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बचपन की अलग-अलग छवि की मोहक कहानियां : शकुन्तला कालरा

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आजादी की जमीन पर फलते-फूलते दो स्कूल : प्रमोद दीक्षित ‘मलय’

‘स्कूल’ का नाम लेते ही हम सबके दिल-दिमाग में स्कूल की एक परम्परागत छवि उभरती है जिसमें एक भवन है, शि‍क्षक और शि‍क्षिकाएं हैं, घण्टी है, एक पूर्व निर्धारित कार्य योजना यानी समय सारिणी है, समय सारिणी से संचालित कुछ नीरस जड़ कक्षाएं हैं, और कक्षाओं में हैं डरे सहमे बच्चे। बच्चे बस्ते के बोझ से दबे हैं, उनके मन में स्कूल आने की न तो ललक है और न ही उत्साह। उनके फीके चेहरे और स्वप्नहीन सूखी आंखों में उदासी और भय पसरा है। बच्चे जो समाज का भविष्य हैं, लेकिन जिनमें सीखने का आनन्द मर चुका है। क्या नहीं लगता है कि वे बच्चे जिनके कंधों पर परिवार और समाज की एक बड़ी जिम्मेवारी आने वाली है, वे मजबूत, कुशल और अन्दर से कुछ सीख पाने के आनन्द के भाव से भरे-भरे हों।

लेकिन नैराश्‍य की इस स्कूली मरुभूमि में कुछ स्कूल मरूद्यान की भांति जीवन की आस जगाने वाले भी हैं। जहां बचपन कलरव करता है। जहां बच्चों में प्रवाहमान ऊर्जा कुछ नया रचने को आतुर है, जहां कबाड़ में भी कला एवं सृजन के नव आयाम दिखाई पड़ते हैं। जहां कल्पना को विकसित करने को विस्तृत फलक उपलब्ध है और आजादी भी। तो आइए मिलते है दो ऐसे ही स्कूलों से जहां न कोई घण्टी है न कोई समय सारिणी। और हां, कक्षाएं भी नहीं हैं। पहले स्कूल का नाम है- ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल‘ भोपाल। प्रश्‍न उठता है कि आखिर यह कैसा स्कूल है और इसके पीछे क्या उद्देश्‍य रहे होंगे और परम्परागत स्कूलों से यह किन मायनों में अलग हैं।

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल भोपाल।

स्कूल के अकादमिक समन्वयक, अनिल सिंह जानकारी देते हैं, ‘‘शैक्षिक क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्था ‘एकलव्य’ में काम करने वाले तीन व्यक्ति प्रमोद मैथिल, राजेष खिंदरी और टुलटुल बिश्‍वास एक ऐसे स्कूल का सपना देख रहे थे, जहां शि‍क्षक और छात्र एक धरातल पर खड़े होकर एक साथ सीखने-सिखाने की यात्रा आरम्भ करें, न कोई आगे न कोई पीछे, सब साथ-साथ बढ़ें, कदम-दर-कदम। जहां प्रत्येक बच्चे को अपनी बात रखने की पूरी आजादी हो और सवाल उठाने का अधिकार भी। जहां हाथ में हुनर हो और मन में कुछ नया सीख पाने का आत्मविश्‍वास भी। तो तीनों ने मार्च 2012 में 6 बच्चों के साथ ‘आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल’ की शुरुआत की।’’

किराये के भवन में संचालित आनन्द निकेतन स्कूल के एक पूरे दिन की गतिविधियां बच्चों को न केवल रिझाती हैं, बल्कि स्वतः सृजन की ओर उन्मुख भी करती हैं। सुबह का पहला सत्र आरम्भ होता हैं दौड़ भाग और कुछ एक्सरसाईज करने से। लेकिन वहां न तो कोई सीटी होती है न कोई निर्देश, और न पहले से तय कोई टीचर। बस बच्चे अपने मन से जो समझते हैं, उसे करते रहते हैं और एक-दूसरे को देखकर एक क्रम बना लेते हैं। सुबह नौ से पौने दस के बीच स्कूल का छोटा मैदान रंगबिरंगी तितलियों से सज जाता है, क्योंकि बच्चों की कोई यूनीफार्म तय नहीं है और विभिन्न रंगबिरंगी पोषाकों में बच्चे तितलियां और फूल ही तो हैं। सूरज की बढ़ती चमक के साथ ही शुरू होता है ‘मार्निंग गैदरिंग’ के रूप में दिन का संगीतमय, रोचक और मस्ती भरा दूसरा सत्र। इसे हम प्रार्थना सत्र भी कह सकते हैं पर यह परम्परागत स्कूली प्रार्थना सत्र से बिल्कुल अलग और ताजगी भरा है। यहां सब बच्चे मिलकर हर्ष-उल्लास और हास-परिहास के साथ विविध भावों एवं रस से ओतप्रोत गीत गाते हैं। ये गीत हिन्दी सहित विविध भारतीय भाषाओं-बोलियों यथा पहाड़ी, छत्तीसगढ़ी, बुंदेली, भोजपुरी, बांग्ला, झारखण्डी, तमिल और अंग्रेजी में हैं, जिन्हे बच्चों ने शि‍क्षकों के साथ मिलकर खुद चुना है। इनसे बच्चे न केवल विविध भाषाओं के सौन्दर्य से परिचित होते हैं, साथ ही अपने अनुभव को भी समृद्ध कर रहे होते हैं। इन गीतों में जीवन के विविध पक्षों के चटकीले रंग समाहित हैं। प्रकृति से अनुराग एवं सह अस्तित्व है। नदी, पर्वत, धरती, जंगल, पक्षियों से संवाद है। मित्रता है, सबके लिए न्याय है और समानता व समरसता के उदात्त भाव भी। गीतों की सुरीली तान, लय, ताल, स्वरों का आरोह-अवरोह और ढपली एवं ढोलक की थाप। बस मन बंध सा जाता है और एक ऐसे विश्‍व की कल्पना में खो जाता है जहां आनन्द है बस अनिर्वचनीय आनन्द।

आनन्द निकतन डेमोक्रेटिक स्कूल का अगला सत्र ‘पोडियम’ कहलाता है, बच्चों की अपनी बातचीत करने और पिछले दिन के कामों की समीक्षा का सत्र। यह स्कूल की अद्भुत और महत्वपूर्ण गतिविधि है। पिछले दिन स्कूल में क्या कुछ घटित हुआ, कौन सी कहानी-कविता सुनी, कहां गये, क्या चित्रकारी की और उसमें कौन से रंग भरे। कैसा लगा, कौन-सी गतिविधि मजेदार थी और कौन-सी बोरिंग। घर और स्कूल दोनों जगह के अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति यहां देखी जा सकती है। यहां बच्चे लोकतांत्रिक सामाजिक जीवन का सुमधुर परिवेश बनाते एवं जीते हुए दिखाई देते हैं। अपनी बात कहने और दूसरों की बातें धैर्य से सुनने एवं महत्व देने का पाठ अनायास सीख जाते हैं। स्कूल में बच्चों की कक्षाएं नहीं हैं, बल्कि उम्र वर्ग के समूह हैं। 3 से 4 वर्ष, 4 से 5 वर्ष, 6 से 8 वर्ष, 8 से 10 वर्ष, और 10 से 12 वर्ष के बच्चों के अलग-अलग पांच समूह है, जिन्हें क्रमश: बटरफ्लाई, बडर्स, स्क्वैरल, पीकॉक और डीयर नाम से जाना जाता है। यह नाम बच्चों ने अपने लिए खुद चुने हैं। बच्चे अपने समूहों में ही पोडियम की गतिविधि करते हैं, जिसमें उनके साथ एक फैसिलिटेटर होता है। फैसिलिटेटर बच्चों की अभिव्यक्ति को पोडियम रजिस्टर में अक्षरश: उनके कहे अनुसार ही दर्ज करता जाता है। बच्चों की मौखिक अभिव्यक्ति का यह मंच स्कूल की ताकत और पहचान है। बच्चों में इससे न केवल अपनी बात रखने का तरीका आया है, बल्कि कहने में निर्भीकता, स्पष्टता और तार्किकता भी बढ़ी है। फैसलिटेटर को भी पिछले दिन की कक्षाओं में की गई गतिविधियों का आभास मिलता है। इस गतिविधि‍ में नित नए प्रयोग होते रहे हैं। शुक्रवार के दिन बड़े बच्चों के लिए स्कूल द्वारा दिए गए या खुद से चुने विषय पर तैयारी करके बोलने की शुरुआत हुई है, इसे बच्चों ने ही आकार दिया है। इसके अतिरिक्त लिखने-पढ़ने की दक्षता वाले बच्चे पिछले दिन का विवरण अपने पोडियम रजिस्टर में लिख कर लाते और पढ़कर सुनाते हैं। पोडियम के लिए बच्चों में उत्सुकता, गंभीरता और उतावलापन बताता है कि यह उनके लिए कितना खास और रुचिपूर्ण सत्र होता है।

पोडियम सत्र के बाद बच्चे नाश्‍ता करने हेतु कुछ देर का अवकाश लेते हैं। फिर प्रारम्भ होता है ‘डे प्लानिंग’ यानी अपने समूहों में दिनभर की योजना बनाने का सत्र। बच्चों की शत-प्रतिशत भागीदारी, आपसी संवाद, नोक-झोक एवं सामान्य तरीके से व्यक्ति और संसाधन की उपलब्धता, सबकी सहमति और सुविधा, व्यावहारिकता, निरंतरता, जरूरत और उपयोगिता के आधार पर बच्चे दिनभर की गतिविधियों की योजना और क्रम तय करते हैं। इससे बच्चों में जहां खुद निर्णय लेने और उसमें अपनी जिम्मेदारी महसूस करने का भाव आता है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी रुचि, पसंद और जरूरत को भी जगह दे रहे होते हैं। यहां किए गए निर्णयों में अहम नहीं टकराते, बल्कि सामूहिक निर्णय करने एवं उदारमन से स्वीकारने का संस्कार जन्मता है।

अब बच्चे अपनी तय कार्य योजना के अनुसार विभिन्न अकादमिक कक्षों में जाते हैं, जहां पहले से ही फैसलिटेटर अपनी तैयारी के साथ मौजूद होते हैं। इन अकादमिक कक्षों में विषय की प्रकृति के अनुकूल रिसोर्स मैटेरियल, बच्चों के काम का डिस्प्ले मैटेरियल और दूसरी सहायक शि‍क्षण की सामग्री होती है, जो बच्चों को विषय से सहजता से जोड़ती है। ये कक्ष भी अनूठे हैं, लैंग्वेज एण्ड इन्क्वैरी रूम,  आर्ट एण्ड एस्थेटिक रूम, सेंस ऑफ हिस्ट्री एण्ड सोसाइटी रूम, चाइल्ड साईंटिस्ट रूम और रूम फार न्यूमरेसी एण्ड लाजिक। औपचारिक स्कूली ढांचे में बच्चों की रूढ़ कक्षाएं होती हैं, जिनमें बच्चे सुबह से शाम तक एक ही कक्ष में बैठे रहते हैं और शि‍क्षक आते-जाते रहते हैं। इसके उलट आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल में फैसिलिटेटर अकादमिक कक्ष में होते हैं और बच्चे अपनी योजना के अनुसार उस क्रम से अकादमिक कक्षों में जाते हैं। इससे जहां एक तरफ तो फैसिलिटेटर को अपने कक्ष में तैयारी करने का अवसर मिलता है और वह अपने कक्षों को लगातार बेहतर बना रहे होते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों को एक अकादमिक कक्ष से निकलकर दूसरे अकादमिक कक्ष में जाने का अवसर मिलता है। वह उन्हें एक विषय की प्रकृति के प्रभाव से निकलकर दूसरे में जाने की सुगमता देता है। कक्ष बदलने से नए अकादमिक कक्ष का वातावरण उस विषय के साथ जीवंत जुड़ाव बनाने में मददगार होता है।

तत्पश्‍चात आधे घंटे के लंच ब्रेक में सभी बच्चे और शि‍क्षक एक साथ बैठकर अपने-अपने टिफिन साझा करते हैं और इस तरह संगत व साथ खाने का मजा लेते हैं। सब्जियों, अचारों, रोटी, पूडी, पराठों का आदान-प्रदान इस सत्र को खास बनाता है। लंच के बाद बच्चे अपनी तय की हुई योजना के अनुसार अकादमिक कक्षों में जाते हैं और अंतिम सत्र में खेलकूद होता है। इसमें शि‍क्षक भी बच्चों के साथ खेलते हैं। ऐसे ही पिछले दिनों बच्चों के साथ कबड्डी खेलते हुए अनिल जी के बायें हाथ में चोट लगी थी। पर पूरी तन्मयता एवं जिजीविषा के साथ खेलना जारी था, क्योंकि चोटें खेलों का एक हिस्सा ही तो हैं।

स्कूल प्रायः 9 बजे प्रारम्भ होता है और 3 बजे छुट्टी हो जाती है। जरूरत के अनुसार बच्चे 5 बजे तक भी स्कूल में रह सकते हैं और अभिभावक उन्हें सुविधानुसार स्कूल से ले जाते हैं। साढ़े 3 से साढे़ 4 बजे तक फैसिलिटेटर अपनी शेयरिंग मीटिंग में एक-एक बच्चे की भागीदारी और उसकी लर्निंग पर बारीकी से बातें करते हैं। इस मीटिंग में हर फैसिलिटेटर को हर कक्षा के बारे में और हर बच्चे के बारे में जानकारी हो रही होती है। फैसलिटेटर एक दूसरे को फीडबैक और सुझाव भी देते हैं। शनिवार का दिन बड़े बच्चों के लिए स्वतंत्र रूप से अपना काम करने का होता है। इसमें वे अपने असाईनमेंट्स, प्रोजेक्ट्स, एक्सपेरीमेंट्स या फिर स्पेशल क्लास करते हैं। कोशि‍श होती है कि बच्चों को इसमें फैसिलिटेटर की कम से कम जरूरत पड़े। शनि‍वार का दिन फैसिलिटेटर्स के लिए भी अगले सप्ताह की प्लानिंग, सत्रों और गतिविधियों के लिए शि‍क्षण सामग्री निर्माण करने और बच्चों के पोर्टफोलियो (स्टूडेण्ट्स फाईल) अपडेट करने का दिन होता है। हर क्षण ऊर्जा और रचनात्मकता से भरा हुआ दिन सभी को बेहतर करने को उत्साहित और प्रेरित करता है।

आनन्द निकेतन स्कूल के बारे में बताते हुए अनिल सिंह कहते हैं, ‘‘जीवन का लक्ष्य है आनन्द प्राप्त करना, लेकिन परम्परागत शि‍क्षा में खुशी के लिए कोई जगह नहीं है। इसलिए एक ऐसी जगह बनाने की जरूरत थी जहां बच्चे खुश रह सकें। टीचर्स और अभिभावक भी आनन्द ले सकें। स्कूल बच्चों के लिए उनके घर का विस्तार हो। और सबसे बढ़कर अपने लिए खुद तय करने के मौके हो। उसी सोच का परिणाम है- आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल। कक्षा आठवीं तक की मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त इस स्कूल में आज 65 बच्चे अध्ययनरत हैं जो विविध सामाजिक स्तर एवं आय वर्ग से आते हैं। दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यवसायी, कर्मचारी एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के बच्चे एक समावेशी और बालमैत्री पूर्ण परिवेश में 5 शि‍क्षकों के साथ विविध गतिविधियों के माध्यम से हर पल सीखते-सिखाते हैं। यहां पाठ्यपुस्तकों का बंधन, अनुशासन की जकड़न, बोझिल नीरस कक्षाएं, बस्ते का बोझ और परीक्षाओं का भय नहीं है, बल्कि एक प्रकार का खुलापन है, आजादी है, हक है और मौके हैं। कुछ सत्रों में प्रायः अभिभावक भी शामिल होते हैं। सतत् और व्यापक मूल्यांकन पद्धति है। हर बच्चे की प्रोफाईल है जिसमें स्कूल में बच्चे की सत्रों में सहभागिता, अन्य बच्चों एवं शि‍क्षकों से व्यवहार एवं उसके रुझान, अभिव्यक्ति, अभिभावकों व सहपाठियों के विचार आदि के समग्र प्रदर्शन के आधार पर सामूहिक निर्णय होता है। यहां बच्चे को उसकी रुचि और समझ अनुसार सीखने की स्वतंत्रता है। सच कहूं तो यहां हम सब एक-दूसरे से सीख रहे हैं और सीखने-सिखाने की कोई जल्दबाजी भी नहीं है।’’

