
देवेंद्र मेवाड़ी
वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी विगत लगभग 45 वर्षों से विभिन्न संचार माध्यमों से विविध विधाओं में विज्ञान लेखन करके समाज में वैज्ञानिक जागरूकता लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनसे देश में विज्ञान लेखन की स्थिति और वैज्ञानिक सोच पर अनुराग की अंतरंग बातचीत-
सदियां बीत गईं लेकिन विज्ञान के इस युग में भारत में अभी भी अंधविश्वास चरम पर है। लोग अपने बच्चे की बलि तक दे देते हैं। इसका क्या कारण मानते हैं आप?
दे.मे. : मेरे विचार से इसकी वजह यह है कि लोगों को विज्ञान की जानकारी कम है। अगर उन्हें विज्ञान की जानकारी मिलती और सच का पता होता तो उन्हें विश्वास होता कि यह सब फरेब है। इस पर हमें विश्वास नहीं करना चाहिए।
हमारे देश में लोगों तक विज्ञान की जानकारी पहुँचाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं। इसके बाद भी लोगों के पास तक जानकारी क्यों नहीं पहुंच रही है, इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। लोगों तक विज्ञान पहुँचाने की जो योजनाएं बनाई जाती हैं, वे लक्ष्य-वेध से क्यों चूक रही हैं- यह एक विचारणीय विषय है। ऐसी योजनाओं का ‘पीयर रिव्यू’ यानी मूल्याँकन जरूर होना चाहिए ताकि पता लग सके कि योजनाएं लक्ष्य वेध रही हैं या नहीं। यदि नहीं तो उन्हें अधिक कारगर बनाने का रास्ता खोजा जाना चाहिए। इस प्रयास में सबसे बड़ा नुकसान जो कर रहे हैं, और समाज को कम से कम पाँच सौ साल या हजार साल पीछे धकेल रहे हैं, वे हैं इलेक्ट्रानिक चैनल और हिंदी फिल्में। इनके माध्यम से भूत-प्रेत, पुरानी रूढ़ियों, अंधविश्वासों पर आधारित कार्यक्रम करोड़ों लोगों तक पहुँचाए जा रहे हैं। यह बहुत गलत है। इन फिल्मों और चैनलों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। कई सामाजिक मुद्दों पर उन्होंने सराहनीय भूमिका निभाई भी है। उन्हें अंधविश्वास को दूर करने का बीड़ा भी उठाना चाहिए।
भारत में विज्ञान लेखन की क्या स्थिति है?
दे.मे. : विभिन्न भारतीय भाषाओं में, विशेषकर हिंदी में विज्ञान लेखन की स्थिति बहुत अच्छी है। 1884 के आसपास विज्ञान की बातें भारतीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में छपने लगी थीं। और, जो कुछ पश्चिम में विज्ञान का विकास हो रहा था या हमारे यहाँ विज्ञान का जो काम हो रहा था, उस पर तत्कालीन सम्पादकों व लेखकों की नजर थी। वे लेखक विज्ञान लेखक नहीं कहलाते थे, वे साहित्यकार थे। वे साहित्य और विज्ञान पर समान रूप से लिखते थे। 1900 में ‘सरस्वती’ शुरू हुई। ‘सरस्वती’ ने साहित्य के साथ-साथ विज्ञान को अधिक से अधिक छाप कर बड़ी भूमिका अदा की। उसमें हिंदी के जाने-माने साहित्यकारों ने भी विज्ञान की रचनाएं लिखीं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी, हरिवंश राय बच्चन, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और बहुत से साहित्यकारों ने लिखा। विज्ञान से जो बदलाव आ रहा था, उस पर प्रेमंचद ने भी अपने संपादकियों में लिखा।
