रूप से बीमार लोग हैं। इनकी बीमारी के कारण कहीं-न-कहीं उनके बचपन में छुपे होते हैं जो उम्र के बढ़ने के साथ-साथ बाहर प्रकट होने लगते हैं।

बच्चा बड़ा होकर कैसा नागरिक बनेगा, इस पर दो बातों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है- पहला, बच्चे का परिवेश और दूसरा, उसके साथ बड़ों द्वारा किया जाने वाला व्यवहार। परिवेश को लेकर सभी एकमत हैं कि बच्चा अपने आसपास जो देखता है या जिस तरह के परिवेश में रहता है उसका उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उसके भीतर कम या ज्यादा जितनी भी हों वही प्रवृत्तियाँ या गुण जन्म लेते हैं जो उसके आसपास रहने वाले लोगों में मौजूद होती हैं। पर बच्चे के साथ बड़ों के द्वारा किए जाने वाले व्यवहार का प्रभाव उससे अधिक गहरा और दीर्घकालीन होता है। उसके निशान बच्चे के व्यक्तित्व पर स्थायी होते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चा जन्म से अच्छा या बुरा पैदा नहीं होता है। अच्छा-बुरा वह इस दुनिया में आकर बनता है। उसमें दोनों प्रवृत्तियाँ होती हैं। घृणा और दमन से अपराध पैदा होता है तथा प्रेम और स्वतंत्रता से रचनात्मकता। बच्चों की पिटाई-फटकार और उनकी इच्छाओं का दमन उन्हें क्रूर बना देता है। उनके भीतर बदले की भावना पैदा कर देता है। बच्चा कमजोर होने के कारण भले तुरंत बदला न ले सके पर उसके अचेतन में यह भाव बैठ जाता है। जब भी मौका मिलता है वह बाहर फूट पड़ता है। माता-पिता या शि‍क्षक का बुरा व्यवहार बच्चे को बहुत नुकसान पहुँचाता है। उनकी फब्तियाँ बच्चे के संवेदनशील मन पर गहरी चोटें करती हैं। तिरस्कार व ताने बच्चे को क्रूर और अपराधिक और विकृत मानसिकता वाला बनाते हैं। जब हम बच्चे की पिटाई करते हैं या उस पर फब्तियाँ कसते हैं तो हम यह भूल जाते हैं कि बच्चे की भी अपनी गरिमा होती है। हम यह सोचते हैं कि हम बच्चे को पीटकर या फटकार लगाकर उसकी गलत आदतों को ठीक कर रहे हैं। उसका भला कर रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि हम उसके भीतर हीनता बोध पैदा कर देते हैं। बच्चे के प्रति हमारा यह व्यवहार दूसरों की नजर में तो बच्चे का मान-सम्मान तो घटा ही देते हैं, खुद अपनी नजर में भी बच्चा गिर जाता है। उसको लगने लगता है कि शायद मैं हूँ ही ऐसा जैसा मेरे बड़े मेरे बारे में कह रहे हैं। वह खुद से घृणा करने लगता है। खुद से घृणा करने वाला भला दूसरों से प्रेम कैसे कर सकता है? बच्चे पर ताने मारना उसे मानसिक आघात पहुँचाता है। उसके भीतर आपराधिक प्रवृत्तियाँ पैदा करने का कारण बनता है। गलत संगत या परिवेश पाकर इनमें तेजी से वृद्धि होने लगती है। यह धारणा गलत है कि आपराधिक प्रवृत्ति जन्मजात होती है। यह औपनिवेशि‍क धारणा है जिसके तहत कुछ जातियों को हमेशा के लिए आपराधिक जाति घोषि‍त कर दिया गया। प्रेम, प्रशंसा और आजादी से वंचित बच्चे आपराधिक प्रवृत्तियों के शि‍कार हो जाते हैं। इसीलिए प्रसिद्ध शि‍क्षाविद जे. कृष्‍णमूर्ति कहते हैं, ‘‘हमारे स्कूलों में किसी तरह के बल-प्रयोग जोर-जबरदस्ती धमकी और क्रोध को समग्रतः और पूर्णतः दूर रखा जाना चाहिए क्योंकि ये सभी चीजें हृदय और मन को कठोर बना देती हैं। क्रूरता के साथ स्नेह का सहअस्तित्व नहीं हो सकता है।’’

दरअसल जब हम किसी भी कारण से बच्चे के साथ डाँट-डपट या उसकी पिटाई करते हैं तो केवल उसके साथ दुव्र्यवहार नहीं कर रहे होते हैं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से एक गलत संदेश भी दे देते हैं कि यदि कोई गलती करता है तो उसके साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए। जबकि यह व्यवहार पूरी तरह अलोकतांत्रिक है। फलस्वरूप बच्चा भी इसी तरह का व्यवहार न केवल दूसरों के साथ करने लगता है बल्कि उसको जस्टीफाई भी करता है। इसलिए बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार बहुत खतरनाक है। जो न केवल बच्चे को नुकसान पहुँचाता है बल्कि एक अलोकतांत्रिक व्यवहार को समाज में स्थापित करता है।

प्रेम और आजादी प्रदान कर हम बच्चे को अपराध करने से रोक कर सकते हैं। बचपन में बच्चे के साथ किया जाने वाला व्यवहार उसके भविष्‍य को तय करता है। बच्चे की गलत परिवरिश उसको बरबाद कर सकती है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि यदि बच्चे के ऊपर किसी प्रकार का भय या नियंत्रण नहीं होगा तो बच्चा बिगड़ जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि भय बच्चे को बिगाड़ देता है। उसके भीतर कुंठा, दब्बूपन, नैराष्य और विकृतियाँ पैदा कर देता है। बच्चों को अनुशासित करने का यह तरीका जहाँ बड़ों के लिए जितना आसान है वहीं बच्चे के भविष्‍य के लिए उतना ही खतरनाक । हम अपने काम को सरल करने के लिए भय का सहारा लेते हैं और भूल जाते हैं कि इससे बच्चे और अंततः समाज को कितना नुकसान पहुँचा रहे हैं। अति अनुशासन मानवता के भविष्‍य के लिए घातक है । बच्चा मनोरोगी हो जाता है। अकेलापन और उपेक्षा भी बच्चों में तनाव, कुंठा और संवादहीनता पैदा कर उन्हें आपराधिकता की ओर धकेलती है। अकेलापन बच्चों के अंदर गुस्सा पैदा करता है और उन्हें क्रूर बनाता है। बच्चे को दुनिया शुष्‍क और फीकी प्रतीत होती है। उनका स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होने लगता है। ऐसे बच्चों में नशा करने की आदत और यौन विकृतियों की संभावना बढ़ जाती है। या फिर वे आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने लगते हैं। यौन विकृतियाँ बच्चों को यौन अपराधों के लिए भी प्रेरित करती हैं। पहली नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट बताती है कि नाबालिग किशोरों द्वारा अंजाम दी जाने वाली बलात्कार की घटनाओं में 188 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके पीछे कहीं ना कहीं उक्त कारण ही जिम्मेदार हैं।

बच्चों की आपस में तुलना करना भी उन्हें क्रूर बना देता है। जब हम किसी एक बच्चे की तुलना दूसरे से करते हैं तो ऐसा करते हुए बच्चे के भीतर हम दो तरह की ग्रंथियाँ पैदा कर देते हैं- पहला, उसके भीतर हीनता का भाव और दूसरा, दूसरे बच्चे के प्रति ईर्ष्‍या का भाव। संतुलित व्यक्तित्व के लिए ये दोनों भाव ही घातक हैं।

यदि सुंदर अपराधमुक्त समाज बनाना है तो हमें प्रत्येक बच्चे को सुंदर और गरिमामयी बचपन देना होगा। उसे घृणा, सजा और दमन से बचाना होगा। उसे उपेक्षा और एकाकीपन से बचाना होगा। बड़ों को अपने व्यवहार को संतुलित बनाना होगा। अपने छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति के लिए मानवीय मूल्यों की उपेक्षा नहीं करनी होगी।

कुछ लोग यह मानते हैं कि नैतिक शि‍क्षा या उपदेश देकर बच्चे को आपराधिक प्रवृत्तियों से बचाया जा सकता है। पर ऐसा नहीं है। शायद ही कोई परिवार या स्कूल ऐसा होता होगा जहाँ नैतिक प्रवचन बच्चों को न दिए जाते हों। हमारे समाज में हर बड़ा बच्चों को उपदेश देने में कहाँ पीछे रहता है। पर कितना असर है उसका, दिखाई दे रहा है। दरअसल हम यह भूल जाते हैं कि- जहाँ शब्द नहीं पहुँचते वहाँ कर्म पहुँचता है। बच्चा शब्दों को नहीं, कर्म को देखता है। अपने माता-पिता-शि‍क्षक और आसपास के वातावरण को देख बच्चा स्वयं मूल्यों को आत्मसात करता है। बच्चे को दिए जाने वाले उपदेशों की अपेक्षा उसके साथ किए जाने वाला व्यवहार और उसका परिवेश उसके व्यक्तित्व निर्माण में अधिक कारगर भूमिका का निर्वहन करता है। इसमें परिवार की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह माना जाता है कि बच्चा प्रारंभिक वर्षों में सबसे अधिक सीखता है। जैसा कि अपने एक निबंध ‘शि‍क्षा का नया आदर्श’ में प्रेमचंद भी लिखते हैं, ‘‘शि‍शु के पहले पाँच-छः साल मनुष्‍य को जैसा बना देते हैं, वैसा ही वह बन जाता है।….इसी उम्र में बच्चे हमारे अज्ञान के कारण झूठ बोलना, झूठे बहाने करना और चोरी करना सीखते हैं। इसी उम्र में आलस्य की और आरोग्य के विरुद्ध आचरण करने की आदत पड़ती है। इसी उम्र में वे जिद्दी, स्वार्थी और कायर होते हैं।’’

बच्चों को अच्छी परवरिश वे ही माता-पिता दे सकते हैं जो कुंठाओं और तनावों से मुक्त हों। अब यहाँ एक यक्ष प्रश्‍न है कि ऐसे माता-पिता जो गरीबी-शोषण-उत्पीड़न में जीवन जी रहे हैं, जिनका जीवन अस्थिर-अनिश्‍चि‍त-असुरक्षित और तमाम भय-आशंकाओं से भरा हो, उनसे कैसे आशा की जा सकती है कि वे अपने बच्चे को स्वस्थ, सुंदर एवं भयमुक्त बचपन दे पाएंगे?

सम्पादकीय सम्पर्क-
दिनेश कर्नाटक
ग्राम व पोस्ट रानीबाग
नैनीताल, उत्तराखंड
पिन- 263126

Email-dineshkarnatak12@gmail.com, punetha.mahesh@gmail.com

एक प्रतिः  20 रुपये, पांच प्रति: 100 रुपये, दस प्रति: 200 रुपये, आजीवन: 1000 रुपये

सड़कों का राजा, एक चि‍तेरा : नि‍धि‍ सक्‍सेना

jean michel basquiat

अमेरि‍का के चि‍त्रकार जीन माइकल बोस्‍कुएत पर नि‍धि‍ सक्‍सेना का लेख-

तुम्‍हें याद है कि‍ तुमने चि‍त्र पहले बनाया था या अक्षर पहले लिखे थे? याद करो… घर की दीवारों पर चॉक या पेंसि‍ल चलाई थी गोल-गोल? क्‍या कहते हो, वह कटा-पि‍टा गोल-गोल जो तुमने रचा था, क्‍या चि‍त्र था? सोचो…ऐसी कि‍सी दीवार के सामने जाओ। देखो। सोचो। क्‍या यह कटा-पि‍टा चि‍त्र है? क्‍या माँ का चेहरा बनाया तुमने? या फि‍र अपना या पापा का मूँछों वाला चेहरा? एक गोल या चौकोर? क्‍या कहते हो, वह चि‍त्र है? ‘‘है तो।’’ क्‍या बडे़ कहते हैं, ‘‘नहीं, यह तो अच्‍छा चि‍त्र नहीं। इसे ठीक से बनाओ। हू-ब-हू बनाओ।’’ अगर कोई ऐसा कहे तो उससे कहना, ‘‘हू-ब-हू तो पहले ही बन चुका है, उसकी नकल करने से क्‍या फायदा?’’ मुझे तो माँ का चेहरा वैसा ही बनाना है, माँ जैसा प्‍यारा-प्‍यारा… और पापा का मूँछें असल में जि‍तनी हैं, होंगी उतनी, पर मुझे तो और भी बड़ी दि‍खती हैं, सो मैं खूब बड़ी मूँछें बनाऊँगी!