आनन्द निकेतन डेमोक्रेटिक स्कूल की अधिगम की इस रसवती धारा में बच्चे और शि‍क्षक अवगाहन कर नित नवीन तौर तरीके विकसित करते रहेंगे। मुझे विश्‍वास है- स्कूल का परिवेश बच्चों के मधुर हास्य और कोमल सृजन से सदैव जीवन्त बना रहेगा। प्रेम, न्याय एवं समतायुक्त एक अहिंसक लोकतांत्रिक समाज रचना की ओर उनके अनथके कदम बढ़ते रहेंगे।

इधर लगभग दो दशकों से शि‍क्षा विषेशकर प्राथमिक शि‍क्षा क्षेत्र की चुनौतियों एवं सतह पर उभरे सवालों से जूझते हुए समाधान की दिशा में सार्थक कदम बढ़े हैं। इस पहलकदमी को शि‍क्षा की बेहतरी के लिए गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। ये प्रयास जहां सरकारी स्तर पर राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 तथा निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शि‍क्षा अधिकार अधिनियम 2009 के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जिसमें स्कूलों में ढांचागत बदलाव करते हुए किसी बच्चे की शि‍‍क्षा प्राप्ति के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करने की एक कोशि‍श की गई हैं, वहीं विस्तृत शैक्षिक फलक पर निजी प्रयासों से भी शि‍क्षा के गुणात्मक सुधार हेतु कुछ उल्लेखनीय नवीन प्रयास हुए है। आपको ऐसे ही एक स्कूल से परचित कराने जा रहा हूं जिसने प्राथमिक शि‍क्षा की परम्परागत छवि, शि‍क्षण एवं मूल्यांकन पद्धति तथा धारणा को न केवल तोड़ा है, बल्कि एक विकल्प भी प्रस्तुत किया है। हालांकि उसके नाम से कहीं दूर-दूर तक भी आभास नहीं होता कि यह किसी स्कूल का नाम है। आप नाम जानना चाहेंगे ? तो लीजिए नाम हाजिर है- ‘इमली महुआ’। पड़ गए न आप अचरज में कि यह कैसा नाम है, क्या कभी ऐसा भी नाम होता है किसी स्कूल का। पर यह सच है और इमली महुआ स्कूल ने अपने प्रदर्शन से एक राह बनायी है जिस पर चलकर विद्यालयों की एक कैदखाने की बन गई छवि से मुक्ति पाकर बालमैत्रीपूर्ण लोकतांत्रिक परिवेश रचा जा सकता है।

इमली महुआ स्कूल के बारे में जानकारी देते हुए संस्थापक प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘इमली महुआ स्कूल छत्तीसगढ़ राज्यान्तर्गत बस्तर के जंगल के बीच कोंडागांव जिला के मुरिया एवं गोंड़ जनजाति बहुल गांव बालेंगापारा में स्थित है। पास में तीन गांव है- कोकोड़ी, कोदागांव और जगड़हिन पारा। ये सभी गांव स्कूल से 3 से 4 किमी की दूरी पर हैं। यह स्कूल नर्सरी से कक्षा 8 तक संचालित हैं। वर्तमान सत्र में 40 बच्चे अध्ययनरत हैं, जो 3 से 15 आयु वर्ग के हैं। वर्तमान में स्कूल का अपना भवन है, पर स्कूल की शुरुआत ‘घोटुल’ में 2 बच्चों, जिसमें एक लड़की थी, और 3 शि‍क्षकों के साथ अगस्त 2007 में हुई थी। यहां कोई परीक्षा नहीं होती है। स्कूल को वित्तीय मदद ‘आकांक्षा पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट, चैन्नै’  द्वारा दी जाती है, जोकि एक सत्र में अधिकतम 60 बच्चों के लिए निश्‍चि‍त है। स्कूल के तीन चौथाई बच्चे मुरिया एवं गोंड़ जनजाति के हैं। शेष बच्चे अनुसूचित और पिछड़ी जातियों यथा कलार, गांडा एवं पनका जाति समूहों से सम्बंधित हैं। 90 प्रतिषत बच्चे पहली पीढ़ी के विद्यार्थी हैं।’’

इसके पहले कि मैं इमली महुआ स्कूल के बारे में विस्तार से बात करूं, मुझे लगता है कि हम उस आदिवासी समाज के जीवन दर्शन को समझने का प्रयास करें जिनके बीच ‘स्कूल’ काम कर रहा है। इससे जहां हम एक ओर आदिवासी जीवन के रीति-रिवाज, ज्ञान, परम्परा एवं विश्‍वास की एक झलक देख सकेंगे, साथ ही स्कूल की राह आ रही कठिनाइयों, चुनौतियों एवं शि‍क्षकों के समर्पण को भी जान-समझ सकेंगे। आजादी के 68 साल बाद भी बालेंगापारा का चतुर्दिक वनवासी जीवन विकास से दूर एवं आधुनिकता से अछूता है। वे प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना के साथ जीते हैं। अपनी आजीविका एवं भोजन के लिए वे खेती और शि‍कार पर आश्रित हैं। मछली पकड़ना, छोटे जानवरों खरगोश, सुअर आदि का शि‍कार करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। पशुपालन भी करते हैं, पर दूध के लिए नहीं, बल्कि गोश्‍त के लिए। क्योंकि आदिवासी समाज दूध पर बछड़े का ही हक मानता हैं, मनुष्‍य का नहीं। आदिवासी समाज अपने बच्चों के साथ इज्जत से बर्ताव करता है। माता-पिता बच्चों के स्वाभिमान की रक्षा करते हैं। छोटे बच्चों से काम नहीं करवाया जाता हालांकि बच्चे अपने बड़ों को काम करते हुए देखकर काम करने का तरीका सीख जाते हैं और बड़े होने पर उनकी मदद करते हैं। आदिवासी समाज में स्पर्धा के लिए कोई स्थान नहीं है। परस्पर सहयोग भावना इन्हें मजबूत बनाए हुए हैं। उनकी भावना को सम्मान देते हुए स्कूल में भी कोई प्रतिस्पर्धा आयोजित नहीं की जाती। आदिवासी समाज में किसी की मृत्यु होने पर स्कूल बन्द कर दिया जाता है क्योंकि वे स्कूल को खुशि‍यों का घर मानते हैं और ऐसे मौके पर स्कूल खोलना उनके प्रति असंवेदना का ही प्रदर्शन होगा। आदिवासी समाज, विशेषरूप से मुरिया और गोंड जानजातियों में अपने बच्चों को परम्परागत ज्ञान,  नृत्य,  संगीत एवं कला सीखने-सिखाने की संस्था ‘घोटुल’ होती है, जिसमें एक बड़े कुटीर में सभी युवक-युवतियां शाम से सुबह तक निवास करते हैं। इसमें अपना जीवन साथी चुनने की भी छूट होती है जिसे सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है। यहां वे पारिवारिक और सांसारिक समझ विकसित करते हैं। हालांकि यह चलन शहरी संस्कृति के दबाव एवं बाहरी लोगों के दखल से अब बहुत कम हो गया है।

इमली महुआ स्कूल।

विद्यालय का आरम्भिक नाम रखा गया था ‘इमली महुआ नई तालीम सेण्टर फार लर्निंग’। पर यह बच्चों के लिए याद कर पाने और बोलने के लिए बहुत लम्बा था, तो बच्चो ने आपसी निर्णय से एक नया नाम चुना- ‘इमली महुआ स्कूल’। स्कूल बारहों महीने सोमवार से शनिवार प्रातः 10 बजे से 4 बजे तक लगता है। हरेक बच्चे का नाम किसी न किसी कक्षा में अंकित होता है, पर बच्चे सामूहिक रूप से पढ़ते हैं। हालांकि कुछ वर्ष पहले तक स्कूल में कक्षाओं की बजाय आयु आधारित बच्चो के चार समूह थे जो सपरी (3-5 वर्ष), सेमर (7-12 वर्ष), सीताफल (8-10 वर्ष) और सूरजमुखी (11-15 वर्ष) नाम से पहचाने जाते थे। यहां पढ़ाये जाने वाले विषयों में अंग्रेजी, गणित, हिन्दी, विज्ञान, पर्यावरण शि‍क्षण/सामाजिक बदलाव, योग, संगीत, मिट्टी का काम, चित्रकला, कढ़ाई-बुनाई जैसे विषय शामिल हैं। स्कूल के शि‍क्षण की माध्यम भाषा हिन्दी के और हल्बी हैं। क्लास बच्चों की मांग पर होती है। बोर होने पर बच्चे मना कर देते हैं। बच्चे रोजाना कई अलग-अलग तरह की गतिविधियां करते हैं और पढ़ाई भी उन्हीं का एक हिस्सा है। लूडो, कैरम, सांप-सीढ़ी, शतरंज, क्रिकेट के साथ ही लकड़ी के गुटकों और मांटेसरी की शैक्षिक सामग्री से भी अनेक आकृतियां बनाते-बिगाड़ते हुए बच्चे खेलते रहते हैं। दरअसल, यह खेलना भी एक प्रकार का सीखना है। कुछ बच्चे दिनभर खेलते हैं। स्कूल में न तो घण्टी बजती है, न स्कूल का गेट बंद होता है। बच्चे कभी भी आ सकेते हैं और जब चाहें घर जा सकते हैं। समय का आकलन सूरज को देखकर कर लेते हैं। बड़े बच्चे घर का काम करके आते हैं। यहां कक्षाएं और टाइम टेबिल का बंधन नहीं हैं। खुला सत्र भी होता है जिसमें बच्चे कोई भी प्रश्‍न पूछ सकते हैं। हर बच्चा अलग-अलग चीजें करता है। एक ही समय में कुछ बच्चे सिलाई-कढ़ाई और मिट्टी का काम करते हैं तो कुछ तबला-हारमोनियम पर अभ्यास कर रहे होते हैं। हम प्रत्येक दिन छोटी चैकियों पर बहुत सारी किताबें और लर्निंग मैटेरियल इस तरह से बिछा देते हैं कि बच्चे आसानी से उन्हें देख सकें और तब वे अपनी रुचि एवं सुविधा अनुसार सामग्री चुन लेते हैं और शि‍क्षक के साथ काम करते हैं। फिर दो घण्टे बाद मिलते हैं तब हाजिरी ली जाती है और बातचीत करते हैं। दोपहर का समय सामूहिक भोजन का समय होता है। बच्चे भोजन अपने घरों से लाते हैं, पर हरेक दिन कुछ बच्चे टिफिन नहीं ला पाते, तब स्कूल से उतनी थालियां ली जाती हैं और सभी बच्चे एवं शि‍क्षक अपने टिफिन में से भोजन का थोड़ा हिस्सा थालियों में क्रमश: रखते जाते हैं। इस प्रकार टिफिन साझा करते हुए बच्चे भोजन का आनन्द लेते हैं। सप्ताह में एक बार पूरे स्कूल का एक साथ लाईब्रेरी क्लास होती है जहां बच्चे पुस्तकों को पढ़ने के साथ-साथ उनका रखरखाव, रजिस्ट्ररों में पुस्तकें दर्ज करने एवं उनको एक पहचान संख्या देने, पुस्तकें निर्गत करने एवं जिल्दसाजी करने जैसे काम सीखते हैं। गत सत्र में पास के सरकारी स्कूल के बच्चे भी शामिल हो जाते थे, लेकिन अब उनका आना बन्द हो गया है।

शुक्रवार के दिन स्कूल आधे दिन का होता है और शुरुआत सामूहिक गान से होती है। उसके बाद स्कूल की सफाई, रखरखाव, मरम्मत और सामान की गिनती का वक्त होता है जिसमें बाल्टी, मग, लोटा, झाड़ू आदि की गिनती होती है। कच्चे फर्श की गोबर से लिपाई की जाती है। साढ़े दस बजे तक ये काम निबटाने के बाद सामूहिक नाश्‍ते का समय होता है और तब चने, मौसमी फल, खजूर, आदि मिल बांटकर खाते हैं। वैसे कुछ साल पहले तक शुक्रवार की दोपहर के बाद का समय हाट जाने का होता था और सूरजमुखी समूह के बच्चे अपने बनाये हुए मिट्टी के काम- खिलौने, घड़े आदि बाजार बेचने जाते थे और स्कूल के लिए सप्ताह भर का राशन एवं हरी सब्जियां लाते थे, पर अब इसमें बदलाव किया गया है और लगातार बदलाव करते रहना ही इमली महुआ की खूबी है। लेकिन ये बदलाव बच्चों का सामूहिक निर्णय है जो संवाद आधारित होता है। स्कूल में बच्चे अपनी दिनचर्या खुद तय करते हैं। पढ़ने के लिए कोई भी किसी बच्चे को मजबूर नहीं कर सकता। प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘यहां हरेक को छूट और स्वतंत्रता है। आजादी के कारण हम फलते-फूलते हैं और उसके अभाव में मुरझाते हैं।’’

शनिवार का दिन बाहर घूमने का दिन होता है। छोटे बच्चे दो समूहों में जंगल या किसी पहाड़ी पर पिकनिक मनाने जाते हैं। बड़े बच्चे साईकिल से आसपास के गांवों, महत्वपूर्ण इमारतों, सांस्कृतिक स्थानों की यात्रा पर जाते हैं। यह यात्रा 20 से 50 किमी तक की हो सकती है। स्वाभाविक है कि वापसी पर वे अपने अनुभव लिखते हैं और अन्य बच्चों के साथ साझा करते हैं। रविवार का दिन आराम और आगामी कार्य योजना बनाने का होता है। एपीसीटी  की ओर से प्रत्येक बच्चे को छात्रवृत्ति दी जाती है, जो बच्चे और उसकी मां के संयुक्‍त खाते में जमा की जाती है।

स्कूल की अब तक की शैक्षिक-सामाजिक यात्रा पर खुशी जताते हुए प्रयाग जोशी कहते हैं, ‘‘आदिवासी बच्चों को ऐसी शि‍क्षा दी जाए, जिससे उनकी विशि‍ष्‍ट सभ्यता बरकरार रहे और नई समस्याओं एवं चुनौतियों से निबटने की कुशलता पैदा हो। तीन-चार साल तक शि‍क्षण पद्धति शि‍क्षक केन्द्रित थी और बच्चों के हित का निर्णय शि‍क्षकों के हाथ में था। लेकिन स्कूल ने देखा कि आदिवासी जीवन में हरेक व्यक्ति को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता है तो स्कूल ने भी बदलाव किया। अब यहां किसी मुद्दे पर सबकी राय ली जाती है और एक सामूहिक निर्णय लिया जाता है। हरेक का एक वोट निश्‍चि‍त होता है। समय-समय पर निर्णयों की समीक्षा भी होती है। साल में एक बार बच्चे शैक्षिक भ्रमण पर जाते हैं ताकि बच्चे शहरी जीवन की वास्तविकता को नजदीक से समझ सकें। अमीर से अमीर व्यक्ति के घर ले जाते हैं और गरीब व्यक्ति के घर भी। पिछलें दिनों कुछ रेड लाईट एरिया और रैनबैक्सी के मालिक के बंगले पर ले गए थे। फुटपाथ पर जिंदगी जीते लोगों से भी भेंट होती है ताकि बच्चों का अनुभव विस्तृत हो सके और बडे़ होने पर बच्चे अपनी सामाजिक जिम्मेवारी को कहीं अधिक गंभीरता के साथ निर्वाह कर सकें। हम यहां हमेशा के लिए नहीं आए हैं। वर्ष 2030 तक हम यहां रहेंगे, पर हमें विश्‍वास है, तब तक स्कूल संचालन के लिए पर्याप्त लोग तैयार हो चुके होंगे।’’

‘इमली महुआ स्कूल’ के परिवेश में लोक का संस्कार है और जीवन का लययुक्त प्रवाह भी। यहां श्रम के प्रति सम्मान है तो जिजीविषा का आह्वान भी। यहां बच्चों को उनके बालपन के निश्‍छल व्यवहार के साथ जीने की स्वीकृति है न कि पग-पग पर बड़ों का हस्तक्षेप और आपत्ति। यहां पल-पल रचनात्मक उत्साह और उल्लास है और कुछ नया गढ़ पाने का विश्‍वास भी। यहां के प्रयोग को हम प्राथमिक शि‍क्षा के क्षेत्र में एक सार्थक पहल के रूप में देख सकते हैं।

लूट का स्कूल : संजीव ठाकुर

संजीव ठाकुर

मैं देश के उन लाखों पिताओं में से एक हूँ, जिनके बच्चे लगभग चार साल के हो गए हैं और जिन्हें किसी न किसी पब्लिक स्कूल की शरण में जाने में विलंब की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी-किसी पब्लिक स्कूल में अपने बच्चे के लिए प्रकांरातर से अपने लिए एक जगह आरक्षित करवाने की यह कवायद दरअसल तभी शुरू हो जाती है, जब बच्चा ‘थ्री प्लस’ का हो जाता है। और उससे भी पहले स्कूल में भरती होने के लिए तैयार करने के क्रम में हर गली-मुहल्ले में खुल गए ‘प्ले स्कूल’ की शरण में जाना भी लगभग अनिवार्य हो गया यानी बच्चा ‘टू प्लस’ का हुआ नहीं कि उसे ‘शिक्षा’ ग्रहण करने के लिए भेजना अनिवार्य-सा हो गया है। लाख समितियाँ बनें, लाख सिफारिशें की जाएँ, बच्चों का बचपन छीनने की यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं लगती, बहरहाल!