हिंदी में विज्ञान लेखन की शताब्दी पूरी हो चुकी है। जो यह कहा जाता है कि हिंदी में विज्ञान की पुस्तकें नहीं हैं तो यह झूठ है। विज्ञान के लगभग सभी विषयों पर हिंदी में सैकड़ों पुस्तकें उपलब्ध हैं। धीरे-धीरे विज्ञान शब्दावली का भी विकास हुआ। भारत सरकार के शब्दावली आयोग ने पारिभाषिक शब्दावलियां छापी हैं। इनमें वैज्ञानिक शब्दों की कमी नहीं है। हालाँकि उनमें कई शब्द कारखाने में बने शब्द जैसे हैं। उन्हें आम भाषा के शब्दों से बदला जा सकता है। लोक में जो शब्द प्रचलित हैं, उन्हें अधिक लेना चाहिए ताकि हर व्यक्ति उन्हें समझ सके।
विज्ञान के प्रचार-प्रसार में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के साथ ही संस्थाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। यह बहुत कम लोगों को मालूम है कि विज्ञान परिषद, प्रयाग के मार्च, 2013 में सौ वर्ष पूरे हो गए। देश में ऐसी कोई दूसरी संस्था नहीं है जो 100 वर्षों से विज्ञान का प्रचार-प्रसार कर रही हो और जिसने सौ साल पूरे कर लिए हों। इस परिषद की स्थापना पं. गंगानाथ झा, रामदास गौड़, प्रो. सालिग्राम भार्गव और प्रो. हमीदुदीन साहब जैसे विद्वानों ने की थी। इसके सभापति और उपसभापति पं. मदन मोहन मालवीय, श्रीमती एनी बेसेंट, सर सी.वाई. चिंतामणि जैसे विद्वान रहे हैं। आचार्य जगदीश चंद्र बसु, आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय, मेघनाद साहा, डा. के.एस. कृष्णन और डा. आत्माराम जैसे वैज्ञानिक इसके सदस्य रहे हैं। यह परिषद 1915 से ‘विज्ञान’ मासिक पत्रिका का निरंतर प्रकाशन कर रही है जिसके लक्ष्य के बारे में पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने दोहा लिखा था।
इसके अलावा ‘विज्ञान लोक’ आगरा से और ‘विज्ञान जगत’ इलाहाबाद से प्रकाशित हुईं जो विशेष रूप से विज्ञान की पत्रिकाएं थीं और काफी लोकप्रिय भी हुईं। इनके माध्यम से आम लोगों के लिए विज्ञान सामने आया। इसी तरह मराठी, बांग्ला, तमिल, असमी आदि तमाम भारतीय भाषाओं में विज्ञान खूब लिखा गया है और लिखा जा रहा है। लेकिन, आम लोगों तक पूरी बात क्यों नहीं पहुँच पा रही है, यह बहुत जटिल सवाल है। इसका एक कारण तो मुझे यह लगता है कि बचपन से ही विज्ञान को कठिन और जटिल बता दिया जाता है। जबकि, ऐसा है नहीं। अगर विज्ञान को प्रकृति और जीवन से जोड़ कर समझाया जाए तो वह किस्से-कहानियों-सा रोचक लगेगा। कौन नहीं जानना चाहेगा कि सूरज क्या है, तारे क्या हैं, बादल कहाँ से आते हैं, वर्षा क्यों होती है, अन्न कहाँ से आया, फूल क्यों खिलते हैं, बीमारियाँ क्यों होती हैं, धातुएं कहाँ से आईं, कंप्यूटर क्या है, मोबाइल क्या है और यह भी कि हमारा शरीर क्या है? ये बातें रोचक तरीके से बताई जाएं तो सभी समझना चाहेंगे। विज्ञान को आम आदमी तक पहुँचना ही चाहिए।
आज इक्कीसवीं सदी की शुरूआत में भी हम कितना अंधविश्वास देख रहे हैं। डायनों की बात सुन रहे हैं, भूत-प्रेतों की बात सुन रहे हैं। एक छोटी-सी खबर जंगल की आग की तरह फैला दी जाती है कि गणेश जी दूध पी रहे हैं। अफवाह फैलती है कि रात को सोए तो पुतले बन जाएंगे, मूर्तियाँ बन जाएंगे तो लोग सारी रात जागते हैं। दीवारों पर हथेलियों की छाप लगा कर भूत-प्रेतों से बचने का उपाय किया जाता है। इतना भी तर्क नहीं करते कि यह सम्भव नहीं है। हम इतनी मामूली सी विज्ञान की समझ भी लोगों में क्यों नहीं डाल पाए। उनमें वैज्ञानिक चेतना और जागरूकता क्यों नहीं फैला पाए हैं, इसका पता लगाया जाना चाहिए और इस कमी को दूर होना चाहिए।
विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए क्या किया जाना चाहिए ?