अमेरि‍का में एक चि‍त्रकार हुआ- जीन माइकल बोस्‍कुएत। उनके चि‍त्रों के आकार बचपन में हमारे बनाए चि‍त्रों से काफी मि‍लते हैं- बि‍खरा रंग, बाहर नि‍कलता, खूब कटा-पीट, कटे, टेढे़-मेढ़े चेहरे और सामान। शब्‍द  और अक्षर भी उनके चि‍त्रों का हि‍स्‍सा हैं। जीन जो कहना चाहते हैं, बताना चाहते हैं, जोर-शोर से कहते हैं। बि‍ना परवाह कि‍ए कि‍ भाषा कैसी है, कैसी बात है। भाषा तो मुख्‍य नहीं होती, बात होती है मुख्‍य। भाषा तो बदलती-बढ़ती है। अलग-अलग होती है। बच्‍चे से बूढे़ होने तक ही कई बार बदलती है। जीन ने चि‍त्र बनाने के नि‍यमों की कोई परवाह नहीं की। चि‍त्र बनाए और बहुत तेजी से बनाए, क्‍योंकि‍ उनके मन-मस्‍ति‍ष्‍क में ढेरों-ढेरों बातें जमा थीं। जीन ने छोटी-सी उम्र में ढेर सारे चि‍त्र बनाए। आज भी उनका बहुत नाम है। कला में एक धारा ही शुरू कर दी जीन ने।

जीन भी आदमी को या चीजों को वैसा ही बनाने के चक्‍कर में नहीं पडे़, जैसा उन्‍हें पहले से बनाया जा चुका है हू-ब-हू। उन्‍होंने उन्‍हें ऐसे बनाया कि‍ बस वे पहचान में आ जाएँ। यानी उसका कि‍रदार चरि‍त्र उस चि‍त्र में आ जाए ठीक-ठीक। नाप-तौल के नहीं, तकनीक नहीं। यह भी हो सकता है कि‍ जीन को सब चीजें दि‍खती ही ऐसी हों, या जीन का मन करता हो कि‍ सब चीजें ऐसी ही हो जाएँ। सीधी-सपाट न रहें। कुछ टेढ़ी, बाकी ति‍रछी, अलग-अलग रंग की। जैसे यदि‍ जीन कि‍सी आदमी का मुँह लाल रँगते हैं तो लाल रंग का आदमी तो होता नहीं, लेकि‍न लाल रंग का भाव होता है जरूर। उस व्‍यक्‍ति‍ के भीतर लाल रंग का भाव होगा। और हम बाहर से जैसे दि‍खते हैं, वैसा तो सब हमें देख ही रहे हैं। असल तो भीतर से कैसे हैं, वह है। सो जीन ने दरअसल उस व्‍यक्‍ति‍ का चरि‍त्र रंग दि‍या- असल चेहरा।

jean michel basquiat

मुझे जीन के चि‍त्रों में एक चि‍त्र बहुत पसंद है- रात में घूमते कुत्‍ते का चि‍त्र। इस चि‍त्र में कुत्‍ते का चेहरा आदमी के चेहरे जैसा है जि‍समें उसकी नाक और दाँत प्रमुखता लि‍ए हैं। अब नाक का मतलब होता है अभि‍मान और दाँत दैत्‍य की तरह सब कुछ चबा जाने वाले हो सकते हैं। इस कुत्‍ते के आसपास रात काली है और आकाश में जहाँ चाँद चमक रहा है बस वहीं कुछ कम-सी रोशनी है। पर चाँद भी पूरा नहीं आया है। बल्‍कि‍ आकाश में दो चाँद हैं एक काली रात में रात-सा काला चाँद और दूसरा नीली रोशनी में चमकता चाँद। यह असलि‍यत और सपने का फर्क लगता है। चमकता चाँद बस सपने में है शायद।

चि‍त्र बनाने से पहले जीन ने लि‍खना शुरू कि‍या दीवारों पर लि‍खना, अलग-अलग तरह के शब्‍द। उन शब्‍दों में कहीं-कहीं छोटे-छोटे चि‍त्र भी होते थे। कभी जो लि‍खते उसे काट भी देते थे। क्‍या दीवारों पर लि‍खा कुछ चि‍त्र भी हो सकता है? तकनीक में बि‍ना उलझे सीधे-सीधे, जल्‍दी-जल्‍दी बात कह दी, बहुत ही जल्‍दी। जैसा प्रकृति‍ ने रचा है, उससे अलग, बहुत अलग। जैसा व्‍यक्‍ति‍ अंदर से दि‍खता है या मन से होता है। उनके लि‍ए चरि‍त्र मूल था, चेहरा नहीं। चरि‍त्र ही दरअसल उनके लि‍ए चेहरा था। बहुत ही ऊबड़-खाबड़ दुनि‍या रही होगी जीन की। अनि‍श्‍चि‍त्‍ता थी बहुत उनके जीवन में। वह समय भी ऐसा ही था। वि‍श्‍वयुद्ध से नि‍कली दुनि‍या, तेज बढ़ता औद्योगीकरण- मालूम नहीं कहाँ जा रहे हैं। क्‍यों जा रहे हैं। और इस सबसे भी ज्‍यादा था, गुस्‍सा। जीन काले थे, अफ्रीकी मूल के। लोग बस इस कारण उन पर शक करते, उन्‍हें बेइज्‍जत भी करते। वही गुस्‍सा था जि‍से उन्‍होंने चि‍त्रों में बदल दि‍या। और दुनि‍या को, दुनि‍या की सब चीजों और लोगों को आँका-बाँका, टेढ़ा-मेढ़ा कर दि‍या। शायद संशय भी था और वि‍श्‍वास भी न था इन सब के ऊपर। यह जीन के खि‍लन्‍दड़ स्‍वभाव का ही नतीजा था कि‍ वे खेल-खेल में ही रच देते थे। उनके चि‍त्रों ही से पता चला है कि‍ उन्‍हें लोगों और चीजों को ऐसा बनाने में बहुत मजा आता था। जीन से कि‍सी ने पूछा भी, ‘‘आपके चि‍त्रों में क्‍या हास्‍य है?’’ तब जीन ने कहा, ‘‘हास्‍य? कोई गि‍र जाए तो लोग हँसते हैं। क्‍या यह है हास्‍य?’’ वे बहुत तेजी-से पेंट करते थे। बस एक घण्‍टे में बड़ा-सा कैनवास चि‍त्र पूरा कर लेते थे। जल्‍दी से भीतर की बात को अभि‍व्‍यक्‍त कर देना।

चि‍त्र की तकनीक को वह फि‍जूल मानते थे। उनका तो पूरा का पूरा ध्‍यान चि‍त्र में कही बात और भाव पर था। जीन के लि‍ए मेज को मेज-सा या कुत्‍ते को ठीक कुत्‍ते-सा बनाया जाना बि‍ल्‍कुल जरूरी नहीं था, क्‍योंकि‍ वह तो बन ही चुका है। आकृति‍ और रंग ऐसे होने चाहि‍ए, जो उस भाव को प्रकट करते हों और उसे भाव को पेंटिंग में असर होना चाहि‍ए। उनके चि‍त्रों में कुछ भी यूँ ही नहीं था। वह सब कि‍या जा रहा था। एक गहरी दृष्‍टि‍ से नि‍कला था। जीन की जिन्‍दगी से और स्‍वभाव से नि‍कला था। काले होने के दर्द से नि‍कला था। उन्‍होंने अपने चि‍‍त्रों में अधि‍कतर बहुत चकमक-चकमक रंग लगाए, भड़कीले और कहीं बस सफेद। कहीं बस काला, कहीं काला-सफेद। इससे भी महत्‍वपूर्ण बात यह है कि‍ जीन ने कभी अपने बन चुके कैनवास को रुपये-पैसे की तरह संभालकर, छि‍पाकर नहीं रखा। उन्‍हें गलि‍यों का चि‍त्रकार भी कहा जा सकता है। उन्‍होंने गटर के ढक्‍कन, लोगों के दरवाजों, सड़कों, दीवारों, ट्रेन- हर जगह चि‍त्र बनाए और उन पर अपना अधि‍कार जाहि‍र नहीं कि‍या, बल्‍कि‍ उन्‍हें यूँ ही छोड़कर चले गए। आगे बढ़े और.. और चि‍त्र बनाए। एक बार भाव मन से जो नि‍कल गया, रच गया तो उस भाव से कोई मोह नहीं। वह अपना काम कर चुका है। जीन के इस स्‍वभाव के कारण उसे सड़कों का कलाकार भी कहा गया।

(चकमक, जुलाई 2012 से साभार) 

अपशब्दों में आत्मनिर्भर होता समाज : प्रभु जोशी

प्रभु जोशी

प्रभु जोशी

हिन्दी को फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ देने के नाम पर हो रहे षड्यंत्र को सामने लाता प्रभु जोशी का आलेख-

भारतीय समाज में सम्पन्न होने और बनने की ऐसी उतावली कदाचित इसके पहले कभी भी इतनी अनियंत्रित होते नहीं देखी गयी, जितनी कि पिछले वर्षों में हमें दिखाई देने लगी है। हम लोग अब किसी भी क्षेत्र में पिछड़ना नहीं चाहते। हम अपनी हीनता-ग्रंथि से बाहर निकलना चाहते हैं। हीनताबोध से बाहर लाने के लिये ‘सबसे आगे होंगे, हिन्दुस्तानी’ बाजार के आशावाद द्वारा निर्मित यह दावा, इतने ऊँचे स्वर में किया जाने लगा कि वह लगभग धमकी में बदल चुका है। वैसे इन दिनों धमकी दे सकने की कुव्वत अपने आप में एक किस्म की समृद्धि का प्रतीक है, जिसे अब हर कोई हासिल करना चाहता है। यह एक नई भद्र-हिंसा है, जो पहले जमींदारों-जागीरदारों के शक्तिवान होने की पहचान हुआ करती थी। वे छूटते ही किसी को भी गाली दे सकने को अपनी हैसियत की तसदीक समझते थे। उनके लिये यह अपने अहम् की तुष्टि की सर्वाधिक आसान विधि थी। यह समाज में सामर्थ्य की गैर-बराबरी को बताती थी। लेकिन, अब ऐसा जागीरदाराना अहम् चारों-ओर है और सभी के पास अहम् इफरात में है। अतः अब सभी जागीरदार हैं।