पिछले सितंबर से ही प्ले स्कूल वाले लिस्ट भेजने लगे, अमुक स्कूल में अमुक तिथि तक आवेदन करना है, तमुक स्कूल में तमुक तिथि तक! माँ-बाप इंटरव्यू में जाकर कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर जाएँ, इसके लिए बाकायदा काउंसलर को बुलवाकर प्ले स्कूल वालों ने हमारा ‘ओरिएन्टेशन’ (पुनश्चर्या) भी करवाया, छद्म-साक्षात्कार भी। फिर भी हममें से अधिकतर माता-पिता फेल हो गए और मनचाही जगह बच्चे का एडमीशन न करवा पाने की वजह से कुंठित भी। जिन्होंने ‘ब्रांडेड’ स्कूल पाया, उन्होंने चालें टेढ़ी कर सड़कों पर इतराना भी शुरू कर दिया। बाकी भी जहाँ-तहाँ एडमीशन करवाकर निश्‍चिंत हो गए। यह निश्‍चिंतता मन चाहा स्कूल न पा सकने के बावजूद भारी भरकम कीमत देकर प्राप्त करनी पड़ी। बहुत ‘बड़े’ स्कूलों की अनाप-शनाप कीमत से पाँच-सात हजार कम कीमत देकर ही इन्हें पाया जा सका। किसी ने बिल्डिंग फंड के नाम पर दान लिया, किसी ने विकास फंड के नाम पर तो किसी ने किसी शैक्षणिक ट्रस्ट के नाम पर। अपनी ही सेवा करने वाले इन ट्रस्टों के नाम पर ‘सधन्यवाद’ कई हजार लिए गए। धर्म के नाम पर चार आना, आठ आना मात्र निकालने वाले लोगों को भी यहाँ पाँच हजार, आठ हजार निकालने पड़े। बदले में उन्हें धन्यवाद तो मिला ही। वैसे यह धन्यवाद भी वे नहीं देते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता?

आखिर अप्रैल के प्रथम सप्ताह से बच्चों के सत्र आरंभ हो गए। सत्र आरंभ होने से पहले सभी माता-पिता को बच्चों के वस्त्र लेने बुलाया गया। कोई हजार रुपये के कपड़े, जूते, नैपकिन वगैरह दिए गए। नैपकिन इसलिए कि बच्चे उन्हें स्कूल के डेस्क पर बिछाकर खाना खाएँ और डेस्क गंदे न हों। उन गंदे डेस्कों को साफ करवाने का खर्च स्कूल वालों का बच जाए। सभी बच्चों को ‘स्विमिंग कॉस्ट्यूम’ भी दिए गए। इससे क्या कि अधिकांश स्कूलों में स्विमिंग पूल ही नहीं हैं और वे एक टबनुमा चीज में पानी भरकर बच्चों को उछलने-कूदने की सुविधा देते हैं।

इसके बाद स्टेशनरी की बारी आई। स्टेशनरी के नाम भी हजार रुपये लिए गए और बदले में सात कॉपियाँ, सात जिल्दें, कुछ स्टिकर, दो पुस्तकें और एक लिस्ट दी गई। ये कॉपियाँ वगैरह देने की कृपा इसलिए की गई ताकि माता-पिता उन पर अपने बच्चों के नाम लिख सकें, उन पर जिल्द चढ़ा सकें। और वह लिस्ट इसलिए ताकि माता-पिता देख सकें कि आपके बच्चे किन-किन चीजों का उपयोग स्कूल में करेंगे! वे सभी स्टेशनरी के सामान उनकी क्लास टीचर को सीधे दे दिए जाएँगे। आप उनके दर्शन भी नहीं कर सकते। हाँ, उनके दाम देखकर कुढ़-भुन सकते हैं। तो कुढ़िए-पैंसिल दो पैकेट- बावन रुपये। शार्पनर- तीन रुपये। पेपर सोप- तीस रुपये, कलर पेंसिल-चौबीस रुपये। इरेजर-तीन रुपये इत्यादि, इत्यादि। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाजार भाव से तीन गुना में ये सामान आपको स्कूल-काउंटर से खरीदने हैं। और यह पूछने का तो आपको अधिकार ही नहीं है कि पूरे सत्र में, जिसमें कोई चार महीने तो छुट्टियों के ही होंगे, बच्चे इतनी पेंसिलों का क्या करेंगे? इतने पेपर सोप का क्या करेंगे? और उनसे जो एप्रैन के पैसे लिए गए हैं, उनका क्या होगा? पच्चीस रुपये ब्लो पेन क्या सत्र समाप्ति के बाद बच्चों को लौटा दिया जाएगा? नहीं भैये, नहीं! अगले सत्र में आप इससे कुछ ज्यादा रकम ही भरेंगे, क्योंकि आपके बच्चे एक क्लास और ऊपर चढ़ जाएँगे।

स्कूलों में अभी छुटिृयाँ चल रही हैं। स्कूल वाले समर कैंप के नाम पर अलग से बच्चों के माता-पिता को दूह रहे हैं। आखिर छुट‍्टि‍यों का बस का किराया भी तो ले ही लिया है। स्कूल-फीस तो चलो जायज है, ये बस का किराया? करीब दो महीने बसों को देख भी नहीं पाने वाले बच्चों को बस का किराया क्यों देना पड़ा? राम जाने! हमारी सरकार तो ये सब बातें जान ही सकती है। सरकार ने कौड़ियों के मोल जमीनें दे ही दी हैं स्कूल वालों को। इससे ज्यादा वह क्या कर सकती है? स्कूल चलाने वाले कोई बड़े उद्योगपति हैं, कोई राजनेता, कोई माफिया उन पर अंकुश रखना क्या किसी सरकार के वश का है? खैर!

स्कूल का सत्र शुरू होने पर भी लूट का खेल जारी रहा। माता-पिता को मीटिंग के बहाने बुलाया गया और दो सौ बीस रुपये जमा कराने को कहा गया। इसके बदले एक वर्कशीट बच्चों को रोज दी जाएगी, जिसमें वो आकृतियों को जोड़ेंगे, उसमें लिखी उल्टी-सीधी कविताओं को रटेंगे, होम वर्क करेंगे और उन्हें बीस रुपये के एक फाइल कवर में रखेंगे। यानी हजार रुपये के स्टेशनरी आइटम में यह ‘वर्कशीट’ शामिल नहीं थी। सभी पिता की तरह मैंने भी रुपये निष्कासित किए, मन लेकिन खीझता रहा और एक सप्ताह बाद बेटी के बस्ते में जब पैंसठ रुपये और जमा करने का फरमान लिखा आया तो मैं उबल पड़ा- ‘‘इतने-इतने पैसे लिए हैं, एक डायरी तक नहीं दे सकते? आई कार्ड बनाने की जिम्मेदारी क्या उनकी नहीं है?’’ आखिर पत्नी ने शांत कराया और मैं जाकर पैंसठ रुपये और दे आया। मैं जानता हूँ, लूट का यह खेल खत्म नहीं हुआ है। स्कूल के खुलते ही फिर किसी मद में माँग की जाएगी, फिर किसी मद में। लूट का यह खेल तो दरअसल तभी खत्म होगा, जब बेटी बारहवीं पास कर जाएगी। और बारहवीं के बाद शायद लूट के ज्यादा बड़े खेल की तैयारी करनी होगी।

कमल जोशी- एक यायावर का अचानक चले जाना : ज़हूर आलम  

कमल जोशी

हमेशा चलते रहना ही उसने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया था। उसने कभी विराम नहीं लिया और 3 जुलाई को बिना किसी को बताए वह सबसे लम्बी अनजान और एक अनंत यात्रा पर निकल गया। बचपन में ही लग गई एक्यूट  अस्थमा की भयंकर बीमारी से लड़ते हुए उसने पहाड़ का चप्पा-चप्पा छान मारा था, चाहे वो रूपकुण्ड और नन्दा राजजात की कठिन यात्रा हो या लद्दाख और छोटा कैलाश की अनंत ऊँचाइयों को पार करना। कम आक्सीजन के कारण जहां बड़े‎-बड़े‎ चौड़े सीने वाले महारथियों की भी साँस फूल जाती थी, वहां दृढ निश्चयी जिद्दी दमे का मरीज कमल उन ऊँचाइयों और दुर्गम पहाड़ों को हँसते–हँसते पार कर लेता था,  क्योंकि प्रकृति और पर्वत की ऊँचाइयों से उसे अगाध प्रेम था और इनके साथ हो रहे दुर्व्यवहार के प्रति गहरी चिन्ता थी।

उत्तराखण्ड के पहाड़-गाँव-लोगों की स्थिति को जानने समझने के लिए 1974 , 1984 , 1994 , 2004  व 2014 में डा० शेखर पाठक के नेतृत्व में पहाड़ संस्था की ओर से आयोजित ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ की लम्बी यात्राओं का वह अगुवा साथी रहा। उत्तराखण्ड के सभी राजनीतिक, समाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों/अभियानों में उसने बढ़-चढ़‎ कर अपनी महत्वपूर्ण‎ हिस्सेदारी निभाई।
कमल जोशी अपनी धुन का पक्का और बहुत जिद्दी इंसान था। बचपन में ही उसे एक्यूट अस्थमा का जानलेवा रोग लग गया था।  दुनिया भर के इलाजों के बावजूद डाक्टरों ने जवाब दे दिया था कि वह बहुत दिन नहीं बचेगा, पर उसने जिद पकड़‎ ली कि वह जियेगा ! …और बिमारी से लड़ते हुए उसने 63 साल की एक भरपूर जिंदगी बिना किसी रोक-टोक के आजादी के साथ बिल्कुल अपनी तरह से जी ! वह कहीं रुका नहीं। बस चलता रहा। वह कहता भी था, “चलना ही मेरी खुराक है और जिन्दगी भी। जिस दिन रुक गया, समझ लो…।’’

वह सबसे बेलौस तरीके से और खुलकर मिलता था। आप-जनाब वाली ‍औपचारि‍कता उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थी। इसीलिए नये-अंजान लोगों से भी वह पलभर में ही घुल-मिल जाता था और उनका दोस्त बन जाता था। इसीलिए उस पारदर्शी दोस्त के मित्रों/जानकारों की इतनी लम्बी फेहरिस्त है कि गिनना मुश्किल होगा। बेबाकी का यह आलम था कि वह किसी के दबाव में कभी नही आता था- चाहे वह कोई भी तुर्रमखाँ हो। उसे खुले दिमाग‎ के लोग ही पसंद थे। बकौल हरजीत-
जो तबीयत हरी नही करते
उनसे हम दोस्ती नही करते

केमिस्ट्री में एमएससी करने के बाद रिसर्च करने के लिए वह कुमाऊँ‎ विश्वविद्यालय नैनीताल आया था। तीन साल गहन शोध करने के बाद जब थीसिस लिखी‎ जा रही थी, अन्तिम चेप्टर मे किसी बात पर गाईड से उसके विचार नही मिले और उसने एक झटके में रिसर्च को तिलांजलि दे दी और फोटोग्राफी, पत्रकारिता, कविता, चित्रकला, सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों और यायावरी में अपना जीवन झोंक दिया। फिर कभी पीछे मुड़कर  नहीं देखा।
बेबाक पत्रकारिता, लेखन और फोटोग्राफी में उसकी नजर का और सोच का कोई जवाब नहीं था। कमल एक बहुत ही उच्चकोटि का लाजवाब फोटोग्राफर था। यह उसकी नजर का कमाल था कि उसके अधिकांश फ्रेम और कम्पोजीशन पेंटिंग जैसे लगते थे।  दिल्ली में एक बार वह मुझे मशहूर फोटोग्राफर रघु राय के स्टूडियो में ले गया था। कमल और रघुराय के बड़े‎ बेतकल्लुफ ताल्लुकात थे। कमल और उसकी फोटोग्राफी के प्रति रघु राय का सम्मान देख मैं दंग था।

अस्सी के दशक में नैनीताल आने के बाद युगमंच, पहाड़, नैनीताल समाचार और उत्तरा पत्रिका से उसने अपना गहरा नाता जोड़ लिया था। जसम और युगमंच परिवार का वह स्थायी‎ सदस्य बन गया था। नाटकों, नुक्कड नाटक समारोह, कवि सम्मेलन‎, होली महोत्सव, फिल्म फेस्टिवल आदि में नैनीताल से बाहर चले जाने के बावजूद वह हमेशा अपनी उपस्थिति और भागीदारी निभाता रहा। डा. शेखर पाठक के सम्पादन में ‘ पहाड़’ और डा. उमा भट्ट के सम्पादन में निकलने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका ‘ उत्तरा’ में उसका सहयोग अतुलनीय था।

देहरादून से संजय कोठियाल के सम्पादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका ‘युगवाणी’ में उसकी भूमि‍का बहुत महत्वपूर्ण थी। मुख्य पन्ने पर उसके द्वारा खींची एक बोलती हुई तस्वीर और उसी पर कमल का आलेख युगवाणी को नई ऊँचाइयां प्रदान कर रहे थे। अब उसके जाने के बाद युगवाणी का मुख्य पन्ना सूना हो जाएगा- जिसका पाठक महीने भर इंतजार करते थे, जिसमें पहाड़ की किसी जुझारू महिला, ढाबे वाले या किसी मासूम पहाड़ी‎ बालक-बालिका की तस्वीर और उसी से जुड़ी पहाड़ के पहाड़ से जीवन, कठोर परिश्रम और जीवन्तता बाल सुलभता पर एक विचारोत्तेजक स्टोरी होती थी। वह अपनी यात्राओं के पड़ा‎वों से उन सच्ची स्टोरियों को उठाकर कागज पर बेहतरीन लेखन शैली में उतार देता था।
वह अपने समाज के लिए प्रेम से सराबोर बहुआयामी प्रतिभा थी। जिन्दगी का अनूठा चितेरा और बेहतरीन इंसान था। उसकी बेबाक हँसीं हमेशा कानों में गूंजती रहेगी।

पिछले साल वह मेरे व मुन्नी के साथ हमारा गाइड बन कर उत्तरकाशी से हरसिल और गंगोत्री तक गया था। इस साल यमनोत्री की यात्रा का प्रोग्राम था, पर कमल वादा तोड़‎कर किसी और यात्रा पर चला गया !