दे.मे. : विज्ञान के सच को फैलाने के लिए हर सम्भव माध्यम का उपयोग किया जाना चाहिए। इलेक्ट्रानिक माध्यमों से जिस तरह अंधविश्वासों को फैलाया जा रहा है, इस पर सरकार को पाबंदी लगानी चाहिए। यह देखना चाहिए कि इससे समाज में अविज्ञान फैल रहा है, अंधविश्वास फैल रहा है। जब विज्ञान का सच मालूम होता है तो लोगों में जागरूकता आती है। इसका एक उदाहरण देना चाहता हूँ। 1980 में मैं पंतनगर में था। जब पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो पूरे पंतनगर विश्वविद्यालय क्षेत्र में जहाँ पूरा वैज्ञानिक माहौल था, लोग घरों में बंद रहे। सड़कें खाली थीं। बाहर कोई दिखाई नहीं देता था। ग्रहण का इतना भय था। लेकिन, 1995 में पूर्ण सूर्यग्रहण लगा तो देश में काफी लोगों ने उसे सुरक्षित तरीके से देखा। तब इतनी जागरूकता आ चुकी थी कि सूर्यग्रहण एक प्राकृतिक घटना है और इससे कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा। पिछला सूर्यग्रहण 22 जुलाई 2011 को लगा। इसमें लाखों लोगों ने सूर्यग्रहण को देखा। ये लाखों लोग इसलिए सूर्यग्रहण को देखने के लिए तैयार हुए क्योंकि उन्हें ग्रहण का सच मालूम हो गया था ।
लेकिन, अगर हम मास मीडिया के माध्यम से इनके खिलाफ अंधविश्वास फैलाते हैं तो मुश्किल होगी। खगोलीय और अन्य प्राकृतिक घटनाओं की व्याख्या तक के लिए टीवी चैनल ज्योतिषियों, टैरो कार्ड और न्यूमरोलॉजी वालों को बुला रहे हैं। अखबारों में भविष्य फल बाँचा जा रहा है। यह सब निराधार है। इसका कोई परीक्षण और प्रयोग नहीं किया गया है, बस आस्था के नाम पर चल रहा है। इसको महसूस किया जाना चाहिए और इसमें कमी लानी चाहिए। कुँडली मिला कर विवाह करने के बावजूद बहू-बेटियों का जीवन संकट में पड़ रहा है क्योंकि कुँडली सुखद जीवन की गारंटी नहीं है। इसके लिए तो आपसी प्रेम और समझ जरूरी है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात सबसे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी। उन्होंने देश में वैज्ञानिक वातावरण के विकास के लिए 1958 में ससंद में ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति’ प्रस्तुत की जिसे संसद ने पारित किया। संसद में विज्ञान और प्रौद्योगिकी नीति पारित करने वाला भारत विश्व का पहला देश है। नेहरू ने देश में आधुनिक विकास के लिए राष्ट्रीय विज्ञान प्रयोगशालाओं की नींव रखी। वे मानते थे कि प्राचीन रुढ़िवादी सोच को बदलने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है।
आम धारणा है कि विज्ञान बहुत क्लिष्ट विषय है। किताबें भी जटिल भाषा में लिखी गई हैं। दूसरे, विज्ञान का संबंध केवल पाठ्यक्रम तक सीमित है। क्या लोगों तक विज्ञान नहीं पहुँचने का यह बड़ा कारण नहीं है ?