दरअसल, गाली अहम् की तुष्टि की अभिव्यक्ति है। इसलिए, जिस तरह पिछले वर्षों में व्यक्ति का अहम् बढ़ा, गालियों की तादाद में इजाफा हो गया। इस बीच मीडिया और फिल्म से जुडे़ लोगों की इलहाम हुआ कि हमारे पास अपशब्दों का टोटा पड़ रहा है। उनकी प्रहार क्षमता छीज चुकी है। नतीजतन, अब अपशब्द काफी ऊँचे प्रतिशत में अंग्रेजी से लिये जाने लगे हैं। हिन्दी में यह प्रत्यक्ष अँग्रेजी निवेश है। इसमें ली गई पूँजी को लौटाने का कोई अनुबन्ध नहीं है। इस पर शून्य-प्रतिशत सूद है। अतः इन दिनों उधार के अपशब्दों का खुलकर उपयोग और उपभोग होने लगा है। कदाचित् फिल्म-उद्योग ने इसी को ध्यान में रख कर गालियों की नई पैकेजिंग की। ईडियट, बास्टर्ड, मदर-फकर जैसी गालियाँ अंग्रेजी में होने से हिन्दी की तुलना में अधिक भद्र और वरेण्य हो गयीं। कहा जाने लगा कि यह भाषा में हमारे समय और समाज के यथार्थ की स्वीकृति है। इसे कतई अग्राह्य नहीं कहा जा सकता। हिन्दी अपनी बासी लद्धड़ता छोड़कर बोलचाल की भाषा बन रही है। अब तक वह पंडिताऊ थी। वह अवरूद्ध समाज गढ़ रही थी। उसने अब कहीं जाकर आम-आदमी की भाषा बनने का संकल्प प्रकट कर दिया है। कभी-कभी विचार भी उठते हैं कि क्या आम आदमी, जो पचास करोड़ की संख्या में है और हिन्दी बोलता है, वह माँ-बहिन के गुप्तांगों को लेकर दी जाने वाली गालियों को अंग्रेजी में प्राप्त करके किसी उपलब्धि के बोध से भर गया है? क्या यही भाषा का नवीनीकरण है?

भाषा मनुष्य द्वारा शताब्दियाँ खपा देने के बाद हासिल किया जाने वाला सर्वाधिक विराट सामाजिक-सांस्कृतिक आविष्कार है। किसी भी समाज को सभ्य और सम्पन्न होने का प्रमाण, उस समाज की भाषा की उस शक्ति से प्रमाणित होता है कि उसमें ‘सम्प्रेषण’ के साथ ‘चिंतन करने’  की कितनी सामर्थ्य है? उसके पास कितना बड़ा शब्द-भण्डार है। कहने की जरूरत नहीं कि हिन्दी के पास दुनिया की किसी भी भाषा से बड़ी शब्द-सम्पदा है। क्योंकि, उसके पास भाषाओं की भाषा संस्कृत ही नहीं, बल्कि सैकड़ों बोलियों और उपभाषाओं की भी अथाह शब्द-पूँजी है। उसका अपनी इन सहोदराओं से जो गहरा रक्त-संबंध है, उसी ने उसको यह शक्ति दी है। मुझे हिन्दी के संदर्भ में हमेशा उस महाशक्ति दुर्गा के रूपक का स्मरण हो आता है, जिसने तमाम देवी-देवताओं से विभिन्न अस्त्र-शस्त्र लिये और जिसकी वजह से वह ‘शक्तिरूपेण संस्थिता’ बन कर तीनों लोकों में अपराजेय सिद्ध हुई। लेकिन, हिन्दी अपनी इस शक्ति के बावजूद, अपने ही लोक में पराजित और अपमानित है। बताया जा रहा है कि वह दरिद्र और अपाहिज है। वह अभिव्यक्ति में असमर्थ है। न वह प्रेम को प्रकट कर पाती है, न क्रोध को। क्रोध की भद्रता के लिए अंग्रेजी की गालियों का आश्रय लेना पड़ रहा है। इस उत्तर-आधुनिक युग में वह टिक नहीं पायेगी। यदि उसे ‘कोलोक्वल’ नहीं बनाया गया। अतः मीडिया आमतौर पर तथा फिल्मों ने खासतौर पर भाषा के इस उत्तर-कार्य का जिम्मा अपने मत्थे ले लिया। साहित्य में भवानी-भाई की एक काव्यपंक्ति पहले भाषा की सरलता के लिये काव्याज्ञा बनी फिर पिटाई के लिये लाठी। ‘जैसा बोलता है, वैसा तू लिख।’ इसकी मदद केवल सम्प्रेषण ही को साहित्य का अभीष्ट बना कर कला-विवके के आग्रह के हाथ-पैर तोड़े गये। सबसे पहले उसके व्याकरण को तोड़ना था, क्योंकि व्याकरण भाषा की माँस-पेशियाँ होती हैं। उनके टूटने पर भाषा अपाहिज होने लगती है। उन्होंने कहा कि व्याकरण की रिजिडनेस हिन्दी को व्यापक बनने में बाधा पैदा कर रही है। उसे हटाया जाना जरूरी है। इससे हिन्दी को एक फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ मिलेगी।

कुल मिलाकर हिन्दी को फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ देने के नाम पर उसे केवल बोलचाल भर की भाषा बनाने का सुनियोजित अभियान शुरू हो गया। इस तरह की हिन्दी को बोलचाल की भाषा कहकर विज्ञापनों और फिल्मों में इस कदर प्रचारित और प्रचलित बनाया कि एक ठीकठाक सी तमीजदार हिन्दी बोलने वाला व्यक्ति युवाओं के लिये मसखरा लगने लगा। ‘भैंचोऽ’ का ध्वनि-साम्य पैदा करने वाला ‘रैंचो’, युवा-वर्ग का नया पूजनीय नायक बना। जो हरेक को अंग्रेजी में दी जाने वाली गालियों के धड़ल्ले से उपयोग करने से तालियाँ लूटने वाला बना। प्रेम ने ‘आराधना’ और ’उपासना’ को कपड़े की तरह उतारा और कमीना इश्क होना स्वीकारा। एल.के.पी.डी. की अश्‍लीलता का नया अन्वय आया। यह उत्तर-आधुनिक ‘वासांसि जीर्णानि‘ का पाठ बना। कुल मिलाकर, एक गलेण्डी और अपशब्दों से भरी अभद्र व लम्पट भाषा, युवा की अभिव्यक्ति का आदर्श बन गयी। यही वजह है कि माँ को ब्लडी-विच कहने पर लड़का ममाज-ब्वॉय होने के लाँछन से बचा और उसने नया पौरुष प्राप्‍त किया। भाई को चेस्टिटी बेल्ट कहने वाली युवती बन्दी-बिन्दास और बोल्ड हुई। कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधने की पुरानी और लद्धड़-रस्म के बजाय सेक्समेट का वेलेण्टाइन-थ्रेड देहमुक्ति का पोस्ट मार्डन प्रतीक हुआ। यौनोन्मुखता ने नए कीर्तिमान रचते हुए सलमान खान की यौनिक-दुलार की मुद्रा को नृत्यकला का दर्जा दिलाया और रतिक्रिया के ‘पेल्विक-जेस्चर्स‘, डांस इण्डिया डांस के आह्वान पर मध्यमवर्गी परिवार की अबोध किशोरियाँ अद्भुत और अनन्या बनीं। अर्थात फूहड़-यौनिकता की अभिव्यक्ति में उफनाते समाज में माँ-बहिन के गुप्तांगों को लेकर दी जाने वाली अंग्रेजी-गालियाँ पिछड़ेपन से उभरने का आधार बनने लगीं। एक समय में निन्दित मेहमूदाना द्विअर्थी और अश्‍लील सम्वाद की प्रतिष्ठा का पुनर्वास हुआ।

अंत में कहना यही है कि अपशब्दों को अंग्रेजी में उगलता भारतीय समाज का युवा पिछलग्गू होने में सबसे आगे है। वह यूरो-अमेरिकी ट्रेश पर परवरिश पा रहा है। एक लम्पट भाषा रूप को बोलचाल की भाषा कहने वालों की नीयत को वह समझ नहीं पा रहा है कि वे वास्तव में हिन्दी को ‘भाषा होने की हैसियत’ से अपदस्थ करते हुए केवल बोली बनाने पर उतारू हैं ताकि वे कह सकें कि ‘वी आर अ नेशन विथ लैंग्विज व्हेयरएज यू आर ट्राइबल विथ डाइलेक्ट। जी हां हम राष्ट्र हैं, क्योंकि हमारे पास भाषा है और तुम आदि‍वासी हो, क्योंकि तुम्हारे पास बोली है।’ दरअसल वह युवा में ‘भाषा विस्थापन’ की मुहिम है कि तुम नहाते-धोते, खाते-पीते, मौज-मजा करते हुए हिन्दी को उपयोग में लाओ और जैसे ही मसला ‘चिंतन’ या ’विचार’ का उठे, तुम तुरन्त अंग्रेजी में आ जाओ। यह हिन्दी को गँवारों, फूहड़ों और गलेण्डे और चिन्तन में अक्षम समाज की भाषा बनाने की मनोवैज्ञानिक रणनीति है। चिन्तन-समर्थ भाषा की भर्त्सना की जाने लगी है। पर हमें सोचना चाहिए कि क्या हम रैंचो-भैंचो की भाषा में हमारी विदेश नीति पर बात कर सकते हैं ? यह कैसी विडम्बना है कि भाषा के एक लम्पट और लुँगाड़े मुहावरे की सार्वदेशि‍क प्रतिष्ठा के प्रयास किये जा रहे हैं।

अन्त में मुझे दूरदर्शन पर प्रसारित होते रहने वाला एक विज्ञापन याद आ रहा है। जिसमें भारतीय परिधान में एक भद्र व्यक्ति अपनी बहुमंजिला रिहायिशी इमारत के तलघर में जाकर ज्यों ही अपनी कार के दरवाजे में चाभी लगाने का झुकता है, तलघर में मौजूद सुरक्षाकर्मी उसके जबड़े पर घुमाकर एक घूँसा मारता है। बाद इसके क्लोज-शॉट में बल्ला घुमाकर ठोंकने वाला धोनी दिखायी देता है। वह दुत्कारने के अन्दाज में कहता है-‘ देश बदल रहा है, भेष कब बदलोगे..?’ अर्थात् अब भद्रता की परिधान से प्रकट होती भारतीय अवधारणा धोनी वाली धुनाई के लायक है। हो सकता है, अगला और नया विज्ञापन ये आये कि ‘देश की आशायें बदल रही है, बास्टर्डों भाषायें कब बदलोगे।’

 

स्कूलों के लि‍ए जरूरी पाठ : प्रेमपाल शर्मा

प्रेमपाल  शर्मा

प्रेमपाल शर्मा

घटि‍या और महंगी पाठ्य पुस्‍तकों से छुटकारा दि‍लाने के लि‍ए सी.बी.एस.ई. की नई पहल की सराहना कर रहे हैं प्रेमपाल शर्मा-

केंद्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड (सी.बी.एस.ई.) ने (14 मई 2013) को आदेश जारी किया है कि केंद्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड से जुड़े सभी चौदह हजार स्‍कूलों में एन.सी.ई.आर.टी. और सी.बी.एस.ई. बोर्ड की किताबें अनिवार्य रूप से लगानी होंगी और उन्‍हें अपनी वैबसाइट पर यह घोषणा भी करनी होगी । ऐसा न करने पर उनकी मान्‍यता रद की जा सकती है।