प्रोफेसर यशपाल- विज्ञान और समाज के सेतु: प्रेमपाल शर्मा

 

प्रोफेसर यशपाल

प्रोफेसर यशपाल (26.11.1926-25.07.2017) को सच्‍चे मायने में जन वैज्ञानिक कहा जा सकता है यानी आम आदमी की भाषा में विज्ञान को समझने, समझाने के लिए जीवन पर्यन्‍त प्रयत्‍नशील। उनका मानना था कि जिस बात को आप आम आदमी को नहीं समझा सकते, वह विज्ञान अधूरा है। इतना ही नहीं, उन्‍हें आम आदमी की समझ–बूझ पर भी बहुत भरोसा था। इसीलिए शिक्षा में वे उस ज्ञान के प्रबल पक्षधर थे, जो सदियों से समाज ने अपने अनुभव से अर्जित किया है, लेकिन उसकी कूपमंडूकता के उतने ही विरोधी। उनके एक-एक शब्‍द में अंधविश्‍वासों, तंत्र-मंत्र के खिलाफ जंग झलकती है। दूरदर्शन पर वर्षों तक चलने वाला प्रोग्राम ‘टर्निंग प्‍वांइट’ इसलिए इतना लोकप्रिय और ज्ञानवर्धक बना। देश के कोने-कोने से आए किसी भी प्रश्‍न को वे बच्‍चों की सी  सहजता से उठाते थे और मानते थे कि स्कूल यदि बच्चों के इस सहज ज्ञान को विज्ञान की नयी रोशनी में संवर्धित कर पाये तो शिक्षा का कायाकल्‍प हो सकता है।

हर मंच पर स्कूल, विश्‍वविद्यालय, मंत्रालय तक उन्होंने  बार-बार दोहराया कि बच्चे केवल ज्ञान के ग्राहक ही नहीं हैं। वे उसे समृद्ध भी करते हैं। बराबर के भागीदार। किसान, आदिवासी समाज के शब्द, बोली और परंपरागत जानकारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना शहरी किताबी ज्ञान। पाठ्यक्रम में दोनों का सामंजस्य, संतुलन चाहिए। स्कूल की दीवारों के भीतर और और उसके बाहर के परिवेश में जितना कम फासला होगा, शिक्षा उतनी ही बेहतर, सहज, रुचिकर होगी। माध्यम भाषा की कसौटी पर यशपाल की अवधारणा को परखा जाए तो हमारे शहरी स्कूल उस विदेशी भाषाओं में पढ़ाते हैं, जो अपने आसपास के परिवेश से बहुत दूर है।

एक साथ उन्‍हें कास्मिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विज्ञान संपादक, प्रशासक की श्रेणी में रखा जा सकता है। अपने अग्रज समकालीन भौतिक वैज्ञानिक, शिक्षाविद डॉ. दौलत सिंह कोठारी की तरह। अपनी भाषाओं के प्रति दोनों का प्‍यार बेमिसाल रहा। मुझे याद आ रही है, दिल्‍ली की एक गोष्‍ठी। जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में शायद नेहरूजी के ही किसी वैज्ञानिक अवदान के प्रसंग में थी। प्रोफेसर यशपाल मुख्‍य वक्‍ता थे। बोलने के लिए खड़े हुए। मंच की तरफ देखते हुए पूछने लगे कि‍ क्‍या हिन्‍दी में बोल सकता हूं? जाहिर है, दिल्‍ली के ऐसे मंच बहुत स्‍पष्‍टता और उत्‍साह से हिन्‍दी के लिए हामी नहीं भरते। कुछ मिनट तो वे अंग्रेजी में बोले फिर तुरंत हिन्‍दी की सहजता में उतर आए। प्रसंग भी इतने आत्‍मीय थे कि उन्‍हें केवल अपनी भाषा में ही कहा जा सकता था। यादगार भाषण था, वैज्ञानिक सोच को बढ़ाने के लिए। और यह भी कि जो व्‍यक्ति समाज को समझता है, उसके बीच से एक लंबे संघर्ष से गुजरा है, उसे जनभाषा की ताकत और उसकी संवाद शक्ति का एहसास है। यही कारण है कि प्रोफेसर यशपाल के किसी भी भाषण के बाद प्रश्‍नों की बौछार लग जाती थी। कभी-कभी घंटों तक। क्‍योंकि न वे विज्ञान का आतंक चाहते थे, न अंग्रेजी का। ऐसे ही सामान्‍य प्रश्‍नों को संकलित कर एनसीईआरटी ने एक किताब प्रकाशित की है, हिन्‍दी और अंग्रेजी दोनों में- खोजी प्रश्‍न Discovered Questions। एक नेशनल बुक ट्रस्‍ट ने भी Random Curiosities। स्कूल, कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए बहुत जरूरी।

यशपाल का जन्म मौजूदा पाकिस्तान के झुंग में हुआ था। विभाजन की त्रासदी के दौर से गुजरते हुए परिवार ने हरि‍याणा के कैथल में डेरा डाला। पंजाब यूनिवर्सिटी से भौतिकी में स्नातकोत्तर के बाद आगे की पढा़ई के लिए  एमआईटी अमेरिका गए। यहाँ दाखिले का प्रसंग भी शिक्षा –विमर्श के लिए बहुत प्रासंगिक है। प्रवेश परीक्षा में वे असफल रहे, तो उन्हें फिर से परीक्षा देने को कहा गया और इस बार उन्होंने बहुत अच्छा किया। सबक यह कि व्यक्ति की क्षमताओं को मापने के लिए परीक्षा पद्धति‍यों  को लचीला बनाने की जरूरत है– दुनियाभर के वि‍श्‍ववि‍द्यायलों की तर्ज़ पर।

विज्ञान के साथ-साथ शिक्षा में उनका मौलिक योगदान रहा है। 1992 में ‘बस्‍ते का बोझ’ शीर्षक से उनकी रिपोर्ट पर्याप्‍त चर्चा में रही है। वे कोचिंग और ट्यूशन के घोर विरोधी थे। कोचिंग के बूते आईआईटी में चुने जाने के भी वे पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि यह बनावटी सफलता है। जो सफल हो जाते हैं, उन्‍हें दूसरे विषयों का शायद ही कोई ज्ञान होता है और जो असफल रहते हैं, वे पूरी उम्र एक निराशा के भाव में रहते हैं। पाठ्यक्रम, शिक्षक विद्यार्थी अनुपात, नर्सरी के दाखिले में टेस्ट, माँ- बाप के इंटरव्यू को बंद करना जैसी बातों को उन्‍होंने राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उठाया और समझाने की कोशिश की। उनकी अध्‍क्षता में बना राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्चा कार्यक्रम-2005 एक ऐतिहासिक दस्‍तावेज है। हालांकि इसके पक्ष–विपक्ष में कम विवाद नहीं हुआ। पारंपरिक विज्ञान के धुर विरोधी इतिहासकारों ने यह कहकर चुनौती दी कि इसकी प्रमाणिकता पर संदेह है, लेकिन यशपाल अपनी मान्यता पर अडिग रहे। उनका कहना सही था कि उसे सिरे से नकारने की बजाय नयी वैज्ञानिक कसौटियो पर कसा जाए क्योंकि हर ज्ञान, समझ समाज सापेक्ष होता है। ग्रेड प्रणाली, परीक्षा को तनाव मुक्‍त करने की उनकी सिफारिशों का दूरगामी महत्व है। समान स्कूल व्यवस्था की बात कोठारी आयोग ने 1966 में की थी, यशपाल भी उसके पूरे समर्थन में थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि सरकारी स्कूल इतने अच्छे और ज्यादा हो जाएँ कि बच्चे निजी स्कूल की तरफ झांके भी नहीं। घर की सारी आमदनी इन प्राइवेट स्कूल में बर्बाद हो रही है।  2008 में उच्‍च शिक्षा के कायान्‍तरण के लिए भी उन्‍होंने एक रिपोर्ट बनायी। दुर्भाग्‍य से इन दोनों ही रपटों को न सही रूप में समझा गया, न लागू किया गया।

जीवनभर अटूट जिजीविषा और उत्‍साह से काम करने वाले यशपाल जी को अंतिम दिनों में इसका अहसास था। वर्ष 2009 में आकाशावाणी के एक कार्यक्रम में मैंने जब समान शिक्षा, अपनी भाषा में पढ़ाई का माध्‍यम, बढ़ती कोचिंग के प्रश्‍नों पर सरकार की असफलता के बारे में पूछा तो उनके स्‍वर में उतनी ही निराशा थी। यों उन्‍हें पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्‍च पुरस्‍कारों से नवाजा गया, उनकी शिक्षा संबंधी सिफारिशों की चर्चा भी देशभर में होती है, लेकिन इसे देश का दुर्भाग्‍य न कहें तो क्‍या कहें कि‍ जहां ऐसे वैज्ञानिक के होते हुए भी वैज्ञानिक सोच के पैमाने पर इतना बड़ा देश दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में है। प्रोफेसर यशपाल को सच्‍ची श्रद्धांजलि उनके विचारों, शिक्षा को फिर से जीवित करने, जन-जन तक फैलाने में है।

ऐसे भी बढ़ता है बस्‍ते का बोझ

निजी स्‍कूलों के बोझ को सरकारी स्‍कूल के बच्‍चों की तुलना में अक्‍सर दोगुने से भी ज्‍यादा वज़न का बस्‍ता लादना पड़ता है। इसमें जरूरी किताबों की बजाय गैरजरूरी किताबों की संख्‍या ही अधिक होती है। मिसाल के लिए, आठवीं कक्षा तक चले वाली सुलेख की किताबें। इन गैरजरूरी किताबों की कीमतें भी जरूरी किताबों की तुलना में बहुत ज्‍़यादा होती हैं। लेकिन हर विद्यार्थी को ये सभी किताबें खरीदनी पढ़ती हैं।

होता यह है कि प्राइवेट स्‍कूलों में चलने वाली अधि‍कांश किताबें निजी प्रकाशक छापते हैं। मान लो किसी किताब की लागत 3 रुपये है तो प्रकाशक उसे पुस्‍तक विक्रेता को 6 रूपये में देगा।     पुस्‍तक विक्रेता, निजी स्‍कूलों के पाठ्यक्रम में उस किताब को शामिल करवा लेगा और इसके बदले स्‍कूल के विद्यार्थियों की कुल संख्‍या के हिसाब से स्‍कूल एक प्रति पर 3 रुपये कमीशन लेगा। यानी यह किताब पुस्‍तक विक्रेता को कुल 9 रूपये में पड़ी। लेकिन विद्यार्थी को यही किताब 15 से 20 रूपये तक में मिलेगी। अब पाठ्यक्रम में जितनी ज्‍़यादा किताबें होंगी प्रकाशक, पुस्‍तक विक्रेता और स्‍कूल चलाने वालों को उतना ही ज्‍़यादा मुनाफा होगा। ज़ाहिर है, इन तीनों में से कोई भी बच्‍चे के बस्‍ते के वज़न की परवाह करेगा तो उसका अपना धंधा चौपट हो जाएगा।

(यशपाल रिपोर्ट- बस्‍ते का वोझ(1992) से/साभार: चकमक, सितम्‍बर, 1994)

लम्बी लकीर खींच गया रवांई साहित्य महोत्सव : प्रवीन कुमार भट्ट


रवांई साहित्य महोत्सव में वि‍चार व्‍यक्‍त करते वक्‍ता।

देहरादून : यमुना और टोंस नदियों से लगा प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर रवांई क्षेत्र अपने प्राचीन इतिहास व विशिष्ट संस्कृति के लिए जाना जाता है। क्षेत्र की भवन निर्माण कला व काष्ठशिल्प भी बेजोड़ है। इतिहासकारों का मत है कि हिमांचल व उत्तराखंड की सीमा में बसे रवांई क्षेत्र में पाए गए अनेक प्राचीन मंदिर व अन्य निर्माण 1000 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। इससे ही इस क्षेत्र की प्राचीन संस्कृति का सहज अंदाजा हो जाता है। कृषि और बागवानी के क्षेत्र में भी रवांई का कोई सानी नहीं है। रवांई का लाल चावल अपनी खूबियों के लिए दूर-दूर तक पहचाना जाता है। यमुना-टोंस के अलावा कमल और ऐसी ही अनेक छोटी नदियां रवांई क्षेत्र को सरसब्ज रखने में अपना योगदान देती हैं।

उत्तराखंड के देहरादून और टिहरी जनपद की सीमाओं से लगे उत्तरकाशी जनपद का रवांई क्षेत्र कृषि, बागवानी, पशुपालन व स्वरोजगार के लिए जाना जाता है लेकिन इस क्षेत्र में साहित्यिक गतिविधियां नगण्य रही हैं। रवांई क्षेत्र की साहित्यिक शून्यता को भरने की पहल सामाजिक संस्था अर्श व देहरादून की प्रकाशन संस्था समय साक्ष्य द्वारा प्रारंभ की गई। दोनों संस्थाओं ने मिलकर 29-30 जुलाई 2017 को रवांई क्षेत्र के केन्द्रीय नगर पुरोला में रवांई साहित्य महोत्सव का आयोजन किया। टीएचडीसी सेवा, टोंस वन प्रभाग पुरोला व होटल क्लासिक हिल व्यू के सहयोग व रवांई साहित्य महोत्सव आयोजन समिति के संयोजन में आयोजित दो दिवसीय आयोजन में कुल दस सत्र आयोजित किए गए।

रवांई घाटी में पहली बार आयोजित साहित्य महोत्सव महानगरों में आयोजित हो रहे साहित्य महोत्सवों से उन्नीस नहीं रहा। इस आयोजन के सत्र इस प्रकार रखे गए कि साहित्य महोत्सव में साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद्, व्यवसायी, इतिहासकार व किसान सभी एक साथ मंच पर नजर आए। साहित्य महोत्सव में न सिर्फ हिन्दी साहित्य में पहाड़ जैसे आंचलिकता व स्थानीयता से जुड़े सत्र आयोजित किए गए जिसमें हिन्दी साहित्य के साथ पहाड़ के रिश्ते और उसकी मौजूदगी पर बात हुई, बल्कि यमुना टोंस घाटी के इतिहास, समाज और संस्कृति जैसे सत्र भी हुए। जहां श्रोताओं को यमुना-टोंस घाटी के इतिहास और प्राचीन संस्कृति के विषय में इतिहासकारों से तथ्यपरक जानकारी हासिल हुई। दो दिवसीय रवांई साहित्य महोत्सव 2017 में राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, लोकसंस्कृति के पुरोधा प्रो. डी.आर. पुरोहित, जमना लाल बजाज व इन्दिरा गांधी पुरस्कार प्राप्त गांधीवादी विचारक व सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन, उत्तराखंड के पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’,  राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किसान युद्धवीर सिंह रावत, बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञ खजान सिंह, भारत में सबसे अधिक छह बार माउन्ट एवरेस्ट फतह कर चुके पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू,  पुस्तकों की दुनिया के जानकार रमाकांत बेंजवाल, बाल प्रहरी के सम्पादक व बाल साहित्यकार उदय किरौला, डॉ राधेश्याम बिजल्वाण, डॉ विजय बहुगुणा जैसे विषय विशेषज्ञ मौजूद रहे।