दे.मे. : यह बहुत बड़ा कारण है। मैं इस बात पर जोर देना चाहूँगा कि पाठ्य-पुस्तकों में जो विज्ञान पढ़ाया जा रहा है, उसके लिए जो सहायक पुस्तकें हैं यानी उस विषय को समझने लायक जो लोकप्रिय शैली में लिखी गईं किताबें हैं, उन्हें निश्चित रूप से विद्यार्थियों को दिया जाना चाहिए। पाठ्य पुस्तकों के साथ ही उस विषय में लिखी रचनाओं के बारे में उसी पुस्तक में सूची दी जानी चाहिए। मान लीजिए कोई अंतरिक्ष के बारे में किताब है या सौरमंडल के बारे में किताब है, उसके साथ-साथ उन लोकप्रिय शैली में लिखी गई पुस्तकों का भी उसमें जिक्र किया जाना चाहिए कि बच्चो ये पुस्तकें हैं, इन्हें संदर्भ के रूप में पढ़ सकते हो। इससे उन्हें विषय को समझने में आसानी होगी। इसके अलावा रोचक व्याख्यान, पुस्तक प्रदशर्नियों, विज्ञापनों आदि और ऐसे ही अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से भी विज्ञान की जानकारी उन तक पहुँचाई जानी चाहिए।
रेडियो पर विज्ञान के तमाम सीरियल आ रहे हैं। टेलीविजन पर भी कुछेक कार्यक्रम दिए जा रहे हैं, लेकिन ये नगण्य हैं। उनकी तुलना में अवैज्ञानिक कार्यक्रम कहीं ज्यादा दिए जा रहे हैं। इस समय देश की बड़ी जरूरत है कि सरकार की ओर से एक विज्ञान का चैनल चलाया जाना चाहिए, जो विज्ञान का प्रचार-प्रसार करे। उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि वह केवल सरकारी चैनल बनकर न रह जाए। वह भी नेशनल ज्योग्राफी या डिस्कवरी की तरह रोचक और ज्ञानवर्धक सामग्री देने वाला चैनल बने। उसमें बच्चों, आम लोगों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों की भागीदारी हो। उसका समय-समय पर मूल्याँकन किया जाना चाहिए कि किस कार्यक्रम को दर्शकों ने अधिक देखा। किसको कितनी टीआरपी मिल रही है।
वैज्ञानिकों और विशेषतौर पर भारतीय वैज्ञानिकों की जीवनियाँ बच्चों को बहुत प्रेरित कर सकती हैं। उन्हें जिंदगी में अपने सपने पूरा करने की राह दिखा सकती हैं। प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक मेघनाथ साहा जब इंटर की कक्षा में पढ़ते थे, तब भी नंगे पैर स्कूल जाते थे। एक बार स्कूल में अंग्रेज गवर्नर आया। मेघनाथ को जूता न पहनने के जुर्म में स्कूल से निकाल दिया गया। इसे गर्वनर के प्रति असम्मान माना गया। लेकिन, मेघनाथ के पास तो जूता था ही नहीं, वे कहाँ से पहनते। वे तैर कर नदी पार अपने गाँव जाते थे क्योंकि नाव के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे हालतों में भी वे हमारे देश की ही नहीं विश्व की वैज्ञानिक विभूति बने। ऐसे वैज्ञानिकों की जीवनी बच्चों को पढ़ने को मिले जिन्होंने कठिनाइयों में भी कभी हार नहीं मानी।
यह सरकार और हम सबकी जिम्मेदारी है कि विज्ञान की जानकारी का प्रसार करें। हम लोगों को समझाएं कि मनुष्य सिर्फ मनुष्य है। उसमें जाति, धर्म का कोई भेद नहीं है। विज्ञान की इतनी सी बात हम अभी तक लोगों को नहीं समझा पाए हैं। बार-बार राजनीतिक कारणों से जाति और धर्म के भेद को फैलाया जा रहा है। हमें मनुष्य के बजाए जातियों में बाँटा जा रहा है ताकि जाति को वोट दें। सच यह है कि मनुष्य की केवल एक जाति है- होमो सेपिएंस।
क्या हिंदी में विज्ञान की शिक्षा देना कठिन है?