निजीकरण की तरफ बढ़ती शिक्षा के मौजूदा परिदृश्‍य में इस आदेश की खास अहमियत है। मनमर्जी खोले स्‍कूलों, कॉलेजों में मनमर्जी ढंग से किताबें लगाई जा रही थीं । दुर्भाग्‍य से इस देश का हर अमीर आजकल शिक्षा के धंधे में उतर रहा है । बड़ी कम्‍पनियाँ हों या धर्म के ठेकेदार या बहुराष्‍ट्रीय कम्‍पनियाँ या दूसरे देश उनकी निगाहें इस धंधे के मुनाफे और मिलने वाली इज्‍जत दोनों पर है । यदि किसी धर्म सम्‍प्रदाय के मालिक ने स्‍कूल खोला है तो वहाँ सारा जोर धर्म की ऐसी शिक्षाओं पर है जो भारतीय संविधान के खिलाफ तो है ही, कभी-कभी समाज के विभाजन का भी कारण बनेंगी। कुछ दिन पहले तमिलनाडु की मुख्‍यमंत्री जयललिता ने 11वीं की एक किताब पाठ्यक्रम से हटाई थी। कारण था कि‍ उसमें नाडार समुदाय/जाति के खिलाफ गलत बयानी। एक ऐसी किताब जो स्‍वास्‍थ्‍य, स्‍वच्‍छता, व्‍यायाम आदि के लिए पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही थी उसमें लिखा था कि माँसाहारी लोग धोखेबाज, झूठे और बेईमान होते हैं । ये चंद उदाहरण हैं । यदि देश भर में फैले हजारों स्‍कूलों की किताबों का मुआयना करें या उन पर शोध किया जाए तो बहुत भयानक तस्‍वीर सामने आएगी । इन किताबों में उलजलूल बातें लिखना एक धर्म तक सीमित नहीं है । जहाँ जिसके विद्यालय, मदरसे हैं वहीं उन्‍होंने अपनी विचारधारा को बिना तथ्‍यों की जाँच किए ठूँस दिया । अच्‍छी बात यह है कि नए आदेशों के तहत यदि कोई ऐसा मामला, प्रकरण, गलत तथ्‍य, मिथ्‍या प्रचार किसी पुस्‍तक में शामिल पाया गया तो उस स्‍कूल की मान्‍यता रद कर दी जाएगी । अगस्‍त 2014 तक सभी स्‍कूलों को अपनी वैबसाइट पर घोषणा करनी होगी ।

प्रोफेसर यशपाल और कृष्‍ण कुमार की अगुआई में बना एन.सी.ई.आर.टी. का नया पाठ्यक्रम अपेक्षाकृत एक संतुलित पाठ्यक्रम कहा जा सकता है । इसमें पहली बार कई अच्‍छी बातें हुईं । पाठ्यक्रम बनाने से पहले 18 समूहों में पाठ्यक्रम की सोच या दशा-दिशा पर अलग-अलग समितियों में विचार हुआ। एक रूपरेखा तैयार हुई जिसे ‘राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा- 2005’ के रूप में जाना जाता है। देश भर में उस पर व्‍यापक प्रति‍क्रि‍या हुईं और फिर उनके आलोक में पाठ्यक्रम बना । पहली से लेकर 12वीं कक्षा तक। ऐसा नहीं कि पाठ्यक्रम विवादों के घेरे में नहीं आया हो । संसद में भी कई बार उस पर विवाद हुआ । 2006 में प्रेमचंद की कहानी ‘दूध के दाम’ के साथ-साथ ‘कवि धूमिल’ और दूसरे प्रसंगों पर आपत्ति उठाई गई और उन्‍हें बदला भी गया । 2012 का विवाद तो सभी को याद होगा जो नेहरू और अम्‍बेडकर को लेकर एक कार्टून पर था । एन.सी.ईआर.टी. की किताबों में पहली बार ऐसे प्रयोग किये गये जैसे- उसमें कार्टून शामिल करना, राजनीति शास्‍त्र की किताबों में उन्‍नी और मुन्‍नी के माध्‍यम से गंभीर-से-गंभीर समस्‍याओं पर खेल-खेल या कहें कि चुहुलबाजी में बड़े-बड़े प्रसंगों को उठाना आदि । कहने का पर्याय है कि शिक्षा एक स्‍थूल निर्जीव चीज नहीं है । विमर्श, बहस, आपसी सम्‍वाद से उसका रंग और निखरता है, खिलता है । लोकतंत्र की यह बुनियादी शर्त है । इस मायने में एन.सी.ईआर.टी. की नयी किताबें एक बड़ी उम्‍मीद जगाती हैं।

लेकिन ठीक इसी वक्‍त सरकारी स्‍कूलों को बदनाम करके निजी स्‍कूलों की तरफ ऐसी बयार चली कि इतनी सूझ-बूझ और मेहनत से बनाया एन.सी.ईआर.टी. का पाठ्यक्रम एक तरफ धरा रह गया ।

शासन और एन.सी.ईआर.टी. प्रशासन भी शक के घेरे में आता है । जिस भी शहर जाओ शिकायतें सुनने को मिलती हैं कि  एन.सी.ईआर.टी. की किताबें उपलब्‍ध नहीं हैं या देर से मिलेंगी । क्‍या हम अपनी भावी पीढि़यों के लिए किताबों की भी व्‍यवस्‍था नहीं कर सकते ? इसमें कहीं-न-कहीं तंत्र के बेईमानों की भी मिलीभगत रही होगी । जब किताबें नहीं मिलेंगी तो अभिभावक और बच्‍चे परेशान होंगे । इसी का फायदा उठाकर निजी प्रकाशक स्‍कूल प्रबंधन से संपर्क करते हैं और रातों-रात अधकचरी किताबें उपलब्‍ध करा दी जाती हैं । और वह भी एन.सी.ई.आर.टी. की किताबों से कई गुना अधि‍क कीमत पर । कई बार तो भरमाने के लिए उनके ऊपर यह भी लिखा होता है कि एन.सी.ई.आर.टी. पाठ्यक्रम पर आधारित । मैंने दर्जनों निजी स्‍कूलों के बच्‍चों की किताबें देखीं हैं । स्‍कूल शुरू होने के पहले ही दिन दस-बीस किलो का बंडल थमा दिया जाता है । नकद हजारों लेकर । हर क्षेत्र में सुस्‍त विद्यालय की चुस्‍ती यहाँ देखने लायक होती है । इतना बड़ा बंडल देखकर बच्‍चा डर ही जाये और अभिभावक रकम देखकर। लेकिन एन.सी.ई.आर.टी. की पाठ्य पुस्‍तक उसमें शायद ही शामिल हो । एन.सी.ई.आर.टी. की किताबें दशकों तक वही रहती हैं, लेकि‍न नि‍जी प्रकाशक मुनाफा कमाने के लि‍ए हर एक-दो साल में थोड़ा-बहुत रद्दोबदल कर देते हैं।

एन.सी.ई.आर.टी. की किताबें लगाने के कई फायदे हैं। पहला यह कि‍ सही शिक्षा से गुजरने से बच्‍चे अच्‍छे नागरि‍क बनेंगे जिसकी कल्‍पना भारतीय संविधान में की गई है । परीक्षा की प्रचलित रटंत से बचने की कोशिश की गई है और ज्यादा जोर गतिविधियों पर है। उदाहरण के लि‍ए साहित्‍य में व्‍याकरण को रटाना लगभग हटा दिया है और विज्ञान में प्रयोगधर्मिता पर जोर है । वैसे ही इतिहास, भूगोल पहले अपने आसपास की दुनिया से जोड़ता है, दुनिया से ऊँची कक्षाओं में । अभी यह सी.बी.एस.ई. के स्‍कूलों में लागू किया गया है । उम्‍मीद कि जानी चाहिए इसे हर शैक्षिक संस्‍था इसका पालन करे। किसी विशेष धर्म या बहुसंख्‍यक या अल्‍पसंख्‍यक के नाम पर इसमें छूट नहीं दी जानी चाहिए।

डॉ.कोठारी ने चालीस वर्ष पहले शिक्षा आयोग के अध्‍यक्ष के रूप में बुनियादी रूप से ऐसी ही दो बातों का आग्रह किया था । एक समान स्‍कूल यानी कि उसी टाट पर अमीर का बच्‍चा भी बैठे और उसी पर गरीब का और वो पढ़े भी वैसी ही पाठ्य सामग्री । देखते हैं कि यह अच्‍छी शुरुआत कितनी कामयाब होती है।

सी.बी.एस.ई. के स्‍कूल पूरे देश में फैले हैं । अब इस आदेश के बाद हमारे पढ़े-लिखे मध्‍यवर्ग के अभिभावकों, बुद्धिजीवियों का फर्ज है कि वे स्‍कूलों को अपने-अपने स्‍तर पर समझाएं और उनसे एन.सी.ई.आर.टी. या बोर्ड की किताबें लगाने के आदेशों का पालन करने के लिए कहें । समाज में अपनी भूमिका के लिए इस वर्ग को कुछ और मुखर होना पड़ेगा । यदि स्‍कूल में ये किताबें न हों तो वे प्रशासन को इसकी इत्तिला दें । इससे उनका किताबों आदि पर खर्च होने वाला पैसा तो बचेगा ही बच्‍चे भी बेहतर शिक्षा पाएंगे ।

‘दीवार पत्रिका’ को एक अभियान बनाए जाने की आवश्यकता है : महेश पुनेठा

school magazine

स्‍कूलों में नि‍कलने वाली पत्रि‍काओं को वि‍शेष महत्‍व है। ये पत्रि‍काएं बच्चों की भाषायी दक्षता, अध्ययन की प्रवृत्ति और सृजनशीलता बढ़ाने में सहायक होती हैं। पेश से शि‍क्षक और कवि‍-आलोचक महेश पुनेठा अपने ऐसे ही अनुभव को साझा कर रहे हैं-

बच्चों की रचनाशीलता को मंच देने और उसे प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हमने पिछले कुछ समय से ‘दीवार पत्रिका’ के प्रकाशन का कार्य प्रारम्भ किया है। यह विद्यालय के विद्यार्थियों के द्वारा किया जाने वाला पाक्षिक आयोजन है। इस पत्रिका को जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है विद्यालय की दीवार में लगाया जाता है। इसमें बच्चों द्वारा तैयार की गई कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, चुटकलों, पहेलियों, समाचार, वर्ग पहेली, सामान्य ज्ञान संबंधी तथ्य, चित्र, कार्टून आदि को एक कागज में सुलेख में लिखकर एक लंबे आदमकद चार्ट में चिपकाया जाता है। इस पत्रिका के संपादन को कार्य पूरी तरह बच्चों द्वारा किया जाता है। बच्चों का एक संपादक मंडल बनाया गया है जो विधावार विषय सामग्री का संकलन और चयन करता है। इस काम को सहज-सरल बनाने के लिए बच्चों को पढ़ने के लिए देश भर से निकलने वाली विभिन्न बाल पत्रिकाएं दी जाती हैं ताकि वे नए अनुभव ग्रहण कर उन्हें अपने तरीके से अपनी दीवार पत्रिका को तैयार करने में उपयोग कर सकें। बच्चे बहुत रुचि से पत्रिका पढ़ते हैं क्योकि उनका पढ़ना सोद्देश्य हो जाता है। उन पत्रिकाओं से भी अपनी दीवार पत्रिका के लिए उपयोगी सामग्री लेते हैं। पत्रिका में एक दूसरे को सहयोग करते हैं। अपने साथियों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। विद्यालय के बच्चों को दीवार पत्रिका की प्रतीक्षा रहती है। धीरे-धीरे यह स्थिति आने लगी है कि इस दीवार पत्रिका में छपने के लिए बच्चों में उत्सुकता बढ़ने लगी है। बच्चे पत्रिका में प्रकाशित सामग्री को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं और पत्रकारिता की बारीकियों को जानने-समझने लगे हैं।