पुरोला के प्रथम नागरिक नगर पंचायत अध्यक्ष प्यारे लाल हिमानी ने सभी साहित्यकारों व उपस्थित नागरिकों का स्वागत किया। आयोजन के पहले दिन ‘यमुना टोंस घाटी- इतिहास, समाज और संस्कृति, ‘हिमालय और हम’, हिन्दी साहित्य में पहाड़, ‘कवि और कविताएं’ (स्थानीय कवियों का कविता पाठ) जैसे रोचक सत्र आयोजित किए गए। पहले दिन सायं साहित्यकारों को पुरोला से मठगांव व धुनधार होते हुए साहित्यकार महावीर रवांल्टा के गांव महरगांव का भ्रमण कराया गया। महरगांव में महाबीर रवांल्टा की अगुवाई में ग्रामीणों ने साहित्यकारों का जोरदार स्वागत किया। इस अवसर पर ग्रामीणों द्वारा तांदी गीत व नृत्य आयोजन के साथ ही साहित्यकारों को पहाड़ी व्यंजन अरसे, पकौड़ी व लाडू खाने को दिए।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियाँ’ विषय पर आयोजित किया गया। इसके अतिरिक्त आयोजन का दूसरा सत्र ‘मैं और पहाड़’ विषय पर पर हुआ। इस एकल सत्र को प्रसिद्ध पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने संबोधित किया। दूसरे दिन का तीसरा सत्र ‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को राजभवन देहरादून के पुस्तकलाध्यक्ष रमाकांत बेंजवाल ने संबोधित किया। बाल साहित्य और बच्चे सत्र को बालसाहित्य के पारखी उदय किरोला ने संबोधित किया। आयोजन के दूसरे दिन दो पुस्तकों का लोर्कापण भी किया गया। पहली पुस्तक महाबीर रवांल्टा की रवांल्टी कविताओं की पुस्तक ‘गैणी जण आमार सुईन’ तथा दूसरी पुस्तक डॉ. सत्यानन्द बडोनी की ‘बस! इथगि चैन्दू’ रही। आयोजन के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। इन कार्यक्रमों में कलाकारों द्वारा रवांई घाटी की लोकसंस्कृति को प्रदर्शित किया गया। जीआईसी पुरोला, शिवालिक पब्लिक स्कूल के छात्रों द्वारा रवांई क्षेत्र के लोकगीतों में नृत्य प्रस्तुत किए गए। आयोजन के दूसरे दिन की शाम रवांई के प्रसिद्ध लोकगायक अनिल बेसारी के नाम रही। बेसारी और उनकी टीम ने स्थानीय लोकगीतों का ऐसा शमा बाँधा कि आयोजन स्थल के आसपास लोग छतों पर चढ़कर कार्यक्रम का आनंद उठाते रहे। इस अवसर पर देहरादून से साहित्यकार शूरवीर सिंह रावत, पत्रकार राजेन्द्र जोशी, मनोज इष्टवाल, दिनेश कंडवाल, सुरेन्द्र पुण्डीर व सुन्दर बिष्ट भी पहुंचे।

रवांई साहित्य महोत्सव में सांस्‍कृति‍क कार्यक्रम पेश करते कलाकार।

‘इतिहास समाज और संस्कृति’सत्र में बोलते हुए राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा कि रवांई का इतिहास समूचे पर्वतीय भूभाग से अलग है। अलग-अलग अवसरों पर हुई पुरातात्विक खुदाई से भी यह संकेत मिल चुके हैं। प्रो. डी.आर. पुरोहित ने बताया कि रवांई क्षेत्र के लोकगीत व लोकनृत्य अपनी अलग ही छाप छोड़ते हैं और यहां संस्कृति अभी अपने मूलरूप में बची हुई है। रवांई क्षेत्र के इतिहास से जुड़े डॉ. राधेश्याम बिजल्वाण ने रवांई की प्राचीन धाड़ा प्रथा के बारे में बताया, जबकि डॉ. प्रहलाद रावत ने रवांई के ऐतिहासिक स्थलों व मंदिरों के बारे में बताया। इसी प्रकार डॉ. बिजय बहुगुणा ने रवांई की बोली की प्राचीनता पर अपनी बात कही। इस सत्र का संचालन इतिहास के प्रवक्ता सुभाष उनियाल ने किया।

‘हिमालय और हम’सत्र में राधा बहन, मोहन सिंह रावत गांववासी व अशोक वर्मा बतौर वक्ता शामिल रहे। राधा बहन ने इशारा किया कि‍ कि‍स प्रकार भारी व अनियोजित निर्माणों के कारण हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण व पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण में संतुलन भविष्य को सुरक्षित रखने की पहली शर्त है। पूर्व मंत्री मोहन सिंह रावत गांववासी ने रवांई क्षेत्र की गई अपनी यात्राओं के साथ ही हिमालय के महत्व और उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उत्तराखंड ओबीसी आयोग के पूर्व अध्यक्ष अशोक वर्मा ने कहा कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के साथ संतुलन बनाते हुए विकास भी जरूरी है। उन्होंने हिमालय में संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे लोगों के लिए बेहतर नीतियां बनाने की वकालत की। इस सत्र का संयोजन युवा साहित्यकार सुभाष तराण द्वारा किया गया।

‘कवि और कविता’ सत्र में स्थानीय कवियों महावीर रवांल्टा, अर्जुन सिंह नेगी, नीरज उत्तराखंडी, खिलानन्द बिजल्वाण, चन्द्रमोहन नौडियाल, प्रवीन तिवारी, सुभाष तराण, बलदेव सिंह भंडारी, बसंती असवाल व चन्द्रभूषण बिजल्वाण आदि ने कविता पाठ किया।

आयोजन के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘यमुना-टोंस घाटीः स्थानीय आर्थिकी और उसकी चुनौतियां’ विषय पर आयोजित किया गया। इस सत्र को कृषि पंडित की उपाधि से नवाजे गए क्षेत्र के प्रगतिशील किसान युद्धवीर सिंह, युवा होटल व्यवसायी हरिमोहन सिंह नेगी, पर्यटन व्यवसायी चैन सिंह रावत, दिनेश भट्ट,  डॉ. आशा राम बिजल्वाण व युवा नेता अमेन्द्र बिष्ट ने संबोधित किया। युद्धवीर सिंह रावत ने बताया कि किस प्रकार यमुना टोंस घाटी में खेती करने के तौर-तरीकों में बदलाव आया और किसान व्यवसायिक खेती की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने खेती किसानी के प्रति नई पीढ़ी की उदासीनता और सरकार के रवैये को भी सामने रखा। हरिमोहन सिंह नेगी ने कहा कि यमुना-टोंस घाटी में देश ही नहीं वरन् दुनिया के कुछ खूबसूरत स्थान हैं। यहां वर्ष भर बहने वाली सुंदर नदियां हैं। यहां चांइसील और हर की दून जैसे बुग्याल हैं। फिर भी यहां पर्यटन का वैसा विकास नहीं हो पाया है। इसके लिए उन्होंने मिलकर प्रयास करने पर बल दिया। डॉ. आशा राम बिज्लवाण ने बताया कि यमुना टोंस घाटी की आर्थिकी को मजबूत करने के लिए व्यावसायिक रणनीतियों पर भी फोकस करना होगा, केवल उत्पादन से काम नहीं चलेगा। साहसिक पर्यटन से जुड़े चैन सिंह रावत ने बताया कि यमुना टोंस घाटी से 30 से अधिक ट्रेकिंग रूट हैं।

‘मैं और पहाड़’ सत्र में एकल संबोधन करते हुए पर्वतारोही लवराज सिंह धर्मशत्तू ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में पर्वतारोहण से जुड़ें। उन्होंने बताया कि पर्वतारोहण न सिर्फ आपको हौसला देता है, बल्कि रोजगार भी देता है।

‘पुस्तकें कुछ कहना चाहती हैं’सत्र में रमाकांत बेंजवाल ने उपस्थित श्रोताओं को बताया कि भले ही ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पढ़ने की आदत कम हो रही है, लेकिन हकीकत यह है कि प्रकाशित हो रही पुस्तकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी प्रकार ‘बाल साहित्य और बच्चे’ सत्र में उदय किरौला ने बाल साहित्य के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने पर जोर दिया। इस सत्र का संयोजन प्रेम पंचोली द्वारा किया गया। आयोजन से जुड़ी रानू बिष्ट, राजेन्द्र लाल आर्या, सुभाष उनियाल आदि ने भी विभिन्न सत्रों में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर पुस्तक प्रदर्शनी व स्थानीय उत्पादों का स्टॉल भी लगाया गया।

कुल मिलाकर दो दिनों का यह आयोजन यमुना-टोंस घाटी में साहित्य को लेकर एक अच्छी शुरुआत कर गया है जिसकी गूंज अगले आयोजन तक सुनाई देती रहेगी।

प्रेमचंद के बहाने समय-समाज को समझने की कोशि‍श  

रा.इ.का. टोटनौला में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया।

पि‍थौरागढ़ : प्रेमचंद जयंती तथा उसकी पूर्व संध्या पार उनको याद करते हुए जगह-जगह विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य प्रेमचंद के बहाने अपने समय और समाज को जानना-समझना और पढ़ने की संस्कृति को आगे बढ़ाना रहा। इस बार पिथौरागढ़ में आरम्भ स्टडी सर्किल, रचनात्मक शिक्षक मंडल और लोकतान्त्रिक साहित्य-संस्कृति मंच द्वारा प्रेमचंद जयंती को एक अलग अंदाज में मनाया गया। प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर एक ‘कथा चौपाल’ का आयोजन किया गया। इसके न किसी को औपचारिक आमंत्रण पत्र दिए गए, न किसी को अध्यक्षता के लिए कहा गया और न ही कोई मुख्य वक्ता तय किया गया। कथा पाठ हुआ। उसके बाद उपस्थित लोगों ने बिना किसी औपचारिकता के कहानी को लेकर अपनी-अपनी बात रखी। गिर्दा के जनगीतों से कार्यक्रम की शुरुआत और समापन हुए। लोग उसके बात भी चर्चा-परिचर्चा करते हुए देखे गए।

कार्यक्रम का एक विहंगम शब्द-चित्र ‘बाखली’ के संपादक गिरीश चन्द्र पाण्डेय ने अपने फेसबुक वाल पर कुछ यूँ खींचा है- बरसात का दिन, राम लीला फिल्ड,और मुंशी प्रेमचंद जयंती का पूर्व दिन शाम के साढ़े चार बजे के आसपास बरसात का रुक जाना और आरम्भ स्टडी सर्कल के कुछ युवा साथी अपने पोस्टरों और किताबों से भरे झोलों के साथ बाहर निकलते हैं। साथ में विनोद उप्रेती, राजीव जोशी, कमलेश उप्रेती, चिंतामणि जोशी, किशोर पाटनी, दिनेश भट्ट आदि का ओपन थियेटर की ओर आना पिथौरागढ़ के माहौल में आ रहे परिवर्तन की ओर इंगित कर रहा था। बस कुछ ही पलों में पोस्टर लहराने लगे और एक मेज पर सज गई थीं कुछ स्थूल और कुछ कृसकाय किताबें। अब तक कुछ भी तो नहीं था, दो-चार लोगों के सि‍वाय।लग रहा था कि‍ बस इतने ही लोग क्या बोलेंगे। क्या सुनेंगे। क्या विचार-विमर्श होगा। कुछ ही देर में महेश पुनेठा आदि का आना और सीढ़ियों पर बैठ जाना । एक-एक कर संख्या का बढ़ते जाना। और बिना औपचारिकता के आरम्भ के साथियों के संचालन में गिर्दा के जनगीत के साथ प्रेमचंद की दो बैलों की कथा का अभिनयात्मक वाचन । थोड़ी ही देर में शिक्षकों और छात्रों के समूह से सामने की सीढ़ियां भर गईं। थोड़ी दूर पर बैठे कुछ बच्चे पहले कुछ मजाकिया मूड में थे, कहानी के उतार-चढ़ाव के साथ खुद को जोड़ने से रोक नहीं पाए। चुपचाप आए और पीछे बैठ गए और कहानी में लीन हो गए। तहसील परिसर की दीवार पर कुछ लोग जो ऐसे ही खड़े थे, दीवार के सहारे खड़े होकर हीरा और मोती की बातें ऐसे सुन रहे थे मानो अपने गांव की सैर में चले गए हों। बीच-बीच में बज रहीं मोबाइल की घण्टियों से ऐसा लग रहा था मानो थियेटर में पार्श्व संगीत चल रहा हो। करीब पौन घण्टे चली कहानी अब पूर्णता की ओर थी । आखिर कहानी पूरी हुई । युवा संचालक का बातचीत को आगे बढ़ाना । खुले मंच को अपने विचारों को साझा करने को कहना । किसी कहानी को कौन किस तरह किन कोणों से पढ़ता और समझता है, कितना अपने से और समाज से जोड़ पाता है, तत्कालीन समाज और समय और आज के परिपेक्ष्‍य में कहानी उपादेयता, पात्रों का गठन और उनकी उपयोगिता पर खुल कर चर्चा परिचर्चा हुई । खास बात यह थी की बोलने वालों में सबसे मुखर युवा और बच्चे थे । सभी ने यह माना कि यह खुली चर्चा शहर में पढ़ने और पढ़ाने की संस्कृति को विकसित करने के लिए एक सार्थक पहल है। यह लगातार होनी चाहिए। रचनात्मक शिक्षक मंडल का योगदान भी सराहनीय रहा। युवाओं को अगर सही मर्गदर्शन मिले तो शहर की फिजा बदल सकती है। युवाओं का यह जोश भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। अंत में फिर जनगीत के साथ एक खूबसूरत खुले मंच का विसर्जन। और उसके बाद किशोर पाटनी, राजीव जोशी, चिंतामणि जोशी की औपचारिक बातें। कुल मिलाकर एक खूबसूरत शाम ।अब बारिश शुरू हो चुकी थी ।

कार्यक्रम में पोस्‍टर रहे आकर्षण का केंद्र।

इस कार्यक्रम के बारे में डीडीहाट से शामिल होने आए शिक्षक साथी कमलेश उप्रेती ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि कुछ बेहतर करने के लिए बहुत बड़े तामझाम की जरूरत बिल्कुल नहीं होती। लगन हो और नीयत साफ तो खुले आसमान के नीचे भी शानदार आयोजन हो सकता है। इसका उदाहरण है पिथौरागढ़ में कालेज में पढ़ने वाले युवाओं का एक रचनात्मक समूह ‘आरंभ स्टडी सर्कल’। कल महान भारतीय साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर कथा चौपाल का अनौपचारिक आयोजन इन जोशीले युवाओं द्वारा किया गया। साथ में एक बुक स्टॉल भी, जहां पर प्रेमचंद साहित्य के साथ वैज्ञानिक विषयों पर किताबें खरीदने के लिए उपलब्ध, कितना सुखद है यह सब हमारे पिथौरागढ़ में हो रहा है।
कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का वाचन नाटकीय संवाद शैली में किया गया तो आभास हुआ कि इस तरह सामूहिक वाचन से कथ्य के कितने सारे आयाम खुलते हैं!  दोस्तो, इस दौर में जब युवा राह चलते भी अपने स्मार्टफोन में घुसा रहता है, आपके किताब उठाकर सरेआम पचास लोगों को पढ़कर सुनाने के जज्बे को सलाम बनता है।