दे.मे. : कतई नहीं। विज्ञान की शिक्षा हिंदी माध्यम से देने के लिए केवल कड़े संकल्प की जरूरत है। जैसे, 1968 में पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर ध्यानपाल सिंह ने निश्चय किया कि उन्हें अपने विश्वविद्यालय में कृषि की शिक्षा हिंदी माध्यम से देनी है। इसके लिए उन्होंने हिंदी के विज्ञान लेखकों को पत्र लिखे कि हमें पुस्तकें तैयार करने के लिए आप जैसे विज्ञान लेखकों की आवश्यकता है। उन्होंने विश्वविद्यालय में अनुवाद एवं प्रकाशन निदेशालय खोला। पहले अंग्रेजी पाठ्य पुस्तकों का अनुवाद कराया गया ताकि निर्धारित तिथि से हिंदी माध्यम से उच्च शिक्षा दी जा सके। विभिन्न विषयों की पुस्तकें तैयार हुईं। मैंने भी वहाँ पादप प्रजनन की प्रमुख पाठ्य पुस्तक ‘एशियाई फसलों का प्रजनन’ का अनुवाद किया।
विश्वविद्यालय की क्षमता उतनी पुस्तकों के प्रकाशन की नहीं थी। इसके लिए नई मशीनें लगवाई गईं। पुस्तकों का प्रकाशन भी विश्वविद्यालय ने शुरू किया। हिंदी में किताबें विद्यार्थियों को उपलब्ध हो गईं। इसके साथ ही हमें निर्देश दिया कि हम वैज्ञानिकों से मिलें। उन्हें प्रेरित करें कि वे हिंदी में पुस्तकें लिखें। हम उन्हें विभिन्न विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। इस तरह किसानों तक कृषि विज्ञान की नई जानकारी पहुँचाने के लिए हिंदी में ‘किसान भारती’ पत्रिका प्रकाशित की गई। उसकी शुरुआत प्रसिद्ध हिंदी विज्ञान लेखक श्री रमेश दत्त शर्मा ने की। बाद में 13 साल तक मैंने उसका सम्पादन किया। कृषि, पशुपालन, पशु चिकित्सा आदि की हिंदी में अनूदित और मौलिक पुस्तकें आ गईं और हिंदी शिक्षा का माध्यम लागू कर दिया गया। आज विश्वविद्यालय के पास हिंदी में सैकड़ों किताबें हैं। कुलपति डॉ. ध्यान पाल सिंह का कहना था कि कौन-सा ऐसा भारतीय किसान है जो अंग्रेजी की पुस्तकें पढ़कर खेत में हल चला रहा है। कौन-सा ऐसा ग्रामीण परिवार है, जो अंग्रेजी में जानकारी लेकर खेतों में उसका उपयोग कर रहा है। उनको तो हमारी आबोहवा में, हमारी फसलों, हमारे पशुओं से संबंधित जानकारी दी जानी चाहिए।
क्या आपको नहीं लगता कि हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए यदि कुछ पुरस्कार घोषित किए जाएं तो विज्ञान के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा मिलेगा ?