इस दीवार पत्रिका को प्रारम्भ करते हुए कुछ कठिनाइयाँ अवश्य आयीं। बार-बार कहने पर भी बच्चों ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई। बच्चों के लिए यह एकदम नया विचार था। बच्चों को  स्वयं रचना तैयार करना बहुत कठिन काम लगता था। परंतु उन्हें निरंतर प्रोत्साहित किया जाता रहा। उनसे बातचीत जारी रखी गई। उन्हें पढ़ने के लिए बाल साहित्य दिया गया। उसके महत्व से उन्हें अवगत कराया गया। एक-दो अंक तैयार कर उनके सामने प्रस्तुत किए गए। हिंदी शिक्षण के दौरान ही उन्हें अपने विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित किया गया। छोटी-छोटी कविताएं, कहानियाँ, निबंध, लेख, यात्रा वृतांत, जीवन-प्रसंग आदि तैयार करवाए गए। समय-समय पर विद्यालय में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों और आसपास की घटनाओं की रिपोर्टिंग करवाई गई। उनमें से बेहतर रचनाओं को दीवार पत्रिका में लगाया जाने लगा। इसके लिए मासिक परीक्षाओं तक का भी उपयोग किया गया। हिंदी की परीक्षा में बच्चों को ऐसे विषयों पर लिखने के लिए कहा गया जिसमें बच्चे अपने अनुभव से बहुत कुछ लिख सकते हैं। जैसे- एक बार कक्षा नौ के बच्चों से कहा गया कि अपने जीवन के किसी ऐसे प्रसंग को लिखें ‘जब उन्हें बहुत खुशी हुई या रोना आया हो’। बच्चों ने बेहद रोचक प्रसंग लिखे। इन प्रसंगों से न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता का ही पता चला बल्कि बच्चे के भीतर झाँकने का अवसर भी मिला। यह भी जानने को मिला कि बच्चे अपने आसपास को कैसे देखते हैं ? अपने बड़ों के प्रति क्या सोचते हैं? उन्हें जीवन में कौन-सी घटना प्रसन्नता देती है और कौनसी दुःख पहुँचाती है? आदि….आदि। इसमें एक सबसे रोचक तथ्य जो सामने आया कि जो बच्चे आमतौर से कक्षा में दो-चार पंक्तियाँ भी नहीं लिख पाते थे उन्होंने दो-दो, तीन-तीन पृष्ठों में अपने संस्मरण लिख डाले। बच्चों द्वारा लिखे गए इन संस्मरणों को भी दीवार पत्रिका में स्थान दिया गया। इस घटना से हमारा भी विश्वास बढ़ा कि यदि बच्चों को अवसर प्रदान किए जाएं तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। आवश्यकता है उनकी अभिव्यक्ति को सम्मान और अवसर प्रदान करने की।

इसकी शुरुआत में एक बात और हुई। दीवार पत्रिका तो बनने लगी परंतु उसमें गिने-चुने दो-चार बच्चों की ही भागीदारी होती थी। यह सामूहिक प्रयास न होकर व्यक्तिगत जैसा ही अधिक बना रहा। कुछ बच्चे इसको समय की बर्बादी तथा फालतू का काम समझते थे। इस पर विचार कर निर्णय लिया गया कि इसके लिए बच्चों का एक समूह तैयार किया जाए। इस उद्देश्य से 6 से 12 तक की प्रत्येक कक्षा से ऐसे बच्चों का चयन किया गया जो अपनी कक्षा में सबसे बेहतर माने जाते हैं। जो पढ़ने-लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। उसमें कुछ ऐसे बच्चों को भी चुना गया जिनका हस्तलेख बहुत सुंदर है या चित्रकला में अच्छा दखल है। पूरे विद्यालय के लगभग 30-35 बच्चों का ऐसा एक समूह गठित किया गया जिसे ‘बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ’ नाम दिया गया। इनकी बैठकें आयोजित की गईं जिसका संचालन बच्चों द्वारा ही किया गया। इस समूह के बच्चों ने आपस में बातचीत कर आम सहमति और रुचि के अनुकूल दीवार पत्रिका के लिए दस सदस्यीय संपादक मंडल का चयन किया। आपस में भूमिकाओं का वितरण किया गया। अब सामगी संकलन-चयन से लेकर चार्ट में चिपका कर उसे पत्रिका का स्वरूप प्रदान करने की सारी जिम्मेदारी यही संपादक मंडल करता है। बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ की भूमिका केवल दीवार पत्रिका तैयार करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस समूह के बच्चे जब कभी भी उन्हें अवकाश मिलता है आपस में बैठकर अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। अपनी समस्याओं को एक-दूसरे के साथ बाँटते हैं । भविष्य के लिए रणनीति बनाते हैं। आपस में पढ़ने-लिखने के कार्यो में एक-दूसरे की मदद करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अध्यापकों से मिलते हैं। इनकी योजना में है कि भविष्य में विद्यालय में साहित्यिक व बौद्धिक क्षमताओं के विकास के लिए समय-समय पर विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जाए, जैसे- भाषण, निबंध, वाद-विवाद, कविता, कहानी, चित्रकला, सामान्य-ज्ञान प्रतियोगिता, बाल रचनात्मक कार्यशाला, गोष्ठी आदि। इसके प्रकोष्ठ का लक्ष्य है कि विद्यालय तथा अपने गाँव-पड़ोस का वातावरण शैक्षिक तथा रचनात्मक बनाया जाए। इस तरह से यह प्रकोष्ठ विद्यालय में एक संदर्भ समूह के रूप में काम करता है।

जैसा कि बच्चों में रचनात्मक लेखक के विकास के लिए विभिन्न विद्यालयों में विद्यालय पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है जो एक अच्छा प्रयास है पर हमारा मानना है कि उसकी कुछ सीमाएं हैं। अधिक खर्चीली होने के कारण उसका वर्ष में एक से अधिक अंक निकालना संभव नहीं है। जहाँ छात्र संख्या कम है वहाँ एक बार निकाल पाना भी संभव नहीं हो पाता। इसमें संपादन से लेकर प्रकाशन में बच्चों की अपेक्षा अध्यापकों की सक्रियता और भागीदारी ही अधिक रहती है जिससे बच्चों को बहुत अधिक कुछ कर पाने तथा सीखने का अवसर नहीं मिल पाता है। लिखने का अवसर भी वर्ष में एक ही बार मिल पाता है। अतः लेखन कौशल के विकास एवं बच्चों की अभिव्यक्ति को मंच प्रदान करने की दृष्टि से इसे बहुत उपयोगी नहीं कहा जा सकता है। विद्यालय पत्रिका के साथ-साथ निरंतर दीवार पत्रिका भी निकाली जाए तो इससे दोनों का महत्व बढ़ जाएगा। विद्यालय पत्रिका के लिए स्तरीय एवं मौलिक सामग्री भी मिल पाएगी। वास्तव में विद्यालय पत्रिका निकालने का उद्देश्य भी पूरा हो पाएगा।

यहाँ पर मैं यह भी बताना चाहूँगा कि दीवार पत्रिका का यह अभिनव प्रयोग केवल राजकीय इंटर कॉलेज, देवलथल में ही नहीं पिथौरागढ़ जनपद के एक दूरस्थ विद्यालय क.पू.मा.वि., नाचनी में रचनात्मक शिक्षक मंडल के राज्य सचिव राजीव जोशी द्वारा भी किया जा रहा है। उन्होंने इस प्रयोग को प्रारंभ करने से पूर्व एक पाँच दिवसीय रचनात्मक बाल कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें बच्चों को दीवार पत्रिका को तैयार करने के बारे में आवश्यक जानकारी देने के साथ ही बच्चों में लेखन कौशल को बढ़ाने के उद्देश्य से रोचक गतिविधियाँ करवाई गईं। यह प्रसन्नता की बात है कि वहाँ भी यह प्रयोग सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है । बच्चे उत्तरोत्तर बेहतर करते जा रहे हैं।

हमारा मानना है कि इस प्रयोग को हर विद्यालय में शुरू किया जाना चाहिए क्योंकि यह न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता, अध्ययन की प्रवृत्ति और सृजनशीलता बढ़ाने में सहायक है बल्कि विद्यालयों में अनुशासन की समस्या को सुलझाने में भी एक हद तक मददगार है। रचनात्मक शिक्षक मंडल के सदस्यों को इसे एक अभियान की तरह लेना चाहिए। इससे प्राप्त अनुभवों को रचनात्मक शिक्षक मंडल के आगामी सम्मेलनों में आपस में बाँटा जाना चाहिए ताकि इसको अधिक उपयोगी और प्रभावकारी बनाया जा सके।

वैज्ञानिक सोच से ही आगे बढ़ेगा समाज : देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

देवेंद्र मेवाड़ी

वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी विगत लगभग 45 वर्षों से विभिन्न संचार माध्यमों से विविध विधाओं में विज्ञान लेखन करके समाज में वैज्ञानिक जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे देश में विज्ञान लेखन की स्थिति और वैज्ञानिक सोच पर अनुराग की अंतरंग बातचीत-

सदियां बीत गईं लेकिन विज्ञान के इस युग में भारत में अभी भी अंधविश्‍वास चरम पर है। लोग अपने बच्‍चे की बलि तक दे देते हैं। इसका क्‍या कारण मानते हैं आप?

दे.मे. :  मेरे विचार से इसकी वजह यह है कि लोगों को विज्ञान की जानकारी कम है। अगर उन्‍हें विज्ञान की जानकारी मिलती और सच का पता होता तो उन्‍हें विश्‍वास होता कि यह सब फरेब है। इस पर हमें विश्‍वास नहीं करना चाहिए।

हमारे देश में लोगों तक विज्ञान की जानकारी पहुँचाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बाद भी लोगों के पास तक जानकारी क्‍यों नहीं पहुंच रही है, इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। लोगों तक विज्ञान पहुँचाने की जो योजनाएं बनाई जाती हैं, वे लक्ष्य-वेध से क्यों चूक रही हैं- यह एक विचारणीय विषय है। ऐसी योजनाओं का ‘पीयर रिव्यू’ यानी मूल्याँकन जरूर होना चाहिए ताकि पता लग सके कि योजनाएं लक्ष्य वेध रही हैं या नहीं। यदि नहीं तो उन्हें अधिक कारगर बनाने का रास्ता खोजा  जाना चाहिए। इस प्रयास में सबसे बड़ा नुकसान जो कर रहे हैं, और समाज को कम से कम पाँच सौ साल या हजार साल पीछे धकेल रहे हैं,  वे हैं इलेक्‍ट्रानिक चैनल और हिंदी फिल्में। इनके माध्‍यम से भूत-प्रेत, पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्‍वासों पर आधारित कार्यक्रम करोड़ों लोगों तक पहुँचाए जा रहे हैं। यह बहुत गलत है। इन फिल्मों और चैनलों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। कई सामाजिक मुद्दों पर उन्होंने सराहनीय भूमिका निभाई भी है। उन्हें अंधविश्‍वास को दूर करने का बीड़ा भी उठाना चाहिए।

भारत में विज्ञान लेखन की क्‍या स्थिति है?