प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल रामनगर द्वारा एमपी इंटर कालेज में कार्यक्रम आयोजित किया गया । इस कार्यक्रम के बारे में कार्यक्रम के संयोजक नवेंदु मठपाल अपनी फेसबुक पोस्ट पर बताते हैं कि 38 विद्यालयों के 700 से अधिक बच्चे, मौका था प्रेमचन्द जयंती की पूर्व संध्या पर रचनात्मक शिक्षक मण्डल द्वारा एमपी इंटर कालेज में आयोजित कार्यक्रम का। ये बच्चे विगत एक महीने में 10 हजार बच्चों से विभिन्न तरीकों से कि‍ए गए सम्पर्क के परिणामस्वरूप आए। बोर्ड सचिव श्री वीपी सिमल्टी जी ने बतौर मुख्य अतिथि अपने स्कूली दिनों को प्रेमचन्द की कहानियों के बहाने याद किया, तो बतौर विशिष्ट अतिथि मौजूद कुमाउंनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल जी ने भी वक्तव्य रखा। ललिता बिनवाल स्मारक समिति के अध्यक्ष बिनवाल जी, वरिष्ठ चित्रकार सुरेश लाल जी, रंगकर्मी रामपाल जी, कवि असगर जी, संजय रिखडी जी के नेतृत्व में भोर संस्था की नौजवान टीम के साथियों, अनेक प्रधानाचार्यों एसपी मिश्रा जी, राय जी, दिग्विजय सिंह जी, पुष्पा बुधानि जी, नलनी श्रीवास्तव जी, नीना सन्धु जी, जीतपाल जी के नेतृत्व में रोवर्स, रेंजर्स की टीम समेत 50 से अधिक शिक्षक-शिक्षिकाओं का रहा सक्रिय सहयोग। देघाट के शिक्षक साथी पाठक जी का विशेष धन्यवाद। बच्चों की एक टीम लेकर पहुंच गए।

अनौपचारि‍क कार्यक्रम में लोगों ने दि‍खाई खासी रुचि‍।

कार्यक्रम की शुरुआत भोर की टीम ने 1857 विद्रोह के प्रयाण गीत ‘हि‍म हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा’ एवं रामप्रसाद बिस्मिल के गीत ‘सरफरोशी की तमन्‍ना’ से हुई। प्रत्येक प्रतिभागी बच्चे को दिया गया- प्रेमचन्द साहित्य। आयोजक मण्डल द्वारा निकाली गई पुस्तिका ‘हमारी विरासत’ का भी विमोचन हुआ। कौन कहता है कि‍ बच्चे पढ़ना नही चाहते, शिक्षकों को तो सिर्फ वेतन और छुट्टी ही चाहिए। रचनात्मक मण्डल की टीम ने फिर गइस धारणा को गलत साबित किया।

गतवर्ष की भांति ही डॉ. डी.डी. पंत स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला बेरीनाग में प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर भव्य आयोजन किया गया। साथी कमलेश जोशी अपनी फेसबुक वॉल में बताते हैं कि  इस कार्यक्रम में विभिन्न स्कूलों के बच्चों ने प्रेमचंद की कहानियों पर पोस्टर बनाए, कहानियों का वाचन किया और नाटक किए। फ़िल्म ‘ईदगाह’ का प्रदर्शन भी किया गया। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष प्रेमचंद जयंती के अवसर पर यहाँ एक बालिका द्वारा प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ का कुमाउंनी भाषा में किया अनुवाद काफी चर्चित रहा था।

प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में भी कार्यक्रम आयोजि‍त हुए। इसके बारे में युवा लेखक बिपिन जोशी अपनी  फेसबुक वॉल पर कुछ इस तरह बताते हैं-  मुंशी प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन, टीएलसी गरुड़ में कहानी वाचन एवम काव्य गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। प्रेमचंद जी की मशहूर कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन किया गया । कहानी पर सारगर्भित चर्चा की गई । उक्त कार्यक्रम में शिक्षक साथियों सहित उत्तराखण्ड के लोक साहित्यकार गोपाल दत्त भट्ट, मोहन चन्द्र जोशी, चन्द्र शेखर बडशीला, ओम प्रकाश फुलारा, वरिष्ठ पत्रकार आनंद बिष्ट तथा जिला शिक्षा अधिकारी आकाश सारस्वत भी मौजूद रहे।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए शिक्षक नीरज पन्त ने मुंशी जी के साहित्य पर उनके जीवन पर प्रकाश डाला। मुंशी जी के बहाने दलित साहित्य और नारी साहित्य पर भी बातचीत की गई । कहानी ‘बड़े भाई साहब’ का वाचन शिक्षक उमेश जोशी ने कि‍या।
कथा चर्चा के बाद कुमाउंनी लोक साहित्य के प्रख्यात हस्ताक्षर मोहन जोशी, वरिष्ठ साहित्यकार गोपाल दत्‍त भट्ट, ओमप्रकाश फुलारा ने अपनी रचनाओं का पाठ कि‍या।
साहित्य गोष्‍ठी को एक महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यक्रम बताते हुए डीईओ आकाश सारस्‍वत ने प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं की प्रसंगिकता पर विचार रखे।

कुमाउं  मंडल  के विभिन्न स्कूलों में भी प्रेमचंद जयंती अपने-अपने तरीके से मनाई गई।  रा.इ.का. देवलथल में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए गए। दीवार पत्रिका ‘मनोभाव’ के प्रेमचंद विशेषांक का प्रधानाचार्य अनुज कुमार श्रीवास्तव ने लोकार्पण किया। उन्होंने कहा कि‍ प्रेमचंद का साहित्य हमें साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी संकीर्णताओं से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बच्चों द्वारा सम्पादित दीवार पत्रिका के इस विशेष अंक की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस तरह के प्रयास अधिकाधिक होने चाहिए क्योंकि इससे बच्चों की रचनाशीलता और कल्पनाशीलता को नए आयाम मिलते हैं। इससे पूर्व कार्यक्रम का संचालन करते हुए दीवार पत्रिका के संपादक राहुल चन्द्र बड़ ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला। शिक्षक रमेश चन्द्र भट्ट ने एक दि‍न पूर्व ‘प्रतिभा दिवस’ पर जूनियर कक्षाओं द्वारा तैयार की गई  दीवार पत्रिकाओं का बच्चों द्वारा समूहवार प्रस्तुतीकरण भी  किया गया।

इससे पूर्व प्रेमचंद जयंती पर कक्षावार निबंधों का पाठ किया गया। कक्षा-12 में उनके निबंध ‘प्राचीन और नवीन’ तथा कक्षा-10 में ‘आजादी की लडाई’ का वाचन किया गया। इन पर बच्चों ने लिखित रूप से अपनी प्रतिक्रिया दी। कक्षा-9 के बच्चों के साथ प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों की चर्चा करते हुए उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया। बच्चों को बताया गया कि कहानियां हमें केवल आनंद ही नहीं प्रदान करती हैं, बल्कि वे जिस कालखंड में रची गयी होती हैं, उस समय और समाज के बारे में बहुत कुछ बताती हैं।जैसे- प्रेमचंद के साहित्य को पढ़ते हुए वे आजादी की लडाई के बारे में तथा उस समय के समाज के बारे में बहुत कुछ जान और समझ सकते हैं। इससे हमारी भाषा भी मजबूत होती है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों के साथ-साथ साहित्य की पुस्तकें भी पढ़ी जानी चाहिए। न केवल खुद, बल्कि दूसरों को भी पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके लिए पुस्तकालय खोलने के अभियान से जुड़ने की बच्चों से अपील की गई।  बच्चों ने लिखित रूप से संकल्प व्यक्त किया कि वे अपने-अपने गांव में छोटे-छोटे पुस्तकालय स्थापित करने की कोशिश करेंगे। साथ ही वे प्रेमचंद की अगली जयंती तक उनकी अधिक से अधिक रचनाएँ पढ़ेंगे।

रा.इ.का. टोटनौला में शिक्षक-साहित्यकार चिंतामणि जोशी के मार्गदर्शन में दीवार पत्रिका ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद अंक का विमोचन किया गया। उन्‍होंने अपनी फेसबुक वाल लि‍खा है कि‍ आज मास का अंत था और चौथे वादन के बाद दीवार पत्रिका समूह द्वारा ‘नवांकुर’ के प्रेमचंद विशेषांक के लोकार्पण व प्रेमचंद जयंती मानाने की योजना भी थी। सुबह विद्यालय पहुंचे तो रात भर के बाद भी बरसात जारी थी। बच्चे पिछले लगभग 15 दिनों से अपने ढंग से प्रेमचंद को जानने-समझने में लगे थे। इस माह दीवार पत्रिका के भी दो अंक तैयार कर चुके थे। विद्यालय में बृहद कक्ष है नहीं। तीसरे वादन तक भी मौसम नहीं खुला तो कक्षा 11अ के बच्चों ने अपनी कक्षा का फर्नीचर बगल के कक्ष में शिफ्ट कर कक्षा में दरिया बिछा दीं और शिक्षकों के लिए कुर्सियां डालकर प्रधानाचार्य जी को सूचित कर दिया कि कार्यक्रम होगा और कक्षा कक्ष में ही होगा। वाह! जहाँ चाह वहां राह।

दीवार पत्रिका संपादक मंडल ने मध्यांतर के बाद विद्यार्थियों को बिना बैग के छोटे से कक्ष में बिठा दिया। मुख्य संपादक कविता कापड़ी ने आवश्यक निर्देशों के बाद प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की कि नवांकुर का लोकार्पण, आलेख-कविताओं-कहानियों का वाचन, समीक्षा, प्रेमचंद के बहाने पढ़ने-लिखने की संस्कृति पर संवाद होगा और गणित अध्यापिका नीता अन्ना को बच्चों की ओर से विदाई भी दी जाएगी। कविता 100 बच्चों के भीतर स्व-अनुशासन रोपित कर चुकी थी।

प्रधानाचार्य कैलाश बसेड़ा जी के साथ श्रीमती अन्ना, पूनम, स्वाति व दीवार पत्रिका टीम ने नवांकुर का लोकार्पण किया। प्रधानाचार्य ने दीवार पत्रिका के महत्व को सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण मानते हुए बच्चों की खूब प्रशंसा की। छात्रा बबीता पाण्डेय ने स्वरचित कुमाउंनी कविता में प्रेमचंद की जीवनी और रचना संसार को व्यक्त किया। कमलेश पाण्डेय ने स्वरचित ‘प्रेमचंद जिन्होंने साहित्य में यथार्थ को निरूपित किया’ तथा आकांक्षा ने ‘प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री पक्ष’ आलेख का वाचन किया। तनुजा कापड़ी ने स्वरचित कहानी ‘शेरा की वापसी’ का पाठ कर सभी की संवेदना को झकझोरा। हिंदी शिक्षक राजेन्द्र बिष्ट, प्रकाश राम व विज्ञानं शिक्षक संतोष पन्त ने बच्चों को प्रेमचंद के विस्तृत रचना संसार की सैर कराई। मैंने प्रेमचंद के सम्बन्ध में बच्चों के प्रश्नों एवं जिज्ञासाओं के समाधान का प्रयास किया। उन्हें प्रेरित किया कि अच्छा साहित्य पढ़ने की आदत विकसित कर कैसे वे बेहतर इन्सान बन सकते हैं।

बागेश्वर जनपद के गरुड़ विकासखंड में स्थित राजकीय जूनियर हाईस्कूल रौल्याना में नवाचारी शिक्षक साथी नीरज पन्त के निर्देशन में  प्रेमचंद की जयंती मनाई गई। इस अवसर पर बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ और ‘पूस की रात’ का वाचन किया एवं कहानी के तत्वों पर चर्चा की।  ग्राम प्रधान मदन गिरी की अध्यक्षता में विविध कार्यक्रम हुए।

क्रि‍एटि‍व उत्‍तराखंड द्वारा रुद्रपुर में संचालित सृजन पुस्‍तकालय में भी प्रेमचंद जयंती पर कार्यक्रम आयोजि‍त कि‍या गया। इस अवसर पर प्रेमचंद की जीवन पर प्रकाश डाला गया और ईदगाह और दो बैलों की कहानी का वाचन कि‍या गया। इसके साथ कवि‍ता पाठ भी हुआ।

राजकीय इंटर कॉलेज खरसाड़ा पालगेट टि‍हरी गढ़वाल में आयोजि‍त कार्यक्रम में दो बैलों की कहानी और कई अन्‍य कहानि‍यों का वाचन और चर्चा हुई। साथ ही प्रेमचंद की भाषा, जीवन दर्शन और सामाजि‍क सरोकारों पर चर्चा हुई। कार्यक्रम का संचालन मोहन चौहान ने कि‍या।

राजकीय प्राथमि‍क वि‍द्यालय नवीन चौरसौ बागेश्‍वर में प्रेमचंद जयंती पर बच्चों ने दीवार पत्रिका ‘मन की बात’ तैयार की। मुख्य का आकर्षण प्रेमचंद की कहानियों का वाचन, जीवन परिचय, स्वरचित कहानी पाठ और चित्रांकन रहा। कार्यक्रम प्रधानाध्‍यापि‍का रीता जोशी की देखरेख में संपन्‍न हुआ।

प्रेमचंद जयंती पर आयोजि‍त कार्यक्रम में बड़ी संख्‍या में बच्‍चों की भागेदारी बहुत कुछ कहती है।

प्रस्‍तुति‍ : महेश चन्द्र पुनेठा

चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें?

अजित कुमार

‘चांदनी चन्दन सदृश’: / हम क्यों लिखें? / मुख हमें कमलों सरीखे/क्यों दिखें? / हम लिखेंगे:/ चांदनी उस रुपये-सी है/ कि जिसमें/चमक है, पर खनक ग़ायब है।’

नयी कविता के ग़ैर-रूमानी मिज़ाज की ऐसी प्रतिनिधि पंक्तियां लिखनेवाले कवि-गद्यकार श्री अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे। आज (18 जुलाई 2017) सुबह 6 बजे लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए 84 साल की उम्र में दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।

हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी गरिमामय उपस्थिति से जीवंत रखनेवाले अजित जी ने लगभग छह दशकों की अपनी साहित्यिक सक्रियता से हिन्दी की दुनिया को यथेष्ट समृद्ध किया। देवीशंकर अवस्थी के साथ ‘कविताएँ 1954’ का सम्पादन करने के बाद 1958 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ प्रकाशित हुआ था। तब से ‘अंकित होने दो’, ‘ये फूल नहीं’, ‘घरौंदा’, ‘हिरनी के लिए’, ‘घोंघे’ और ‘ऊसर’ – ये कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। उपन्यास ‘दूरियां’, कहानी-संग्रह ‘छाता और चारपाई’ तथा ‘राहुल के जूते’, संस्मरण और यात्रा-वृत्त की पुस्तकें ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहाँ से कहीं भी’, ‘अँधेरे में जुगनू’, ‘सफरी झोले में कुछ और’ और ‘जिनके संग जिया’, तथा आलोचना पुस्तकें ‘इधर की हिन्दी कविता’, ‘कविता का जीवित संसार’ और ‘कविवर बच्चन के साथ’ प्रकाशित हुईं। इनके अलावा नौ खण्डों में ‘बच्चन रचनावली’, ‘सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली’, ‘बच्चन निकट से’, ‘बच्चन के चुने हुए पत्र’, ‘हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं’ समेत बीसियों पुस्तकें उनके सम्पादन में निकलीं। अभी-अभी उनकी किताब ‘गुरुवर बच्चन से दूर’ छप कर आयी है।

अपनी लम्बी बीमारी और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अजित जी लेखन में लगातार सक्रिय रहे। कुछ समय से दिल्ली की साहित्यिक संगोष्ठियों में उनका आना-जाना थोड़ा कम अवश्य हो गया था, पर विभिन्न संचार-माध्यमों के ज़रिये साहित्यिक समुदाय के साथ उनका जीवंत संपर्क बना हुआ था।

श्री अजित कुमार का निधन हिन्दी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है. जनवादी लेखक संघ उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)

अनुप्रि‍या की बाल कवि‍ताएं

चि‍त्र: अनुप्रि‍या

कि‍ताब

काले अक्षर की माला में
गूंथा हुआ जवाब हूँ
मैं तो प्यारी मुनिया की
एकदम नयी किताब हूँ

मेरे भीतर कई कहानी
कितने सारे रंग
उड़ता बादल,चहकी चिड़िया
सब हैं मेरे संग

उड़नखटोला अभी उड़ा है
लेकर सपने साथ
आसमान की सैर करेंगे
दे दो अपना हाथ

प्यासा कौवा ढूँढ़ रहा है
पानी की एक मटकी
शेर आ रहा पास है अब तो
साँस हमारी अटकी

मुन्ना खाए आम रसीला
मुनिया देखे फूल
खेल-खेल में पढ़ते बच्चे
बातें सारी भूल।

चिड़िया रानी

चिड़िया रानी पल भर ठहरो
मुझको तुम एक बात बताओ
कैसे गाती इतना मीठा
आज पहेली यह सुलझाओ