दे.मे. : विज्ञान लेखन के लिए कई पुरस्कार पहले से ही हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद का राष्ट्रीय पुरस्कार है। चार-पांच वर्गों में पुरस्कार दिए जाते हैं लेकिन इनका समुचित प्रचार नहीं होता। इनके बारे में समाचारपत्र-पत्रिकाओं में कोई नहीं लिखता। हर साल 28 फरवरी को विज्ञान दिवस पर ये पुरस्कार दिए जाते हैं, लेकिन कहीं कोई खबर नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए राजीव गांधी ज्ञान-विज्ञान पुरस्कार दिया जाता है। यह एक बड़ा पुरस्कार है। आपने सुना कभी इसके बारे में? वे पुरस्कृत पुस्तकें कहाँ हैं? हिंदी में विज्ञान लेखन के लिए केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ओर से ‘आत्माराम पुरस्कार’ दिया जाता है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति के कर-कमलों से दिया जाता है इसलिए समाचारपत्रों में थोड़ी-बहुत चर्चा हो जाती है। इसके अलावा भी विज्ञान लेखन के लिए विभिन्न मंत्रालय पुरस्कार देते हैं।
समाज को बदलने में वैज्ञानिक सोच का क्या महत्व है।
दे.मे. : वैज्ञानिक सोच सच का पक्षधर है। इसलिए यह समाज को जागरूक बनाता है, उसे आगे बढ़ाता है। जबकि, रूढ़िवादिता और अंधविश्वास प्रतिगामी सोच को बढ़ाते हैं और समाज को पीछे ढकेलते हैं। अगर हम देश-काल पर नजर डालें तो साफ दिखाई देगा कि आज हम जहाँ खड़े हैं वहाँ तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बल पर पहुँचे हैं। अनाज के मामले में आत्मनिर्भरता हो या दूध क्रांति, चिकित्सा की नई तकनीकें या अंतरिक्ष में उड़ते हमारे संचार व मौसम उपग्रह अथवा चाँद पर दस्तक देने वाला चंद्रयान-1, ये सभी विज्ञान और प्रौद्योगिकी की देन हैं। तंत्र-मंत्र और ज्योतिष से आज तक न कोई अंतरिक्षयान बना है, न फसलों की पैदावार बढ़ी है और न चिकित्सा विज्ञान के चमत्कार सामने आए हैं। इसलिए हमें वैज्ञानिक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए। अंधविश्वासों को आँख मूंद कर अपनाने के बजाय तर्क करना चाहिए कि क्या ऐसा हो सकता है? वैज्ञानिक सोच हमें प्रगति की राह पर आगे बढ़ाता है।
आप व्यक्तिगत जीवन में अंधविश्वासों और अवैज्ञानिकता का कैसे विरोध करते हैं?
दे.मे. : मैं और मेरा परिवार तर्क का सहारा लेते हैं और ऐसी धारणाओं को नहीं मानते। बिल्ली के रास्ता काटने पर हम तुरंत आगे बढ़ते हैं ताकि आसपास के लोग समझ सकें कि इससे कुछ नहीं होता। हम सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण को सुरक्षित विधि से देखते हैं और उस दौरान खाते-पीते रहते हैं ताकि साबित हो सके कि यह एक शानदार खगोलीय घटना है। इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। हम दिन, वार, दिशा के फलाफल नहीं मानते। हमने अपनी मानसिकता ऐसी बना ली है इसलिए इन वहमों और अंधविश्वासों में नहीं फँसते।
आपने लेखने के लिए विज्ञान क्यों चुना?