दे.मे. :  विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में, विशेषकर हिंदी में विज्ञान लेखन की स्थिति बहुत अच्‍छी है। 1884 के आसपास विज्ञान की बातें भारतीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। और, जो कुछ पश्चिम में विज्ञान का विकास हो रहा था या हमारे यहाँ विज्ञान का जो काम हो रहा था, उस पर तत्‍कालीन सम्‍पादकों व लेखकों की नजर थी। वे लेखक विज्ञान लेखक नहीं कहलाते थे, वे साहित्‍यकार थे। वे साहित्‍य और विज्ञान पर समान रूप से लिखते थे। 1900 में सरस्‍वती शुरू हुई। सरस्‍वती ने साहित्‍य के साथ-साथ विज्ञान को अधिक से अधिक छाप कर बड़ी भूमिका अदा की। उसमें हिंदी के जाने-माने साहित्‍यकारों ने भी विज्ञान की रचनाएं लिखीं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी, हरिवंश राय बच्‍चन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और बहुत से साहित्‍यकारों ने लिखा। विज्ञान से जो बदलाव आ रहा था, उस पर प्रेमंचद ने भी अपने संपादकि‍यों में लिखा।   

हिंदी में विज्ञान लेखन की शताब्‍दी पूरी हो चुकी है। जो यह कहा जाता है कि हिंदी में विज्ञान की पुस्‍तकें नहीं हैं तो यह झूठ है। विज्ञान के लगभग सभी विषयों पर हिंदी में सैकड़ों पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं। धीरे-धीरे विज्ञान शब्‍दावली का भी विकास हुआ। भारत सरकार के शब्‍दावली आयोग ने पारिभाषिक शब्‍दावलियां छापी हैं। इनमें वैज्ञानिक शब्‍दों की कमी नहीं है। हालाँकि उनमें कई शब्‍द कारखाने में बने शब्‍द जैसे हैं। उन्हें आम भाषा के शब्‍दों से बदला जा सकता है। लोक में जो शब्‍द प्रचलित हैं, उन्‍हें अधिक लेना चाहिए ताकि हर  व्‍यक्ति उन्हें समझ सके।

विज्ञान के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के साथ ही संस्‍थाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि विज्ञान परिषद, प्रयाग के मार्च, 2013 में सौ वर्ष पूरे हो गए। देश में ऐसी कोई दूसरी संस्‍था नहीं है जो 100 वर्षों से विज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रही हो और जिसने सौ साल पूरे कर लिए हों। इस परिषद की स्थापना पं. गंगानाथ झा, रामदास गौड़, प्रो. सालिग्राम भार्गव और प्रो. हमीदुदीन साहब जैसे विद्वानों ने की थी। इसके सभापति और उपसभापति पं. मदन मोहन मालवीय, श्रीमती एनी बेसेंट, सर सी.वाई. चिंतामणि जैसे विद्वान रहे हैं। आचार्य जगदीश चंद्र बसु, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, मेघनाद साहा, डा. के.एस. कृष्णन और डा. आत्माराम जैसे वैज्ञानिक इसके सदस्य रहे हैं। यह परिषद 1915 से ‘विज्ञान’ मासिक पत्रिका का निरंतर प्रकाशन कर रही है जिसके लक्ष्य के बारे में पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने दोहा लिखा था।

इसके अलावा विज्ञान लोक आगरा से और विज्ञान जगत इलाहाबाद से प्रकाशित हुईं जो विशेष रूप से विज्ञान की पत्रिकाएं थीं और काफी लोकप्रिय भी हुईं। इनके माध्यम से आम लोगों के लिए विज्ञान सामने आया। इसी तरह मराठी, बांग्‍ला, तमिल, असमी आदि तमाम भारतीय भाषाओं में विज्ञान खूब लिखा गया है और लिखा जा रहा है। लेकिन, आम लोगों तक पूरी बात क्‍यों नहीं पहुँच पा रही है, यह बहुत जटिल सवाल है। इसका एक कारण तो मुझे यह लगता है कि बचपन से ही विज्ञान को कठिन और जटिल बता दिया जाता है। जबकि, ऐसा है नहीं। अगर विज्ञान को प्रकृति और जीवन से जोड़ कर समझाया जाए तो वह किस्से-कहानियों-सा रोचक लगेगा। कौन नहीं जानना चाहेगा कि सूरज क्या है, तारे क्या हैं, बादल कहाँ से आते हैं, वर्षा क्यों होती है, अन्न कहाँ से आया, फूल क्यों खिलते हैं, बीमारियाँ क्यों होती हैं, धातुएं कहाँ से आईं, कंप्यूटर क्या है, मोबाइल क्या है और यह भी कि हमारा शरीर क्या है? ये बातें रोचक तरीके से बताई जाएं तो सभी समझना चाहेंगे।  विज्ञान को आम आदमी तक पहुँचना ही चाहिए।                                       

आज इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में भी  हम कितना अंधविश्‍वास देख रहे हैं। डायनों की बात सुन रहे हैं, भूत-प्रेतों की बात सुन रहे हैं। एक छोटी-सी खबर जंगल की आग की तरह फैला दी जाती है कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। अफवाह फैलती है कि रात को सोए तो पुतले बन जाएंगे, मूर्तियाँ बन जाएंगे तो लोग सारी रात जागते हैं। दीवारों पर हथेलियों की छाप लगा कर भूत-प्रेतों से बचने का उपाय किया जाता है। इतना भी तर्क नहीं करते कि यह सम्‍भव नहीं है। हम इतनी मामूली सी  विज्ञान की समझ भी लोगों में क्‍यों नहीं डाल पाए। उनमें वैज्ञानिक चेतना और जागरूकता क्‍यों नहीं फैला पाए हैं, इसका पता लगाया जाना चाहिए और इस कमी को दूर होना चाहिए।  

विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए क्‍या किया जाना चाहिए ?

दे.मे. :  विज्ञान के सच को फैलाने के लिए हर सम्‍भव माध्‍यम का उपयोग किया जाना चाहिए। इलेक्‍ट्रानिक माध्‍यमों से जिस तरह अंधविश्‍वासों को फैलाया जा रहा है, इस पर सरकार को पाबंदी लगानी चाहिए। यह देखना चाहिए कि इससे समाज में अविज्ञान फैल रहा है, अंधविश्‍वास फैल रहा है। जब विज्ञान का सच मालूम होता है तो लोगों में जागरूकता आती है। इसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ। 1980 में मैं पंतनगर में था। जब पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो पूरे पंतनगर विश्‍वविद्यालय क्षेत्र में जहाँ पूरा वैज्ञानिक माहौल था, लोग घरों में बंद रहे। सड़कें खाली थीं। बाहर कोई दिखाई नहीं देता था। ग्रहण का इतना भय था। लेकिन, 1995 में पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो देश में काफी लोगों ने उसे सुरक्षित तरीके से देखा। तब इतनी जागरूकता आ चुकी थी कि सूर्यग्रहण एक प्राकृतिक घटना है और इससे कोई दुष्‍प्रभाव नहीं पड़ेगा। पिछला सूर्यग्रहण 22 जुलाई 2011 को लगा। इसमें लाखों लोगों ने सूर्यग्रहण को देखा। ये लाखों लोग इसलिए सूर्यग्रहण को देखने के लिए तैयार हुए क्‍योंकि उन्‍हें ग्रहण का सच मालूम हो गया था

लेकिन, अगर हम मास मीडिया के माध्‍यम से इनके खिलाफ अंधविश्‍वास फैलाते हैं तो मुश्किल होगी। खगोलीय और अन्य प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या तक के लिए टीवी चैनल ज्‍योतिषियों, टैरो कार्ड और न्‍यूमरोलॉजी वालों को बुला रहे हैं। अखबारों में भविष्‍य फल बाँचा जा रहा है। यह सब निराधार है। इसका कोई परीक्षण और प्रयोग नहीं किया गया है, बस आस्था के नाम पर चल रहा है। इसको महसूस किया जाना चाहिए और इसमें कमी लानी चाहिए। कुँडली मिला कर विवाह करने के बावजूद बहू-बेटियों का जीवन संकट में पड़ रहा है क्योंकि कुँडली सुखद जीवन की गारंटी नहीं है। इसके लिए तो आपसी प्रेम और समझ जरूरी है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात सबसे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी। उन्होंने देश में वैज्ञानिक वातावरण के विकास के लिए 1958 में ससंद में ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति’ प्रस्तुत की जिसे संसद ने पारित किया। संसद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति पारित करने वाला भारत विश्व का पहला देश है। नेहरू ने देश में आधुनिक विकास के लिए राष्ट्रीय विज्ञान प्रयोगशालाओं की नींव रखी। वे मानते थे कि प्राचीन रुढ़िवादी सोच को बदलने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है।

आम धारणा है कि विज्ञान बहुत क्लि‍ष्‍ट विषय है। किताबें भी जटिल भाषा में लिखी गई हैं। दूसरे, विज्ञान का संबंध केवल पाठ्यक्रम तक सीमित है। क्‍या लोगों तक विज्ञान नहीं पहुँचने  का यह बड़ा कारण नहीं है ?

दे.मे. :  यह बहुत बड़ा कारण है। मैं इस बात पर जोर देना चाहूँगा कि पाठ्य-पुस्‍तकों में जो विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके लिए जो सहायक पुस्तकें हैं यानी उस विषय को समझने लायक जो लोकप्रिय शैली में लिखी गईं किताबें हैं, उन्‍हें निश्चित रूप से विद्यार्थियों को दिया जाना चाहिए। पाठ्य पुस्‍तकों के साथ ही उस विषय में लिखी रचनाओं के बारे में उसी पुस्‍तक में सूची दी जानी चाहिए। मान लीजिए कोई अंतरिक्ष के बारे में किताब है या सौरमंडल के बारे में किताब है, उसके साथ-साथ उन लोकप्रिय शैली में लिखी गई पुस्‍तकों का भी उसमें जिक्र किया जाना चाहिए कि बच्‍चो ये पुस्‍तकें हैं, इन्‍हें संदर्भ के रूप में पढ़ सकते हो। इससे उन्हें विषय को समझने में आसानी होगी। इसके अलावा रोचक व्‍याख्‍यान, पुस्तक प्रदशर्नियों, विज्ञापनों आदि और ऐसे ही अन्‍य कार्यक्रमों के माध्‍यम से भी विज्ञान की जानकारी उन तक पहुँचाई जानी चाहिए।

रेडियो पर विज्ञान के तमाम सीरियल आ रहे हैं। टेलीविजन पर भी कुछेक कार्यक्रम दिए जा रहे हैं, लेकिन ये नगण्‍य हैं। उनकी तुलना में अवैज्ञानिक कार्यक्रम कहीं ज्‍यादा दिए जा रहे हैं। इस समय देश की बड़ी जरूरत है कि सरकार की ओर से एक विज्ञान का चैनल चलाया जाना चाहिए, जो विज्ञान का प्रचार-प्रसार करे। उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि वह केवल सरकारी चैनल बनकर न रह जाए। वह भी नेशनल ज्‍योग्राफी या डिस्‍कवरी की तरह रोचक और ज्ञानवर्धक सामग्री देने वाला चैनल बने। उसमें बच्चों, आम लोगों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों की भागीदारी हो। उसका समय-समय पर मूल्‍याँकन किया जाना चाहिए कि किस कार्यक्रम को दर्शकों ने अधिक देखा। किसको कितनी टीआरपी मिल रही है।

वैज्ञानिकों और विशेषतौर पर भारतीय वैज्ञानिकों की जीवनियाँ बच्‍चों को बहुत प्रेरित कर सकती हैं। उन्‍हें जिंदगी में अपने सपने पूरा करने की राह दिखा सकती हैं। प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक मेघनाथ साहा जब इं‍टर की कक्षा में पढ़ते थे, तब भी नंगे पैर स्‍कूल जाते थे। एक बार स्‍कूल में अंग्रेज गवर्नर आया। मेघनाथ को जूता न पहनने के जुर्म में स्कूल से निकाल दिया गया। इसे गर्वनर के प्रति असम्‍मान माना गया। लेकिन, मेघनाथ के पास तो जूता था ही नहीं, वे कहाँ से पहनते। वे तैर कर नदी पार अपने गाँव जाते थे क्‍योंकि नाव के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे हालतों में भी वे हमारे देश की ही नहीं विश्व  की वैज्ञानिक विभूति बने। ऐसे वैज्ञानिकों की जीवनी बच्चों को पढ़ने को मिले जिन्होंने कठिनाइयों में भी कभी हार नहीं मानी।

यह सरकार और हम सबकी जिम्‍मेदारी है कि विज्ञान की जानकारी का प्रसार करें। हम लोगों को समझाएं कि मनुष्य सिर्फ मनुष्य है। उसमें जाति, धर्म का कोई भेद नहीं है। विज्ञान की इतनी सी बात हम अभी तक लोगों को नहीं समझा पाए हैं। बार-बार राजनीतिक कारणों से जाति और धर्म के भेद को फैलाया जा रहा है। हमें मनुष्य के बजाए जातियों में बाँटा जा रहा है ताकि जाति को वोट दें। सच यह है कि मनुष्य की केवल एक जाति है- होमो सेपिएंस।

क्या हिंदी में विज्ञान की शिक्षा देना कठिन है?