कैसे नन्हे पंखों के बल
आसमान छू पाती हो
तुम्हें पकड़ने हम जो आएं
झट से तुम उड़ जाती हो

कैसे छोटी चोंच तुम्हारी
चुग जाती है दानों को
आज बताना होगा तुमको
हम नन्हे अनजानों को

एक दिन फुरसत में हमको भी
आसमान की सैर कराओ
चूं-चूं-चीं-चीं की भाषा में
नयी कहानी हमें सुनाओ।

सुबह सवेरा

हाथ थाम कर सूरज का
घर से चला सवेरा
चिड़ियों के पंखों ने डाला
आसमान में डेरा

धीमे-धीमे आँख मींचते
उठा है सारा बाग़
लहरों ने रच डाला  है
आज नया फिर राग

ढूंढ़ रहा है बादल कब से
खोयी हुई जुराब
भूल गया है मेज पे रख के
फिर वो नयी किताब

खिल आये हैं चेहरे फिर
फिर से सजे हैं खेल
जिससे कल झगड़ा कर आये
आज किया फिर मेल

सोबन ब्वौडा! असली आज़ादी तो तूने दिलाई : कमल जोशी

कमल जोशी

कमल जोशी जी से 20 जून को कोटद्वार में उनके घर पर मुलाकात हुई थी। मेरे आग्रह पर उन्‍होंने ‘लेखक मंच’ के लि‍ए छह रचनाएं दे दी थीं। अन्‍य रचनाएं देने का वादा कि‍या था। उनमें में से एक ‘रंगीली की खि‍चड़ी’ 26 जून को प्रकाशि‍त कर दी थी। अब पढ़ि‍ए उनकी एक और रचना-

हिमालय खूबसूरत दिख रहा था।

उखड़ती साँसों के बावजूद मैंने ट्राय-पोड लगाया, कैमरा सेट किया और फोटो खींचने लगा। हिमालय मनमोहक अदाएं दिखा रहा था। एक सुन्दर फोटो भी ट्रैकिंग की सारी थकान मिटा देती है। इन्हीं दृश्यों के लिए भी तो मैं यात्राएं करता हूँ।

मैं खतलिंग ग्लेशियर के इलाके में था। कल सुबह ही अपनी बाइक पर आया था। अपनी आदत और जिद के अनुरूप रेहा पिछली सीट पर कब्जा जमाये थी। चंबा से बूढ़ा केदार का रास्ता इतना खूबसूरत था कि जो रास्ता चार घंटे में कट जाना चाहिए था, उस पर ही हमने सारा दिन लगा दिया था। ज्यादा समय तो टिहरी डैम के नीचे दबे हुए टिहरी के यादों के बारे में बात करने में ही कट गया। कितनी बार टिहरी आया था और जिन सड़कों पर चला था, फटफटिया दौड़ाई थी, आज वो सब पानी के नीचे दबी थीं, जाने कैसी होंगी वे सड़कें अब? पानी के साथ आई गाद में दब गयी होंगी! …पर यादें हैं, जो हमेशा तैरती ही रहती हैं!

घनसाली के बाद घुमावदार रास्ता। दोनों तरफ कभी चीड़ की तो कभी मिलीजुली प्रजाति के पेड़। हवा में ठंडी खुनक और साथ में करेले के साथ नीम वाली तर्ज पर कवि हृदया रेहा। हर पचास कदम पर बाइक रोकने को कहती। रास्ते को महसूस करती, पेड़ों से बतियाती रेहा। किसी शहर में पले-बढ़े को इस रूप में देखना मुझ जैसे पहाड़ी को भला ही लगता है, और असमंजस भी होता है कि‍ हम पहाड़ी ही क्यों पहाड़ का इतना असम्मान करते है। शायद पहाड़ में रहने के दुःख और कठिनाइयां हमें इसकी सुन्दरता को अनदेखा करने को मजबूर कर देती हैं।

रेहा के साथ एक पंगा और है। वह जहां कहीं भी सड़क के किनारे के ढाबे में किसी औरत को काम करता देखती है, तो बिना रुके नहीं रहती। चाय पीनी तो लाजिमी है ही (मैं अपने प्रिय फैन-बिस्कुट का भक्षण भी करता हूँ), उस महिला से बात कर उसकी जिन्दगी और परिस्थितियों में झांकने की भी कोशिश करती है। कई बार मुझे दुभाषिये का काम भी करना होता है। ऐसे ही चमियाला से पहले एक ढाबे पर एक महिला चाय बना रही थी। रेहा ने मेरा कन्धा दबाया। मैने इशारा समझा और ढाबे पर बाइक रोक दी। चाय की जरूरत तो मुझे भी थी। उतरते ही चाय का ‘आर्डर’दे दिया गया। मेरी कमजोरी को देखते हुए रेहा ने महिला से पूछा, ‘‘क्‍या फैन भी हैं?’’ महिला ने ‘हाँ’ कहा तो रेहा ने फैन लेकर मुझे पकड़ाए और ताकीद दी, ‘‘तुम अपना मुंह फैन खाने में व्यस्त रखना, मैं जरा बात भी करती हूँ।’’ मैं निरीह बकरे की तरह फैन चबाने में व्यस्त हो गया। रेहा महिला के साथ बातें करने लगी। पता चला कि ढाबा मालकिन महिला का नाम सावित्री है और यह ढाबा उसके पति ने खोला था। पर ढाबा खोलते ही पति के यार दोस्तों ने यहां कब्जा जमा लिया।

‘‘ग्राहक कम आते थे और साथ के लुंड ज्यादा…मवासी तो घाम लगनी ही थी।’’ दुखी सावित्री ने बताया, ‘‘दारूड़ी भी गया था।’’

सावित्री ने पति को समझाया, दोनों बच्चों की जिम्मेदारी के बारे में बताया, ‘‘पर दारूड़ी किसी की सुनता है क्या?’’ ये सवाल उसने रेहा से ही कर डाला।

‘‘क्‍यों, अब कहाँ है पति।’’ रेहा ने जिज्ञासावश पूछा।

‘‘अरे कहाँ,  हमें नरक में छोड़ कर खुद भाग्याँन हो गया।’’ बिना भाव बदले सावित्री बोली, ‘‘ कर्जा ऊपर से छोड़ गया। मैं तो घर पर ही रहती थी।’’ उसने जोड़ा। फिर बताया कि जब कर्जा के तकाजे वाले आये और उन्हें लगता कि‍ अब कर्जा वापस नहीं मिलेगा, तो वे उसके पति को ही गाली देने लगते। पति तो पति ही था, सावित्री की नजर में। उसके लिए गाली कैसे सहती। इसलिए उसने तय किया कि‍ वह खुद ढाबा चला कर कर्जा उतार देगी। और उसने ऐसा किया भी। उसकी कर्मठता से विभोर रेहा ने उसे गले लगा लिया। मैं सिर्फ ‘शाबास भुली’का ही गंग्याट कर पाया।

रात को हम बूढ़ाकेदार ही रुके। यहाँ मेरे परिचित बिहारी भाई का आश्रम भी है, पर रात को उनको परेशान करना उचित नहीं समझा, तो एक छोटे से होटल में रहे।

सुबह चिड़ियों की चहचाहट से नीद खुली। बाइक को बुढा़केदार में ही छोड़ दिया गया। हम अगुंडा होते हुए  महासर ताल के रास्ते लगे। हमारा कोई निश्चित जगह जाने का कार्यक्रम नहीं था। उत्तराखंड, अरे नहीं तब उत्तराँचल, बने एक साल हुआ था यानी ये वृतांत 2001 का है।

मैं उत्तराखंड के बारे में लोगों की राय जानने को उत्सुक था इसलिए घूम रहा था। जब मैं नयी टिहरी में था तो रेहा का पता चला कि‍ मैं नयी टिहरी में हूँ, तो वह बिना बताये चंबा आ गई- इस फरियाद कम धमकी ज्यादा के साथ कि वह घूमना चाहती है। फिर क्या था, हम सतत आवाराओं की तरह निकल पड़े थे।

हम महासर के ऊपर एक धार में पहुंचे थे कि‍ मुझे हिमालय दिखाई दिया। मैंने ट्राइ-पौड तान दिया- फोटो के लिए। पिट्ठू लिए हुए रेहा भी पीछे से आकर पसर गई। फोटो खींचने की जल्दी इसलिए थी कि कहीं कोहरा खूबसूरत हिमालय को ढक न दे।

मैंने फोटो लीं, लाजिमी था कि रेहा के कुछ पोज उस ब्रेक ग्राउंड में भी लूं क्योंकि‍ खाने का सामान उसी के पिट्ठू में था। अगर यह न करता तो ये भी हो सकता था कि रेहा खुंदक में मुझे खाने के लिए कुछ ना दे या कम दे।

पेट में कुछ जाने के बाद आसपास देखा। लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर एक व्यक्ति बैठा था। आसपास गायें थीं। वह यहाँ इस छोटे से मैदान में पशु चराने ही आया था। वह भी हमें देख रहा था। हमारा रात को यहीं रहने का इरादा था क्योंकि‍ पास ही छोटा पानी का नाला भी था और कुछ दूरी पर छाने भी। रात काटने के लिए सुरक्षित जगह थी। उस व्यक्ति के अलावा और कोई आसपास नहीं था। मैं उससे ही जगह की जानकारी लेने गया। नजदीक पहुँच कर जैसे ही मैं उसको अभिवादन करता, उसने कहा, ‘‘गुड मोर्निंग।’’  मैं अचकचा गया। इस तरह के अंग्रेजी अभिवादन की आशा मुझे नहीं थी। वह एक बुजुर्ग थे और छोटी सी छड़ी लेकर एक पत्थर पर बैठे थे। वह लगभग बहत्तर-पिछत्‍तर साल के थे। मैंने भी ‘गुड मार्निंग’ कह कर उनको जवाब दिया और बिस्कुट का पैकेट खोल कर उनकी और बढा़या। पहले तो उन्होंने मना किया, पर रेहा न जाने कब पीछ-पीछे आ गई थी।  उसने कहा कि‍ ले लीजिये ना ताऊ जी। तो उन्होंने एक बिस्कुट ले लिया। उन्होंने हमें बैठने को कहा तो हम पास के ही पत्थर में बैठ गये। मैंने देखा कि‍ वहां पर एक पुरानी ब्रिटिश टाइम की गरम डांगरी रखी है। संयोग से उस पर जो मोनोग्राम था, उस पर रॉयल आर्मी जैसा कुछ लिखा था, जो बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही पता चल रहा था। मैंने पूछा कि‍ यह डांगरी आपके पास कहाँ से आई तो वह मुस्कराए और बोले कि‍ यह मेरी ही है। मैंने उनसे पूछा कि‍ वह ब्रिटिश फौज में थे, क्या। उन्होंने हामी भरी और कहा, ‘‘मैंने  वर्ल्ड वार भी लड़ा है। यह तब की ही है।’’

मैंने उनसे उनके फौजी जीवन के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि‍ वह आजाद हिन्द फौज में भी थे। अब दिलचस्पी बढ़नी स्वाभाविक थी। वह तो जिंदा इतिहास थे। रेहा ने स्वाभावानुसार डायरी निकाली और वृद्ध जी से नाम पूछा। उन्होंने अपना नाम सोबन सिंह बताया। उनसे बातें शुरू हुईं। कहानी दिलचस्प थी। उन्हीं के शब्दों में…

‘‘मैं जब चौदह साल का था, तो देश (मैदान) के बारे में बहुत सुना था। पौड़ी जिले के एक फौजी थे। वह जब छुट्टियों में आये तो अपनी बहन के घर हमारे गाँव आये। उनकी चमक-दमक देखकर हम बहुत प्रभावित हुए। तय कर लिया कि‍ फौज में भर्ती होंगे। पर टिहरी में तो भरती होती नहीं थी। हमें पता चला कि‍ लैंसडाउन में फौज की भरती हो रही है। मैं और मेरे दो दोस्त घर से बिना बताये लैंसडाउन के लिए भाग गए। रात को जिस गाँव में जाते और कहते कि‍ फौज में भर्ती होने जा रहे हैं तो लोग खाना खिला देते। सोने-ओढ़ने को दे देते। तब जमाना दूसरा था, पराया बच्चा भी अपना होता था। तीन दिन में लैंसडाउन पहुंचे। डर तो रहे थे।’’ सोबन सिंह जी ने बताया। लैंसडाउन पहुँचने पर वे लोग सीधे फौज के एक संतरी के पास पहुंचे और उसे सीधे सल्यूट किया। जब उसने पूछा तो उन्होंने बताया कि‍ हम फौज में भर्ती होने टिहरी से आए हैं। उसने कहा कि‍ परसों सुबह बटालियन ग्राउंड में आना। मैं सबसे छोटा था तो उसने मुझ से मेरी उम्र पूछी। मैंने बताया कि‍ चौदह साल है। वह संतरी बोला, ‘‘तुम्हारी उम्र छोटी है। तुम भर्ती नहीं हो सकते।’’ मैं बहुत दुखी हो गया। मेरी आँखों में आंसू आ गए कि अब घर किस मुंह से जाऊँगा। डर भी रहा था। मेरी हालत देखकर संतरी को दया आ गई।

शायद संतरी को पहले किसी ने इतनी इज्जत से सेल्यूट किसी ने नही किया था इसलिए वह प्रभावित हो गया था। वह बोला, ‘‘ तू पहाड़ी हिसाब से थोड़ा लंबा है। जब तेरी उम्र पूंछे तो अपनी उम्र सोलह साल बताना।’’

गुरुमंत्र पाकर सोबन सिंह खुश हो गए। उनको बीच का एक दिन काटना मुश्किल हो गया। पैसे नही थे, खाना कहाँ से खाएं और फौज की भर्ती की परीक्षा देनी थी। वह उदास बैठे थे। तभी एक काला कोट पहने व्यक्ति उधर से गुजरा। ‘‘हमें पता नहीं था कि‍ काला कोट वकील पहनते हैं और हम कचहरी के रास्ते पर हैं। उसने हमें देखा। शायद हमारे चेहरे पर भूख साफ दिखाई दे रही थी। उसने पूछा कि‍ कौन हो, क्यों बैठे हो। पहले तो हम घबराए कि‍ यह क्यों पूछ रहा है, पर बाद में उन्हें बताया कि‍ फौज में भरती होने आए है।’’

‘‘ भाग कर आए हो।’’ जब उन्होंने पूछा तो हमें काटो तो खून नहीं। हमारे साथ का एक रोने लगा। वह डर से रो रहा था या भूख से पता नहीं। यह मैंने सोबन सिंह जी से नही पूछा।

उन्होंने उसे रोते हुए देखकर पूछा कि‍ पैसे-वैसे हैं तुम्हारे पास! तो इन लोगों ने मना कर दिया।

‘‘जब उन्होंने पूछा कि‍ रात को खाना खाया कि‍ नहीं, तो हम चुप रहे।’’

काले कोट वाले व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘‘क्या भूखे पेट फौज में भर्ती होओगे?’’ फिर उन्होंने जेब से एक रुपिया निकाला और उन्हें दिया और ‘सि‍र्फ खाना खाना’ कहकर चला गए। काले कोट वाला वह वकील इन लोगों को देवदूत सा लगा!