दे.मे. : क्योंकि मैं बचपन से ही जिज्ञासु था और हर बच्चे की तरह अपने चारों ओर की हर चीज के बारे में जानना चाहता था- सूर्य, चंद्रमा और तारों के बारे में, पेड़-पौधों, फूलों, तितलियों, जीव-जंतुओं, बादल, वर्षा और हर उस चीज के बारे में जो दिखाई देती थी। फिर, विज्ञान की पढ़ाई शुरू की और धीरे-धीरे विज्ञान की बातों का पता लगता गया। मुझे पता लगता गया तो मेरा मन दूसरों को बताने के लिए बैचेन हुआ। और, मैंने वे बातें साथियों को बताईं, बच्चों को बताईं। लोगों को बताने के लिए हिंदी में विज्ञान के लेख लिखने लगा। पहला लेख लिखा ‘जानि शरद ऋतु खंजन आए’, दूसरा ‘शीत निष्क्रियता’, तीसरा ‘कुमायूं और शंकुधारी’। पहले दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ को भेजे। तीसरा ‘विज्ञान’ को। ‘विज्ञान जगत’ के संम्पादक प्रोफेसर आर.डी. विद्यार्थी का उत्तर मिला, “लिखते रहना, कौन जाने कल तुम स्वयं एक विज्ञान लेखक बनो।” इस एक पंक्ति ने मेरे भीतर विज्ञान लेखन की लौ जगा दी। अप्रैल 1965 में मेरा पहला लेख ‘विज्ञान’ मासिक में छप गया और दोनों लेख ‘विज्ञान जगत’ के मई-जून 1965 संयुक्तांक में। इस तरह मेरे विज्ञान लेखन की शुरुआत हो गई हालाँकि तब तक मैं हिंदी में कहानियाँ भी लिख रहा था जो ‘कहानी’, ‘माध्यम’, ‘नई कहानियां’, ‘उत्कर्ष’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।
शुरुआती दौर में आपको विज्ञान लेखन में किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा और किन लोगों ने आपको इसके लिए प्रेरित किया?
दे.मे. : शुरुआती दौर में कोई विशेष मुश्किलें सामने नहीं आईं क्योंकि विज्ञान की जो बातें में पढ़ता था, जो जानकारी मिलती थी उसे अपनी भाषा में, अपने ढंग से लिख देता था। लेकिन, दीक्षा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’ और ‘नवनीत’ जैसी पत्रिकाओं के विद्वान सम्पादकों, मतलब मनोहर श्याम जोशी, डा. धर्मवीर भारती और नारायणदत्त जी से ली जिनके द्वारा सम्पादित लेख पढ़ कर सरल भाषा-शैली में लिखने का क ख ग सीखा। रमेश दत्त शर्मा, गुणाकर मुले और रमेश वर्मा जैसे अग्रज विज्ञान लेखकों की रचनाएं पढ़ कर निरंतर लिखने की प्रेरणा मिलती रही। निरंतर लिखना ही नई ऊर्जा देता रहा। आपको बताऊँ, मैंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा इंस्टिट्यूट), पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और पंजाब नेशनल बैंक में दीर्घकाल तक नौकरी की लेकिन हर व्यस्तता के बावजूद विज्ञान लेखन करता रहा। कई बड़ी स्टोरीज हिंदी में पहली बार मैंने दीं जैसे- कृषि वैज्ञानिक डा. नार्मेन बोरलाग को नोबेल शांति पुरस्कार, दक्षिणी ध्रुव में एक भारतीय वैज्ञानिक और सिरोही बिंदु, विश्व के पहले परखनली शिशु का जन्म आदि।
आपने विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं?
दे.मे. : जी हाँ, मेरी पहली वैज्ञानिक उपन्यासिका ‘सभ्यता की खोज’ 1979 में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद कई विज्ञान कथाएं लिखीं जो मेरे तीन कथा संग्रहों में संकलित हैं। विज्ञान कथा लेखन में मेरी विशेष रुचि रही है और मैं इसके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य का अध्ययन करता रहता हूँ। हिंदी साहित्य में इस विधा की रचनाओं की भारी कमी है, हालाँकि हिंदी में लगभग 1884 से विज्ञान कथा साहित्य रचा जा रहा है। इस क्षेत्र में राहुल सांकृत्यायन, डा. संपूर्णानंद, आचार्य चतुर सेन जैसे साहित्यकारों ने भी अपना योगदान दिया है। नई पीढ़ी के कई विज्ञान कथाकार इस विधा को समृद्ध कर रहे हैं। असल में विज्ञान कथा लेखन एक कठिन कार्य है जिसमें कहानी की समझ और विज्ञान के तंतुओं से कथा बुनने की कला आना जरूरी है। एक बात और, विज्ञान कथाओं से जनमानस तक विज्ञान को आसानी से पहुँचाया जा सकता है।
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