दे.मे. :  कतई नहीं। विज्ञान की शिक्षा हिंदी माध्यम से देने के लिए केवल कड़े संकल्‍प की जरूरत है। जैसे, 1968 में पंतनगर विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉक्‍टर ध्यानपाल सिंह ने निश्‍चय किया कि उन्हें अपने विश्‍वविद्यालय में कृषि की शिक्षा हिंदी माध्‍यम से देनी है। इसके लिए उन्‍होंने हिंदी के विज्ञान लेखकों को पत्र लिखे कि हमें पुस्तकें तैयार करने के लिए आप जैसे विज्ञान लेखकों की आवश्‍यकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय में अनुवाद एवं प्रकाशन निदेशालय खोला। पहले अंग्रेजी पाठ्य पुस्तकों का अनुवाद कराया गया ताकि निर्धारित तिथि से हिंदी माध्यम से उच्च शिक्षा दी जा सके। विभिन्न  विषयों की पुस्तकें तैयार हुईं। मैंने भी वहाँ पादप प्रजनन की प्रमुख पाठ्य पुस्तक ‘एशियाई फसलों का प्रजनन’ का अनुवाद किया।  

विश्‍वविद्यालय की क्षमता उतनी पुस्तकों के प्रकाशन की नहीं थी। इसके लिए नई मशीनें लगवाई गईं। पुस्‍तकों का प्रकाशन भी विश्‍वविद्यालय ने शुरू किया। हिंदी में किताबें विद्यार्थियों को उपलब्‍ध हो गईं।  इसके साथ ही हमें निर्देश दिया कि हम वैज्ञानिकों से मिलें। उन्‍हें प्रेरित करें कि वे हिंदी में पुस्‍तकें लिखें। हम उन्‍हें विभिन्‍न विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। इस तरह किसानों तक कृषि विज्ञान की नई जानकारी पहुँचाने के लिए हिंदी में किसान भारती पत्रिका प्रकाशित की गई। उसकी शुरुआत प्रसिद्ध हिंदी विज्ञान लेखक श्री रमेश दत्त शर्मा ने की। बाद में 13 साल तक मैंने उसका सम्‍पादन किया। कृषि, पशुपालन, पशु चिकित्‍सा आदि की हिंदी में अनूदित और मौलिक पुस्‍तकें आ गईं और हिंदी शिक्षा का माध्‍यम लागू कर दिया गया। आज विश्‍वविद्यालय के पास हिंदी में सैकड़ों किताबें हैं। कुलपति डॉ. ध्‍यान पाल सिंह का कहना था कि कौन-सा ऐसा भारतीय किसान है जो अंग्रेजी की पुस्‍तकें पढ़कर खेत में हल चला रहा है। कौन-सा ऐसा ग्रामीण परिवार है, जो अंग्रेजी में जानकारी लेकर खेतों में उसका उपयोग कर रहा है। उनको तो हमारी आबोहवा में, हमारी फसलों, हमारे पशुओं से संबंधित जानकारी दी जानी चाहिए।

क्‍या आपको नहीं लगता कि हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए यदि कुछ पुरस्‍कार घोषित किए जाएं तो विज्ञान के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलेगा ?

दे.मे. : विज्ञान लेखन के लिए कई पुरस्‍कार पहले से ही हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत राष्‍ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद का राष्ट्रीय पुरस्‍कार है। चार-पांच वर्गों में पुरस्‍कार दिए जाते हैं लेकिन इनका समुचित प्रचार नहीं होता। इनके बारे में समाचारपत्र-पत्रिकाओं में कोई नहीं लिखता। हर साल 28 फरवरी को विज्ञान दिवस पर ये पुरस्‍कार दिए जाते हैं, लेकिन कहीं कोई खबर नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान पुरस्कार दिया जाता है। यह एक बड़ा पुरस्कार है। आपने सुना कभी इसके बारे में? वे पुरस्कृत पुस्तकें कहाँ हैं? हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ओर से आत्माराम पुरस्कारदिया जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति के कर-कमलों से दिया जाता है इसलिए समाचारपत्रों में थोड़ी-बहुत चर्चा हो जाती है। इसके अलावा भी विज्ञान लेखन के लिए विभिन्न मंत्रालय पुरस्कार देते हैं।

समाज को बदलने में वैज्ञानिक सोच का क्‍या महत्‍व है।

दे.मे. : वैज्ञानिक सोच सच का पक्षधर है। इसलिए यह समाज को जागरूक बनाता है, उसे आगे बढ़ाता है। जबकि, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास प्रतिगामी सोच को बढ़ाते हैं और समाज को पीछे ढकेलते हैं। अगर हम देश-काल पर नजर डालें तो साफ दिखाई देगा कि आज हम जहाँ खड़े हैं वहाँ तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर पहुँचे हैं। अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हो या दूध क्रांति, चिकित्सा की नई तकनीकें या अंतरिक्ष में उड़ते हमारे संचार व मौसम उपग्रह अथवा चाँद पर दस्तक देने वाला चंद्रयान-1, ये सभी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की देन हैं। तंत्र-मंत्र और ज्योतिष से आज तक न कोई अंतरिक्षयान बना है, न फसलों की पैदावार बढ़ी है और न चिकित्सा विज्ञान के चमत्कार सामने आए हैं। इसलिए हमें वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अंधविश्वासों को आँख मूंद कर अपनाने के बजाय तर्क करना चाहिए कि क्या ऐसा हो सकता है? वैज्ञानिक सोच हमें प्रगति की राह पर आगे बढ़ाता है।

आप व्यक्तिगत जीवन में अंधविश्वासों और अवैज्ञानिकता का कैसे विरोध करते हैं?

दे.मे. : मैं और मेरा परिवार तर्क का सहारा लेते हैं और ऐसी धारणाओं को नहीं मानते। बिल्ली के रास्ता काटने पर हम तुरंत आगे बढ़ते हैं ताकि आसपास के लोग समझ सकें कि इससे कुछ नहीं होता। हम सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सुरक्षित विधि से देखते हैं और उस दौरान खाते-पीते रहते हैं ताकि साबित हो सके कि यह एक शानदार खगोलीय घटना है। इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। हम दिन, वार, दिशा के फलाफल नहीं मानते। हमने अपनी मानसिकता ऐसी बना ली है इसलिए इन वहमों और अंधविश्वासों में नहीं फँसते।

आपने लेखने के लिए विज्ञान क्यों चुना?

दे.मे. :  क्योंकि मैं बचपन से ही जिज्ञासु था और हर बच्चे की तरह अपने चारों ओर की हर चीज के बारे में जानना चाहता था- सूर्य, चंद्रमा और तारों के बारे में, पेड़-पौधों, फूलों, तितलियों, जीव-जंतुओं, बादल, वर्षा और हर उस चीज के बारे में जो दिखाई देती थी। फिर, विज्ञान की पढ़ाई शुरू की और धीरे-धीरे विज्ञान की बातों का पता लगता गया। मुझे पता लगता गया तो मेरा मन दूसरों को बताने के लिए बैचेन हुआ। और,  मैंने वे बातें साथियों को बताईं, बच्चों को बताईं। लोगों को बताने के लिए हिंदी में विज्ञान के लेख लिखने लगा। पहला लेख लिखा ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’, दूसरा ‘शीत निष्क्रियता’, तीसरा ‘कुमायूं और शंकुधारी’। पहले दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ को भेजे। तीसरा ‘विज्ञान’ को। ‘विज्ञान जगत’ के संम्‍पादक प्रोफेसर आर.डी. विद्यार्थी का उत्तर मिला, “लिखते रहना, कौन जाने कल तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” इस एक पंक्ति ने मेरे भीतर विज्ञान लेखन की लौ जगा दी। अप्रैल 1965 में मेरा पहला लेख ‘विज्ञान’ मासिक में छप गया और दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ के मई-जून 1965 संयुक्तांक में। इस तरह मेरे विज्ञान लेखन की शुरुआत हो गई हालाँकि तब तक मैं हिंदी में कहानियाँ भी लिख रहा था जो ‘कहानी’, ‘माध्यम’, ‘नई कहानियां’, ‘उत्कर्ष’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।

शुरुआती दौर में आपको विज्ञान लेखन में किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा और किन लोगों ने आपको इसके लिए प्रेरित किया?

दे.मे. :  शुरुआती दौर में कोई विशेष मुश्किलें सामने नहीं आईं क्योंकि विज्ञान की जो बातें में पढ़ता था, जो जानकारी मिलती थी उसे अपनी भाषा में, अपने ढंग से लिख देता था। लेकिन, दीक्षा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’ और ‘नवनीत’ जैसी पत्रिकाओं के विद्वान सम्‍पादकों, मतलब मनोहर श्याम जोशी, डा. धर्मवीर भारती और नारायणदत्त जी से ली जिनके द्वारा सम्‍पादित लेख पढ़ कर सरल भाषा-शैली में लिखने का क ख ग सीखा। रमेश दत्त शर्मा, गुणाकर मुले और रमेश वर्मा जैसे अग्रज विज्ञान लेखकों की रचनाएं पढ़ कर निरंतर लिखने की प्रेरणा मिलती रही। निरंतर लिखना ही नई ऊर्जा देता रहा। आपको बताऊँ, मैंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टिट्यूट), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और पंजाब नेशनल बैंक में दीर्घकाल तक नौकरी की लेकिन हर व्यस्तता के बावजूद विज्ञान लेखन करता रहा। कई बड़ी स्टोरीज हिंदी में पहली बार मैंने दीं जैसे- कृषि वैज्ञानिक डा. नार्मेन बोरलाग को नोबेल शांति पुरस्कार, दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक और सिरोही बिंदु, विश्व के पहले परखनली शिशु का जन्म आदि।

आपने विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं?