‘‘हम तो उनका नाम भी नहीं पूछ पाए।’’ उस वक्त एक रुपया बहुत होता था। आज के 100 रुपयों से ज्यादा। हमने दो दिन उसी में काटे और तीसरे दिन भर्ती के लिये पहुंचे। उन दिनों आज की तरह कठिन नहीं था, भर्ती होना। अंग्रेजों को तो लड़ने के लिए भेड़-बकरी चाहिए थी। हमारी उम्र, लंबाई-चौड़ाई लि‍खी। मैदान में दौडा़या और वजन उठवाया। फिर एक डॉक्टर ने आला लगाकर कुछ देखा। बस उस समय ही डर लगा। और हम भर्ती हो गए।’’सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘लैंसडाउन में हमारी ट्रेनिंग हुई, नौ महीने के लिए और फिर हमें बरेली भेजा गया। दो महीने बाद ही हमें मलाया (मलेशिया) जापानियों से लड़ने भेज दिया। बम-गोले गिरते थे। पैंट में ही हग-मूत देते थे। बच्चे ही तो थे हम। बाद में हमें जापानियों ने पकड़ लिया। कैदी हो गया। ये सन (उन्नीस सौ) चवालीस  की बात होगी। कैद में हम दिन भर ड्रिल करते थे। जापानी हमसे ज्यादती भी करते थे।

‘‘एक दिन एक हिन्दुस्तानी हवालदार हमारे पास आया कि‍ क्या हम कैद से छूटना चाहते हैं? हमने कहा कि‍ क्या उसके पास भागने का कोई प्लान है। उसने कहा कि‍ भागना नहीं है। अपने देश के लिए लड़ना है। हमने कहा कि‍ वह तो हम कर ही रहे थे। तब उसने कहा कि‍ तुम देश के लिए नहीं, अंग्रेजों के लिए लड़ रहे थे। हमारी समझ में कुछ नहीं आया।’’ सोबन सिंह जी ने बताया।

‘‘एक दिन हमारी बड़ी परेड यानी सब कैदी हिन्दुस्तानी सिपाहियों को एक साथ मैदान में लाया गया। पता चला कि‍ कोई सुभाष बोस भाषण देंगे। हमने सोचा कि‍ जापानी अफसरों के होते हुए कोई हिन्दुस्तानी भाषण देगा- इसका मतलब है कि‍ वह कोई बड़ा आदमी होगा। भाषण में सुभाष बोस ने कहा कि‍ भारतवासी गुलाम हैं।  हमें गुलामी की जंजीर तोड़नी होगी। मेरी समझ में नहीं आया कि‍ गुलाम क्या होता है?. उन्होंने कहा कि‍ हमें देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लड़ना होगा। आजाद हिन्द फौज में भर्ती होना होगा।’’

‘‘बाद में पंजाबी हवालदार ने हमें गुलामी का मतलब समझाया। हमारी आंखें खुली कि‍ हम अब तक विदेशियों के लिए अपनी जान देने पर उतारू थे। हम आजाद हिन्द फौज में आ गए। रंगून, बर्मा में हमने अंग्रेजी फौज के खिलाफ लड़ा। हार गए और हमारे ऑफिसर ढिल्लों को अंग्रेजों ने जेल में डाल दिया था। जंगलों में भटकते रहे। इस डर से कि‍ पकडे़ जायेंगे, तो सजा होगी। हम गांवों में आ गये और सारे कागज फाड़ डाले कि‍ कहीं पकडे़ न जाएँ। देश जब आजाद हुआ, तो हमने समझा कि‍ हमें फौज वापस ले लेगी, पर पता चला की फौजी नियमों से हम बागी थे। कोई पेंशन नहीं। ‘‘हमने और हमारे साथियों ने कई बार सरकार को लिखा कि‍ हम अंग्रेजों के हिसाब से तो बागी थे, पर अपने हिन्दुस्तान के लिए ही तो लडे़ ही थे। हमारी सुध लो। पर कहीं से कोई जवाब नहीं।’’  इसके बाद सोबन सिंह चुप हो गए।

मैंने सोबन सिंह को ध्यान से देखा। यह भी एक स्वतन्त्रता सेनानी था। देश के लिए लड़ा। गोलियों का सामना किया था। यह यहाँ अपनी भेड-बकरियों के साथ जिंदगी बिताने के लिए अभिशप्त है। कुछ स्वतन्त्रता सेनानियों को ताम्र पत्र मिले, पेंशन मिली, उनके बच्चों को और बच्चों के बच्चों को भी रियायत मिली, नौकरी मिली! इस सेनानी का, जीवन के आखिरी मुकाम पर खडे़ सोबन सिंह का सहारा सिर्फ एक बांस की डंडी है….! यह भी तो स्वतन्त्रता सेनानी ही है। मैंने ध्यान दिया कि‍ बातों-बातों में रेहा ने कब सोबन सिंह का हाथ पकड़ लिया है और उसे सहला कर सांत्वना दे रही है। मुझे पता ही नहीं चला। सोबन सिंह उसे प्यार से देख रहे थे।

सोबन सिंह ने मेरी और देखा और कहा, ‘‘उत्‍तरांचल बन गया है। क्या हमारी भी कुछ पूछ होगी!’’ तब मैं कोई जवाब नहीं दे पाया था! सोबन सिंह जी से मिलने के सोलह साल बाद आज यह कह सकने कि‍ स्थिति में हूँ कि उत्तराखंड तो सिर्फ नेताओं और ठेकेदारों के लिए बना है ताऊ जी, आपको पूछने की फुर्सत किसी को नहीं.!

मुझे भी चुप देख कर सोबन सिंह जी ने हिमालय के तरफ देख कर कहा, ‘‘कोहरा साफ हो गया है।हिमालय की फोटो खींचो।’’

मैंने हिमालय की तरफ देखा- मुझे वो बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। सोबन ब्वौडा की बात सुनने के बाद मैं खुद को कोहरे से निकाल नहीं पा रहा था।

स्वतंत्रता, संवाद और विश्वास : महेश पुनेठा

पिछले दिनों फेसबुक पर मैंने एक प्रश्न पोस्ट किया कि आप अपना कोई भी कार्य किन परिस्थितियों में सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं? इसके उत्तर में लगभग दो दर्जन लोगों ने अपनी राय व्यक्त की, जिन्हें मोटे रूप में हम दो वर्गों में बांट सकते हैं। पहला वर्ग- जिनका कहना था कि वे दबाव, विपरीत परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण और विरोध के माहौल में अपना कार्य सबसे बेहतरीन रूप में कर पाते हैं। दूसरा वर्ग- जिनका कहना था कि वे जब मनचाहा काम हो और मनचाहे ढंग से करने की आजादी हो, अनुकूल परिस्थितियां हों, समय-समय पर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिल रहा हो, किसी तरह का कोई दबाव न हो और भयमुक्त वातावरण हो, ऐसे में बेहतरीन रूप में कार्य कर पाते हैं। दूसरे वर्ग के लोगों की संख्या अधिक थी। पहले वर्ग की बातें मुझे आदर्शवादी अधिक लगीं। कहने-सुनने में तो ये बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन वास्तविकता से काफी दूर हैं। ऐसे व्यक्ति अपवाद ही होंगे, जो भय-दबाव-अविश्‍वास और विपरीत परिस्थितियों में अपना बेहतरीन या सर्वश्रेष्‍ठ दे पाएं। कम से कम रचनात्मक कार्य तो बिल्कुल ही नहीं। यदि ऐसा होता तो दुनिया के सारे बेहतरीन काम गुलामों के खाते में होते। वास्तविकता यह है कि हम किसी भी कार्य को उन्हीं परिस्थितियों में बेहतरीन रूप में कर सकते हैं, जब हमें उस काम को करने के लिए पूरी स्वतंत्रता प्रदान की जाय, किसी तरह का कोई शारीरिक और मानसिक दबाव न डाला जाय, जहां भी उस कार्य को संपादित करने के लिए हमें कुछ जानने-समझने की जरूरत महसूस हो, उसके लिए हमें आवश्‍यक संवाद करने के पूर्ण अवसर दिए जायें। हम पर इस बात का विश्‍वास किया जाय कि हम उस कार्य को करने की क्षमता रखते हैं अर्थात हम उस कार्य को कर सकते हैं। बात-बात पर यदि हमारी ईमानदारी और निष्‍ठा पर शक किया जाता है, तो उसका प्रभाव हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है।

जैसा कि हमारा सरोकार शि‍क्षा से है और जब हम सीखने-सिखाने के संदर्भ में उक्त प्रश्‍न को देखते हैं, तो यहां भी दूसरे वर्ग के लोगों के उत्तर ही सटीक प्रतीत होते हैं। स्वतंत्रता, विश्‍वास और संवाद, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के मूल तत्व हैं। इन तीनों तत्वों के सही तालमेल के बिना सीखना-सिखाना संभव नहीं लगता है। यह बात शि‍क्षक और शि‍क्षार्थी दोनों पर बराबर रूप से लागू होती है। शि‍क्षक सिखाने की प्रक्रिया में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास चाहता है तो बच्चे सीखने की प्रक्रिया में। एक शि‍क्षक अपने शि‍क्षण और स्कूल प्रबंधन के दौरान तमाम तरह के प्रयोग तभी कर सकता है, जब उसे ऐसा करने की आजादी दी जाय, उस पर विश्‍वास व्यक्त किया जाय। साथ ही शि‍क्षक को खुद पर भी विश्‍वास हो तथा एक ओर उच्च अधिकारियों तो दूसरी ओर बच्चों के साथ निरंतर संवाद स्थापित करने के उसे अवसर प्रदान किए जायें। आज सरकारी शि‍क्षा का सबसे बड़ा संकट यही विश्‍वास का संकट है, जिसे एक सोची-समझी चाल के तहत पैदा किया गया है। इसी के बलबूते शि‍क्षा का बाजार फल-फूल रहा है।

शि‍क्षण एक कला है। कोई भी कला तब तक पूर्णरूप में विकसित नहीं हो सकती है, जब तक उसके लिए दबावमुक्त वातावरण न हो। इधर ‘जबावदेही’के नाम पर शि‍क्षक पर जिस तरह के नियंत्रण लगाए जा रहे हैं, वे उस पर दबाव ही अधिक बनाते हैं। बच्चों के परीक्षा-परिणामों को तो पहले से ही उसकी वेतन-वृद्धि और पदोन्नति से जोड़ा जा चुका था, अब उसकी कक्षा-शि‍क्षण प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सी.सी.टी.वी. कैमरे लगाने तक की बात की जा रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों ने इन उपायों पर अमल करके भी देख लिया है। इसके नाकारात्मक परिणाम ही देखने में आए। फिर भी इसका अनुकरण किया जा रहा है। दरअसल, इस तरह के उपाय शि‍क्षक की रचनात्मकता को प्रभावित करते हैं। उसे दायरे से बाहर जाकर कुछ नया करने से रोकते हैं। उसे स्वाभाविक नहीं रहने देते हैं। यह समझा जा सकता है कि अपनी वेतन वृद्धि-पदोन्नति और नौकरी बचाने के भय से ग्रस्त अध्यापक कभी भी बच्चों को भयमुक्त वातावरण नहीं दे सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि भय हमेशा कमजोर की ओर संक्रमित होता है।

दुनियाभर के शि‍क्षाविद् इस बात पर बल देते हैं कि बच्चों को भयमुक्त वातावरण दिया जाय। इसके पीछे यह तर्क है कि सीखने के लिए जिस अवलोकन, चिंतन और विश्‍लेषण की आवश्‍यकता होती है, वह दबावमुक्त वातावरण में ही हो संभव है। यदि बच्चों का मन-मस्तिष्‍क किसी भी प्रकार के दबाव में होता है तो वह एक तरह से व्यस्त होता है।ऐसे में बच्चे अवलोकन और विश्‍लेषण नहीं कर सकते हैं। अवलोकन और विश्‍लेषण के लिए मन का अवकाश में होना जरूरी है। साथ ही बच्चों की क्षमताओं पर विश्‍वास किया जाय, यह कतई न कहा जाय- ‘वे बच्चे हैं यह उनके वश की बात नहीं है।’ उनसे खुला संवाद किया जाय।लेकिन खाली स्वतंत्रता और विश्‍वास तब तक कारगर साबित नहीं होंगे, जब तक उनसे सार्थक संवाद न हो और उन्हें प्रश्न करने को प्रोत्साहित न किया जाय। साथ ही जहां उन्हें प्रोत्साहन की जरूरत है, वहां प्रोत्साहन और जहां मार्गदर्शन की जरूरत है, वहां मार्गदर्शन दिया जाय। दूसरे शब्दों में जब बच्चे जिस तरह की मदद चाहें,  उन्हें उस तरह की मदद देने के लिए तैयार रहा जाए। बच्चों की जिज्ञासा को जागृत किया जाय। अब यहां पर सवाल उठता है कि तमाम तरह के दबावों से दबा शि‍क्षक क्या ऐसा कर सकता है?

कतिपय शि‍क्षक-अभिभावक बच्चों को स्वतंत्रता प्रदान करने की बात पर चुटकी लेते हुए कहते हैं कि अब बच्चों को रोकना-टोकना नहीं है, वे जो चाहे उन्हें करने देना है, उनसे अब कुछ कहना नहीं है क्योंकि अब तो भयमुक्त वातावरण बनाना है। दरअसल, यह बात का सरलीकरण करना है। स्वतंत्रता का मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाय, वे जैसा चाहें, वैसा करते रहें। बच्चों के लिए स्वत्रंतता के साथ-साथ खुला संवाद भी बहुत जरूरी है। ध्यातव्य है, ‘संवादहीन स्वतंत्रता’को अराजकता में बदलने में देर नहीं लगती है। बच्चों को स्वतंत्रता देने के साथ ही उनसे और अधिक संवाद करना जरूरी हो जाता है। ऐसे में शि‍क्षक-अभिभावक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उसे पहले से अधिक रचनात्मक और कल्पनाशील होना पड़ता है। उसे संवाद के माध्यम से एक बड़ी दुनिया से बच्चों का परिचय कराना होता है। उनके हर प्रश्‍न का उत्तर देने की कोशि‍श करनी होती है। बच्चों के भीतर यह आत्मविश्‍वास पैदा करना पड़ता है कि वे चाहें तो बहुत कुछ कर सकते हैं। उनके भीतर अपार क्षमता है और वे अपनी क्षमताओं को पहचानें और खुद पर विश्‍वास करें। इस जिम्मेदारी को शि‍क्षक-अभिभावक तभी अच्छी तरह से निभा सकते हैं, जब बच्चों से अधिक से अधिक दोस्ताना संवाद स्थापित करें।

इस अंक को हमने कुछ ऐसे विद्यालयों पर केंद्रित किया है, जिनका कार्य अन्य विद्यालयों से हटकर है। जहां सीखने-सिखाने के नए तरीके अपनाए गए या अपनाए जा रहे हैं। आप पाएंगे कि इन सभी विद्यालयों के बीच सबसे बड़ी समानता यही है कि सभी के मूल में स्वतंत्रता, संवाद और विश्‍वास निहित है, जिनके अभाव में इस तरह के विद्यालयों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। इन्हें इस सिद्धांत के प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। इन विद्यालयों में बच्चों को दबाव मुक्त रखने और स्वतंत्रता देने के उद्देश्‍य से कक्षा-परीक्षा और स्कूल आने-जाने के समय तक में भी छूट दिखाई देती है।

इस अंक में हमारी कोशि‍श थी कि हम अधिक से अधिक ऐसे स्कूलों के बारे में जानकारी दें, जिनकी कार्यप्रणाली और शि‍क्षण प्रक्रिया परम्परागत पद्धति से हटकर है, जिन्हें ‘नवाचारी स्कूल’कहा जा सकता है। लेकिन हमें सरकार द्वारा तय मानकों के हिसाब से बहुत अच्छा कार्य कर रहे ‘अच्छे स्कूल’ तो बहुत सारे  मिले पर ‘नवाचारी स्कूल’ गिने-चुने ही। इस पर चिंतन करने की जरूरत है कि आखिर शि‍क्षा जैसे रचनात्मक क्षेत्र में भी नवाचार का इतना अभाव क्यों? क्यों नहीं हम लीक से हटकर सोच पा रहे हैं? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ‘क्या सख्ती से पेश आओ’नीति पर चलकर यह संभव है?

(शैक्षि‍क दखल, अंक-10, जुलाई 2017 से साभार)