दे.मे. :  जी हाँ, मेरी पहली वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘सभ्यता की खोज’ 1979 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद कई विज्ञान कथाएं लिखीं जो मेरे तीन कथा संग्रहों में संकलित हैं। विज्ञान कथा लेखन में मेरी विशेष रुचि रही है और मैं इसके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य का अध्ययन करता रहता हूँ। हिंदी साहित्य में इस विधा की रचनाओं की भारी कमी है, हालाँकि हिंदी में लगभग 1884 से विज्ञान कथा साहित्य रचा जा रहा है। इस क्षेत्र में राहुल सांकृत्यायन, डा. संपूर्णानंद, आचार्य चतुर सेन जैसे साहित्यकारों ने भी अपना योगदान दिया है। नई पीढ़ी के कई विज्ञान कथाकार इस विधा को समृद्ध कर रहे हैं। असल में विज्ञान कथा लेखन एक कठिन कार्य है जिसमें कहानी की समझ और विज्ञान के तंतुओं से कथा बुनने की कला आना जरूरी है। एक बात और, विज्ञान कथाओं से जनमानस तक विज्ञान को आसानी से पहुँचाया जा सकता है।

दिल और दिमाग़ की जंग : बीनू भटनागर

Binu Bhatnagar

चर्चित लेखि‍का बीनू भटनागर का व्‍यंग्‍य-  

‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे ’ पुराना गाना है, पर शायद सबने सुना हो। दिल टूटने के बाद जी   ही नहीं सकते, जब आपके पास ऐसा कोई विकल्प है ही नहीं, तो ये क्या कहना कि जी कर क्या करेंगे!

शायरों को थोड़ा सा जीव-विज्ञान का ज्ञान होता तो बहुत से बेतुके गीत न बनते जैसे ‘दिल के टुकड़े हज़ार हुए इक यहाँ  गिरा इक वहाँ गिरा ’,   दिल न हुआ काँच का गिलास हो  गया, दिल में तो एक मामूली सा छेद हो जाए तो बड़ा सा  आपरेशन करवाना पड़ता है।

शायर और कवि तो दिल से ऐसे खेलते हैं, मानो दिल ना हो कोई खिलौना हो, ‘खिलौना जानकर तुम दिल ये मेरा तोड़े जाते हो’ जैसा गीत ही लिख डालते हैं।

गीत हों या संवाद, फिल्म हो या टी.वी. धारावाहिक,  उपन्यास हो या कहानी, नया हो या पुराना, दिल से ऐसे-ऐसे काम करवाये जाते हैं जो हो ही नहीं सकते। गुर्दे की चोरी हो सकती है, क्योंकि वो दो होते हैं, एक चोरी हो जाए दूसरा पूरा काम संभाल लेता है, पर दिल निकालने से तो आदमी तुरन्त मर जायेगा। फिर भी हमारे बुद्धिजीवी  कवि प्यार मे दिल चुराने की बात करते थकते नहीं, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को नज़र नहीं चुराना सनम’ दिल चोरी होने के बाद नज़र यानी आँख चुराने के लिये कोई ज़िन्दा बचेगा क्या ? ये तो सीधे-सीधे क़त्ल का मामला हो जयेगा !

एक और गाना याद आया ‘दिल विल प्यार व्यार मैं क्या जानू रे’ सही कहा दिल के बारे मे कवि महोदय ने, दिल तो सिर्फ  ख़ून को पूरे शरीर मे पम्प करके भेजता है प्यार व्यार जैसे काम तो दिमाग़ कुछ हारमोन्स के साथ मिलकर  करता है, और  कवि ठीकरा उस बेचारे मुठ्ठी भर नाप के दिल के सर फोड़ते हैं।

‘ ऐ मेरे दिले नादान तू ग़म से न घबराना’,  अजी  साहब!  नादान तो कवि हैं, दिल को तो घबराना आता ही नहीं, ये काम भी दिमाग़ का ही है। घबराने के लिये दिमाग़ को कुछ ज़्यादा ही रक्त की आवश्यकता पड़ती है, इसलिये दिल को तेज़ी से धड़कना पड़ता है। वह तो बस दिमाग़ को घबराहट के लिये तेज़ी से ख़ून भेजता है और कवि समझने लगते हैं कि‍ दिल ही घबरा रहा है।

कभी कोई अंतर्द्वन्द हो तो लेखक दिल और दिमाग़ को आमने-सामने लाकर खड़ा करने से भी नहीं चूकते।  फिल्मों में, टी.वी. धारावाहिकों में एक ही किरदार आमने-सामने खड़ा होकर बहस करता है। एक भावुक सा लगता  है जो दिल से सोचता हुआ बताया जाता है और दूसरा थोड़ा तर्क करता है, व्यावहारिक सा होता है, वह दिमाग़ से सोचता है, जबकि भावनायें और तर्क दोनों ही दिमाग़ से ही उपजती हैं, दिल बेचारे को तो सोचना आता ही नहीं है।

जब कोई दुविधा होती है, किसी पात्र को तो दूसरा कोई पात्र आकर उसे दिल-दिमाग़ पर एक भाषण दे डालता है कि ‘भैया, दिल से सोच दिमाग़ की मत सुन, दिल से लिया गया निर्णय ही हमेशा सही होता है।’ अब लेखक दिल और दिमाग़ में ही जंग शुरू करवा देते हैं कि दिल का ओहदा बड़ा है या दिमाग़ का। यह जंग एकदम बेमानी है । दिल का काम दिमाग़ नहीं कर सकता और दिमाग़ का काम दिल नहीं कर सकता।  इनसान दोनों के बिना जी ही नहीं सकता।  दिमाग़ देखा जाए तो सोच पर ही नहीं शरीर पर भी नियंत्रण रखता है, पर यदि कुछ सैकिंड भी दिल दिमाग को ख़ून न भेजे तो दिमाग़ को निष्क्रिय होते देर नहीं लगेगी। मेरे प्रिय लेखक भाई-बहनो ! दिल और दिमाग़ की  लड़ाई मत करवाइये। दोनों को अपना-अपना काम करने दीजिये। दिल या दिमाग़ की लड़ाई में सिर्फ डाक्टरों का ही फायदा होगा।

दिल और दिमाग़ के बीच सभी भाषाओं मे भ्रांतियाँ हैं। हिन्दी मे  ‘हार्दिक प्रेम’,’ हार्दिक आशीर्वाद’ जैसे वाक्याँश  हमेशा से प्रयोग हुए हैं। उर्दू मे ‘दिली ख्वाहिश’ और ‘दिल से मुबारकबाद’ कहने का रिवाज है। इंगलिश मे भी ‘hearty congratulations’ कहा जाता है। जबकि प्यार, बधाई और  ख़्वाहिश सब दिमाग़ से जुड़ी हैं, दिल से नहीं। मेरे विचार से देश की अन्य भाषाओं और विदशों की भाषाओं मे भी ऐसे वाक्याशों का प्रयोग होता ही रहा होगा। अब इस  विषय में तो भाषा वैज्ञानिकों को शोध करने की ज़रूरत है। जीव विज्ञान मे तो इस विषय मे कोई भ्रांति है ही नहीं।  अतः मेरा मानना है कि अब इन वाक्याशों की जगह दिमाग़ या मस्तिष्क से जुड़े वाक्याँश तलाशने की ज़रूरत है।

‘दिमाग़ी आशीर्वाद’ या ‘मस्तिष्कीय प्यार’ भी जमा नहीं। मानसिक शब्द लोगों को मानसिक बिमारियों या मनोविकार   की याद दिलाता है। अतः वह भी प्रयोग नहीं कर सकते। एक चीज़ होती है ‘मन’ जो मस्तिष्क में ही कहीं छुपा बैठा  होता है। उससे कोई वाक्याँश सोचते हैं – ‘मन से आशीर्वाद’, ‘मन से प्यार’ कैसा रहेगा ? मुझे तो ठीक लग रहा है। बस, थोड़ी आदत डालने की बात है!

मैंने अपने कवि और लेखक भाई-बहनों से दिल और दिमाग़ या हृदय और मस्तिष्क या heart और brain  (मुझे और कोई भाषा नहीं आती है) के बारे मे काफ़ी चर्चा कर ली है। आशा है कि अब कोई भ्रम किसी को नहीं होगा, फिर भी यदि कोई शंका हो तो हमारे टोल-फ्री नम्‍बर पर संपर्क करें। यह हेल्पलाइन 24 घंटे सातों दिन उपलब्ध है। आप चाहें तो हमारी  वेबसाइट दि‍लदि‍माग डॉट कॉम पर लॉगइन कर सकते हैं। हम इस विषय पर देश-विदेश के जीव वैज्ञानिकों और साहित्यकारों के साथ   एक संगोष्ठी के आयोजन पर भी विचार कर रहे हैं। आप अपने विचार प्रतिक्रिया के बॉक्स मे लिख देंगे तो हमें इस आयोजन को करने मे सुविधा होगी। यह विश्‍वस्तरीय आयोजन करने मे कुछ समय तो लगेगा। इसलि‍ए इसकी संभावित तारीख़ 1 अप्रैल, 2013 सोची हुई है। सभी से सहयोग की अपेक्षा रहेगी।

जाकिर अली रजनीश को बॉब्स पुरस्कार

जाकिर अली रजनीश

जाकिर अली रजनीश

नई दि‍ल्‍ली : ब्लॉग के आस्कर कहे जाने वाले जर्मनी के अन्तर्राष्ट्रीय ‘डॉयचे वेले बॉब्स पुरस्कार 2013‘ की घोषणा हो गयी है। इनमें ‘हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ ब्लॉ्ग’ का पुरस्कार ‘तस्लीम’ (http://www.scientificworld.in) को तथा ‘सबसे रचनात्मक‘ ब्लॉग का पुरस्कार ‘सर्प संसार‘ (http://snakes.scientificworld.in) को प्रदान किया गया है। ये दोनों पुरस्कार यूजर च्वाइस श्रेणी के अन्तर्गत प्रदान किये गये हैं। यह जानकारी डायचे वेले की अधिकारिक वेबसाइट ‘दा बॉब्स डॉट कॉम’ पर दी गयी है। साइट के अनुसार पुरस्कार वितरण जर्मनी के बॉन शहर में होगा। वहाँ पर 18 जून को ग्लोबल मीडिया फोरम द्वारा आयोजित समारोह में विजेताओं को पुरस्कृत किया जाएगा।

बॉब्स के अनुसार 03 अप्रैल से चल रही ऑनलाइन वोटिंग में 94 हजार से अधिक वोट पड़े थे, जिनमें ‘तस्लीम‘ एवं ‘सर्प संसार‘ को अपनी-अपनी श्रेणी में क्रमश: 62 और 45 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए हैं। चर्चित रचनाकार और विज्ञान संचारक डॉ. जाकिर अली रजनीश इन ब्लॉगों के मॉडरेटर हैं और वैज्ञानिक जागरूकता के प्रचार-प्रसार के लिए इन ब्लॉगों का संचालन करते हैं। उन्होंने बताया कि विश्‍व की 14 भाषाओं में दिया जाने वाला बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार कुल 6 श्रेणियों में दिया जाता है और इन पुरस्कारों में हिन्दी भाषा को पहली बार शामिल किया गया है।

डॉ. रजनीश ने बताया कि हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग से नवाजा गया ‘तस्लीम’ ब्लॉग मूलतः एक गैर सरकारी संस्था है, जो वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करती है। यह संस्था अब तक विज्ञान ब्लॉग लेखन कार्यशाला, विज्ञान कथा कार्यशाला, राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी एवं अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन जैसे कार्यक्रम आयोजित करा चुकी है। उन्होंने बताया कि ‘सर्प संसार‘ एक ऐसा ब्लॉग है, जिसमें साँपों से जुड़ी जानकारियों को रोचक ढंग से प्रकाशित किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से साँपों के व्यवहार, उनकी आदतों पर रोशनी डाली जाती है और उनसे जुड़े अंधविश्‍वासों से पर्दा उठाया जाता है।

प्रस्तुतिः अर्शिया अली, कोषाध्यक्ष, तस्लीम